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बर्बर इस्राईल और अमेरिकी आतंकवाद से कराहती दुनियां और अरब जगत : रिपोर्ट

 

किस साल ज़ायोनी सैनिकों ने 1300 फ़िलिस्तीनियों को शहीद किया और उसके जवाब में फ़िलिस्तीनियों ने 160 इस्राईली सैनिकों को मौत के घात उतारा

इलाक़े की अरब सरकारें, कभी भी फिलिस्तीनियों के साथ नहीं थीं, हम बढ़ा रहे हैं अपनी ताक़त, हिज़्बुल्लाह

लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन के उप महासचिव ने कहा है कि इलाक़े की गद्दार अरब सरकारें, कभी भी फिलिस्तीनियों के साथ नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी प्रतिरोध मोर्चे का समर्थन किया है।

शेख नईम क़ासिम ने फिलिस्तीनियों के पहले इन्तेफाज़ा आंदोलन की वर्षगांठ के अवसर पर मंगलवार को एक भाषण में कहा कि ज़ायोनी शासन ने बरसों से फिलिस्तीनियों का अधिकार हड़प कर रखा है लेकिन फिलिस्तीनियों की हर पीढ़ी ने फिलिस्तीनी आकांक्षा की रक्षा की है और उसे जीवित रखा है।

हिज़्बुल्लाह आंदोलन के उप महासचिव ने कहा कि इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने अरब सरकारों ने अपना असली रूप दिखा दिया लेकिन प्रतिरोध मोर्चा, संतुलन बनाने के लिए लेबनान, फिलिस्तीन और इलाक़े में अपनी ताक़त बढ़ाएगा।

यूएई और बहरैन ने गत सितंबर में इस्राईल के साथ संबंध सामान्य बनाने के समझौते पर हस्ताक्षर किये।

फिलिस्तीनियों का पहला इन्तेफ़ाज़ा आंदोलन सन 1987 में शुरु हुआ था और सन 1993 में ओस्लो समझौते के साथ खत्म हुआ। अलअक़्सा इन्तेफाज़ा 28 सितंबर सन 2000 में शुरु हुआ और सन 2005 तक जारी रहा जबकि कुद्स इन्तेफाज़ा अक्तूबर सन 2015 में आरंभ हुआ और अब तक जारी है।

इस्राईल का बर्बर रवैया, कोरोना टेस्ट के लिए ज़रूरी सामान ग़ज़्ज़ा जाने से रोका, ग़ज़्ज़ा में कोरोना का टेस्ट रोकना पड़ा

इस्राईल की नाकाबंदी से घिरे ग़ज़्ज़ा पट्टी में कोरोना की टेस्टिंग रुक गयी है क्योंकि इस्राईल ने नाकाबंदी कड़ी कर दी है।

फ़ार्स न्यूज़ के मुताबिक़, ग़ज़्ज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को बताया कि ग़ज़्ज़ा के केन्द्रीय लैब में ज़रूरी साज़ो-सामान ख़त्म होने की वजह से कोरोना का टेस्ट रुक गया है। उन्होंने बताया कि ज़ायोनी शासन बाहर से मेडिकल साज़ो-सामान, ग़ज़्ज़ा में दाख़िल नहीं होने दे रहा है, जिसकी वजह से ग़ज़्ज़ा के स्वास्थ्य तंत्र की हालत बहुत ख़राब हो गयी है।

ग़ौरतलब है कि इस्राईन ने 2006 से ग़ज़्ज़ा की ज़मीनी, हवाई व समुद्री नाकाबंदी कर रखी है जिसकी वजह से इस इलाक़े के 20 लाख लोग बहुत ही दयनीय ज़िन्दगी बिताने को मजबूर हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी ग़ज़्ज़ा में कोरोना की एमर्जेन्सी टेस्टिंग व इलाज के लिए ज़रूरी मेडिकल साज़ो सामान न होने के अंजाम की ओर से बारंबार सचेत कर चुके हैं।

अमरीका, भेदभाव का साम्राज्य

अमरीका में ज़्यादातर समीक्षक इस देश के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के बयान और भाषण को अमरीका में नस्लभेदी टकराव के बढ़ने में एक कारक मानते हैं।

वर्ष 2016 में ट्रम्प ने मैक्सिको के पलायनकर्ताओं को मुट्ठी भर अपराधी व अतिक्रमणकारी कहा था। इसी तरह उन्होंने अपने ट्वीटर हैंडल पर नक़ली आंकड़ों को प्रकाशित कर कहा था कि अमरीका में होने वाले ज़्यादातर अपराध श्याम वर्ण के लोग अंजाम देते हैं। उन्होंने वर्ष 2018 में वाइट हाउस में पलायन के बारे में आयोजित एक बैठक में अल्साल्वाडोर, हाइटी और कुछ अफ़्रीक़ी देशों को शिटहोल अर्थात मल का गटर कहा था।

ट्रम्प के समर्थक नस्लभेदियों द्वारा शार्लोट्ज़वेल में विरोधियों पर हमले की घटना जो अगस्त 2017 में घटी, इस घटना के बारे में ट्रम्प का बयान आग को बुझाने के लिए पानी का काम करता, उसने आग में घी डालने का काम किया। ट्रम्प के इस घटना के बारे में नस्लभेदी बयान और फिर एरिज़ोना के राज्य के शेरिफ़ अर्थात शासनाधिकारी को माफ़ी वास्तव में अमरीकी समाज में नस्लभेदी तनाव के जारी रहने का कारण बनी। शार्लोट्ज़वेल में प्रदर्शनकारियों पर हमले की घटना में एरिज़ोना राज्य के मैरीकोपा ज़िले के शेरिफ़ जो आर्पायो पर लोगों की नस्ल के आधार पर तलाशी लेने का आदेश दिया था। आर्पायो पर इल्ज़ाम था कि उन्होंने एरिज़ोना में कार्यकाल के दौरान ग़ैर क़ानूनी पलायनकर्ताओं की गिरफ़्तारी के लिए उन लोगों को सड़कों पर रुकवाते थे जिनकी शक्ल लैटिन अमरीकियों से मिलती थी या स्पैनिश भाषा में बात करते थे।

अमरीकी प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष पॉल राएन ने डॉनल्ड ट्रम्प के आर्पायो को माफ़ करने के फ़ैसले पर कहाः “प्रतिनिधि सभा इस फ़ैसले से सहमत नहीं है। प्रशासनिक अधिकारियों पर अमरीका में सभी के अधिकारों का सम्मान करने की ज़िम्मेदारी है। हमें किसी को यह इजाज़त नहीं देनी चाहिए कि कोई यह सोचे कि चूंकि उसे माफ़ कर दिया गया है इसलिए उसका उत्तरदायित्व कम हो गया है।” न्यूयॉर्क टाइम्ज़ के अनुसार, डॉनल्ड ट्रम्प ने महीनों पहले इस फ़ाइल को बंद करने की कोशिश की थी और पूर्व महान्यायवादी जेफ़ सेशन्ज़ से जो अमरीका-मैक्सिको की सीमा पर बाड़ के निर्माण के समर्थक थे, और वाइट हाउस के सलाहकार डॉनल्ड मैक्गान से जो आर्पायो के मामले को ख़त्म करने के लिए सभी विकल्पों की समीक्षा करें।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शिक्षक लॉरेन्स डी बेबोने ब्रिटेन की समाजशास्त्र के बारे में पत्रिका द ब्रिटिश जर्नल ऑफ़ सोशयालोजी में ट्रम्प की नस्लभेदी नीति के बारे में लिखा थाः ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से अमरीका में नस्लभेद तीन गुना बढ़ा है। टिकन पत्रिका के संपादक व राजनैतिक कार्यकर्ता माइकल लर्नर ने 2017 में कहा थाः लोगों की लिंग के बारे में डॉनल्ड ट्रम्प के बयान से आने वाले नस्लभेदी संकेत और वर्ष 2016 में चुनावी संघर्ष के दौरान उनकी बातें लेटिन मूल के लोगों, मुसलमानों और यहूदियों के ख़िलाफ़ आम स्तर पर नफ़रत बढ़ी है। शोध दर्शाते हैं कि ख़ुद को श्रेष्ठ समझने वाले गुटों ने हाथों हाथ ट्रम्प का स्वागत किया। सारा पॉस्नर और डेविड नेवर्ट की मदर जोन्ज़ पत्रिका की वेबसाइट में छपी रिपोर्ट के अनुसार, श्वेत वर्ण की निगाह में मैक्सिको के पलायनकर्ताओं का अतिक्रमणकारी व अपराधी होना, उनकी नस्लभेदी भावना का पता देती है।

अमरीका में नाइट पार्टी के एक नस्लभेदी श्वेत सदस्य ट्रम्प के समर्थन में अतिश्योक्तिपूर्ण बयान में कहते हैः “हमारे बुद्धिमान स्वामी हमारे मुक्तिदाता ने अपने समर्पित अनुयाइयों के लिए नेमतों की भरमार कर दी है।” एक रिचल पेन्डरग्राफ़्ट ने जो कू क्लक्स कलान की जगह लेने वाले दल नाइट पार्टी की अहम सदस्यों में से हैं, कहती हैः चुनाव में ट्रम्प की जीत दर्शाती है कि हमारे दृष्टिकोण को लाखों लोग मानते हैं। कू क्लक्स कलान वह गुट था जो उन्नीसवीं शताब्दी में अमरीका के दक्षिणी भाग में श्याम वर्ण के लोगों और महिलाओं को भयभीत करता था। वर्ष 2017 में शार्लोट्ज़वेल में श्वेत वर्ण के लोगों की स्वीकारोक्ति के दौरान, कू क्लक्स क्लान के बड़े नेताओं में से एक डेविड ड्यूक ने जिसे बड़ा जादूगर कहते थे, कहा थाः “ये दंगे व विद्रोह ट्रम्प वादों के व्यवहारिक के अर्थ में है। इसलिए बहुत से राजनेताओं और राष्ट्राध्यक्षों ने ट्रम्प के व्यवहार की निंदा की और उनके बयान को अमरीकी समाज में नस्लभेद के बढ़ने में प्रभावी माना है।”

ट्रम्प का व्यवहार कू क्लक्स कलान वालों से बहुत मिलता जुलता है जिन्होंने, विश्वस्तर पर मशहूर बुद्धिजीवियों के सीमाओं के खुले रहने के विचार की आलोचना की क्योंकि ट्रम्प का मानना है कि सीमाओं के खुले रहने से पलायनकर्ताओं को इस बात का अवसर मिलेगा कि वह अमरीकी मज़दूरों का काम उचक कर अपने जीवन के स्तर को बेहतर कर लेंगे। डॉनल्ड ट्रम्प ने मैक्सिको की जनता पर तस्करी सहित नाना प्रकार के अपराध करने और उस देश पर अतिक्रमण करने का इल्ज़ाम लगाया जो शांतिप्रेमी व क़ानून पर अमल करने वाला है। इसी प्रकार ट्रम्प ने पलायनकर्ता मुसलमानों को तर्कहीन, मानवाधिकार में यक़ीन न रखने वाला और ख़तरनाक हमलों का समर्थक कहा। ट्रम्प का दावा है कि ओबामा सरकार ने इन ख़तरों की अनदेखी की।

ट्रम्प के राष्ट्रपति काल में नस्लभेदी व्यवहार इतना बढ़ गया है कि मानवाधिकार के प्रतिवेदक और संयुक्त राष्ट्र संघ की नस्लभेद के ख़िलाफ़ समिति ने भी इस नीति की आलोचना की और इसे अमरीका में नस्लभेदी विवाद के बढ़ने का कारक बताया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने भी वर्ष 2018 में ट्रम्प के श्याम वर्ण व अफ़्रीक़ी मूल के लोगों, अल्पसंख्यकों और और इसी प्रकार लैटिन अमरीकी देश के लोगों के ख़िलाफ़ अपमानजनक भाषण को अमरीका में नस्लभेदी रुझान के बढ़ने के लिए ज़िम्मेदार बताया। इकोनॉमिस्ट और न्यूयॉर्कर पत्रिकाओं ने अगस्त 2017 के संस्करण के अपने कवर पेज की तस्वीर में ट्रम्प कू क्लक्स क्लान वालों जैसा दिखाया था।

मशहूर विचारक फ़्रांसिस फ़ूकूयामा ने जो पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद द एन्ड ऑफ़ हिस्टी नामक विचार के लिए मशहूर हैं, एक समीक्षा में, ट्रम्प की लोकप्रियता अमरीकी समाज में टकराव बढ़ने का मूल कारण लिब्रल डेमोक्रेसी के सामने उत्पन्नन संकट को मानते हैं। फ़ूकूयामा ने लिब्रल डेमोक्रेटिक व्यवस्था के ख़त्म होने की भविष्यवाणी करते हुए कहा हैः “उच्च स्तरीय बुद्धिजीवियों द्वारा श्वेत वर्ण के मध्यम वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों के रहने वालों की अनदेखी, ट्रम्प की लोकप्रियता और दक्षिणपंथी पहचान वाली नीति के प्रकट होने का एक कारण रही। ट्रम्प का सत्ता में आना अमरीका की राजनैतिक व्यवस्था के पतन की सूचक है, हालांकि ट्रम्प अपनी लोकवादी नीतियों को लागू नहीं कर पाएंगे।”

फ़ूकूयामा का मानना है कि लिब्रल डेमोक्रेटिक व्यवस्था में क़ानूनी समानता के नतीजे में आर्थिक या सामाजिक समानता नहीं आती और अमरीका तथा विकसित देशों ने विशाल संपत्ति के बावजूद पिछले 30 साल में आय में बहुत अधिक विषमता का अनुभव किया है। इसलिए जो नागरिक अपनी आर्थिक व सामाजिक स्थिति को ख़तरे में पड़ा हुआ देख रहे हैं, एक ओर वह उच्च स्तरीय बुद्धिजीवियों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं तो दूसरी ओर निर्धन व पलायनकर्ता वर्ग को ज़िम्मेदार मानते हैं। उनका मानना है कि बुद्धिजीवियों ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया और निर्धन व पलायनकर्ता वर्ग भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं।

जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी के शिक्षक माइकल कज़िन अमरीकी विदेश संबंध परिषद का अंग समझी जाने वाली पत्रिका द फ़ॉरेन पॉलिसी में लिखते हैः ट्रम्प का संबंध दक्षिणपंथी लोकवाद से है। बुद्धिजीवी बड़ी कंपनियों को आम लोगों के हितों के ख़तरे में पड़ने के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं। ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना अमरीकी लोकवाद की नस्लभेदी राष्ट्रवादी शाखा की मज़बूती को दर्शाता है। ऐसा लोकवाद जिसका मानना है कि पिरामडि के ऊपरी भाग पर स्थित दुष्ट ताक़त और निचले भाग में स्थित मूल्यहीन व अश्वेत निर्धनों की ताक़त के बीच शैतानी एकता है जिससे बहुसंख्यक श्वेत वर्ण के हित व मूल्य ख़तरे में पड़ते हैं।

ट्रम्प के राष्ट्रपति काल के दो साल गुज़रने के बाद भी अमरीका में नस्लभेदी व्यवहार में कमी नहीं आयी है बल्कि इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि नस्लभेदी व्यवहार और बढ़ा है क्योंकि ट्रम्प की नीतियों के विभिन्न आयाम नस्लभेदी विचारों से गुथे हुए हैं।

फ़िलिस्तीन मुद्दा और शैतानी योजना डील आफ़ सेन्चुरी के विषय पर चर्चा _ 1

ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने ज़ायोनियों द्वारा फ़िलिस्तीन के अतिग्रहण के बाद दो अप्रैल 1947 को संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव को एक पत्र लिखकर फ़िलिस्तीन की संकटमयी स्थिति पर ध्यान देने की मांग की।

इस प्रकार से विवाद को हल करने के लिए 11 सदस्यीय कमेटी का गठन हुआ और पश्चिमी शक्तियों विशेषकर ब्रिटेन के हस्तक्षेप और सुझाव से फ़िलिस्तीन को यहूदी और अरब दो देशों में विभाजित करने की पुष्टि की गयी।

फ़िलिस्तीन के मुसलमानों और अन्य स्वतंत्रता प्रेमी मुसलमानों ने इस योजना का कड़ा विरोध किया और कहा कि वह हर उस योजना के कड़े विरोधी हैं जो फ़िलिस्तीन के विभाजन का कारण बनेगा। उस समय फ़िलिस्तीन की ऐतिहासिक धरती पर अतिग्रहण के लिए ज़ायोनियों ने क्रूर और भीषण अपराध कर दिए जिससे लगभग दस लाख फ़िलिस्तीनी विस्थापित हो गये। इसीलिए सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव क्रमांक 194 पारित किया। इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव में विस्थापितों को हर्जाना देने और उनके स्वदेश वापसी पर बल दिया था किन्तु ज़ायोनी शासन ने यह प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया।

इस्राईली विश्वविद्यालय के सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर शोल्मो आवेन्री 2008 में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव क्रमांक 194 के बारे में स्वीकार करते हैं कि इस प्रस्ताव पर अमल करने का अर्थ, फ़िलिस्तीनियों के वापसी के हक़ को स्वीकार करना है जो किसी भी स्थिति में इस्राईली वार्ताकारों के लिए स्वीकार नहीं है। ज़ायोनी शासन ने गठन के समय से ही सुरक्षा परिषद के किसी भी प्रस्ताव पर अमल न किया। यह विषय ऐसी हालत में है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के बहुत से प्रस्ताव, अमरीका, ब्रिटेन और फ़्रांस द्वारा ज़ायोनी शासन के समर्थन के कारण पास नहीं हो सका।

वर्ष 1967 में इस्राईल और अरबों के बीच छह दिवसीय युद्ध के बाद सुरक्षा परिषद ने बैतुल मुक़द्दस सहित अतिग्रहित क्षेत्रों से वापसी पर आधारित एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव को भी ज़ायोनी शासन ने नहीं माना इसीलिए सुरक्षा परिषद ने 2 अक्तूबर 1973 में प्रस्ताव क्रमांक 338 को पारित करके प्रस्ताव क्रमांक 242 लागू करने की मांग की थी।

ज़ायोनी शासन के विस्तारवाद और पश्चिम द्वारा उसके जारी समर्थन की वजह से फ़िलिस्तीनी जनता के बीच प्रतिरोध की भावना मज़बूत हुई, इस प्रकार से कि ज़ायोनी शासन और उसके घटकों के दबाव का हथकंडा भी प्रतिरोध को समाप्त न कर सका। यही कारण है कि बीसवीं शताब्दी के नब्बे के दशक में प्रतिरोध को समाप्त करने के लिए विभिन्न योजनाएं और षड्यंत्र पेश किए गये। फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध ने ज़ायोनी षड्यंत्रों और साज़िशों को नाकाम बना दिया।

13 सितम्बर 1993 में विश्व की तीन हज़ार हस्तियों की उपस्थिति में ज़ायोनी शासन और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के बीच अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने ओस्लो समझौता हुआ। फ़िलिस्तीनी प्रशासन की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर यासिर अराफ़ात ने किया जबकि ज़ायोनी शासन की ओर से ज़ायोनी प्रधानमंत्री इस्हाक़ राबिन ने हस्ताक्षर किए।


ओस्लो समझौते से ख़ुश अमरीकी राष्ट्रपति ने अपनी पीठ थपथाते हुए कहा ज़ायोनी प्रधानमंत्री इस्हाक़ राबिन ने भी अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए जज़बाती लहजे में कह डाला

जब अमरीकी राष्ट्रपति और ज़ायोनी प्रधानमंत्री अपना अपना बयान दे चुके तो यासिर आराफ़ात के पास कहने को कुछ नहीं था तो उन्होंने सिर्फ़ लोगों का आभार व्यक्त किया।

वास्तव में यह समझौता समस्या के समाधान के लिए किया गया जिसमें तय किया गया था कि दोनों पक्ष, एक दूसरे को तथाकथित फ़िलिस्तीनी और इस्राईली सीमाओं की परिधि में जीने के हक़ को आधारिक रूप से स्वीकार करें किन्तु अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन को भी यह बरदाशत नहीं हुआ और उसने फ़िलिस्तीनियों के साथ संघर्ष विराम का विरोध करते हुए अलख़लील नामक मस्जिद पर हमलाकर के दसियों नमाज़ियों को मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार से ओस्लो समझौते की भी धज्जियां उड़ गयीं।

तेल अवीव सरकार के हित में फ़िलिस्तीन में सांठगांठ करने के लिए अमरीका के निरंतर प्रयासों के बाद, फ़िलिस्तीनी प्रशासन और ज़ायोनी शासन ने बिल क्लिंटन की सीधी निगरान में वाय रिवर नामक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अंतर्गत ज़ायोनी शासन को जार्डन नदी के पश्चिमी तट के 13 प्रतिशत भाग को छोड़ना था किन्तु नेतनयाहू ने इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ज़ायोनी बस्तियों के निर्माण में तेज़ी कर दी।

वर्ष 1999 में एहूद बराक के सत्ता में पहुंचने के बाद मिस्र के शहर शरमुश्शैख़ में फ़िलिस्तीनी प्रशासन और ज़ायोनी शासन के बीच वाय रीवर-2 या शरमुश्शैख़ समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में दोनों पक्षों ने एक स्थाई सहमति तक पहुंचने के लिए फिर से वार्ता करने पर सहमति जताई थी।

जहां एक ओर समझौते पर समझौते हो रहे थे वहीं अरब जगत के लोग और मुस्लिम जनता, ज़ायोनी शासन के साथ सांठगांठ का खुलकर विरोध कर रही थी। दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शनों और अपनी सरकार के विरुद्ध होने वाले प्रदर्शनों ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि उनकी सरकारों ने ज़ायोनी शासन के साथ होने वाली सांठगांठ को स्वीकार कर लिया है लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने ओस्लो समझौते के आरंभ में ही कह दिया था कि यह लोग सांठ गांठ करना चाहते हैं और इस्लाम की नज़र में फ़िलिस्तीन के मद्दे पर सांठगांठ हराम है।

बहरहाल फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर होने वाली सांठगांठ प्रक्रिया पर नज़र डालने से यह सिद्ध हो जाता है कि जितने भी समझौते हुए हैं या जितनी भी सांठगांठ हुई है वह सब इस्राईल को मज़बूत करने और फ़िलिस्तीन को कमज़ोर करने के लिए ही हुई है या यूं कहा जाए कि फ़िलिस्तीन के मुद्दे को जड़ से समाप्त करने के लिए ही है। इसीलिए समस्त मुसलमानों विशेषकर फ़िलिस्तीनियों को अमरीका, पश्चिम और ज़ायोनियों के षड्यंत्रों को समझकर अपने धार्मिक दायित्वों पर अमल करते हुए इन षड्यंत्रों को विफल बनाना होगा।


फ़िलिस्तीन मुद्दा और शैतानी योजना डील आफ़ सेन्चुरी के विषय पर चर्चा- 2

डील आफ़ सेन्चुरी के हवाले से पिछले कार्यक्रम में हमने आपको बताया था कि फ़िलिस्तीनियों से सांठ गांठ करने के लिए कई समझौते हुए किन्तु उनमें से कोई एक भी समझौता सफल नहीं हो सका।

13 सितम्बर 1993 में विश्व की तीन हज़ार हस्तियों की उपस्थिति में ज़ायोनी शासन और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के बीच अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने ओस्लो समझौता हुआ। उसके बाद वर्ष 1999 में एहूद बराक के सत्ता में पहुंचने के बाद मिस्र के शहर शरमुश्शैख़ में फ़िलिस्तीनी प्रशासन और ज़ायोनी शासन के बीच वाय रीवर-2 या शरमुश्शैख़ समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह दोनों समझौते भी सफल नहीं हो सके।

जहां एक ओर फ़िलिस्तीन पर सौदे बाज़ी पे सौदेबाज़ी हो रही है वहीं फ़िलिस्तीन की जनता पूरी ताक़त के साथ इसे नकार रही है। फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हमास के एक वरिष्ठ नेता ने ज़ायोनी षड्यंत्रों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि फ़िलिस्तीन का सौदा करने वाले यहीं पर ख़ामोश नहीं बैठे उन्होंने सन 2000 में कैंप डेविड में मध्यपूर्व की तथाकथित शांति वार्ता का क्रम जारी रखा। इस वार्ता में अमरीका के तत्वकालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ज़ायोनी शासन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एहूद बराक और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के मुखिया यासिर अराफ़ात ने भाग लिया। बैतुल मुक़द्दस पर मालेकाना हक़ और इस महत्वपूर्ण शहर को अपनी अपनी राजधानी बनाने के लिए फ़िलिस्तीनी और ज़ायोनी दोनों ही प्रतिनिधि मंडलों के प्रयास, यही वह विषय था जिस पर दोनों पक्षों ने कैंप डेविड में अधिकतर चर्चा की। इस बैठक में फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख यासिर आराफ़ात ने बैतुल मुक़द्दस की राजधानी वाले एक स्वतंत्रत फ़िलिस्तीनी देश के गठन का अपना संकल्प दोहराया था। उन्होंने कैंप डेविड में अमरीकी राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए कहा था कि फ़िलिस्तीन के उस नेता ने अभी अपनी मां की कोख से जन्म नहीं लिया जो बैतुल मुक़द्दस को भूल जाए।

रोचक बात यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ज़ायोनी प्रधानमंत्री एहूद बराक और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख यासिर आराफ़ात जब कांफ़्रेस रूम में जा रहे थे तो उन्होंने पत्रकारों को एक ग्रुप फ़ोटो दी और पत्रकारों ने उनसे सवाल किया। यहां पर ज़ायोनी प्रधानमंत्री और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख यासिर आराफ़ात ख़ामोश रहे किन्तु बिल क्लिंटन ने इन दोनों की ओर से कहा कि हमें अभी कुछ नहीं कहना है, हम वार्ता के लिए जा रहे हैं और वार्ता में जो फ़ैसला होगा उससे आप लोगों को अवगत कराया जाएगा।

यहां पर बात ख़त्म हो गयी और तीनों नेता कांफ़्रेंस रूम की ओर बढ़े, सबसे पहले अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन कमरे में दाख़िल हुए और उसके बाद फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख यासिर आराफ़ात और ज़ायोनी प्रधानमंत्री एहूद बराक में पहले आप, पहले आप का जो सिलसिला शुरु हुआ वह काफ़ी देर तक चलता रहा।

यह सिक्के का दूसरा रुख़ था। इतिहास गवाह है कि ईरान में जब इस्लामी क्रांति सफल हुई और इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख यासिर अराफ़ात को ईरान का न्योता दिया। ईरान में यासिर आराफ़ात का भरपूर स्वागत हुआ और उन्होंने इस अवसर पर पत्रकारों से बात करते हुए ईरान और इमाम ख़ुमैनी की सराहना की।

बहरहाल कैंप डेविड बैठक हुई और आख़िरकार अमरीकी अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से इस वार्ता की विफल की स्वीकारोक्ति की, यह बैठक दो सप्ताह तक परिणामहीन उठा पटख के बाद आख़िरकार समाप्त हो गयी और इसने सिद्ध कर दिया कि ज़ायोनी शासन अपनी नीतियों से पीछे हटने को तैयार नहीं है और यहां तक कि पूर्वी बैतुल मुक़द्दस को भी स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी देश की राजधानी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इस्राईल और फ़िलिस्तीनियो के बीच निरंतर तथाकथित शांति समझौते को नकाराते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहा था कि यह सुलह नहीं बल्कि कलंक है।

कैंप डेविड वार्ता की विफलता के बाद मार्च 2002 में अरब संघ के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक लेबनान की राजधानी बैरूत में आयोजित हुई। इस बैठक में फ़िलिस्तीनियों और ज़ायोनियों के बीच झड़पें समाप्त करने की योजना पेश की गयी। इस योजना को फ़िलिस्तीनी प्रशासन के तत्कालीन प्रमुख यासिर आराफ़ात की अनुपस्थिति में पास कर लिया गया। इस योजना के अनुसार ज़ायोनी शासन को 1967 की सीमाओं तक पीछे हटना होगा और इसके मुक़ाबले में अरब जगत भी इसको आधिकारिक रूप से देश का दर्जा देंगे किन्तु ज़ायोनी शासन ने वर्ष 1967 की सीमाओं से पीछे हटने से इनकार कर दिया और कहा कि वह फ़िलिस्तीनी विस्थापितों की वापसी के हक़ को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं करेंगा। या यूं कहा जाए कि इस्राईल ने अरबों की योजना का पूरी तरह से विरोध कर दिया।

मामला यहीं पर नहीं रुका, शांति के लिए रोडमैप नामक षड्यंत्रकारी योजना वर्ष 2002 में अमरीका, यूरोपीय संघ, रूस और संयुक्त राष्ट्र संघ के सुझाव पर पेश की गयी। इसका लक्ष्य, फ़िलिस्तीन और इस्राईल दो देशों का एक साथ गठन है। इस योजना में फ़िलिस्तीनी गुटों का निरस्त्रीकरण तथा बंदियों की आज़ादी भी शामिल थी, इस योजना को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में पास किया गया। इन प्रयासों का परिणाम जेनेवा संधि के रूप में सामने आया। 50 पृष्ठों पर आधारित यह ढाई वर्षों की गुप्त वार्ताओं का परिणाम था। इन वार्ताओं में इस्राईल की ओर से ज़ायोनी शासन के पूर्व न्यायमंत्री यूसी बेलिन ने जबकि फ़िलिस्तीनी प्रशासन की ओर से फ़िलिस्तीन के पूर्व ख़ुफ़िया विभाग के मंत्री यासिर अब्दो रब्बो ने भाग लिया था। पहली दिसम्बर 2003 को दोनों पक्षों ने जेनेवा में समझौते पर हस्ताक्षर किए किन्तु ज़ायोनी शासन ने कुछ समय बाद जेनेवा योजना को पूरी तरह रद्द कर दिया और इस योजना को इस्राईल को कमज़ोर करने का प्रयास क़रार दिया।

बहरहाल वर्तमान समय में इस्लाम के विरुद्ध अमरीका और ज़ायोनी शासन के षड्यंत्रों का क्रम जारी है इसीलिए पूरी दुनिया के मुसलमानों को एकजुट हो जाना चाहिए।

फ़िलिस्तीन मुद्दा और शैतानी योजना डील आफ़ सेन्चुरी के विषय पर चर्चा- 3

हमने बताया था कि फ़िलिस्तीन की सौदेबाज़ी के लिए विभिन्न प्रकार के समझौते किए गये जिनमें से एक समझौता ओस्लो था जो विफल हो गया उसके बाद 1999 में एहूद बराक के सत्ता में पहुंचने के बाद मिस्र के शहर शरमुश्शैख़ में फ़िलिस्तीनी प्रशासन और ज़ायोनी शासन के बीच वाय रीवर-2 या शरमुश्शैख़ समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

यह समझौता भी अंत में दम तोड़ गया और अब ज़ायोनी शासन के समर्थकों ने इस्राईल का फ़िलिस्तीन में और अधिक पैर जमाने और इस्राईल तथा फ़िलिस्तीनियों में तथाकथित शांति समझौते के लिए नई साज़िश रचना शुरु कर दी है।

फ़िलिस्तीन के हालात धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे कि 8 फ़रवरी 2005 में मिस्र के शरमुश्शैख़ में दूसरी बैठक आयोजित हुई जिसमें तत्कालीन इस्राईली प्रधानमंत्री एरियल शारोन, स्वशासित फ़िलिस्तीनी प्रशासन के अध्यक्ष महमूद अब्बास, मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक और जार्डन नरेश मलिक अब्दुल्लाह ने भाग लिया। इस बैठक में शामिल लोगों ने रोड मैप के आधार पर शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद लगभग दो साल बाद दिसम्बर 2006 से सितम्बर 2008 तक एहूद ओलमर्ट और महमूद अब्बास ने 36 बार एक दूसरे से मुलाक़ात की और निचले स्तर की वार्ताएं भी आयोजित की। इसका परिणाम यह निकला कि 27 नवम्बर 2007 को अमरीकी राज्य मैरीलैंड के एनापोलिस शहर में अमरीकी नौसेना की एकेडमी में एनापोलिस बैठक आयोजित हुई जिसमें फ़िलिस्तीनी प्रशासन के नेता, ज़ायोनी शासन और अरब भाषी कुछ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक में भी हमास के नेता उपस्थित नहीं हुए।

फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर सबसे ज़िम्मेदार और सबसे अधिक सक्रिय अमरीकी राष्ट्रपति शायद हैरी ट्रूमैन थे जबकि इस ज़िम्मेदारी को अदा करने की सबसे महत्वपूर्ण जगह संयुक्त राष्ट्र संघ था जिसकी बैठक में फ़िलिस्तीन के विभाजन पर मतदान हुआ।

इस बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के बाहर इस्राईल का झंडा लहरा दिया गया। जैसे ही फ़िलिस्तीन दो हिस्सों में विभाजित हुआ ज़ायोनियों ने अपनी शक्ति ज़ाहिर करने में देर नहीं की। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने वह चीज़ संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्राईल के प्रतिनिधि से सुनी जिसकी उनको प्रतीक्षा थी।

लेकिन अमरीका ने चाल चली और उसने ज़ायोनियों की अपेक्षा के विपरीत अपना मोहरा चलाया।

वास्तव में हालात सही नहीं थे, इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्राईल के प्रतिनिधि मूशे शरित को अमरीका भेजा गया ताकि वह इस्राईल को आधिकारिक रूप से स्वीकार करने के बारे में अमरीका के दृष्टिकोण को बदल सकें लेकिन जार्ज मार्शल यह बात सुनने को तैयार नहीं थे। मार्शल वाइट हाऊस गये ताकि इस बारे में ट्रूमैन से बात करें, वहां उनको यह समझ में आया कि राष्ट्रपति उनके विचारों से सहमत नहीं हैं और इस्राईल के बारे में उनके अलग अलग दृष्टिकोण हैं। राष्ट्रपति के सलाहकार क्लार्क कैलीफ़ोर भी उस बैठक में मौजूद थे

बहरहाल महमूद अब्बास ने अक्तूबर 2007 के आरंभ में कहा था कि दा एनापोलिस कांफ़्रेंस के आयोजन का लक्ष्य, ग़ज़्ज़ा पट्टी और पश्चिमी तट को मिलाकर एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी देश के गठन की फ़िलिस्तीनी पक्षों की इच्छा थी। महमूद अब्बास यहीं पर नहीं रुके बल्कि उन्होंने बैतुल मुक़द्दस के विभाजन, फ़िलिस्तीनी विस्थापितों और उनके वापसी के हक़, सीमाओं, ज़ायोनी बस्तियों के भविष्य, पानी और सुरक्षा जैसे फ़िलिस्तीनियों और इस्राईलों पक्षों के बीच छह महत्वपूर्ण चुनौतियों के हल पर भी बल दिया।

हमास के एक वरिष्ठ नेता महमूद अज़्ज़ेहार ने नवम्बर 2007 की एनापोलिस कांफ़्रेंस के बारे में कहा कि यदि इस कांफ़्रेंस में हमास को भाग लेने का निमंत्रण दिया जाता तब भी इस कांफ़्रेंस में भाग लेना अर्थहीन था क्योंकि इस्राईल, फ़िलिस्तीन की धरती के अतिग्रहण को समाप्त करने के लिए तैयार ही नहीं था और न ही महमूद अब्बास सारे फ़िलिस्तीनियों के प्रतिनिधि हैं।

एनापोलिस बैठक कई दिनों तक चलती रही और अंत में कई दिन बाद बैठक की समाप्ति पर एक घोषणापत्र जारी किया गया। इस बैठक में यह तय किया गया कि 2008 के अंत तक दोनों पक्ष सांठगांठ वार्ता करके किसी स्थाई सहमति तक पहुंच जाएंगे। इस बैठक में ज़ायोनी शासन ने गोलान क्षेत्र को सीरिया का क्षेत्र माना और इस बात की तत्परता की घोषणा की कि फ़िलिस्तीन की स्वतंत्र सरकार का गठन होगा।

यहां पर यह बताना आवश्यक है कि आरंभ में ऐसा तो नहीं था किन्तु ऐसा महसूस हो रहा था कि इस प्रकार का समझौता वास्तव में फ़िलिस्तीनियों के हित में है किन्तु समय बीतने के साथ ही दोनों पक्षों के दृष्टिकोण बदलने लगे और आशाएं निराशाओं में बदल गयीं। बहुत अधिक उथल पुथल के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के काल में अप्रैल 2012 में महमूद अब्बास ने नेतनयाहू को एक पत्र लिख कर बताया कि वह वार्ता आरंभ करने में रुचि रखते हैं किन्तु इसकी शर्त यह है कि पूर्व बैतुल मुक़द्दस में ज़ायोनी बस्तियों का निर्माण बंद किया जाए और दो देश के समाधान के रूप में 1967 की सीमाओं को स्वीकार किया जाए।

नेतनयाहू ने भी महमूद अब्बास के पत्र का तुरंत ही जवाब दिया। उन्होंने एक सप्ताह से कम समय में महमूद अब्बास के पत्र का जवाब दिया। उन्होंने पहली बार आधिकारिक रूप से इस बात को स्वीकार किया कि फ़िलिस्तीनियों को भी इस बात का पूरा पूरा हक़ है कि उनके पास भी एक स्वतंत्र देश हो। उनका बयान केवल शब्दों तक ही सीमित रहा और उन्होंने कोई भी व्यवहारिक क़दम नहीं उठाया। इस प्रकार से समस्त योजनाएं और साज़िशें, ज़ायोनी शासन के विस्तारवाद और वाशिंग्टन द्वारा उसके समर्थन के कारण विफलता का शिकार हो गयीं।

फ़िलिस्तीन के मामले में ईरान के प्रसिद्ध विशेषज्ञ सादुल्लाह ज़ारेई हर योजनाओं की विफलता के बारे में कहते हैं कि यदि फ़िलिस्तीन और अरबी पक्षों तथा फ़िलिस्तीन के बारे में अरब पक्षों की ओर पेश किए गये विषयों पर नज़र डालें तो हमें पता चलता है कि यह सारी योजनाएं इस्राईल की मज़बूती और फ़िलिस्तीन की तबाही के लिए पेश की गयीं हैं। या दूसरे शब्दों में यह कहें कि जितनी भी योजनाएं पेश की गयी हैं सबके सब इस्राईल को बाक़ी रखने और फ़िलिस्तीन को राजनैतिक मोर्चे से हटाने के लिए पेश की गयी थीं और इनमें से हर एक को विफलता का मुंह देखना पड़ा।

प्रसिद्ध ईरानी विशेषज्ञ सादुल्लाह ज़ारेई कहते हैं कि सारी योजनाओं की विफलता के दो कारण हैं। पहला कारण यह है कि एक राष्ट्र जो लगभग एक करोड़ पचास लाख लोगों पर आधारित है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, अर्थात फ़िलिस्तीनियों की संख्या लगभग एक करोड़ पंद्रह लाख की आबादी तक पहुंच रही है, यह एक अटल सच्चाई है और एक पचास या साठ लाख यहूदी, उनकी अनदेखी नहीं कर सकते।

दूसरा कारण यह है कि क्षेत्रीय स्तर पर यदि कोई षड्यंत्र होता है तो उसके मुक़ाबले में एक मज़बूत प्रतिरोध भी है और मज़बूत प्रतिरोध के होने की वजह से कोई ऐसी योजना थोपी नहीं जा सकती जो क्षेत्रीय वास्तविकताओं का इन्कार करे। वर्ष 2016 में अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के चयन के बाद इस बार षड्यंत्र को नये स्वरूप में पेश किया गया जिसे डील आफ़ सेन्चुरी का नाम दिया गया।

रोचक बात यह है कि डोनल्ड ट्रम्प ने अपने यहूदी दामाद को इस योजना को लागू करने की ज़िम्मेदारी दी है। जेरेड कुश्नर ने पिछले दो वर्षों के दौरान मध्यपूर्व विशेषकर फ़िलिस्तीन- इस्राईल तनाव पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रखा। कूश्नर फ़िलिस्तीन-इस्राईल तनाव के लिए डील आफ़ सेन्चुरी योजना पर काम कर रहे हैं और इसे लागू करना चाहते हैं किन्तु दो साल गुज़रने के बावजूद अब तक इसके लागू होने की आधिकारिक घोषणा नहीं कर सके हैं।

योजना का एलान तो नहीं किया गया लेकिन इसके बारे में जानकारियां जान बूझ कर लीक की गईं ताकि प्रतिक्रियाओं का अंदाज़ा लगाया जा सके। एक जानकारी यह लीक होकर आई कि इस योजना के तहत बैतुल मुक़द्दस को हमेशा के लिए इस्राईल की राजधानी बना दिया जाएगा और अमरीका ने बाक़ायदा इसका एलान भी कर दिया और अपना दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित कर दिया।

बहरहाल फ़िलिस्तीन के मुद्दे के बारे में इस्लामी गणतंत्र ईरान ने बारम्बार कहा है कि फ़िलिस्तीन की जनता की इच्छा के अनुसार ही फ़िलिस्तीन के मुद्दे का समाधान किया जाएगा

फ़िलिस्तीन मुद्दा और शैतानी योजना डील आफ़ सेन्चुरी के विषय पर चर्चा- 4

हमने बताया था कि फ़िलिस्तीन की सौदेबाज़ी के लिए विभिन्न प्रकार के समझौते किए गये।

बराक ओबामा 2009 में सत्ता में पहुंचे और फ़िलिस्तीनी- ज़ायोनी विवाद, एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में अमरीका की विदेश नीति में यथावत बाक़ी रहा। इससे पहले तक यद्यपि अमरीका ने फ़िलिस्तीनियों और ज़ायोनियों के बीच तथाकथित शांति के बहुत अधिक प्रयास किए किन्तु इससे न केवल उनके बीच मतभेदों में कमी नहीं हुई बल्कि मतभेद और भी गहरे हो गये।

शायद यह कहा जा सकता है कि अमरीकी योजनाओं के मार्ग की मुख्य रुकावट, बुश सरकार द्वारा ज़ायोनी शासन की आतंकवादी कार्यवाहियों और निहत्थे फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार का बिना रोक टोक और खुला समर्थन था। अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में ज़ायोनी बस्तियों की संख्या में वृद्धि और अमरीका द्वारा फ़िलिस्तीनी सरकार को आधिकारिक रूप से स्वीकार न करने की वजह से मतभेद और भी गहरा गया। बराक ओबामा ने अपने चुनावी प्रचार में हमेशा से ही पश्चिमी एशिया के बारे में अमरीका की पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों विशेषकर फ़िलिस्तीन मुद्दे के बारे में उनकी नीतियों की आलोचना की और इस मामले को अपनी नवीन विदेश नीति के आधार पर हल करने पर बल दिया।


ओबामा ने अपने राष्ट्रपति काल के पहले ही सप्ताह में एक अरब टीवी चैनल के साथ अपना पहला साक्षात्कार किया और उन्होंने फ़िलिस्तीनी-इस्राईली मुद्दे के समाधान के लिए अपने विशेष दूतको पश्चिमी एशियाई क्षेत्र भेजा। उन्होंने अपने बारे में मुसलमानों के दृष्टिकोणों को बदलने का प्रयास किया और इसी के तहत ज़ायोनी शासन की विशेषकर बस्तियों के विस्तार के लिए निंदा की।

बराक ओबामा ने यह सब कुछ तो किया लेकिन सच्चाई यह है कि जैसे जैसे वह अपने दूसरे शासन काल की ओर बढ़ रहे थे उन्होंने अपनी राजनैतिक बोलचाल बदल दी जबकि ज़ायोनी शासन से अपनी सरकार के दृष्टिकोण को निकट कर दिया बल्कि यूं कहा जाए कि उन्होंने भी खुलकर इस्राईल का समर्थन शुरु कर दिया।

परिवर्तन के नारे के साथ सत्ता में पहुंचने वाले बराक ओबामा ने आरंभ में तो यह दिखाने का प्रयास किया कि वह निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाएंगे और अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह कम से कम विदित रूप से ज़ायोनी शासन का समर्थन कम करने के लिए मजबूर हुए किन्तु अमरीका में मौजूद मज़बूत ज़ायोनी लाबी और बहुत से ज़ायोनी समर्थक अमरीकी नेता इस बात को समझ गये।

वर्ष 2001 में होने वाले एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि केवल 9 प्रतिशत ज़ायोनियों को ही यह विश्वास था कि ओबामा सरकार, फ़िलिस्तीनियों का समर्थक होने से पहले ज़ायोनियों की समर्थक है।

बराक ओबामा ने गद्दी पर बैठने के पहले ही दिन अर्थात राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने 21 जनवरी 2009 में ज़ायोनी प्रधानमंत्री एहूद ओलमर्ट, हुस्नी मुबारक, मलिक अब्दुल्लाह द्वितीय और महमूद अब्बास जैसे अरब नेताओं से टेलीफ़ोन वार्ता में इस बात पर बल दिया कि वह शांति योजना को व्यवहारिक बनाने में पूरी तरह गंभीर हैं और इसमें वह सक्रिय भूमिका अदा करेंगे।

इसके बाद उन्होंने और अमरीका की तत्कालीन विदेशमंत्री हिलेरी क्लिटन ले इस संबंध में एक संयुक्त बयान जारी किया और जार्ज मिशल नामक अपने एक अनुभवी सांसद को पश्चिमी एशिया के लए अमरीका के विशेष दूत के रूप में चुना। बराक ओबामा ने कई बार कई अवसरों पर इस्राईल द्वारा बस्तियों के निर्माण का खुलकर विरोध भी किया। उन्होंने सितम्बर 2009 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा में अपने भाषण में कहा कि अमरीका, इस्राईल द्वारा बस्तियों के निर्माण के क्रम को जारी रखने का विरोधी है। उन्होंने इसी प्रकार जून 2009 में क़ाहिरा विश्व विद्यालय में अपने भाषण के दौरान ज़ायोनी बस्तियों का विरोध किया। उनका कहना था कि सयुंक्त राज्य अमरीका बस्तियों के निर्माण के जारी रखने को ग़ैर क़ानूनी समझता है और यह निर्माण, पहले वाले समझौतों का उल्लंघन है और शांति प्रक्रिया के प्रयास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। अब इस्राईली कालोनियों के निर्माण को रोकने का समय आ गया है।

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनके मंत्रीमंडल ने आने वाले वर्षों में भी ज़ायोनी बस्तियों के निर्माण का विरोध किया किन्तु ज़ायोनी प्रधानमंत्री बेनयामीन नेतेनयाहू बस्तियों के निर्माण को रोकने के अपने वचनों के पालन से इनकार कर दिया। या यूं कहा जाए कि ज़ायोनी प्रधानमंत्री ने अमरीका को बस्तियों के निर्माण के लिए जो वादा किया था उस पर अपनी प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया।

बराक ओबामा ने वर्ष 2009 में विदेशमंत्रालय के अपने भाषण में 1967 से पहले की सीमाओं के अनुसार फ़िलिस्तीनी देश के गठन के समर्थन की घोषणा की। उन्होंने अपने बयान में कहा कि 1967 की सीमाओं को दोनों पक्षों के बीच शांतिवार्ता का आधार बनाया जाना चाहिए किन्तु नेतेनयाहू ने एक बयान जारी करके इस्राईल के प्रति अमरीकी सरकार के वचनों को याद दिलाया और उक्त सीमाओं के अनुसार वार्ता आरंभ करने के लिए ओबामा की नीतियों को रद्द कर दिया।

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बावजूद इसके कि वह ज़ायोनी बस्तियों के निर्माण और 1967 की सीमाओं के आधार पर दो सरकारों के गठन के ज़बरदस्त विरोधी थे, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में फ़िलिस्तीन की सदस्यता के विषय का विरोध किया। यद्यपि आख़िर में जीत फ़िलिस्तीनियों की ही हुई और फ़िलिस्तीनी 2012 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पर्यवेक्षक सदस्य के रूप में चुना गया।

फ़िलिस्तीन मुद्दा और शैतानी योजना डील आफ़ सेन्चुरी के विषय पर चर्चा- 5

हमने आपको बताया था कि बराक ओबामा के शासन काल में भी फ़िलिस्तीनी – ज़ायोनी विवाद, एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में अमरीका की विदेश नीति में यथावत बाक़ी रहा।

बराक ओबामा के पूर्ववर्तियों ने भी फ़िलिस्तीनियों और ज़ायोनियों के बीच तथाकथित शांति के बहुत अधिक प्रयास किए किन्तु इससे न केवल उनके बीच मतभेदों में कमी नहीं हुई बल्कि मतभेद और भी गहरे हो गये।

फ़िलिस्तीनी-ज़ायोनी विवाद के गहराने के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनके मंत्रीमंडल ने ज़ायोनी बस्तियों के निर्माण का विरोध शुरु कर दिया किन्तु ज़ायोनी प्रधानमंत्री बिनयामीन नेतेनयाहू ने बस्तियों के निर्माण को रोकने के अपने वादे के पालन से इनकार कर दिया।

यहां पर हमें अमरीका और ज़ायोनी शासन के बीच विदित रूप से मतभेद गहराते नज़र आ रहे थे और बराक ओबामा ने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए विदेशमंत्रालय में अपने महत्वपूर्ण भाषण में 1967 से पहले की सीमाओं के अनुसार फ़िलिस्तीनी देश के गठन के समर्थन की घोषणा कर दी। अभी उनके बयान को जारी हुए अधिक समय नहीं बीता था कि नेतेनयाहू ने एक बयान जारी करके इस्राईल के प्रति अमरीकी सरकार के वचनों को याद दिलाया और उक्त सीमाओं के अनुसार वार्ता आरंभ करने के लिए ओबामा की नीतियों को रद्द कर दिया।

अमरीका और इस्राईल के बीच विदित रूप से गहराते मतभेद पर मरहम रखने के लिए ओबामा ने आख़िरकार इस्राईल का दौरा किया और उसके बाद सारी अतीत की बातों को भुला दिया गया और दो पुराने दोस्त एक बार फिर एक हो गये।

फ़िलिस्तीन के इतने अधिक समर्थन का दावा करने वाले बाराक ओबामा ने अपने दृष्टिकोण से पलटी मारते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में फ़िलिस्तीन की सदस्यता के विषय का विरोध करते हुए इस्राईल के प्रति अपनी वफ़ादारी का एक बार फिर सबूत पेश किया।

अमरीकी राष्ट्रपी बाराक ओबामा ने अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम दो वर्षों में फ़िलिस्तीनियों और ज़ायोनियों के बीच संकट को समाप्त करने और दोनो पक्षों को वार्ता की मेज़ पर लाने का बहुत प्रयास किया और उन्होंने फ़िलिस्तीन के मुद्दे को ज़ायोनी शासन के साथ अरब देशों के संबंधों के संकट के रूप में पेश किया। इसीलिए उन्होंने ज़ायोनी शासन के साथ अरब देशों के संबंधों को सामान्य बनाने के सुझाव पेश किए जो वाशिंग्टन की नज़र में यह प्रक्रिया ज़ायोनी-फ़िलिस्तीनी शांति के परिणाम के रूप में सामने आएगी।

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जो योजना पेश की थी उसमें पूर्वी बैतुल मुक़द्दस के कुछ क्षेत्रों को अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में शामिल करना और बैतुलमुक़द्दस शहर में बाक़ी इस्लामी स्थलों पर अरबों को अधिकार देता शामेल था। यद्यपि बाराक ओबामा ने इस एकपक्षीय योजना को लागू करने के लिए अरब देशों के प्रमुखों से वार्ताएं भी कीं किन्तु ज़ायोनियों द्वारा बस्तियों के जारी निर्माण और ओबामा से नेतेनयाहू के ठंडे संबंधों के कारण यह योजना भी बुरी तरह विफल हो गयी।

यहां पर एक बात बताना आवश्यक है कि यदि हम ज़ायोनी – फ़िलिस्तीनी विवाद और इस विवाद की मुख्य वजह पर नज़र डालते हैं तो हमारे लिए सब स्पष्ट हो जाता है। इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि अमरीका के तत्कालीन ट्रूमैन और उनके सलाहकार जार्ज मार्शल के बीच इस्राईल के गठन पर काफ़ी मतभेद था। बात यहीं पर नहीं रुकी और इस्राईल का गठन हो गया।

वास्तव में यह कहा जा सकता है कि ज़ायोनी शासन के विस्तारवाद और इस शासन को इस बात का विश्वास कि अमरीका उसका हमेशा समर्थन करता रहेगा, इन्हीं कारणों से अतीत की योजनाएं और सुझाव भी विफल रहे हैं।

पश्चिमी एशिया के मामलों के ईरानी टीकाकार मसऊद असदुल्लाही का कहना है कि फ़िलिस्तीनियों के संबंध में ज़ायोनी शासन की अतिक्रमणकारी नीतियां और योजनाएं कभी भी समाप्त नहीं होती और इसका मुख्य कारण अमरीका का व्यापक समर्थन और अरब सरकारों का धीरे धीरे एक एक क़दम पीछे हटना है। या दूसरे शब्दों में यूं कहा जाए कि इस्राईल, अमरीका के निरंतर समर्थन और अरब देशों के पीछे हटने की वजह से दुस्साहसी हो गया है और उसने फ़िलिस्तीन में अपनी विस्तारवादी नीतियों को बढ़ाया और सांठगांठ करने वाले अरब देश, जनता का समर्थन न होने की वजह से फ़िलिस्तीन में इस्राईल की शत्रुतापूर्ण नीतियों का साहस नहीं जुटा पाए।

बराक ओबामा ने अपने आठ साल के राष्ट्रपति काल में फ़िलिस्तीनी मुद्दे के समाधान के लिए प्रयासों का दिखावा तो बहुत किया किन्तु उन्होंने अपने राष्ट्रपति काल के दौरान ज़ायोनी शासन के विरुद्ध कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं होने दिया और इस लेहाज़ से रिकार्ड दर्ज कर लिया। अलबत्ता बराक ओबामा ने अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम दिनों में ज़ायोनी बस्तियों के निर्माण को रोकने के बारे में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव क्रमांक 2234 पर होने वाले मतदान में भाग नहीं लिया।

बहुत से टीकाकारों ने ओबामा की इस कार्यवाही को राजनैतिक ड्रामा क़रार दिया क्योंकि उन्होंने अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम तेल अवीव की जमकर वित्तीय, राजनैतिक व सामाजिक सहायता की है। ओबामा वाइट हाऊस से रुख़सत हो गये और वर्ष 2016 में अमरीका को डोनल्ड ट्रम्प के रूप में नया राष्ट्रपति मिला जिससे वाशिंग्टन द्वारा ज़ायोनी शासन के समर्थन का क्रम जारी रहा बल्कि यूं कहा जाए कि इस समर्थन ने नया आयाम अपना लिया।

अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति ऐसा नहीं था जिसने ज़ायोनी शासन और उसके गठन का समर्थन न किया हो, जी हां समर्थन तो सबने किया लेकिन फ़र्क यह है कि किसी ने बहुत ज़्यादा और किसी ने बहुत कम।

मुसलमानों के मुक़ाबले में ट्रम्प प्रशासन की इस्लाम विरोधी नीतियों के कारण वाशिंग्टन प्रशासन और जैसन ग्रीन ब्लाट और जेयर्ड कुश्नर जैसे ट्रम्प की सलाहकार टीम ने अपने हितों को साधते हुए फिलिस्तीन के मुद्दे के बारे में कट्टरपंथी दृष्टिकोण अपनाया। दूसरी ओर वास्तव में यदि देखा जाए तो आक्रमक और हमलावर बर्ताव के बजाए अमरीका और ज़ायोनी शासन ने बहुत ही मिलाजुला रवैया अपनाया ताकि किसी को भनक तक न लगे कि यह काम पूर्ण समन्वय से किया जा रहा है। इसका उदाहरण यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अभूतपूर्व कार्यवाही करते हुए अपने दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित कर दिया। अमरीका के इस क़दम पर इस्लामी जगत और दुनिया से कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

फ़िलिस्तीन के एक सक्रिय कार्यकर्ता अदनान हुसैनी, फ़िलिस्तीनियों और मुसलमानों के विरुद्ध ट्रम्प की नीतियों के बारे में कहते हैं कि ट्रम्प ने अपना दूतावास तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करके खुलकर और अभूतपूर्व ढंग से इस्लामी और अरब जगत के विरुद्ध युद्ध का एलान कर दिया है।

उनका कहना था कि अमरीका मे अब तक 42 राष्ट्रपति गुज़रे हैं किन्तु किसी ने भी इस प्रकार का फ़ैसला नहीं लिया। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि ट्रम्प का यह फ़ैसला, उनके राजनैतिक अज्ञान, अनाड़ीपन और मूर्खता का चिन्ह है।

ट्रम्प प्रशासन में ज़ायोनी लाबी के प्रभाव तथा ज़ायोनिज़्म आंदोलन की ओर उनकी पार्टी, उनके परिवार और उनके निकट संबंधियों के रुझान के अतिरिक्त आर्थिक संबंधों और गहरे रणनैतिक तथा आइडियालाजिक निर्भरता ने ट्रम्प में ज़ायोनी शासन के प्रति समर्थन की ज्योति जगा दी है और यही कारण है कि फ़िलिस्तीनी-ज़ायोनी विवाद को हल करना,फ़िलिस्तीन और इस्लामी जगत के हितों के लिए नहीं बल्कि अमरीका के व्यापारिक और आर्थिक हितों को प्राप्त करने और अवैध ज़ायोनी शासन को बाक़ी रखने की परिधि में है।

जैसा कि सभी को पता है कि फ़िलिस्तीनी प्रशासन पिछले कई वर्षों से सांठगांठ वार्ता के षड्यंत्र में आकर कई बार ट्रम्प प्रशासन के अपमानजनक रवैयों को सहन कर चुका है। हमास की राजनैतिक शाखा के प्रमुख इस्माईल हनिया ने ग़ज़्ज़ा की जनता के मध्य अपने संबोधन में कहा था कि हमें यह सूचना मिली है कि अमरीकी सरकार, फ़िलिस्तीनी वर्ताकारों और अधिकारियों से कैसा बर्ताव करती है, वास्तव में इस्राईली इच्छाएं, अमरीकी बयानों और भाषा की परिधि में फ़िलिस्तीनी वार्ताकारों के हवाले की जाती हैं। हालात अब यहां तक पहुंच गये हैं कि अमरीका ने फ़िलिस्तीनी प्रशासन को मजबूर कर दिया है कि वह फ़िलिस्तीनी क़ैदियों और शहीदों के परिजनों की सहायता नहीं करेगा।

आजकल एक महत्वपूर्ण मुद्दा जो हमारे सामने है वह फ़िलिस्तीनी मुद्दे को भुला देने की साज़िश है, वे इस मुद्दे को इस्लामी जगत के मंच से हटा देना चाहते हैं, वे तथाकथित शांति वार्ता करके फ़िलिस्तीन के विषय को भुला देना चाहते हैं। उनका कहना था कि यह फ़िलिस्तीनियों के साथ विश्वासघात है, जो लोग भी कर रहे हैं वे फ़िलिस्तीनियों के साथ धोखा और विश्वासघात कर रहे हैं। (रहबर)

इस कार्यवाही से समस्त यहूदियों के लिए एक स्वतंत्र देश का रास्ता खुल जाएगा। यह कार्यवाही यहूदियों को अधिकारी और विशिष्टिताएं देता है और विश्व समुदाय में सदस्यता का अधिकार प्रदान करती है। हम अपने स्वभाविक और एतिहासिक अधिकारों के आधार पर इस्राईली यहूदियों की धरती पर यहूदी सरकार के गठन के घोषणा करता हूं। इस्राईली प्रतिनिधि मेरी सरकार को इस बात की सूचना मिल गयी है कि फ़िलिस्तीन में एक यहूदी सरकार ने अपने अस्तित्व की घोषणा की है और उसके द्वारा और उससे जुड़ी संस्थाओं द्वारा हमसे आधिकारिक रूप से उसे स्वीकार करने की अपील की गयी है, अमरीकी सरकार अंतिम सरकार को अनाधिकारिक रूप से इस्राईल की नई सरकार के रूप में आधिकारिक रूप से स्वीकार करती है।

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