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अरब डायरी : सऊदी अरब ईरान से रिश्ते सुधारने के लिए पाकिस्तान, तुर्की और क़तर के ज़रिये वार्ता कर रहा है : मजबूर सऊदी अरब चीन-रूस की शरण में!

अमेरिकी चुनावों में सत्ता परिवर्तन का नुक्सान दो देशों को सबसे ज़यादा होना माना जा रहा है, एक भारत और दूसरा सऊदी अरब, भारत के ऊपर बाइडेन की हुकूमत दबाव बना रही है कि भारत रूस से S-400 सिस्टम न खरीदे और अगर भारत खरीदता है तो फिर अमेरिका भारत के खिलाफ कार्यवाही करेगा, दूसरे सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के खिलाफ अमेरिकी हुकूमत ने अपना पक्ष साफ़ कर दिया है, वो शहज़ादा सलमान के खिलाफ जमाल खगोशी की हत्या के मामले को इस्तेमाल कर सऊदी अरब पर ज़ियादा से ज़ियादा दबाव बनाना चाहती है, अमेरिका की कोशिश सऊदी अरब को किसी तरह से ईरान के खिलाफ जंग के लिए खड़ा करना है, जबकि सऊदी अरब फिलहाल ईरान से अपने रिश्तों को सुधारने के लिए तुर्की और पाकिस्तान के माध्यम से बातचीत कर रहा है, साथ ही क़तर के विदेश मंत्री को सऊदी अरब ने ईरान के साथ वार्ता के लिए खासतौर पर मनाया है, सूत्रों के मुताबिक सऊदी किंग मुहम्मद सलमान ने अमेरिका और इस्राईल के बढ़ते दबाव और दखल को देखते हुए सऊदी की सत्ता अपने हाथों में ले ली है, किंग को लगता है कि प्रिंस सलमान ने कई पुराने दोस्तों को इसराइल के झांसे में आ कर दुश्मन बना लिया है या उनसे रिश्ते ज़यादा ही ख़राब कर लिए थे, इन सबको देख कर सऊदी किंग सलमान ने तुर्की, पाकिस्तान, क़तर के आलावा यमन, सीरिया से रिश्ते सुधारने की तरफ कदम बढ़ाये, जिसके नतीजे में सऊदी अरब ने यमन की जंग को जल्द से जल्द खतम करने के लिए गोपनीयं वार्ता ओमान के अंदर जारी रखी हैं, सऊदी अरब हौसी बाग़ियों के प्रतनिधियों से जंग रोकने के लिए मुसलसल वार्ता कर रहा है, वहीँ सऊदी अरब ने अपनी ग़लती का अहसास होते ही पाकिस्तान के साथ मामलात को सुधारने के लिए बड़े निवेश करने का एलान कर दिया है, पाकिस्तान के गवादर में ऑइल प्रोजेक्ट में सऊदी अरब बहुत बड़ा निवेश करने जा रहा है, इसके आलावा पाकिस्तान से जो बकाया रुपया वसूलने की बात थी सऊदी अरब ने उसे लेने से मना कर दिया है, पाकिस्तान के रास्ते सऊदी अरब चीन और अफ़ग़ानिस्तान से अपने बिगड़े रिश्ते सुधरने की कोशिश में है, सऊदी अरब अमेरिका के रवैये से परेशान और हैरान है, ऐसे में उसकी कोशिश चीन के साथ जाने की है, इसी वजह से सऊदी अरब चीन के सी पैक का हिस्सा बनने को तैयार है, वो चीन को सस्ते रेट पर आयल सप्लाई के लिए भी तैयार है, चीन की ताकात का अंदाजा सऊदी अरब को अच्छी तरह से है, नए समीकरण बन रहे हैं, अमेरिका को भारत की ज़रूरत है, तो चीन रूस पाकिस्तान से साथ हैं, ईरान और सऊदी अरब आपस में लड़ते रहते हैं मगर ईरान के चीन से रिश्ते बहुत अच्छे और गहरे हैं ऐसे में सऊदी अरब के लिए चीन से सम्बन्ध क़ायम करना तब ही मुमकिन है जब सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते सुधरे हों, लिहाज़ा सऊदी अरब गोपनीयं रूप से ईरान से रिश्ते सुधारने के लिए पाकिस्तान, तुर्की और क़तर के ज़रिये वार्ता कर रहा है

बाइडेन की हुकूमत के हालिया रुख ने सऊदी अरब को चीन और रूस के करीब लाने को मजबूर कर दिया है, साथ ही सऊदी अरब को इस मोके पर पाकिस्तान की भी ज़रूरत आ पड़ी है, पाकिस्तान एक नुक्लेअर पॉवर सम्पन देश है, जिसकी अपनी अलग अहमियत है

सऊदी अरब भारत के साथ भी अपने संबंधों को लेकर नए सिरे से विचार कर रहा है, धयान रहे अब सऊदी की सत्ता किंग सलमान के पास है, और वो पाकिस्तान की कीमत पर भारत को अहमियत नहीं देंगे,, ऐसे में भारत को भी अपने मामलात को लेकर परिवर्तन करना चाहिए, मगर भारत की विदेश निति में वैसी धार नहीं है जैसा पहले हुआ करती थी…..परवेज़


सीरिया को अरब संघ में वापस लाया जाएः इराक़

इराक़ के विदेशमंत्री ने सीरिया को अरब संघ में वापस लाए जाने की मांग की है।

फ़ोआद हुसैन ने अरब जगत में एकता को मज़बूत करने के उद्देश्य से सीरिया को पुनः अरब संघ में शामिल करने पर बल दिया है।

इराक़ के विदेशमंत्री फ़ोआद हुसैन ने मंगलवार को सऊदी अरब में फ़ार्स की खाड़ी की सहकारिता परिषद के महासचिव नाएफ़ अलहजरुफ़ से भेंटवार्ता की। उन्होंने इस वार्ता में इस बात पर बल दिया कि सीरिया को अरब संघ में वापस लाया जाना चाहिए क्योंकि वह इस संघ के संस्थापक देशों में से है। उन्होंने कहा कि यह काम इस संघ के सारे ही सदस्य देशों के हित में है। इससे पहले अल्जीरिया भी अरब संघ में सीरिया को वापस लाए जाने की मांग कर चुका है।

इराक़ के विदेशमंत्री का कहना था कि उनकी देश की शांति एवं सुरक्षा, फ़ार्स की खाड़ी पर सकारात्मक प्रभाव डालेगी एसे में विभिन्न क्षेत्रों में इस परिषद के साथ सहयोग एवं सहकारिता ज़रूरी है।

उल्लेखनीय है कि सीरिया संकट के समय सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के दबाव के कारण अरब संघ ने सन 2011 में इस देश की सदस्यता निलंबित कर दी थी।


अमरीकी छत्रछाया में सीरिया में फलते-फूलते दाइश के आतंकियों की ज़िम्मेदारी अब मोसाद के हाथों में

सीरिया में दाइश के आतंकियों की गतिविधियाों की ज़िम्मेदारी अब इस्राईल की गुप्चरसेवा मोसाद को दे दी गई है।

इराक़ के दियाला प्रांत की धर्मगुरू परिषद के प्रमुख ने बताया है कि सीरिया में सक्रिय दाइश के आतंकवादियों के कैंपों की ज़िम्मेदारी अबतक अमरीका की गुप्तचर सेवा सीआईए के हाथों में थी किंतु अब यह काम इस्राईली गुप्तचर सेवा मोसाद के हवाले कर दिया गया है। जब्बार अलमामूरी ने कहा कि पिछले कुछ समय से सीरिया में सक्रिय दाइश के आतंकियों की देखरेख मोसाद कर रही है।

उन्होंने कहा कि सीरिया में जो कुछ भी होता है उसका सीधा प्रभाव इराक़ की सुरक्षा पर पड़ता है क्योंकि दोनो देशों की सीमाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि सीरिया में आतंकी गुट, अमरीका और इस्राईल की देखरेख में अपनी गतिविधियां अंजाम देते हैं। इससे पहले सीरिया के सुरक्षा सूत्रों ने बताया था कि अमरीकी सैनिकों के हैलिकाप्टरों से सीरिया से दाइश के आतंकवादियों को इराक़ की सीमा पर पहुंचाया जा रहा है। इसी बीच इराक़ सुरक्षा सूत्रों ने बताया है कि मंगलवार को नैनवा प्रांत में सीरिया से मिलने वाली इराक़ी सीमा पर दाइश के 11 आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया गया है।

जब्बार अलमामूरी ने कहा कि मध्यपूर्व को अशांत रखने के लिए आतंकवादी गुटों को जन्म देना अमरीका की नीति रही है। उन्होंने कहा कि पहले अलक़ाएदा को सामने करके यह काम किया गया और अब दाइश की आड़ में यह काम किया जा रहा है।


इराक़, अमरीकी दूतावास को निशाना बनाकर फिर हुआ राॅकेट हमला

इराक़ की राजधानी बग़दाद में अमरीकी दूतावास को निशाना बनाकर एक बार फिर राकेटों से हमला किया गया।

इराक़ी सूत्रों ने रिपोर्ट दी है कि बग़दाद के ग्रीन ज़ोन क्षेत्र में धमाके की आवाज़ सुनी गयी जिसके बाद अमरीकी दूतावास के सायरन बजने लगे।

फ़ार्स न्यूज़ एजेन्सी की रिपोर्ट के अनुसार, इराक़ी सूत्र ने सोमवार की रात बग़दाद के ग्रीन ज़ोन क्षेत्र में धमाके की आवाज़ सुनने की ख़बर दी है।

कुछ इराक़ी सूत्रों ने इस बारे में रिपोर्ट दी है कि धमाके की आवाज़ के बाद अमरीकी दूतावास के सायरन बजने लगे।

अलमयादीन टीवी ने इराक़ में अपने पत्रकार के हवाले से रिपोर्ट दी है कि तीन कैट्यूशा राकेट अमरीकी दूतावास के आसपास गिरे हैं।

रशा टूडे ने भी बग़दाद में अपने पत्रकार के हवाले से रिपोर्ट दी है कि इस हमले में कई लोग घायल हुए हैं।

इराक़ की सरकारी समाचार एजेन्सी वा ने सुरक्षा सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि बग़दाद के ग्रीन ज़ोन क्षेत्र में दो राकेट गिरे हैं।

इराक़ी सूत्र ने इस बारे में अधिक ब्योरा नहीं दिया और इस हमले में लोगों के भी घायल होने की ख़बर का खंडन किया है।


ईरान की शर्तों के सामने मजबूर होकर झुका अमरीका, इज्ज़त बचाने के लिए थामा यूरोप का दामन

अमरीका की बाइडन सरकार की समझ में आ गया है कि ईरान झुकने वाला नहीं है और परमाणु समझौते से पूरी तरह निकल जाने की उसकी धमकी गंभीर है।

इसीलिए वाशिंग्टन ने अपने यूरोपीय घटकों को इशारा दे दिया कि ब्रसेल्ज़ में ईरानी वार्ताकारों के साथ अनौपचारिक बैठक कर लें। यह ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से अमरीका के पीछे हटने और किसी तरह अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश है।

अमरीकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने तीन यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी को सूचना दे दी कि वाशिंग्टन सरकार ईरान के साथ वार्ता की मेज़ पर बैठने के लिए तैयार है। यही नहीं अमरीकी सरकार ने आगे बढ़कर राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद से कहा है कि ईरान पर लगे प्रतिबंधों की समय सीमा में विस्तार न करने का वह विरोध नहीं करेगी। अमरीकी सरकार ने ईरानी कूटनयिकों की यात्रा पर लगी रोक में भी ढील दे दी है।

यह बात साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि अमरीका की नई सरकार ने ईरान की शर्तों के सामने झुकने के लिए अपनी तत्परता का इशारा दे दिया है। यानी वह ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हो गई है क्योंकि उसे यक़ीन हो चला है कि अगर ईरान की शर्तं न मानी गई तो ईरान परमाणु समझौते से निकल जाएगा और शायद उस रास्ते पर चल निकले जिस रास्ते पर उत्तरी कोरिया चला है।

हमें जो जानकारियां मिली हैं उनके अनुसार तो ईरान अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को अपने प्रतिष्ठानों के निरीक्षण से पूरी तरह रोकने की तैयारी कर चुका है। अगर अमरीका ने प्रतिबंधों को समाप्त न किया तो सोमवार से पर्यवेक्षकों को ईरान के प्रतिष्ठानों में जाने की अनुमति नहीं रहेगी।

अमरीकी राष्ट्रपति बाइडन ने इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू से टेलीफ़ोन पर जो वार्ता की है वह दोस्ती के एलान के लिए नहीं बल्कि यह सूचना देने के लिए थी कि अमरीका परमाणु समझौते में लौट रहा है और ईरान की सरकार से नए सिरे से संपर्क बहाल करने का फ़ैसला कर चुका है। नेतनयाहू और उनके कार्यालय ने वार्ता के बहुत मधुर माहौल में होने के जो दावे किए हैं सब बेबुनियाद हैं।

ईरान में तो सुधारवादी और सिद्धांतवादी दोनों ही धड़े इस बात पर एकमत हैं कि सारे अमरीकी प्रतिबंध ख़त्म होने चाहिए मगर अमरीका में इस बात पर गहरा मतभेद है कि ईरान के परमाणु मुद्दे से कैसे निपटा जाए। विदेश मंत्री ब्लिंकन जिस धड़े का नेतृत्व कर रहे हैं उसका कहना है कि ईरान के परमाणु समझौते में अमरीका को लौट जाना चाहिए। वहीं दूसरा कट्टरपंथी धड़ा कहता है कि ईरान के परमाणु समझौते में अमरीका तब लौटे जब ईरान की मिसाइल ताक़त और क्षेत्रीय प्रभाव पर भी बातचीत शुरू हो जाए।

ईरान हरगिज़ यह मांग मानने वाला नहीं है और अगर अमरीका ने प्रतिबंध हटाने की शर्त पूरी न की तो अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए ईरान में ठहर पाना असंभव हो जाएगा।

अमरीका केवल ताक़त की ज़बान समझता है। ईरान ने बता दिया है कि अब अमरीका के खोखले वादों पर वह कोई ध्यान नहीं देगा।

अमरीका ने ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक आतंकवाद का जो हथियार इस्तेमाल किया वह अपनी आख़िरी सांसें ले रहा है क्योंकि यह हथियार पूरी तरह फ़ेल हो गया। वह ईरान को झुकाने के बजाए अमरीका के झुकने का रास्ता साफ़ कर रहा है।

ईरान अपने प्रतिरोध की ताक़त से यह जंग जीत गया क्योंकि वह आत्म निर्भर रहना पसंद करता है और इसके लिए क़ुरबानी भी देनी पड़े तो हिचकिचाता नहीं। यहीं से अरबों को पाठ लेना चाहिए कि इज़्ज़त की ज़िंदगी कैसे गुज़ारी जाती है।

अब्दुल बरी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

इस्राईल से हैरत अंगेज़ बयान…अब अमरीका को भूल जाना बेहतर, रूस और चीन में बनाई जाए पैठ

संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्राईल के राजदूत गिलआद अरदान बार बार अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन से संपर्क कर रहे थे और इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू के लिए उनकी फ़ोन काल बहुत ज़रूरी है।

बाइडन ने नेतनयाहू को फ़ोन किया मगर इस फ़ोन के बाद नेतनयाहू ने एक बैठक बुलाई जो असाधारण है। इसमें वह ईरान के परमाणु समझौते के बारे में बात करना चाहते हैं।

नेतनयाहू मान चुके हैं कि अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन से उनके मतभेद हैं मगर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बाइडन से उनकी दोस्ती बीस साल पुरानी है। नेतनयाहू ने यह नहीं बताया कि मतभेद के मुद्दे क्या हैं मगर सब को मालूम है कि बाराक ओबामा के शासनकाल के आख़िरी महीनों में नेतनयाहू ने कांग्रेस की दावत पर अमरीका का दौर किया था और इस तरह उन्होंने ओबामा प्रशासन को ललकारा था। यह ओबामा के साथ ही उस समय के उप राष्ट्रपति जो बाइडन का खुला अपमान था। नेतनयाहू ने अमरीकी कांग्रेस में जाकर भाषण दिया था और ईरान के साथ किए गए परमाणु समझौते का खुलकर विरोध किया था जिसे ओबामा प्रशासन अपनी कूटनीति की सफलता क़रार दे रहा था।

इस्राईली सांसद अय्यूब क़ुर्रा ने एक बयान में अच्छी तरह समझा दिया कि नेतनयाहू इस समय कितने गहरे संकट में पड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर बाइडन सरकार गोलान हाइट्स को इस्राईल का इलाक़ा मानने से इंकार कर देती है और ईरान के परमाणु समझौते में लौट जाती है तो फिर इस्राईल को चाहिए कि अमरीका को भूल कर चीन और रूस का दामन थामे। उन्होंने आगे कहा कि अमरीका के कहने पर इस्राईल ने चीन के साथ एक अरब डालर का हथियार सौदा ठंडे बस्ते में डाल दिया था अब ज़रूरत है कि उस डील को फिर से जीवित किया जाए।

अय्यूब क़ुर्रा वैसे तो नेतनयाहू की पार्टी के सांसद हैं मगर उनके बयान का महत्व इस लिए बढ़ जाता है कि वह नेतनयाहू के बहुत क़रीबी लोगों में हैं। यह पहला मौक़ा है कि इस्राईल के भीतर अमरीका को लेकर इस प्रकार का धमकी भरा बयान दिया जा रहा है। कुछ लोग तो यह मान रहे हैं कि ख़ुद नेतनयाहू ने पर्दे के पीछे से यह बयान दिलवाया है।

इस प्रकार का बयान तब आया है जब बाइडन ने चीन और रूस को लेकर कड़े बयान दिए हैं और चीन को धमकी दी है कि मानवाधिकारों के हनन के मामले में उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने रूस को धमकी दी कि मास्को की शत्रुतापूर्ण नीतियों, अमरीकी चुनाव में हस्तक्षेप और साइबर हमलों पर वाशिंग्टन के ख़ामोश रहने का ज़माना बीत चुका है।

नेतनयाहू ने जो पैंतरा बदला है वह कोई नई बात नहीं है क्योंकि सोवियत संघ संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्राईल को मान्यता देने में आगे आगे था मगर ज़ायोनियों ने हमेशा अमरीका का साथ दिया तो अब अगर वह पाला बदलता है तो इसमें बहुत ज़्यादा आश्चर्य की गुंजाइश नहीं है।

मगर यहां सवाल यह है कि अमरीका और पश्चिम ने इस्राईल को बाक़ी रखने के लिए सैकड़ों अरब डालर की रक़म ख़र्च की है क्या वह बर्दाश्त करेंगे कि इस्राईल उनके ख़ैमे से निकल जाए? इसका जवाब तो हमें नहीं मालूम मगर इतना ज़रूर पता है कि इस्राईली सरकार इस समय गहरे संकट में फंसी हुई है।

मध्यपूर्व के इलाक़े में गहरे बदलाव हो रहे हैं, सबसे बड़ा बदलाव तो उस प्रतिरोधक मोर्चे का लगातार मज़बूत होना है जिसका नेतृत्व ईरान कर रहा है और यह मोर्चा पूरे पश्चिमी एशिया के इलाक़े की तसवीर बदल देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

यमन, मआरिब पर नियंत्रण की उल्टी गिनती शुरु, सेना ने चारों ओर से शहर को घेरा, कभी भी हो सकता है जीत का एलान…

यमन के एक सैन्य सूत्र ने रूसी समाचार एजेन्सी को बताया है कि मआरिब प्रांत के केन्द्र का यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों ने घेराव कर लिया और जल्द ही इस शहर पर उनका पूरा नियंत्रण हो जाएगा।

एक सैन्य सूत्र ने रूसी समाचार एजेन्सी स्पूतनिक से बात करते हुए यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों के शहर पर नियंत्रण के बहुत क़रीब होने की सूचना दी है।

सूत्र ने बताया है कि यमनी सैनिकों और स्वयं सेवी बल के लड़ाकों ने दो सप्ताह के आप्रेशन के दौरान मआरिब शहर का घेराव कर लिया जबकि उसके दूसरे शहर से संपर्क को तोड़ने के लिए भीषण लड़ाई जारी है।

यमनी सैन्य सूत्र का कहना है कि मआरिब शहर के आसपास के सारे पहाड़ी इलाक़ों पर नियंत्रण के बाद अल-क़ायदा और सऊदी गठबंधन के एजेन्टों से ख़ाली कराने का आप्रेशन जारी है और मआरिब पर जीत का कभी भी एलान किया जा सकता है।

अमरीका ने कर ली सऊदी क्राउन प्रिंस को घेरने की पूरी तैयारी

सऊदी अरब के सूत्रों ने बताया है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ख़िलाफ़ अमरीका की राजनीतिक कार्यवाही के मद्देनज़र, राजमहल में सतर्कता बढ़ा दी गई है।

सऊदी अरब के शासक सलमान, अपने बेटे युवराज मुहम्मद बिन सलमान के संबन्ध में अमरीकी सरकार के संभावित व्यवहार को लेकर बहुत चिंतित हैं। इसी विषय के दृष्टिगत उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा है कि वाइट हाउस के क्रोध को कम करने के लिए वे कोई रास्ता निकालें। इन्ही सूत्रों का कहना है कि बिन सलमान ने अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को भेजे गोपनीय पत्र में उनसे मांग की है कि वे सऊदी पत्रकार ख़ाशुक़जी की हत्या से संबन्धित जानकारी को सार्वजनिक न होने दें।

शुक्रवार को अमरीका के एक जानकार सूत्र ने बताया था कि बाइडेन सरकार, मार्च के पहले सप्ताह में जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या से संबन्धित रिपोर्ट को प्रकाशित करने जा रही है। इसी बीच एक रूसी समाचारपत्र “नीज़ा वीसीमाया” ने भी अपने एक लेख में बताया है कि एसा लगता है कि बाइडेन सरकार ने मुहम्मद बिन सलमान को राजनैतिक ढंग से घेरने की तैयारी कर ली है। अब बाइडेन सरकार, युवराज बिन सलमान के बदले सऊदी अरब के शासक मुहम्मद सलमान से बात करना चाहती है।

उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब के युवराज मुहम्मद बिन सलमान के साथ अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के बहुत अच्छे संबन्ध थे और उन्होंने अपनी पहली विदेशी यात्रा में सऊदी अरब को चुका था किंतु अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति ने अबतक युवराज मुहम्मद बिन सलमान को कोई लिफ्ट तक नहीं दी है जिससे वे काफ़ी चिंतित हैं।

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