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भगवान बुद्ध : धर्म की आधुनिक प्रयोगशाला

मुदित मिश्र

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भगवान बुद्ध : धर्म की आधुनिक प्रयोगशाला
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भगवान बुद्ध एक ऐसी पहेली है, जिसे सुलझाया जाना हमारे लिये जरूरी है। क्यों ऐसा हुआ कि बुद्ध अपनी जड़ समेत चीन,तिब्बत, जापान, बर्मा, श्रीलंका समेत कई दूसरे देशों में चले गये और भारत की मिट्टी को अनाथ कर गये।

दशावतारों में श्रीराम व कृष्ण के बाद बुद्ध ही वह अवतार है,जिसे हम भली भाँति जानते हैं। सिंहली परम्परा कहती है कि बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व पाँचवीं, छठी शताब्दी में हुआ। वे अस्सी वर्ष तक जीवित रहे थे।उनका जीवनकाल बिहार और उत्तरप्रदेश के आसपास ही बीत गया। इससे बाहर वे कहीं आये-गये नहीं।

बुद्ध चक्रवर्ती सम्राट के लक्षणों वाले असाधारण क्षत्रिय थे। उनके पास शाक्यवंशी राजकुल में जन्म लेने मात्र से मिलने वाले सांसारिक सुखों का अक्षय भंडार था, फिर भी उन्होंने तरुणावस्था में गृहत्याग किया,परिव्राजक संन्यासी बने और ध्यान की उस अवस्था में जा पहुँचे , जिसका अभ्यास ऋषि-मुनि वैदिककाल से ही करते चले आये थे।
बुद्ध ने बहुत सीधी और सरल जीवनशैली अपनायी।उन्होंने अपने विचार किसी पर थोपे नहीं। किसी से शास्त्रार्थ करने में उनकी कोई रुचि नहीं थी।उन्होंने प्रश्न अपने आपसे किये और उत्तर मिल जाने तक धैर्य रखा।बुद्ध ने तपस्या की वही शैली अपनायी, जो वैदिक ऋषियों की थी संन्यास का वह रास्ता चुना, जो पुराणों में दिखाया गया था। जीवन के सत्य को समझने के लिये उन्होंने जो पगडंडी बनाई, वह सनातन धर्म द्वारा अनुमोदित थी, किन्तु वहाँ मिथ्या आडंबर नहीं था, प्रचलित विश्वासों को मानने की बाध्यता नहीं थी। उन रीति- रिवाजों को जबर्दस्ती बनाये रखने की विवशता भी नहीं थी, जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद के स्मारक बन कर खड़े हुए थे।

बुद्ध ने कभी किसी का विरोध नहीं किया। किसी के ऊपर छींटाकशी नहीं की। अपने समकालीन महावीर पर मतास्त्र का प्रयोग नहीं किया।बुद्ध अपने विचारों को लेकर असहज भी नहीं हुए। हठ उनके स्वभाव में नहीं था। अपने धर्म और संघ के विरुद्ध उठने वाली आवाज को उन्होंने शान्तिपूर्वक
सुना और उसे मृदुल मुस्कान से भरी हुई अपनी मौन साधना में उतार लिया।

बुद्ध जीवन का सम्मान करते हैं, और प्रगति की सम्भावना पर नये सिरे से विचार करते हैं। वे तर्कों का जाल बुनने के लिये नहीं बैठते, समस्या का समाधान खोजते हैं और उसे समाज में डाल देते हैं। बुद्ध उस कड़वाहट को धो डालना चाहते हैं, जिससे मानवता लज्जित होती है, जिससे हमारी सभ्यता की चादर मैली होती है।
बुद्ध ने दु:ख पर विचार किया, दु:ख के कारण पर विचार किया और दुःख की नकारात्मक प्रतिमा को भंग करने के सरल रास्ते सुझाये। वे मत-परिवर्तन और धर्म-परिवर्तन में विश्वास नहीं करते थे। वे तो मानवजाति के लिये नया हृदय, नया मस्तिष्क और नयी दृष्टि विकसित करने में लगे हुए थे। उनका सम्पूर्ण जीवन एक प्रयोगशाला थी,जहाँ वे वैज्ञानिक की तरह अथक परिश्रम कर रहे थे।

बुद्ध ने जीवन में एक बार भी क्रोध नहीं किया।उनके मुख से एक बार भी अप्रिय वचन नहीं निकले।वे मानवजाति से प्रेम करने वाले अनोखे भिक्षु थे।उन्होंने रूढियाँ तोड़ीं।एक सच्चे शिक्षक का जीवन व्यतीत किया, और शिक्षक के तौर पर संस्मरण शैली को अपनाया। कठोर तपस्या और उपवास के अंतहीन गलियारों में से निकल कर उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया था, वह मानवता का आत्मदर्शन था, वह संवेदनशील हृदय की करुण पुकार थी।

बुद्ध की विचारधारा पुराणपंथी नहीं,अत्याधुनिक थी।वे स्त्री-स्वातंत्र्य में विश्वास करते थे। उनके लिये कर्म ही जाति थी, कर्म ही आश्रय था। वे समाज को एकसूत्र में बाँध कर रखने के लिये कर्म को ही बन्धु कहते थे। वे कहते थे कि आचार-विचार और संवेदनाओं से हमारे व्यक्तित्व की बुनावट होती है।हमारा संसार वैसा ही है, जैसा हमने इसे रचा है। आंतरिक शान्ति ही विजेता का सच्चा पुरस्कार है।

बुद्ध केवल इसलिये अस्वीकार नहीं हो सकते कि वे वर्णाश्रम व्यवस्था, जातिप्रथा, स्थापित धर्मग्रंथ, देवी-देवता, यज्ञविज्ञान और तत्कालीन समाजशास्त्र के सामने चुनौती बन कर खड़े हो गये थे। उन्होंने अपनी पूरी थैली उलट दी थी। कुछ भी तो बचा कर नहीं रखा था।

बुद्ध दार्शनिक होने का दावा नहीं करते। भगवान् होने का तो बिलकुल नहीं। वे एक नीतिशास्त्र के प्रस्तावक हैं। वे हमें इस संसार से भागने के लिये नहीं कहते, न ही आत्मा को कष्ट में डालने का परामर्श देते हैं। वे पहले वैज्ञानिक हैं जिन्होंने एक ऐसे मध्यम मार्ग का पता लगाया, जो शान्ति, उच्च प्रज्ञा और निर्वाण की ओर ले जाता है। यही वह अष्टांग पथ है, जिसमें सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यकक् व्यायाम और सम्यक् समाधि का समावेश है। यही बुद्ध के जीवन का सार है, यही बुद्ध का विज्ञान है, और यही वह नीतिशास्त्र है जिसे बुद्ध ने अपने जीवन में चरितार्थ किया।

हम भारतीयों को सुदूर अतीत में लौटने का अच्छा अभ्यास है।तो क्यों न एक बार बुद्ध की प्रयोगशाला में चला जाए। जो पीछे छूट गया है, वह कदाचित् बौद्ध धर्म नहीं, एक जागरण है। वह एक मशाल है,जिसे थामने के लिये एक प्रयास अब भी सम्भव है।

🍁मुरलीधर
[विश्वास तो नहीं होता कि रामभद्राचार्य जी ने ऐसा कुछ कहा होगा। यदि कहा है, तो बहुत दुःख की बात है। आचार्य को ही परम्परा का ज्ञान न हो, और यह ज्ञान न हो कि उनकी बात कहाँ तक जा सकती है, तो यह आचरण और मर्यादा के क्षेत्र की बड़ी भारी त्रासदी है। भगवान् रक्षा करे।]

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