विशेष

नकारात्मक दृष्टि वाला सदा ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, वैमनस्य आदि की अग्नि में निरंतर जलता रहता है!

मुदित मिश्र
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नव दिवसीय विपश्यना साधना के उपरान्त आज धम्मगढ़ में मङ्गल-मैत्री (ध्यानोपरांत सद्भावना) सम्पन्न हुई श्री सत्यनारायण गोयन्दका जी की प्रतिनिधि आचार्या ज़किया रिज़वी जी के वात्सल्यपूर्ण सानिध्य में,आइये व्यवहार से परमार्थ की ओर मैत्री भावना पर पतञ्जलि का यह सूत्र देखें :-
*मैत्र्यादिषु बलानि।।२३।।*

मैत्री आदि भावनाओं (मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा अर्थात समता) में संयम करने से योगी को अमोघ बल प्राप्त होता है. समाधि पाद के सूत्र 33 में बताया गया है कि सुखी जनों से मित्रता, दुखियों पर करुणा, पुण्यात्माओं में प्रसन्नता तथा पापियों की उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है. साधक इनका पालन करके अपने जीवन को प्रसन्न रखकर ही योग मार्ग में आगे बढ़ सकता है. जीवन तथा योग साधना दोनों के लिए विधायक दृष्टि बड़ी महत्वपूर्ण है. इससे व्यक्ति अनेक प्रकार के विचारों एवं संघर्ष से बच जाता है तथा जीवन में अत्यंत मानसिक शांति का अनुभव करता है किंतु ऐसा योगी जो सिद्धावस्था में पहुंच जाता है, यदि वह मैत्री, करुणा और मुदिता में संयम करता है, तो उसे अमोघ बल प्राप्त होता है. अध्यात्म का नियम है कि विधायक होने से वह स्व-ऊर्जा को संचित करता है, उसका क्षय नहीं होता जिससे उसमें अपूर्व साहस धैर्य आत्मविश्वास विचारों एवं कार्यो में दृढ़ता, आत्मबल प्राप्त होता है. इनके बल पर ही वह जीवन में अद्भुत कार्य कर सकता है.


राम, कृष्ण, विवेकानंद, महात्मा गांधी आदि अनेक महापुरुष इसी विधायक दृष्टि के कारण आत्मबल के धनी हुए. जबकि नकारात्मक दृष्टि वाले भौतिक साधनों से संपन्न होते हुए भी आत्मा से निर्बल हो जाते हैं. क्योंकि इससे उनकी ऊर्जा का क्षय होता रहता है. रावण, कौरव, दानव आदि इसी कारण से भौतिक शक्तियों से संपन्न होते हुए भी आत्मबल में निर्बल ही सिद्ध हुए. अध्यात्म के साथ ही यह दृष्टि जीवन में भी लागू होती है, कि विधायक दृष्टि वाला अनेक प्रकार की चिंताओं तथा परेशानियों से बचा रहता है. जिससे वह अपना जीवन सुख एवं शांति से व्यतीत करता है तथा लोगों की सद्भावना प्राप्त करता है.

जबकि इसके विपरीत नकारात्मक दृष्टि वाला सदा ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, वैमनस्य आदि की अग्नि में निरंतर जलता रहता है. जो व्यक्ति दूसरों को चैन से नहीं रहने देता, वह स्वयं भी चैन से नहीं रह सकता. अध्यात्म में यह प्रतिक्रिया का सिद्धांत है कि जैसा तुम दूसरों को दोगे उसका हजार गुना तुम्हें मिलेगा. सुख देने वाला हजार गुना सुख प्राप्त करता है एवं दुख देने वाला हजार गुना दुख उठाता है यह सृष्टि का नियम है.

महर्षि पतंजलि कहते हैं, मैत्री पर संयम करने से या किसी अन्य सहज गुण पर संयम करने से उस गुण विशेष में बड़ी सक्षमता आ जाती है.सर्वप्रथम तो जागरूकता और उसके ठीक बाद आता है द्वितीय चरण अपने संयम को प्रेम पर करुणा पर ले आना. व्यक्ति को समाधि से फिर प्रेम पर वापस आना होता है. इसलिए समाधि जिसमें मृत्यु का अनुभव मिलता है.उसके बाद मैत्री पर संयम संपन्न करने से या किसी अन्य सहज गुण पर संपन्न करने से उस गुण विशेष में बड़ी सक्षमता आ जाती है. अगर निरंतर किसी एक ही बात के बारे में सोचा जाए तो वह धीरे-धीरे मूर्त रूप लेने लगती है.

वास्तव में होता क्या है, जिस संसार में हम रहते हैं वह हमारे ही द्वारा बनाया गया संसार है.जिस शरीर में हम रहते हैं,वह हमारा ही निर्माण है जिस मन में हम रहते हैं वह भी हमारी अपनी ही रचना है. हम अपनी धारणाओं के द्वारा ही सारे संसार का निर्माण करते हैं जो कुछ भी हम सोचते हैं, वह देर-सवेर वास्तविकता बन ही जाती है. प्रत्येक विचार अंततः सत्य ही हो जाता है. समाधि में जब मन नहीं रह जाता है, मन विजय हो जाता है और केवल मैत्री भाव ही रह जाता है तो व्यक्ति मैत्री की अवधारणा के साथ इतना एक हो जाता है कि वह स्वयं भी मैत्री ही हो जाता है. बुद्ध ने कहा था अब जब मैं संसार में दोबारा आऊंगा तो मेरा नाम मैत्रेय होगा मेरा नाम मित्र होगा.

पतंजलि कहते हैं मैत्री का आविर्भाव होने दो, अपनी समाधि में दूसरों को भी सहभागी बनाओ उसे बांटो और पतंजलि कहते हैं कि अपना संयम प्रेम और मैत्री भाव पर ले आओ और तब सब अपने से विकसित हो जाएगा. ऐसा नहीं है कि हम मैत्रीपूर्ण हो जाएंगे, बल्कि तब हम मैत्री भाव हो जाएंगे. तब ऐसा नहीं कि हम प्रेम करेंगे, हम प्रेम ही हो जाएंगे प्रेम हमारे होने का ढंग हो जाएगा.
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सबका मङ्गल हो

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