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इस निर्दयी दुनिया और इस हाहाकार में अंतर्रात्मा की आवाज़ को तस्वीरों में अधिक ध्यान से देखें और सोचें : रिपोर्ट

यहूदी देश बनाये जाने का कानून

19 जुलाई 2018 को जायोनी संसद ने यहूदी देश बनाये जाने पर आधारित एक कानून पारित किया।

नस्लभेद के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कन्वेन्शन संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में 21 दिसंबर 1965 को पारित किया गया। इस कन्वेशन में हर प्रकार के भेदभाव से दूर रहने की बात की गयी है। इस अंतरराष्ट्रीय कन्वेशन में हर प्रकार के नस्ली भेदभाव से दूर करने की परिभाषा में आया है कि हर प्रकार के भेदभाव को जातिवाद या नस्ली-भेदभाव कहा जाता है जिसका लक्ष्य सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से असमानता हो। इस बात के दृष्टिगत जायोनी शासन की संसद ने 19 जुलाई को यहूदी देश बनाये जाने पर आधारित जो कानून पारित किया है वह नस्लीभेदभाव का खुला प्रतीक है। क्योंकि यह कानून यहूदी जाति के श्रेष्ठ होने पर बल देता है। इस कानून के अनुसार फिलिस्तीनी भूमि यहूदी राष्ट्र का एतिहासिक वतन होगा, यह कानून हिब्रू भाषा को यहूदियों की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देता है। इसी तरह यह कानून कुद्स नगर को जायोनी शासन की राजधानी के रूप में मान्यता देने के अलावा फिलिस्तीन की अतिग्रहित भूमियों में जायोनी कालोनियों में विस्तार का भी समर्थन करता है। जायोनी शासन के इस कानून की जितनी भी समीक्षाएं की गयीं और उस पर प्रतिक्रियायें व्यक्त की गयीं सबमें इस कानून को नस्लभेद का स्पष्ट उदाहरण बताया गया।

अंतरराष्ट्रीय कन्वेशन की भूमिका में हर उस श्रेष्ठता को रद्द किया गया है और उसकी भर्त्सना की गयी है जिसका आधार जातिवाद हो और सामाजिक दृष्टि से वह अन्यायपूर्ण और ख़तरनाक है और किसी प्रकार से उसका औचित्य नहीं दर्शाया जा सकता। जाति, रंग या नस्ल के आधार पर लोगों के मध्य भेदभाव राष्ट्रों के मध्य मित्रतापूर्ण और शांतिंपूर्ण संबंधों की दिशा में बहुत बड़ी बाधा है और यह चीज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और इसी प्रकार एक देश या सरकार के भीतर शांतिपूर्ण संबंधों में विघ्न उत्पन्न कर सकती है और मानव समाज की आकांक्षाएं और नस्लभेद पर आधारित रुकावटें एक साथ नहीं हो सकतीं। इन सब बातों के दृष्टिगत कहना चाहिये कि नस्लभेद भर्त्सनीय है और सामाजिक दृष्टि से वह खतरनाक है, मित्रतापूर्ण संबंधों की दिशा में बहुत बड़ी रुकावट है और अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा को खतरे में डालता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय कन्वेशन में स्पष्ट शब्दों में नस्लभेद और जातिवाद की भर्त्सना की गयी है। अंतरराष्ट्रीय कन्वेशन के अलावा दूसरे विभिन्न कानून व घोषणापत्र भी हैं जिनमें नस्लवाद और जातीय भेदभाव की निंदा की गयी है। संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र में भी नस्लवाद की निंदा की गयी है। मानवाधिकार के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र में भी बल देकर कहा गया है कि समस्त इंसान हैसियत, प्रतिष्ठा और अधिकार की दृष्टि से समान हैं। इसी प्रकार इस घोषणापत्र में बल देकर कहा गया है कि नस्ल एवं वंश की दृष्टि से समस्त इंसान बराबर हैं। इसी प्रकार मानवाधिकार के इस घोषणापत्र में बल देकर कहा गया है कि कानून के मुकाबले में सब बराबर हैं और सबको किसी प्रकार के भेदभाव के बिना समान कानूनी अधिकार प्राप्त हैं।

बहरहाल एक यहूदी देश का कानून, नस्ली सफाया, मानवता विरोधी अपराध, युद्ध अपराध और अतिक्रमण जैसे अपराधों का स्पष्ट उदाहरण है और यह वह चीज़ें हैं जिनका अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के घोषणा पत्र में उल्लेख किया गया है। रोम घोषणापत्र में भी किसी गुट के सदस्यों को शारीरिक या मानसिक पीड़ा देने को नस्ली सफाये का नाम दिया गया है और एक यहूदी देश बनाये जाने के संबंध में जो कानून पारित किया गया है उससे फिलिस्तीनियों को भारी शारीरिक व मानसिक पीड़ा पहुंचेगी। इसी प्रकार रोम घोषणा पत्र में उस चीज़ को युद्ध अपराध का नाम दिया गया है जो शारीरिक व मानसिक पीड़ा का कारण बनती हो।

इस्राईली संसद ने एक यहूदी देश बनाये जाने के संबंध में जो कानून पारित किया, नस्लभेदी होने के कारण उसकी फिलिस्तीनियों, गैर फिलिस्तीनियों हस्तियों के अलावा अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी भर्त्सना की।

फिलिस्तीन के जेहादे इस्लामी आंदोलन के एक नेता यूसुफ अलहसाइने ने इस कानून की प्रतिक्रिया में बल देकर कहा कि जायोनी शासन की संसद में एक यहूदी देश बनाये जाने के संबंध में पारित होने का कानून नस्लवाद और घृणा का प्रतीक है। इस कानून से यह बात सिद्ध होती है कि अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि जायोनी शासन अतिग्रहित फिलिस्तीनी भूमियों में फिलिस्तीनियों के अस्तित्व को समाप्त करने की दिशा में प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि यह कानून इसी प्रकार जार्डन नदी के पश्चिमी किनारे की और अधिक भूमियों को जायोनी कस्बों में मिला लेने का मार्ग प्रशस्त करता है और इस कानून के लागू होने की स्थिति में कुद्स और फिलिस्तीन के अतिग्रहित दूसरे क्षेत्रों में फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकालने का नया क्रम आरंभ हो जायेगा। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय और रोम घोषणा पत्र में भी कहा गया है कि किसी को ज़बरदस्ती निकालना या भगाना खुला मानवता विरोधी अपराध है।

मलेशिया में इस्राईल बहिष्कार आंदोलन के नेता मोहम्मद नज़री इस्माईल इस संबंध में कहते हैं कि इस शासन ने दुनिया को दिखा दिया है कि उसका आधार जातिवाद व नस्लभेद है और इस शासन के लिए नस्लभेद से बेहतर कोई दूसरा शब्द नहीं मिल सकता जिस तरह से दक्षिण अफ्रीका की नस्ल व रंगभेदी सरकार का राष्ट्रों और सरकारों ने बहिष्कार किया था उसी तरह से पूरी दुनिया में इस्राईल का भी बहिष्कार किया जाना चाहिये। जार्डन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र अर्राये में अरब पत्रकार जार्ज ज़रीफ़ ने लिखा कि इस्राईली संसद नेसेट में इस कानून का पारित होने का अर्थ नस्लभेदी व्यवस्था की मज़बूती है और इस्राईल इस कानून को पारित करके फिलिस्तीनियों के खिलाफ नस्ल भेद को लागू कर रहा है।

एक दूसरा अरब पत्रकार मोअफ्फक मुतिर फिलिस्तीनी पत्रिका अलहयातुल जदीदा में लिखता है कि इस्राईल की संसद में अतिवादी और नस्लभेदी प्रतिनिधियों ने इस कानून के पक्ष में मत देकर इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया है कि इस्राईल एक अतिग्रहणकारी और नस्लभेदी सरकार है।

एक अन्य अरब पत्रकार फाएज़ रशीद भी समाचार पत्र अलवतन में लिखता है कि यहूदी देश के कानून का पारित होना अपेक्षा से परे कार्य था और इस्राईल जैसी फासीवादी सरकार से इसके अलावा कोई दूसरी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिये। इस कानून का अर्थ जायोनी नस्लभेद की मज़बूती, फिलिस्तीनियों को अपनी मातृभूमि में वापसी के अधिकार को खत्म कर देना और जायोनी कालोनियों के निर्माण को कानूनी रूप देना है।

एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने कहा है कि इस्राईल द्वारा एक यहूदी देश के कानून के पारित करने का अर्थ फिलिस्तीनियों के खिलाफ अतिग्रहित भूमियों में नस्लभेद को वैधता प्रदान करना है। इसी प्रकार इस संगठन ने स्पष्ट करके कहा है कि इस समय फिलिस्तीन के अतिग्रहित क्षेत्रों की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत भाग फिलिस्तीनी हैं और अब उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जायेगा।

वास्तविकता ये है कि इस्राईली संसद नेसेट में एक यहूदी देश बनाये जाने के संबंध में पारित होने वाला कानून पहला और आखिरी कानून नहीं है। क़तर की अलजज़ीरा साइट ने इस्राईली संसद में पारित होने वाले कुछ नस्लभेदी कानूनों की ओर संकेत किया और लिखा है कि 6 फरवरी 2017 को जायोनी कालोनियों के निर्माण को सुव्यवस्थित बनाये जाने के संबंध में कानून पारित हुआ, नवंबर 2016 को कुछ स्थानों पर अरबी भाषा प्रयोग न करने का प्रस्ताव पारित हुआ और इसी प्रकार 13 नवंबर 2016 को अज़ान न प्रसारित किये जाने का प्रस्ताव पारित हुआ और यह ये सब जायोनी संसद में पारित होने वाले नस्लभेदी कानून के कुछ नमूने हैं।

इससे पहले जुलाई 1998 में राष्ट्रसंघ की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समिति ने स्पष्ट शब्दों में इस्राईल को एक नस्लभेदी सरकार कहकर उसकी आलोचना की थी और घोषणा की थी कि 1998 में पारित होने वाले कानून के अनुसार फिलिस्तीनियों को दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जायेगा। इसी मध्य पश्चिम एशिया के लिए राष्ट्रसंघ के आर्थिक और सामाजिक आयोग ने मार्च 2017 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें जायोनी शासन पर फिलिस्तीनियों के साथ नस्लभेदी व्यवहार करने का आरोप लगाया था। इस आयोग के तत्कालीन राष्ट्रसंघ के महासचिव के सहायक रीमा ख़लफ ने कहा था कि यह पहली बार है जब राष्ट्रसंघ से संबंधित किसी संस्था ने खुल्लम खुल्ला इस्राईल को एक नस्लभेदी सरकार की संज्ञा दी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एन्टोनियो गुटेरस ने इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद रीमा ख़लफ से मांग की थी कि वह अपनी रिपोर्ट को वापस ले लें परंतु उन्होंने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

इस्राईल को जो नस्लभेदी सरकार की संज्ञा दी गयी है वह केवल ग़ैर इस्राईलियों तक सीमित नहीं है बल्कि स्वयं इस्राईल की कुछ हस्तियों और नेताओं ने भी उसे नस्लभेदी सरकार की संज्ञा दी है और फिलिस्तीनियों के खिलाफ इस्राईल की कार्यवाहियों की भर्त्सना करते हैं। इस्राईल की मेर्टज़ पार्टी के नेता ज़हावा गैलोन ने पिछले वर्ष तेलअवीव विश्व विद्यालय से संबंधित एक सुरक्षा संस्था की कांफ्रेन्स में भाषण देते हुए कहा था कि जो कुछ फिलिस्तीन की अतिग्रहित भूमियों में हो रहा है वह नस्लभेद है और इस्राईल ने दसियों लाख फिलिस्तीनियों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया है।

यह बात सिद्ध हो गयी है कि इस्राईल नस्लभेदी कार्यवाहियां और मानवता विरोधी अपराध कर रहा है फिर भी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यहूदी देश कानून को लागू होने से रोकने के लिए जायोनी शासन पर दबाव नहीं डाला गया। शायद इसकी वजह यह है कि विश्व समुदाय इस परिणाम पर पहुंच गया है कि इस्राईल को यूरोपीय और पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका का व्यापक समर्थन प्राप्त है और इसी समर्थन की छत्रछाया में वह फिलिस्तीनियों के खिलाफ अपराधों को जारी रखे हुए है और उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं है।

रणक्षेत्र में फ़ोटो और जीवनी के विषय

कभी कहा जाता था कि एक तस्वीर के कई पहलू होते हैं या एक तस्वीर हज़ारों कहानियां बयान करती हैं किन्तु अब हम ऐसे काल में जीवन व्यतीत कर रहे हैं जिसमें सब कुछ बदल गया है और फ़ोटो को कम ही देखा जाता है।

फ़ोटो पर नज़र डालने से हमको अतीत की याद आने लगती है और हम अपने अतीत में खो जाते हैं।

तस्वीरों के इतिहास में बहुत से फ़ोटोग्राफ़र और चित्रकार यहां तक कि कुछ आम लोगों ने ऐसे फ़ोटो ली है जिसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। वह तस्वीरें कम नहीं है जिसने आम जनमत यहां तक कि दुनिया के राजनेताओं को भी प्रभावित किया है, इतिहास बदल दिया और दुनिया में इतिहास को झिंझोड़ने वाली तस्वीरें बन गयीं।

समाचारिक फ़ोटो, यद्यपि हालिया वर्षों में घटनाओं को ख़बरों और प्रमाणों के साथ पेश किया गया किन्तु इसकी मुख्य ज़िम्मेदारी समाचार पत्रों के लिए आश्चर्यजनक और व्यापक तस्वीरों को जमा करना था ताकि अधिक से अधिक बिक्री की जा सके।

वार फ़ोटो, समाचारिक फ़ोटो की शाखा है जो युद्धग्रस्त क्षेत्रों के जीवन और सशस्त्र झड़पों का चित्रण पेश करते हैं। युद्ध संबंधी फ़ोटो लोगों को युद्ध की त्रासदियों को सही ढंग से समझने और युद्धग्रस्त क्षेत्रों के हालात को सही तरीक़े से समझने में मदद करती है, यह बात केवल युद्धग्रस्त क्षेत्रों या झड़पों वाले क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। युद्ध के खंडहरों, इंसान को होने वाले नुक़सानों को और उसकी परेशानियों, एक थके हुए सैनिक और दुख दर्द में भरे बच्चे की तस्वीर पेश करना, दक्षता का काम है।

युद्ध के क्षेत्र के फ़ोटोग्राफ़र हमेशा यह प्रयास करता है कि इस प्रकार से फोटो ले विधटनाओं ड्रामैटिक आयाम मज़बूत हो जाए। यूरोपीय सुरक्षा और सहयग संगठन में स्वतंत्र मीडिया के विशेषज्ञ फ़्रिमोट डू फ़ार्स खाड़ी के युद्ध की तस्वीरों को टेलीवीजन सीरियल की भांति बताते हैं जो हमेशा से संबोधकों में यह जिज्ञासा पैदा करती है कि मामले की तह तक जाएं और मीडिया इस प्रकार से अपने संबोधकों और पाठकों की संख्या में वृद्धि करता है और विज्ञापनों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करता है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि समय बीतने के साथ साथ फ़ोटोग्राफ़रों का मानवता प्रेमी संदेश और युद्ध, निर्धनता और बीमारी को समाप्त करने में निहित होता है और संकट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में संबोधकों की संवेदनशलता को किसी सीमा तक बदल दिया है।

ईरान – इराक़ युद्ध की फ़ोटो और उसके फ़ोटोग्राफ़र्स के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है किन्तु अभी तक ईरान के इस महत्वपूर्ण भाग के पहलू अनछुए हैं। इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के दौरान की झिंझोड़ देने वाली तस्वीरें अभी तक बाक़ी हैं। इन फ़ोटोज़ ने असमान्य युद्ध की वास्तविताओं को दुनिया के सामने पेश किया था। यह तस्वीरें ईरानी राष्ट्र पर पश्चिमी मीडिया के निरंतर हमलों की गाथांए सुनाती हैं जब झूठे मीडिया का ही बोलबाला था।

थोपे गये युद्ध की समाप्ति को लगभग तीस साल हो रहे हैं और पवित्र प्रतिरक्षा और क्रांति के फ़ोटोग्राफ़रों के संघ के अनुसार उस काल से अब तक 12 लाख तस्वीरों को जमा किया गया है। यह तस्वीरें, फ़्रंट लाइन से लेकर योद्धाओं की जीवनियों और युद्ध की त्रासदियों को भी बयान करती हैं।

महदी मुनइम उन पहले फ़ोटोग्राफ़रों में है जिन्होंने विभिन्न रूप में ईरान विरुद्ध इराक़ द्वारा थोपे गये युद्ध से उत्पन्न होने वाले नुक़सानों और मारे गये लोगों की तस्वीरें जारी की हैं। वह एक स्वतंत्र फ़ोटोग्राफ़र है जिन्होंने “युद्ध की भेंट चढ़ने वाले” और ” आशा का चमत्कार” नामक दो पुस्तकें प्रकाशित की है। युद्ध की भेंट चढ़ने वाले नामक पुस्तक में उस व्यक्ति की तस्वीर प्रकाशित की है जो धमाके के बाद अपंग हो गया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में दस करोड़ से अधिक बारूदी सुरंगें लगी हुई हैं। इसके साथ ही दुनिया में सैन्य झड़पों के नुक़सानों और ख़तरों के बावजूद इनकी संख्या में वृद्धि हुई है। होने वाले शोध के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान, बोसनिया, कंबोडिया और मोज़ाम्बिक जैसे चार देशों में, बड़ी संख्या में लोग अपने अपने देशों में अपनी दिनचर्या के दौरान बारूदी सुरंगों का सामना करते हैं।

ईरान में आम नागरिक, गांववासी, सीमावर्ती, क़बाईली और बच्चे सबसे अधिक बारूदी सुरंगों की चपेट में आते हैं। इन धमाकों में बचने वाले एक तिहाई लोग, अपंग हो जाते हैं और यह प्रतिशत बच्चों के छोटे शरीर के दृष्टिगत और अधिक बढ़ जाता है। हालिया दो दश्कों में और वर्ष 1999 से मरने वालों और घायलों की संख्या चरम सीमा तक पहुंच गयी थी।

हालिया कुछ वर्षों के दौरान विश्व की बड़ी शक्तियों की ओर से आतंकवादियों के समर्थन और क्षेत्रीय झड़पें बढ़ने के कारण झड़पों की तस्वीरों बढ़ गयी हैं। निसंदेह वर्ष 2015 में बच्चे की सबसे प्रसिद्ध तस्वीर सीरिया के कुर्द बच्चे की तस्वीर थी जो तुर्की के समुद्र तट पर औंधे मुंह मुर्दा हालत में पाया गया। इस तस्वीर ने यूरोप में शरणार्थियों के संकट में मानवीय त्रासदी के पहलू को उजागर किया और दुनिया के सामने शरणार्थियों की दयनीय स्थिति पर चिंतन मनन करने के लिए एक पहलू छोड़ दिया। इस वर्ष दुनिया में अपने घर से बेघर होने वालों की संख्या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे अधिक है।

यूरोप में शरणार्थियों के रूप में रहने वाले अधिकतर लोग हिंसा और पाश्विकता की वजह से फ़रार हुए हैं और हम उस हिंसा और पाश्विकता की कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से आधे से अधिक लोग वर्ष 2015 में सीरिया में थे। लंदन स्थित ग़ैर सरकारी संस्था ह्यमून राइट्स वाच ने रिपोर्ट दी है कि मार्च 2011 के मध्य से अब तक कम से कम तीन लाख पचास हज़ार लोग सीरिया में आंतरिक युद्ध के कारण अपनी जान गवां चुके हैं। यूनीसेफ़ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भी इस स्थिति के जारी रहने वाले चेतावनी भरे फ़ोटो जारी किए हैं। यदि आप कप्यूटर पर सर्च करने लगे तो आपको बहुत से बच्चों की हृदय विदारक तस्वीरें मिल जाएंगी। मीडिया द्वारा जनसंहार और युद्ध की तस्वीर पेश करने का क्रम समाप्त नहीं होगा। दूसरा उदाहरण यमन युद्ध की तस्वीर है। यह युद्ध सऊदी अरब के नेतृत्व में शुरु हुआ जिसमें अब तक दसियों हज़ार लोगों की जान जा चुकी है और इस देश में व्यापक स्तर पर सूखापन हो गया है और परिवेष्टन के कारण इस निर्धन अरब देश को दवाओं और खाद्य पदार्थों में कमी का सामना है। यही नहीं इस देश में व्यापक स्तर पर महामारी भी फैल रही है और विस्तृत पैमाने पर लोग हैज़े में ग्रस्त हो गये हैं।

यमन के तीन वर्षीय युद्धके कारण इस निर्धन अरब देश को बहुत अधिक नुक़सान उठाना पड़ा है। सनआ में विकास और अधिकार केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार इस युद्ध के हज़ारवें दिन इसमें मरने वालों की संख्या 13 हज़ार 603 हो गयी है जिनमें 2887 बच्चे और 2027 महिलाएं शामिल हैं। इस हमले के आरंभिक 33 महीनों में 26 लाख पचास हज़ार लोग बेघर हुए जबकि इस देश का आधार भूत ढांचा पूरी तरह तबाह हो गया। रेड क्रिसेंट संस्था की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान समय में यमन की 80 प्रतिशत जनता पेय जल, खाद्य पदार्थ, ईंधन और चिकित्सा संसाधनों से वंचित है।

यूनीसेफ़ ने घोषणा की है कि यमन के बीस लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हो गये हैं। इसके अतिरिक्त यमन में हर दस मिनट पर एक बच्चा कुपोषण और बीमारी के कारण काल के गाल में समा जाता है। मीडिया निरंतर यमन में होनी वाली त्रासदी की तस्वीरें दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं।

अंत में वह नमूना पेश करना चाहते हैं जो अभी हाल ही में पेश आया है। सोमवार 14 मई को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अपने दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का फ़ैसला किया। बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी के रूप में घोषित करने का ट्रम्प प्रशासन का फ़ैसला, ग़लत और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। यह विषय संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के भी ख़िलाफ़ है तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने बल दिया है कि अवैध अधिकृत धरती की क़ानूनी हैसियत का सम्मान किया जाना चाहिए।

ट्रम्प प्रशासन के इस फ़ैसले से दुनिया के मुसलमानों और फ़िलिस्तीनियों में आक्रोश फैल गया और ज़ायोनी सैनिकों ने इस फ़ैसले के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले फ़िलिस्तीनियों का ग़ज़्ज़ा पट्टी और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में जमकर दमन किया।

वर्षों से मीडिया और न्यूज़ एजेन्सियां फ़िलिस्तीनी जनता की स्थिति और उन पर हो रहे अत्याचारों को दुनिया के सामने पेश करती रही हैं। हालिया दिनों में होने वाले फ़िलिस्तीनियों के प्रदर्शनों को भी मीडिया ने व्यापक स्तर पर कवरेज दिया। इन्हीं प्रदर्शनकारियों में एक फ़िलिस्तीनी जवान भी नज़र आया जो व्हील चेयर पर बैठकर प्रदर्शन कर रहा था।

इस अपंग फ़िलिस्तीनी का नाम फ़ादी अबू सलाह था जो वर्ष 2008 में जब वह केवल 19 साल का था, ग़ज़्ज़ा पर ज़ायोनी सैनिकों की बमबारी में अपने दोनों पैर गंवा बैठा था। अबू सलाह दस साल बाद नकबा दिवस के अवसर ज़ायोनी स्नापर की गोली से शहीद हो जाता है।

क्या मनुष्यों पर हो रहे इन अत्याचारों पर चुप रहा जा सकता है? हम कैसे इसका चित्रण पेश कर सकते हैं और कैसे इस निर्दयी दुनिया के सामने आंखें बंद कर सकते हैं? क्या हम इस रणक्षेत्र में आराम से जीवन व्यतीत कर सकते हैं?

फ़ोटोग्राफ़र इस निर्दयी दुनिया और इस हाहाकार में अंतर्रात्मा की आवाज़ को नई आवाज़ दे सकते हैं, उनकी तस्वीरों को अधिक ध्यान से देखें और सोचें।

 

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