इतिहास

मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद और सियासत : ग़ुलामी बदतरीन चीज़ है चाहे उसे कितना ही ख़ुबसूरत नाम क्यों न दे दिया जाए!

source : vaia : Syed Faizan Siddiqui
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🕛 22 फरवरी 1958 ई०
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ग़ुलामी बदतरीन चीज़ है चाहे उसे कितना ही ख़ुबसूरत नाम क्यों न दे दिया जाए !”
“जो क़ौम अपने आप को बचाने पर कादिर न हो उसको तहफ़्फ़ुज़ात भी नही बचा सकते”

“आज ज़लज़लों से डरते हो, कभी तुम खुद एक ज़लज़ला थे. आज अंधेरों से कांपते हो, क्या तुम्हें याद नहीं कि तुम्हारा वजूद ही एक उजाला है। ये देखो मस्जिद के मीनार तुमसे झुक कर सवाल करते हैं कि तुमने अपनी तारीख़ के सफ्हात को कहाँ गुम कर दिया है। आओ, अहद करो कि ये मुल्क हमारा है, हम इसके लिए हैं और इसकी तकदीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज के बगैर अधूरे ही रहेंगे”

ये सब बातें कहीं है मौलाना अबुल कलाम मुहियुद्दीन बिन ख़ैरूद्दीन अल-हुसैनी आज़ाद उर्फ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने ।
11 नवंबर 1888 ईस्वी में यानी 131 साल क़ब्ल मौलाना आज़ाद की विलादत सल्तनत-ए-उस्मानिया के अल-हिजाज के शहर-ए-मक्का में हुई थी जो दौर-ए-हाज़िर में मुल्क़ ए सऊदी अरब का हिस्सा है | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की शरीक़-ए-हयात ज़ुलैख़ा बेग़म था । मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की वफ़ात 22 फरवरी 1958 ईस्वी में दिल्ली में हुई ।

भारत में 1857 की असफ़ल क्रांति के बाद उनका परिवार मक्का चला गया था.उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन साल 1898 में परिवार सहित भारत लौट आए और कलकत्ता में बस गए. आज़ाद को बचपन से ही किताबों से लगाव था. जब वे 12 साल के थे तो बाल पत्रिकाओं में लेख लिखने लगे.साल 1912 में आज़ाद ने अल-हिलाल नाम की एक पत्रिका निकालनी शुरू की. यह पत्रिका अपने क्रांतिकारी लेखों की वजह से काफी चर्चाओं में रही. ब्रिटिश सरकार ने दो साल के भीतर ही इस पत्रिका की सुरक्षा राशि ज़ब्त कर दीऔर भारी जुर्माना लगाकर उसे बंद करवा दिया.1916 आते-आते आज़ाद को बंगाल से बाहर चले जाने का आदेश दे दिया गया और रांची में नज़रबंद कर दिया गया.राष्ट्रीय एकता के पेरोकार सार्वजनिक जीवन में उतरने के साथ ही आज़ाद ने स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय एकता को सबसे ज़रूरी हथियार बताया. साल 1921 को आगरा में दिए अपने एक भाषण में उन्होंने अल-हिलाल के प्रमुख उद्देश्यों का ज़िक्र किया.उन्होंने कहा, ”मैं यह बताना चाहता हूं कि मैंने अपना सबसे पहला लक्ष्य हिंदू-मुस्लिम एकता रखा है. मैं दृढ़ता के साथ मुसलमानों से कहना चाहूंगा कि यह उनका कर्तव्य है कि वे हिंदुओं के साथ प्रेम और भाईचारे का रिश्ता कायम करें जिससे हम एक सफल राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे.”मौलाना आज़ाद के लिए स्वतंत्रता से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण थी राष्ट्र की एकता. साल 1923 में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा, ”आज अगर कोई देवी स्वर्ग से उतरकर भी यह कहे कि वह हमें हिंदू-मुस्लिम एकता की कीमत पर 24 घंटे के भीतर स्वतंत्रता दे देगी, तो मैं ऐसी स्वतंत्रता को त्यागना बेहतर समझूंगा. स्वतंत्रता मिलने में होने वाली देरी से हमें थोड़ा नुकसान तो ज़रूर होगा लेकिन अगर हमारी एकता टूट गई तो इससे पूरी मानवता का नुकसान होगा.”एक ऐसे दौर में जब राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक पहचान को धर्म के साथ जोड़कर देखा जा रहा था, उस समय मौलाना आज़ाद एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे जहां धर्म, जाति, सम्प्रदाय और लिंग किसी के अधिकारों में आड़े न आए हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार मौलाना आज़ाद कभी भी मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के समर्थक नहीं बने, उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया.15 अप्रैल 1946 को कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने कहा, ”मैंने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान के रूप में अलग राष्ट्र बनाने की मांग को हर पहलू से देखा और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यह फ़ैसला न सिर्फ़ भारत के लिए नुकसानदायक साबित होगा बल्कि इसके दुष्परिणाम खुद मुसलमानों को भी झेलने पड़ेंगे. यह फ़ैसला समाधान निकालने की जगह और ज़्यादा परेशानियां पैदा करेगा.”मौलाना आज़ाद ने बंटवारे को रोकने की हरसंभव कोशिश की. साल 1946 में जब बंटवारे की तस्वीर काफ़ी हद तक साफ़ होने लगी और दोनों पक्ष भी बंटवारे पर सहमत हो गए, तब मौलाना आज़ाद ने सभी को आगाह करते हुए कहा था कि आने वाले वक्त में भारत इस बंटवारे के दुष्परिणाम झेलेगा.उन्होंने कहा था कि नफ़रत की नींव पर तैयार हो रहा यह नया देश तभी तक ज़िंदा रहेगा जब तक यह नफ़रत जिंदा रहेगी, जब बंटवारे की यह आग ठंडी पड़ने लगेगी तो यह नया देश भी अलग-अलग टुकड़ों में बंटने लगेगा.पाकिस्तान का भविष्य पहले ही देख लिया थामौलाना ने जो दृश्य 1946 में देख लिया था, वह पाकिस्तान बनने के कुछ सालों बाद ही 1971 में सच साबित हो गया.मौलाना आज़ाद ने पाकिस्तान के संबंध में कई और भविष्यवाणियां भी पहले ही कर दी थीं. उन्होंने पाकिस्तान बनने से पहले ही कह दिया था कि यह देश एकजुट होकर नहीं रह पाएगा, यहां राजनीतिक नेतृत्व की जगह सेना का शासन चलेगा, यह देश भारी कर्ज़ के बोझ तले दबा रहेगा, पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के हालातों का सामना करेगा, यहां अमीर-व्यवसायी वर्ग राष्ट्रीय संपदा का दोहन करेंगे और अंतरराष्ट्रीय ताकतें इस पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिशें करती रहेंगी.इसी तरह मौलाना ने भारत में रहने वाले मुसलमानों को भी यह सलाह दी कि वे पाकिस्तान की तरफ पलायन न करें. उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि उनके सरहद पार चले जाने से पाकिस्तान मज़बूत नहीं होगा बल्कि भारत के मुसलमान कमज़ोर हो जाएंगे.उन्होंने बताया कि वह वक्त दूर नहीं जब पाकिस्तान में पहले से रहने वाले लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान के लिए उठ खड़े होंगे और भारत से वहां जाने वाले लोगों से बिन बुलाए मेहमान की तरह पेश आनेलगेंगे.मौलाना ने मुसलमानों से कहा,”भले ही धर्म के आधार पर हिंदू तुमसे अलग हों लेकिन राष्ट्र और देशभक्ति के आधार पर वे अलग नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में तुम्हें किसी दूसरे राष्ट्र से आए नागरिक की तरह ही देखा जाएगा.”जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो मौलाना आज़ाद की अक़्ल की दाद देनी पड़ती है उनकी सटीक भविष्यवाणियां प्रशंसनीय हैं.शायद ये वही प्रशंसा थी जिसकी वजह से पाकिस्तानी लेखक अहमद हुसैन कामिल ने ये सवाल पूछा था- क्या अब वो वक्त नहीं आ गया है कि उपमहाद्वीप के मुसलमान, जो बीते 25 सालों में अभाव और अपमान से जूझ रहे हैं, उस मसीहा की विचारधारा को अपनाएं जिसे उन्होंने 1947 में ख़ारिज कर दिया था.

हालांकि हमारे साजिद भय्या को मौलाना के बारे में और कुछ भी कहना है जोकि उन्होंने नीचे लिखा है ।

असर करें न करें सुन तो ले मेरी फ़रियाद
नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की ज़िंदगी के दो मरहले है, पहले मरहले में वह राह-ए-हक़ पर थे और दूसरे मरहले में वह राह-ए-बातिल पर थे | मैं अमली ऐतबार से पहले मरहले को 1912 से 1921 (8 साल) तक को मानता हूं और दूसरे मरहले को 1921 से 1958 (37 साल) तक को मानता हूं | मैं अलग-अलग पर बात करूंगा |

राह-ए-हक़ (1912 – 1921) : शुरुआती दौर में अबुल कलाम आज़ाद क़ुरआन-ओ-जिहाद के नारों के साथ मैदां में आए | 1912 ईस्वी में उन्होंने अल-हिलाल अख़बार की शुरुआत की और 1913 ईस्वी में हिजबुल्लाह क़ायम की | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने एक ज़लाली अंदाज़ में तमाम के दिलों में एक सूर फूंकी | शेख़-उल-हिंद ने तो यहां तक फ़रमाया कि इस नौजवान ने तो हम्हें भूला हुआ सबक याद दिला दिया | आप तस्व्वुर कीजिए कि जिस शख़्स के बारे में शेख उल हिंद ऐसा फ़रमा रहे है वह बाद में एक बदतरीन जुन्नारपोश शख़्स कैसे बन गया?

इस के लिए मैं अपनी तरफ़ से कुछ नहीं कहूंगा लेकिन जिस किसी भाई को तहक़ीक़ करनी हो वो 1921 में लाहौर के जलसे की तहक़ीक़ात कर लें | ग़ौर कीजिएगा कि शेख़ उल हिंद मौलाना महमूद अल-हसन की वफ़ात 30 नवंबर 1920 में हो चुकी थी जिन्हेंने कहा था कि इस नौजवान ने तो हम्हें भूला हुआ सबक याद दिला दिया | 1921 में उस जलसे में कुछ ऐसा हुआ था जो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अना को ठेस पहुंचा गई और मैं समझता हूं कि वहीं से वो राह-ए-बातिल की तरफ़ बढ़ने लगे |

राह-ए-बातिल (1921–1958) : मेरे इल्म में यह तो नहीं कि 1921 के ठीक बाद ही वो राह-ए-बातिल पर आ गए मैं ने ऊपर भी यह कहा है कि–“मैं समझता हूं कि वहीं से वो राह-ए-बातिल की तरफ़ बढ़ने लगे”, लेकिन वो तब राह-ए-बातिल पर आ चुके थे जब वो 1923 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने |
बुत-ए-हिंदी की मोहब्बत में बरहमन भी हुए ।

मौलाना अबुल कलाम आजाद की राह-ए-बातिल के भी दो मरहले है, एक मरहला आज़ादी से पहले का (1923 से 1947) और दूसरा मरहला आज़ादी के बाद का (1947 से 1958) | मेरा असल मौज़ू आज़ादी के बाद से मरहले का है जिस का ज़िक्र मैं नीचे के शीर्षक में करूंगा |

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सियासत : जैसा कि मैं ने ऊपर कहा भी है कि मेरा मौज़ू आज़ाद हिंद के बाद दौर ही है | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद हिंद 15 अगस्त 1947 से 2 फरवरी 1958 तक हिंद के शिक्षा मंत्री थे, वे हिंद के प्रथम शिक्षा मंत्री थे | जो शख़्स लगभग साढ़े दस सालों तक शिक्षा मंत्री रहा उस ने तालीमी ऐतबार से मिल्लत के लिए क्या किया? कुछ नहीं किया | चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे मगर जुन्नारपोशी और सेक्युलरिज्म के ग्रस्त एक ज़ेहनी ग़ुलाम जो ठहरे |

अब अपने असल मौज़ू पर आता हूं | 1948 ईस्वी में लखनऊ की एक शूरा में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने शूरा की सदारत करते हुए कहा था कि मुसलमानों को अपनी सियासी तंज़ीम बंद करके कांग्रेस मैं ज़म हो जाना चाहिए और आज मशरिक़-ओ-मग़रिब-ओ-मशरिक़ में मुसलमानों के जो हालात है उन की अहम वज़ह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की वही फ़िक़्र है जिस पर इन ख़ित्तों के मुसलमानों न अमल किया (वज़ह और भी है, जिस पर मैं अपनी अन्य लेख में चर्चा करूंगा जो इल्म-ओ-इश्क़ पर इज़ाफ़ी शीर्षक के साथ होगी) जबकि ज़ुनूबी हिंद का मुसलमां इन तमाम ख़ित्तों से बेहतर है क्योंकि जिस दौरान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी वो बचकानी बात रखी कि–मुसलमानों को अपनी सियासी तंज़ीम बंद करके कांग्रेस मैं ज़म हो जाना चाहिए–पर मुहम्मद इस्माइल वाकआउट कर गए थे और उन्होंने 10 मार्च 1948 ईस्वी में मद्रास में सियासी तंज़ीम–इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग–की नींव रखी | मुहम्मद इस्माइल को क़ाईद-ए-मिल्लत के लक़ब से नवाज़ा गया | बाक़ी कमी 2 मार्च 1958 ईस्वी में फ़ख़्र-ए-मिल्लत मौलाना अब्दुल वाहिद ओवैसी ने कर दी | खुद चिंतन-ओ-मंथन करें कि आख़िर ज़ुनूबी हिंद का मुसलमां हिंद के तमाम ख़ित्तों से बेहतर क्यूं है?

अंदाज़-ए-बयां गरचे बहुत शोख़ नहीं
शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात

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