धर्म

क़ुरआन पाक की बाज़ आयतें ऐसी हैं जो कुछ राज़ भरे हर्फ़ से शुरू होती हैं

Zia Imtiyaz
==========
क़ुरआन पाक की बाज़ आयतें ऐसी हैं जो कुछ राज़ भरे हर्फ़ से शुरू होती हैं,
इन हुरूफ़ को अलग अलग पढ़ा जाता है, जैसे “या-सीन”, “अलिफ़-लाम-मीम”, “ता-हा” वगैरह…. इसीलिए इनको “हुरूफ़ ए मुक़त्तआत” कहा जाता है, अभी तक इन हर्फ़ों का सही मतलब हम नही जान सके हैं….
.
हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के बारे में आमतौर पर उलमा की राय ये है कि ये क़ुरआन में कुछ कोड वर्ड हैं, और इन हुरूफ़ का मतलब सिवाय अल्लाह के कोई भी नहीं जानता…. इनको क़ुरआन में नाज़िल करने की हिकमत अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते होंगे हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते, लेकिन ये जिस तरह क़ुरआन में नाज़िल हुए थे उसी तरह हमें इन्हें लिखते और पढ़ते रहना चाहिए !!
.
…. यहां तक तो ठीक है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते,…. लेकिन कुछ मज़हबी रहनुमाओं को मैंने ये कहते देखा है कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत का मतलब समझने की इंसान को बिल्कुल कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये इंसानी इख़्तियार की बात ही नही है…
…. इस हाल में एक सवाल लाज़मी पैदा होता है कि जब अल्लाह क़ुरआन में ये फरमाता है कि क़ुरआन को नस्ले इंसानी की हिदायत के लिए नाज़िल फ़रमाया गया है, तो इसमें ऐसे हुरूफ़ अल्लाह ने क्यों नाज़िल किये जिन हुरूफ़ को समझना इंसानों के बस के बात ही न हो….??? अगर क़ुरआन हिदायत के लिए है तो इसमें न समझ में आने वाले कोड वर्ड का क्या काम ??
.
….. इस बारे में मैंने मौलाना इसरार अहमद रह० की एक तक़रीर सुनी थी कि नबी सल्ल० के ज़्यादातर सहाबियों ने भी हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की कोई तशरीह नही निकालने की कोशिश की और तमाम उलमा का इसी बात पर इज्मा है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते लेकिन इन्हें ये सोचकर क़ुरआन में पढ़ते रहें कि हमें नही, पर हो सकता है हमसे आगे आने वाली नस्लों में इन हुरूफ़ के मानी समझने वाले लोग भी हो जाएं, और कुछ नए राज़ खुल जाएं इसलिए इन हुरूफ़ के साथ ही क़ुरआन को नई नस्लों तक पहुँचाया जाता रहना चाहिए, ….. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हुरूफ़ की तशरीह करने की सहाबा के ज़माने में किसी ने कोशिश नही की उस वक्त भी अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० जैसे जलील उल क़दर सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब समझने की कोशिश की, उन्होंने खयाल ज़ाहिर किया कि “अलिफ़ लाम मीम” दरअसल एक पोशीदा आयत है जिसका खुलासा “अनल्लाहो आलमो” है, यानी “मैं अल्लाह, जानने वाला हूं” …. इसमे पहले हर्फ़ अलिफ़ से “अना”, दूसरे हर्फ़ लाम को लफ़्ज़ “अल्लाह” के बीच में लिया, और तीसरे लफ़्ज़ मीम को “आलमो” के आख़ीर में…

…. हालांकि इस ख्याल को बाक़ी लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० की ज़ाती राय माना, और इस खयाल को ज़्यादा मकबूलियत हासिल न हुई….
.
…. बहरहाल नबी के सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह की कोशिश की, इससे मेरी समझ में एक बात तो ये साफ़ हो जाती है कि आप सल्ल० ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को लेकर ऐसी कोई मनाही नही की थी कि इन हुरूफ़ का मतलब निकालने की कोई मुसलमान कोशिश न करे…

… चुनांचे बाद के ज़मानों में भी कुछ दानिशवरों ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह समझने की कोशिश की, …. जैसे मौलाना हमीद्दुदीन फराही रह० ने ख़्याल ज़ाहिर किया कि ये हुरूफ़ दरअसल जिस सूरत के शुरू में हैं, उस सूरत में बयान की गई किसी ख़ास बात की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए अल्लाह ने इन हुरूफ़ के ज़रिये इशारा किया है, …. मसलन उन्होंने बताया कि इब्रानी ज़बान में लफ़्ज़े “ता” से इशारा “साँप” की तरफ़ होता है, तो हुरूफ़ ए मुक़त्तआत से शुरू होने वाली सूरह “ता-हा” में हज़रत मूसा अस० की असा के सांप बन जाने का वाकया बयान किया गया है और, सूरह की शुरुआत में लफ़्ज़ “ता” से उसी साँप की तरफ़ इशारा किया गया है,

…. इसी तरह “नून” अरबी में मछली को कहा जाता है और हर्फ़ “नून” से शुरू होने वाली सूरह “नून वल क़लम” में उस ख़ास वाकये का ज़िक्र है जब हज़रत यूनुस अस० एक तवील अरसे तक के लिए एक मछली के पेट में फंसे रहे थे….!!!
.

…. बहरहाल, मेरा ये मानना है कि इस मसले पर अभी कोई आख़री राय क़ायम कर लेना जल्दबाजी होगी, …. जिस तरह हमारे बुज़ुर्गों ने ये सोचा कि हम नही, पर शायद अगली नस्लों में इन हुरूफ़ का राज़ जानने वाले लोग आ जाएं… यही मेरा भी सोचना है..

…… मैंने ये जाना है कि इससे पहले भी क़ुरआन पाक की बहुत सी आयतों के राज़ हमसे पहले के लोग नहीं जान पाए थे, जैसे फ़िरऔन की लाश किस तरह बची है, इस बात को सौ साल से पहले क़ुरआन में पढ़ने वाले लोग नही समझ पाते होंगे, इंसान की पैदाइश लोथड़े या जोंक से किस तरह हुई, इस बात को आज के ज़माने से पहले के मुसलमान क़ुरआन में पढ़ कर किस हद तक समझ पाते होंगे ?? लेकिन वो क़ुरआन को जस का तस आगे बढ़ाते रहे, और तरक़्क़ी ए ज़माना के साथ हम क़ुरआन के इन राज़ों को बेहतर ढंग से समझते गए….
.

… तो बेशक हुरूफ़ ए मुक़त्तआत में भी कोई हिदायत ही पोशीदा है, जो शायद बाद के ज़मानों की तरक़्क़ी के साथ इंसानों को समझ में आएगी…

…. लेकिन बाद के ज़माने के लोगों को इनके पीछे का राज़ भी तभी पता चल सकता है, जब हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को समझने की कोशिश करने वालों की मुखालिफत न की जाए… क़ुरआन पाक में अल्लाह बार बार इसकी आयतों पर ग़ौरो फ़िक्र करने की दावत इंसानों को देता है, लिहाज़ा ये सोच पालना कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब ढूंढने वाला शख़्स मज़हब के हिसाब से कोई गुस्ताखाना अमल कर रहा है, ये सोच पालना दुरुस्त नही !!!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *