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#IqbalDay : इस पेंटिंग में इक़बाल अपने वालिदैन के साथ हैं

भारत में मुग़ल हुकूमत के खात्मे के बाद ब्रिटिश राज कायम हो गया था, अंग्रेजी राज की बेशुमार ताकात के सामने भारत की जनता की आज़ादी की मांग ऐसे ही थी जैसे नक्कारख़ाने में ”तूती” की आवाज़ हो, अंग्रेज़ों के भारत पर कब्ज़ा कर लेने के बाद से ही उनके खिलाफ बग़ावत शुरू हो गयी थी, 1747 में मोलविवों ने बाकायदा जिहाद का एलान कर पहली खुली चुनौती दे दी थी, सय्यद अहमद सईद ‘शहीद’ से बुलंद हुई आज़ादी की आवाज़ देश की आज़ादी/बटवारे 1947 तक जारी रही, शुरू के 110 साल अंग्रेज़ों से अकेले भारत के मुसलमान लड़ते रहे, बाकी क़ौमों ने उसमे ज़रा भी हिस्सा नहीं लिया, मुसलमान लड़ रहे थे क्यूंकि हुकूमत मुसलमानों से अंग्रेज़ों ने लेली थी, बाकी नहीं लडे क्यूंकि वो समझते थे कि हम से क्या मतलब, हमारी न पहले हुकूमत थी और न अब, अंग्रेज़ों की हुकूमत को बल्कि भारत की ग़ैर मुस्लिम जनता के बड़े हिस्से ने ख़ुशी ख़ुशी अपनालिया था, वो खुश थे कि चलो, मुसलमानों से तो हुकूमत गयी, और इस तरह 1947 तक अकेले मुस्लमान अंग्रेज़ों से जंग करते रहे, जवाहर लाल नेहरू ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं, ”जंगे आज़दी की शुरुवात मुसलमानों ने की और मुल्क की बाकी क़ौमें भेड़ बकरियों की तरह पीछे पीछे हो लीं”,,यहाँ नेहरू ने बड़ी ईमानदारी से बात कही है

जब भारत के मुसलमानों के बाद दीगर लोगों पर अंग्रेज़ों ने शिकंजा कसना शुरू किया और उनके राज, जागीरें, ज़मींदारियाँ ख़तम कर दी गयीं तब आँख खुली कि ये सिर्फ मुसलमानों से राज पाठ नहीं गया है बल्कि देश पर ही अंग्रेज़ों का राज हो गया है, अंग्रेज़ों की सेना/पुलिस में गोरखा, सिख, राजपूत, मराठा थे, उनका राज इन्हीं के दम पर चला था, भारत में अँगरेज़ पचास हज़ार की तादाद से ज़ियादा कभी नहीं रहे थे, लेकिन उनका बनाया सिस्टम ऐसा था जो ‘हवा’ में आदमी को बे रस्सी के बाँध दे और वो हिल भी न सके, उनका पैदा किया हुआ खौफ आज भी लोगों के जिस्म में थरथराहट पैदा कर देगा, उनका ये बंदोबस्त कायम भारतीय कारिंदों, मुलाज़िमों के दम पर रहा

भारतीय उप महादीप में बीते दो सदियों में सर सय्यद अहमद खान से बड़ा कोई पोलिटिकल, सोशल, एजुकेशनल, रिलीजियस रिफॉर्मर, थिंकर, फिलास्फर, गाइड, मेंटोर मुस्लिम क़ौम में पैदा नहीं हुआ, सर सय्यद के ऊपर बाद के वक़्त में लोगों ने लिखा, बोला बहुत है मगर काम नहीं किया, सर सय्यद का विज़न बहुत बड़ा ‘ब्रॉड’ है, वो आलमी है, वो अपने अंदर हर अच्छाई को रखता है, उसमे मज़हब की बुनियाद पर फ़र्क़ नहीं है, वो मोर्डर्न ज्ञान, विज्ञान के ज़रिये तरक्की की राह दिखता है, सर सय्यद अहमद खां के इसी ‘मिशन’ को अल्लामा इक़बाल ने आगे चल कर अपनाया, अल्लामा इक़बाल जैसी शख्सियत ही सर सय्यद अहमद खान की विरासत को संभाल सकती है

अल्लामा ने क़ौम और मुल्क को पस्ती से उभारने के लिए सर सय्यद के रास्ते को चुना और वोही एक वाहिद रास्ता आज भी है तमाम मुसीबतों से निजात का, अल्लामा इक़बाल को अल्फ़ाज़ों में बयान करना, उनकी बुलंदी, उनके बारे में लिखना, कहना बहुत आसान नहीं है, अल्लामा ने भारत की तमाम क़ौमों को जगाया, उनके अंदर वसवसे पैदा किये, उनके अंदर के खौफ को ख़त्म किया, उन्होंने इंसान को उसका मक़सद याद दिलाया, उन्होंने मुसलमानों को झकझोर के रख दिया, ये कि अकेले अल्लामा इक़बाल ने भारतीय उप महादीप के लोगों को ग़ुलामी की ज़ंजीरें तोड कर आज़ादी के लिए उभारा,,,,

हज़ारों साल नरगिस अपनी बे नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

परवेज़ ख़ान

Syed Faizan Siddiqui
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#IqbalDay
इस पेंटिंग में इक़बाल अपने वालिदैन के साथ हैं ।
अल्लामा इक़बाल की पैदाइश से पहले उनके वालिद ने ख़्वाब में देखा कि एक कबूतर आसमान में उड़ रहा है और नीचे लोगों का मजमा है. हर कोई ये चाह रहा है कि ये कबूतर उसके पास आ जाए. थोड़ी देर में ये कबूतर अल्लामा के वालिद के पास आ कर बैठ गया.
अल्लामा के वालिद शैख नूर मुहम्मद बेहद मुफ़लिस और ख़स्ता हाल थे. बाजार में उन की टोपियों की दुकान थी. वो ख़ुद अपने हाथ से टोपी ( बुर्के वाली भी ) सी कर बेचते थे.
अल्लामा बचपन में अपने बड़े भाई अता मुहम्मद के साथ अपने घर के पास एक काग़ज़ के कारख़ाने में काग़ज कूटने जाते थे.
किसे ख़बर थी कि चंद पैसों के एवज़ काग़ज़ कूटने वाला ये बच्चा एक दिन अपनी शाइरी से एक आलम को जीत लेगा.
इक़बाल की शाइरी की घन गरज सुनकर ही दुनिया के लोग उर्दू के अदब की तरफ मुतवज्जे हुए. उन्होंने देखा कि एक बिल्कुल नई ज़बान में किस आला दर्जे की शाइरी मौजूद है. ये बात बिल्कुल ठीक है कि अपनी शाइरी के एतबार से उर्दू बर्रे सग़ीर की सब से मालदार ज़बान है. जैसी शाइरी उर्दू में की गई वैसी किसी और भारतीय भाषा में नहीं है.
उर्दू को बैनुल अक़वामी (international) सतह पर रूशनास अल्लामा ने ही कराया. जब उनका कलाम उनकी ही ज़िंदगी में यूरोपीय भाषाओं में तर्जुमा हुआ.
अपने सियासी नज़रियात की वजह से भले ही वो कुछ लोगों के निशाने पर रहे हों लेकिन इक़बाल अपनी शाइरी और खालिस इस्लामी फ़िक्र की वजह से दुनिया में एक अज़ीम शाइर तस्लीम किए गए हैं और आइंदा भी ये यक़ीन है कि जैसे जैसे कलाम ए इक़बाल नए ज़हनों पर खुलता रहेगा वैसे उनकी शायराना अज़मत में ईज़ाफ़ा होता रहेगा ।।

Syed Faizan Siddiqui
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#IqbalDay
अल्लामा इक़बाल के भाई उन्हें आखिरी वक़्त में तसल्ली दे रहे थे . तो अल्लामा ने फरमाया कि
نشان مرد مومن با تو گویم
چو مرگ آید تبسم بر لب اوست
निशान ए मर्द ए मोमिन बा तू गोयम
चू मर्ग आयद तबस्सुम बर लब ए ओस्त
मैं आपको मर्द ए मोमिन की निशानी बताऊँ, जब मौत आती है तो उसके होंठों पर मुस्कुराहट होती है.

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