धर्म

पवित्र क़ुरआन चमकता हुआ सूर्य है जो अपने प्रकाशमयी मार्गदर्शन से अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है : ईश्वरीय वाणी पार्ट 30

सूरे इसरा में महान ईश्वर कहता है” आपके पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके अलावा किसी और की उपासना न की जाये और माता- पिता के साथ भलाई की जाये।

जब भी उनमें से एक या दोनों तुम्हारे सामने बूढे हो जायें तो उनका न्यूनतम अपमान भी नहीं करना और उन्हें झिड़कना नहीं और उनसे शिष्टापूर्वक बात करना और उनके आगे दयालुता से, नम्रता से भुजाये झुकाये रखना और कहो कि हे पालनहार जिस तरह इन्होंने मुझे बालकाल में पाला है तू भी उन पर दया कर”

ईश्वरीय धर्म इस्लाम में हर अच्छे कार्य का आधार एकेश्वरवाद है। इसी संबंध में पवित्र कुरआन माता- पिता के बारे में सिफारिश करता है और बल देकर कहता है कि उनके साथ भलाई की जाये। यहां पर रोचक बात है कि महान ईश्वर ने सबसे पहले अपनी उपासना का उल्लेख किया है और उसके बाद मां- बाप के आदर- सम्मान की बात की है। इससे यह बात स्पष्ट है कि इस्लाम में माता- पिता को बहुत महत्व प्राप्त है। इसके महत्व को समझने के लिए बस इतना ही काफी है कि महान ईश्वर ने अपनी उपासना के बाद माता- पिता के आदर- सत्कार की बात की है। माता पिता और बच्चों के बीच में जो संबंध होता है वह अनउदाहरणीय होता है और वह समाज की मजबूती एवं उसका मूल आधार होता है। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय धर्म इस्लाम में जितना अधिक बल माता पिता के सम्मान पर दिया गया है उतना किसी और धर्म में नहीं है। इस्लाम में माता- पिता के सम्मान पर इतना बल दिया गया है कि अगर माता- पिता काफिर भी हों तब भी उनका सम्मान किया जाना चाहिये। दूसरे शब्दों में अगर माता पिता ईश्वर को न मानने वाले हों तो तब भी उनका सम्मान किया जाना चाहिये।

सूरे इसरा की २३वीं-२४वीं आयत में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि बच्चों को चाहिये कि वे माता- पिता के साथ बहुत ही शालीन व शिष्टाचारिक तरीके से पेश आयें। इसी तरह इन आयतों में यह भी कहा गया है कि जब माता पिता बूढे हो जायें तो ऐसा कोई काम न करे जिससे उन्हें कष्ट पहुंचे। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अगर माता पिता जवान हों तब भी उनका सम्मान किया जाना चाहिये। माता पिता से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करना चाहिये, उनसे अनुचित बात नहीं करनी चाहिये। उनसे बहुत ही शालीन व शिष्टाचारिक ढंग से बात करना चाहिये। उनके समक्ष विनम्र रहना चाहिये। यही नहीं अगर मां बाप का व्यवहार अच्छा न भी हो तब भी उनके लिए दुआ करनी चाहिये और कहना चाहिये कि हे पालनहार इन पर दया कर जिस तरह इन्होंने बालकाल में मुझे पाला। दूसरे शब्दों में मां बाप की शारीरिक व आत्मिक जो भी आवश्यकता हो उसे भलाई के साथ पूरा किया जाना चाहिये। किसी भी इंसान को यह नहीं भूलना चाहिये कि बचपने में वह भी कमज़ोर व अक्षम था और उसके माता पिता ने उसके प्रति प्रेम में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया था।

एक दिन एक बूढ़े बाप ने पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में कहा” एक दिन में एक मजबूत और धनी आदमी था अपने बेटे की सहायता करता था परंतु अब वह पैसे वाला हो गया है और मेरी सहायता नहीं करता है। पैग़म्बरे इस्लाम रो पड़े और कहा कोई पत्थर और रेत नहीं है जो इस बात को सुने और न रोये। उसके बाद आपने फरमाया तुम और तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुम्हारे पिता का है” बहरहाल पवित्र कुरआन लेशमात्र भी माता पिता के अपमान व अनादर को पसंद नहीं करता है चाहे उनका धर्म कुछ भी हो और उनका संबंध किसी भी जाति व समुदाय से हो।

पवित्र कुरआन के सूरे इसरा में अपने निकट परिजनों और ज़रूरतमंद लोगों की सहायता की ओर संकेत किया गया है और इस बात पर बल देकर कहा गया है कि खर्च करने में अपव्यय नहीं होना चाहिये। सूरे इसरा की आयत नंबर २९ में आया है” और अपने हाथ को न ही अपनी गर्दन से बांध लो (यानी किसी को कुछ न दो) और न ही इतना खुला छोड़ो कि सब कुछ दे डालो कि निन्दित व असहाय होकर बैठ जाओ” जो इंसान आवश्यकता से अधिक खर्च करता है यह कार्य इस बात का कारण बनता है कि इंसान अपने कार्यों को जारी नहीं रख पाता है और आखिर में वह अपने घर बैठ जाता है।

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम अपने घर में थे। एक मांगने वाला दरवाज़े पर आया। देने के लिए कुछ नहीं था। उसने पहनने के लिए वस्त्र ही मांग लिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपना एकमात्र वस्त्र उसे दे दिया। यह कार्य इस बात का कारण बना कि पैग़म्बरे इस्लाम उस दिन नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद न जा सके। उस वक्त सूरे इसरा की २९वीं आयत उतरी जिसमें महान ईश्वर सीमा से अधिक दान करने से मना करता है।

बलात्कार, किसी की हत्या, अनाथों का माल खाना, कम तौलने और अहंकार से बचना वे विषय हैं जिनका सूरे इसरा की आयत नंबर ३३ में उल्लेख किया गया है। महान ईश्वर कहता है” जिस जान का मारना ईश्वर ने हराम किया है उसे न मारना मगर वैध ढंग से और जो व्यक्ति नाहक़ मारा जाये तो हमने उसके उत्तराधिकारी को यह अधिकार दे रखा है कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे निश्चय ही उसकी सहायता की जायेगी”

समस्त ईश्वरीय और ग़ैर ईश्वरीय धर्मों में इंसानों की जान को महत्व दिया गया है पंरतु इस्लाम धर्म ने इस मामले को विशेष महत्व दिया है यहां तक कि पवित्र कुरआन के सूरे माएदा में कहा गया है कि एक इंसान की हत्या समस्त इंसानों की हत्या के समान है। हां अगर कोई इंसान किसी इंसान की हत्या कर देता है तो गये व्यक्ति के परिजनों को हत्यारे से बदला लेने का अधिकार दिया गया है लेकिन इसमें भी उसे सीमा से अधिक बढने की अनुमति नहीं है।

निःसंदेह हर समाज में विभिन्न कारणों से बच्चे अनाथ हो जाते हैं। मानवता की दृष्टि से ऐसा बच्चों का समर्थन व सहायता की जानी चाहिये। इसी कारण इस्लाम ने इस विषय को असाधारण महत्व दिया है। सूरे इसरा की ३४वीं आयत में सभी लोगों को अनाथों का माल खाने से मना किया गया है। इस आयत में सबसे पहले अनाथ के माल की सुरक्षा के महत्व की बात की गयी है महान ईश्वर कहता है” और अनाथों के माल को हाथ न लगाओ सिवाये उत्तम रीति के यहां तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुंच जायें और वादे को पूरा करो कि वादे के बारे में अवश्य पूछा जायेगा। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अनाथ के माल में से खाना पीना हराम है पंरतु अगर कोई एसा कार्य किया जाये जिससे अनाथ के धन में वृद्धि हो या इससे उसकी सुरक्षा हो सके तो यह कार्य सही है।

सूरे इसरा की आयत नंबर ३९ में पवित्र कुरआन एकेश्वरवाद के बारे में चर्चा करता है और उसके बाद महान ईश्वर की महानता को सिद्ध करने का वर्णन करते हुए कहता है सातों आसमान और ज़मीन में जो कुछ भी है सब ईश्वर का गुणगान करते हैं और कोई भी चीज़ नहीं है जो ईश्वर का गुणगान न करती हो पंरतु तुम उनके गुणगान को नहीं समझते हो कि निश्चय ही वह अत्यंत सहनशील और क्षमाशील है”

अलबत्ता पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में ब्रह्मांड में मौजूद वस्तुओं के गुणगान की ओर संकेत किया गया है। दूसरे शब्दों में ब्रह्मांड की कोई एसी वस्तु नहीं है जो महान ईश्वर का गुणगान न करती हो। इस ब्रह्मांड में मौजूद अनुपम व्यवस्था इस वास्तविकता की सूचक है कि इस ब्रह्मांड का रचयिता हर प्रकार के दोष से पवित्र है। इसी प्रकार ब्रह्मांड में मौजूद वस्तुएं उसकी असीम शक्ति और ज्ञान की सूचक हैं। क्योंकि अगर ज्ञान और शक्ति न होती तो ये चीज़ें अस्तित्व में ही न आतीं।

सूरे इसरा की 78वीं आयत में महान ईश्वर नमाज़ कायेम करने की ओर संकेत करते हुए कहता है” नमाज कायेम करो सूरज के ढलने से रात के छा जाने तक और सुबह की नमाज़ के प्रति पाबंद रहो क्योंकि सुबह की नमाज पर रात दिन के फरिश्तों की गवाही होती है”

पवित्र कुरआन इसमें और इसके बाद वाली आयत में नमाज तथा महान ईश्वर पर ध्यान देने की बात करता है। ये वे चीज़ें हैं जो इंसान को शक्ति प्रदान करती हैं और शैतानी उकसावे से मुक्ति पाने व दूर रहने का बेहतरीन साधन है। नमाज इंसान को महान ईश्वर की याद दिलाती है और इंसान की आत्मा को पापों से शुद्ध व दूर कर देती है। इंसान के स्वास्थ्य पर नमाज़ का बहुत प्रभाव है। नमाज़ इंसान को बुराइयों से रोकती है।

पवित्र कुरआन के सूरे इसरा की आयत नंबर ८२ और कुछ दूसरी आयतों में कुरआन के लाभ और उसके प्रभाव के बारे में चर्चा की गयी है। पवित्र कुरआन का इंसान की आत्मा पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महान ईश्वर कहता है” और हम जो चीज़ कुरआन से नाज़िल करते हैं वह मोमिनों के लिए शिफा व दया है किन्तु अवज्ञाकारियों के लिए घाटे के सिवा कुछ बढाता ही नहीं” वास्तव में पवित्र कुरआन इंसान को हर प्रकार की बीमारी से स्वच्छ व शुद्ध बनाता है। जो लोग पवित्र कुरआन की शिक्षाओं पर अमल करते हैं उनके अस्तित्व में नाना प्रकार के सदगुण पाये जाते हैं।

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