धर्म

कहो ईश्वर एक है : अल्लाह के ख़ास बन्दे : पार्ट 26

आपको अवश्य याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने हज़रत अली के जीवन के कुछ पहलुओं की समीक्षा की थी।

पूरे अमवी शासकों ने अपनी धूर्धता व पाखंड का प्रयोग किया ताकि हज़रत अली के नाम को मिटा दें और जब उन्हें हज़रत अली की शहादत की ख़बर मिली तो उन्होंने सोचा कि हज़रत अली के जीवन का कोई भी चिन्ह बाकी नहीं बचा है पर उनको यह नहीं पता था कि जो इंसान महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का विशेष बंदा हो उसे वह रहती दुनिया के लिए अमर बना देगा।

हज़रत अली की जो अद्वितीय विशेषताएं थीं उन सबसे हट कर उन्होंने जो मूल्यवान धरोहरें छोड़ी हैं उनमें से एक विश्व विख्यात” नहजुल बलाग़ा” किताब है जो शताब्दियां बीत जाने के बावजूद विद्वानों, बुद्धिजीवियों और प्रतीभाशाली व्यक्तियों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस किताब में एकेश्वाद, न्याय, रचना, सृष्टि, महिला, पुरूष, ईश्वरीय भय, दुनिया की भर्त्सना, शैतान, पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ साथियों, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की विशेषताएं, मोमिन व महान ईश्वर का भय रखने वाले और इसी प्रकार मित्थ्याचारी व्यक्तियों की विशेषताएं, पवित्र कुरआन की कुछ आयतों की व्याख्यायें, मौत की याद, सरकारों और राष्ट्रों सहित दूसरे सैकड़ों विषयों का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार इस किताब में हज़रत अली  के जो कथन व वक्तव्य हैं वे पवित्र कुरआन की भांति उपदेश व नसीहत की भांति हैं और वे भिन्नाभिन्न विषयों के बारे में जानकारियों को पढ़ने या सुनने वालों के सामने स्पष्ट नमूने के रूप में पेश करते हैं और धीरे- धीरे वे सुनने या पढ़ने वाले को उस गंतव्य की ओर ले जाते हैं जहां उसे पहुंचना चाहिये।

प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा को तीन भागों में बांटा गया है। पहले भाग में हज़रत अली के खुत्बे व भाषण हैं। दूसरे भाग में पत्र, वसीयतें और सिफारिशें हैं जबकि तीसरे भाग में हज़रत अली के छोटे- छोटे वाक्य और स्वर्णिम कथन हैं जो साहित्यिक दृष्टि से अपने शिखर बिन्दु पर हैं। अलबत्ता हज़रत अली ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के काल में, युद्धों में और इसी प्रकार जब विभिन्न नगरों में उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी बनाया गया था तो उस समय हज़रत अली  ने जो भाषण और उपदेश दिये थे उन सबको नहीं लिखा गया है। इसी तरह हज़रत अली  के उन कथनों व भाषणों को नहीं लिखा गया है जो उन्होंने ख़लीफाओं की सहमति से बयान किया है बल्कि हज़रत अली  के केवल उन भाषणों, खुत्बों और उपदेशों को संकलित किया गया है जब वे विदित में ख़लीफ़ा बने थे। उस समय भी उनके केवल कुछ ख़ुत्बों व भाषणों को संबलित किया गया।

सन् 400 हिजरी कमरी के प्रसिद्ध विद्वान व धर्मगुरू सैयद रज़ी ने साहित्यिक बोध के आधार पर हज़रत अली के भाषणों व कथनों को संकलित किया था। बहुत से लोगों का मानना है कि प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा पवित्र कुरआन के बाद वाक्पटुता का सुन्दरतम नमूना है और उसे कुरआन के छोटे भाई की उपाधि दी गयी है।

इब्ने अबिल हदीद सातवीं हिजरी का एक सुन्नी मोअतज़ली विद्वान है। उसने प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा की जो व्याख्या की है वह 20 खंडों में है और वह नहजुल बलाग़ा की प्रसिद्ध व्याख्याओं में से एक है। वह अरबी भाषा का दक्ष साहित्यकार व शायर था जो हज़रत अली  के भाषणों व कथनों से बड़ी श्रृद्धा रखता है और वह अपनी किताब की प्रस्तावना में लिखता हैः सच में हज़रत अली की बातें ईश्वर की बातों से नीचे और सृष्टि व इंसान की बातों से ऊपर हैं। भाषण देने और लेखन की कला प्रेमियों ने उनसे सीखी है।” इब्ने अबिल हदीद ने नहजुल बलाग़ा की जो व्याख्या लिखी है उसके चौथे खंड में वह नहजुल बलागा के 35वें पत्र की व्याख्या में लिखता हैः वाक्पटुता को देखो किस तरह उसने स्वयं को इस इंसान के हवाले कर दिया है। शब्दों के विचित्र तालमेल व समन्वय को देखो। मानो शब्दों ने उनसे कह दिया है और एक के बाद दूसरा स्वयं को उनके अधिकार में दे देता है। यह उस सोते की भांति है जो ज़मीन से फूटता है और उसका पानी स्वयं उबलता व जारी होता है। धन्य है ईश्वर कि एक जवान मक्का जैसे बड़े शहर में परवान चढ़ता है। उसने किसी दर्शनशास्त्री से मुलाक़ात नहीं की है परंतु दर्शनशास्त्र में उसकी बातें व कथन अफलातून और अरस्तू से उच्च हैं। वह कभी दर्शनशास्त्रियों के साथ उठा- बैठा नहीं है पंरतु वह सुक़रात से आगे बढ़ गया है।“

प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा का एक अन्य प्रेमी शैख मोहम्मद अब्दो है। वह वर्षों पहले मिस्र के मुफ्ती थे। उन्होंने भी मूल्यवान पुस्तक नहजुल बलाग़ा की व्याख्या लिखी है। वह अपनी किताब की प्रस्तावना में लिखते हैं” अरब जगत में एक व्यक्ति भी नहीं है जो यह न मानता हो कि हज़रत अली के कथन ईश्वर और उसके पैग़म्बरे के बाद सबसे श्रेष्ठ व उच्च कोटि हैं” और यह नहीं है किन्तु वही चीज़ जिसके बारे में स्वयं हज़रत अली ने कहा है कि हम वक्तव्य, भाषण और बयान के सरदार हैं। भाषण के वृक्ष की जो जड़े हैं वह हमारे अंदर हैं और उसकी शाखाओं ने हम पर छाया कर रखा है।

प्रसिद्ध पुस्तक नहजुल बलाग़ा की समस्त विशेषताओं से हटकर रहस्यवाद का उसका जो पहलु है वह बहुत प्रभावी है इस प्रकार से कि प्यासी आत्मा को वह इस प्रकार तृप्त करता है कि उसके पवित्र जल के प्रभाव इंसान के समस्त अंग से स्पष्ट होते हैं। जब एकेश्वरवाद की पहचान और उसकी विशेषताओं के बारे में बात की जाती है तो इस तरह वह उच्च होती है कि पढ़ने वाला यह आभास करता है कि वह फरिश्तों के पंख पर सवार है और उस दूरस्थ बिन्दु पर उड़ रहा है जिसके आगे इंसान की सोच व कल्पना नहीं जा सकती। जब सोये हुए इंसान को जगाने व जागरुक करने की बात आरंभ होती है, जब मौत और जीवन के समाप्त हो जाने और पहले की क़ौमों व जातियों के अंजाम की बात होती है तो इस तरह बात होती है कि इंसान का समूचा अस्तित्व कांप उठता है। हज़रत अली  परलोक और महान ईश्वर की याद का सुन्दर चित्रण करते हुए कहते हैं” ईश्वर ने अपनी याद को दिलों का सैक़ल करार दिया है। ईश्वर की याद से न सुनने वाला सुनने वाला हो जाता है, न देखने वाला देखने वाला हो जाता है और उद्दंडता करने वाला उद्दंडता के बाद नतमस्तक हो जाता है।“

इसके बाद जो लोग ईश्वरीय मार्ग में चलते हैं उनके संबंध में हज़रत अली  फरमाते हैं” वे फरिश्तों के मध्य रहते हैं। उन्हें आराम व सुकून होता है। उनके लिए कभी भी समाप्त न होने वाली अनुकंपायें तैयार हैं। जब वे ईश्वर को पुकारते और उसे याद करते हैं तो प्रायश्चित के समीर चलने और पापों के पर्दों के हट जाने का आभास करते हैं।

हज़रत अली  के अस्तित्व की व्यापकता नहजुल बलाग़ा से विशेष नहीं है और न केवल आस्था, नैतिकता, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आदि विषयों से विशेष थी बल्कि दुआ, प्रार्थना और रहस्यवाद से जुड़े मामलों में भी हज़रत अली  के अस्तित्व की व्यापकता स्पष्ट है। इस विषय को सिद्ध करने के लिए “सहीफये अलविया” नाम की हज़रत अली  की एक मूल्यवान पुस्तक की ओर संकेत करते हैं। इस किताब में हज़रत अली की प्रार्थनाओं का उल्लेख है। इस महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान किताब को अब्दुल्लाह बिन सालेह समाहिजी नाम के महान शीया धर्मगुरू व विद्वान ने एकत्रित व संकलित किया है। उन्होंने यह कार्य दसवीं हिजरी कमरी में किया था। इस मूल्यवान किताब पर विद्वान, धर्मगुरू और हदीस बयान करने वाले ध्यान देते हैं और विशेषज्ञ एक विश्वस्त प्रमाण के रूप में उसे देखते हैं। इस मूल्यवान किताब में 150 से अधिक दुआएं हैं और इस किताब की व्यापकता के दृष्टिगत उसे दुआओं का संग्रह कहा जा सकता है यहां तक कि कुछ विचारकों ने इसकी तुलना चौथे इमाम की सहीफये सज्जादिया किताब से किया है। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि हदीस बयान करने वाले एक महान विद्वान व धर्मगुरु दिवंगत नूरी ने “मुस्तदरकुल वसाएल” नाम की एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी है और इस किताब के सुन्दर अंत के रूप में “सहीफये सानविया अलविया” नाम की एक किताब लिखी है जो सहीफये अलविया किताब के महत्व को दर्शाती है। क्योंकि सहीफये सानविया अलविया में जो बातें उन्होंने लिखी हैं उनमें से बहुत सी बातों व प्रार्थनाओं को सहीफये अलविया से लिया है।

हज़रत अली की एक अन्य मूल्यवान धरोहर “ग़ोररूल हेकम व दोररुल कलिम ” नाम की किताब है। इस मूल्यवान किताब में हज़रत अली  के लगभग 11 हज़ार छोटे-2 कथनों को एकत्रित किया गया है और यह कार्य तुर्की के कुर्दिस्तान क्षेत्र के आमिद नगर के एक विद्वान व धर्मगुरू अब्दुल फत्ह नासेहुद्दीन अब्दुल वाहिद बिन मोहम्मद आमेदी ने किया है। मोहम्द आमेदी, पांचवी हिजरी क़मरी में आमिद नगर के न्यायधीश और हदीस बयान करने वाले वरिष्ठ धर्मगुरू थे। मोहम्मद आमिदी बहुत से विद्वानों और धर्मगुरूओं के विश्वासपात्र थे और उनकी मूल्यवान किताब “ग़ोररुल हेकम व दोररुल कलेम” की बहुत सी हदीसों को इन विद्वानों व धर्मगुरूओं ने अपनी-2 अपनी किताबों में बयान किया है। इस किताब के महत्वपूर्ण होने को समझने के लिए इतना ही काफी है कि इस किताब की विभिन्न हस्तलिखित प्रतियां ईरान के पवित्र नगर मशहद, ईरानी संसद, मदरसे आली शहीद मुर्तज़ा मुतह्ररी, भारत, तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस के पुस्तकालयों में मौजूद हैं। यह किताब सात खंडों में है। यह ईरान, मुंबई, सैदा, मिस्र और सीरिया में बारमबार प्रकाशित हो चुकी है। अरबी के अलावा इस किताब का फार्सी और उर्दू में अनुवाद हो चुका है और इस्लामी जगत के एक प्रसिद्ध शीया विद्वान व धर्मगुरू जमालुद्दीन मोहम्मद खांसारी ने फारसी भाषा में उसकी व्याख्या भी की है। इस मूल्यवान किताब को 91 भागों में बांटा गया है। इसके नैतिक, आस्था, शैक्षिक और सामाजिक आदि समस्त विषयों को वर्णमाला के हिसाब से लिखा गया है।

बहरहाल हजरत अली  ने जो मूल्यवान धरोहरें छोड़ी हैं उनका अध्ययन, शोध और उन पर अमल करना बहुत ज़रूरी है और न्याय व सच्चाई के प्यासे संसार के लिए हज़रत अली को सर्वोत्तम आदर्श के रूप में पेश किया जा सकता है। स्पष्ट है कि पूर्ण सच्चाई व अच्छाई महान ईश्वर की इच्छा और उसके वादे के अनुसार उस समय व्यवहारिक होगी जब महामुक्तिदाता हज़रत इमाम महदी लोगों की नज़रों के सामने प्रकट होंगे।

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