इतिहास

लीबिया के लोगों को अब याद आता है मुअम्‍मार गद्दाफ़ी : लीबिया का इतिहास : गद्दाफ़ी के समय लीबिया!

 

लीबिया का इतिहास

उत्तरी अफ्रीका में स्थित लीबिया ज्यादातर मरुस्थली इलाके से घिरा तेल सम्पन्न देश है. आज इसे जनरल मुआम्मार गद्दाफी के 42 साल के शासन और उसके बाद की अस्थिरता के लिए ज्यादा जाना जाता है. 1951 में आजादी हासिल करने से पहले ज्यादातर समय लीबिया पर विदेशी शासन रहा. इसके बाद जल्द ही तेल की खोज ने इस देश को बड़ी सम्पन्नता दी. हाल ही में देश में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ जिसमें भारी संख्या में लोगों ने यूरोप में शरण ली

लीबीया का भूगोल
लीबिया उत्तर अफ्रीका मगरिब क्षेत्र का देश है. यह अफ्रीका का चौथा सबसे बड़ा देश है जिसकी ज्यादातर आबादी भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्र में रहती है. देश का 90% हिस्सा रेगिस्तान से ढंका है जो कि सहारा मरुस्थल का हिस्सा है. यहां केवल बिखरे हुए नखलिस्तानों में और उसके आसपास ही जीवन मिलता है. 1,759,540 वर्ग किलोमीटर (685,524 वर्ग मील) में फैला लीबिया भूमध्यसागर के तट पर स्थित उत्तरी अफ्रीका का देश होने के नाते इतिहास में खास अहमियत रखने वाला देश रहा. लीबिया के उत्तर पश्चिम में ट्यूनिशिया, पश्चिम में अल्जीरिया, दक्षिण में नाइजर और चाड, दक्षिण पूर्व में सूडान, और पूर्व में मिस्र की सीमाएं लगती है. उत्तर से लगा भूमध्य सागर लीबिया को यूरोप और बाकी दुनिया से जोड़ता है. दक्षिण और पश्चिम में बिखरे हुए पठारी इलाकी हैं. देश के दो बंदरगाहों में से एक त्रिपोली राजधानी है जहां देश की जनसंख्या का छठा भाग रहता है. यह भूमध्य सागर के पश्चिम में स्थित है. वहीं पूर्व में स्थित बेंगाजी दूसरा बंदरगाह है.

लीबिया का इतिहास
यहां कांस्य युग से ही लोग रहा करते थे. शुरू से ही लीबिया तीन हिस्सों में लंबे समय तक बंटा रहा. त्रिपोली और उसके आसपास के क्षेत्र पिपोली तानिया कहलाया, दक्षिण और दक्षिण पश्चिम के हिस्से फैजान कहे गए. वहीं पूर्वी हिस्से को सिरिनेसिया के नाम से जाना गया. फिनिसियनों ने पश्चिम लीबिया में अपने व्यापारिक केंद्र बनाए जबकि पूर्वी लीबिया में ग्रीकों ने उपनिवेशिक शहर बसाए. इसके बाद यहां कार्थागियनों, पर्सियनों, मिस्र और यूनान का अधिपत्य रहा. रोमन साम्राज्य के दौरान यहां ईसाई धर्म फैला. रोमनों के बाद यहां सातवीं सदी तक वैंडालों ने शासन किया. 7वीं सदी में इस्लाम ने जल्दी ही यहां प्रभाव जमा लिया. 16वीं सदी में स्पेन कब्जे में यह ज्यादा समय नहीं रहा और अंततः ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया. लेकिन ओटोमन राज्य के अधीन केवल त्रिपोली तानिया का हिस्सा ही था. इस दौरान यहां सैन्य अस्थिरता बनी रही और लीबिया युद्ध से दूर न रह सका. प्रथम विश्व युद्ध से पहले ही लीबिया को इटली ने अपना उपनिवेश बना लिया जो 1947 तक रहा.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
1951 में लीबिया में आजादी के बाद एक स्वतंत्र राजशाही रही. 1969 में सैन्य तख्तापलट के बाद कर्नल मुआम्मार गद्दाफी ने 1969 में सत्ता अपने हाथ में ले ली और चार दशक तक शासन किया. कर्नल गद्दाफी ने लीबिया का सैन्यकरण कर दिया. जनरल गद्दाफी और अमेरिका की दुश्मनी रही, जो 21वीं सदी में खत्म होने लगी. 2011 में पश्चिमी सैन्य सहयोग से बागी विद्रोह ने उनके शासन को समाप्त किया और उन्हें मार दिया गया.

गद्दाफी के बाद का समय
गद्दाफी की गिरफ्तारी से पहले ही संयुक्त राष्ट्र ने ‘नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल (एनटीसी)’ को वैध सरकार घोषित कर दिया. गद्दाफी के बाद अफ्रीकी संघ ने भी एनटीसी सरकार को मान्यता दे दी. टीएनसी ने 2012 में जनरल नेशनल कांग्रेस को सत्ता दे दी. इसके बाद लीबिया पर तोब्रुक के डेप्यूटीज काउंसिल ने भी सरकार बनाने का दावा किया. 2014 से जनलर हफ्तार की ‘लीबीयन नेशनल आर्मी’ का भी पूर्वी क्षेत्रों में प्रबाव बढ़ा. 2016 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से संयुक्त सरकार बनी, लेकिन इसे लीबिया के कुछ गुटों ने मानने से इनकार कर दिया. लीबिया के कई क्षेत्र इस सरकार के नियंत्रण से बाहर थे जिन पर आईएस, विद्रोहियों, और जातीय लड़ाकों का कब्जा था. यह अस्थिरता तब से बनी हुई है और लीबिया में एक स्थिर सरकार के होने की संभावना कम ही रही है.

अफ्रीका सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है लीबीया
64 लाख की आबादी वाला देश लीबिया में 97% लोग सुन्नी मुस्लिम हैं. यहां शिया-सुन्नी संघर्ष नहीं है, लेकिन सत्ता के लिए विभिन्न गुटों में संघर्ष जरूर होता दिख रहा है. यहां अरबी भाषा आम है लेकिन इटैलियन और अंग्रेजी भाषा सभी शहरों में समझी जाती है. यहां पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस के भंडार होने के अलाव जिप्सम भी पाया जाता है जिसकी वजह से सीमेंट भी यहां प्रमुख उद्योग है. कृषि उत्पादों में चावल, जौ, जैतून, खजूर, रसीले फल, सब्जियां मूंगफली सोयाबीन जैसे उत्पाद प्रमुख है.

कौन हैं जनरल हफ्तार
जनरल हफ्तार कर्नल गद्दाफी के विरोधियों का नेतृत्व कर रहे हैं. उन्हें मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात समर्थन दे रहे हैं. हप्तार को रूढ़िवादी सलाफिस्तों का समर्थन भी हासिल है. उनकी लीबीयन नेशनल आर्मी पूर्वी लीबिया से आईएस को निकाल चुकी है और अब त्रिपोली तक आ चुकी है. हफ्तार एक समय गद्दाफी के सहयोगी थे, लेकिन वे गद्दाफी के सत्ता में आने के बाद दोनों में मतभेद हो गए और हफ्तार अमेरिका चले गए. 2011 में वे लीबिया वापस आ गए और ‘लीबीयन नेशनल आर्मी’ का गठन किया.

तो क्या है लीबिया के पीछे दुनिया के देशों का मकसद
यूरोपीय देश फ्रांस और लीबिया का सबसे प्रमुख पड़ोसी ( जो कि लीबिया के उत्तर में स्थित भूमध्य सागर के उस पार स्थित है.) दोनों का एक खास मकसद लीबिया से उनके देशों में लोगों का पलायान रोकना. दोनों ही देशों की अपनी निजी समस्याएं हैं

अमेरिका ने उन सभी गुटों का समर्थन किया जो आईएस और अल कायदा के खिलाफ लड़ रहे थे इसमें संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार प्रमुख थी. हालांकि अमेरिका ने जनरल हफ्तार के त्रिपोली की ओर बढ़ने की आलोचना की है. मजेदार बात यह है कि जनरल हफ्तार अब भी अमेरिका के नागरिक हैं. वहीं रूस जनरल हफ्तार के पक्ष में है. रूस ने संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया जो उसने सुरक्षा परिषद में जनरल हफ्तार के खिलाफ निंदा के लिए रखा था.

लीबिया – महान समाजवादी जनवादी लिबियाई अरब जम्हूरिया

الجماهيرية العربية الليبية الشعبية الإشتراكية العظمى
Al-Jamāhīriyyah al-ʿArabiyyah al-Lībiyyah aš-Šaʿbiyyah al-Ištirākiyyah al-ʿUẓmā

राष्ट्रगान: अल्लाहो अकबर
भगवान महानतम है’
राजधानी – ट्रिपली
32°54′N 13°11′E
सबसे बड़ा नगर – त्रिपोली
राजभाषा(एँ) – अरबी
निवासी – लिबियाई
सरकार – जम्हूरिया
– क्रांति के नेता और मार्गदर्शक मुअम्मर अल-गद्दाफी
– जनवादी कांग्रेस के महासचिव इमबारेक शामेख
– प्रधानमंत्री बगदादी मेहमूदी
स्वतंत्रता
– इटली की वापसी १० फ़रवरी १९४७
– संयुक्त राष्ट्र न्यासिता के अंतर्गत युनाइटेड किंगडम एवं फ्रांस से
24 दिसम्बर १९५१
क्षेत्रफल
– कुल १,७५९,५४१ km2 (१७ वां)
– जल (%) नगण्य
जनसंख्या
– २००९ जनगणना ६,४२०,००० (१०५ वां)
– २००६ जनगणना ५,६७०,६८८1
सकल घरेलू उत्पाद (पीपीपी) २००८ प्राक्कलन
– कुल $८८.१३३ बिलियन अमरीकी डॉलर (-)
– प्रति व्यक्ति $१४,१९२ अमरीकी डॉलर (५५ वां)
मानव विकास सूचकांक (२०१३) Decrease ०.७८४
उच्च · ५५वाँ
मुद्रा दीनार (LYD)
समय मण्डल EET (यू॰टी॰सी॰+२)
यातायात चालन दिशा दाहिने
दूरभाष कूट २१८
इंटरनेट टीएलडी .ly
अरबी (de jure), लिबियाई अरबी (de facto)

लीबिया (अरबी: ليبيا‎), आधिकारिक तौर पर ‘महान समाजवादी जनवादी लिबियाई अरब जम्हूरिया’ (अरबी: الجماهيرية العربية الليبية الشعبية الإشتراكية العظمى ‎‎ Al-Jamāhīriyyah al-ʿArabiyyah al-Lībiyyah aš-Šaʿbiyyah al-Ištirākiyyah al-ʿUẓmā), उत्तरी अफ़्रीका में स्थित एक देश है। इसकी सीमाएं उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्व में मिस्र, उत्तरपूर्व में सूडान, दक्षिण में चाड व नाइजर और पश्चिम में अल्जीरिया और ट्यूनीशिया से मिलती है।

करीबन १,८००,०० वर्ग किमी (६९४,९८४ वर्ग मील) क्षेत्रफल वाला यह देश, जिसका ९० प्रतिशत हिस्सा मरुस्थल है, अफ़्रीका का चौथा और दुनिया का १७ वां बड़ा देश है। देश की ५७ लाख की आबादी में से १७ लाख राजधानी त्रिपोली में निवास करती है। सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से यह इक्वीटोरियल गिनी के बाद अफ्रीका का दूसरा समृद्ध देश है। इसके पीछे मुख्य कारण विपुल तेल भंडार और कम जनसंख्या है।

लीबिया १९५१ मे आजाद हुआ था एवं इस्क नाम ‘युनाइटेड लीबियन किंगडम’ (अंग्रेज़ी: United Libyan Kingdom) रखा गया। जिसका नाम १९६३ मे ‘किंगडम ऑफ लीबिया’ (अंग्रेज़ी: Kingdom of Libya) हो गया। १९६९ के तख्ता-पलट के बाद इस देश का नाम ‘लिबियन अरब रिपब्लिक’ रखा गया। १९७७ में इसका नाम बदलकर ‘महान समाजवादी जनवादी लिबियाई अरब जम्हूरिया’ रख दिया गया।

लिबिया राज्य उत्तर में भूमध्य सागर से, दक्षिण में चैड प्रजातंत्र एवं नाइजर प्रजातंत्र से, पश्चिम में ट्युनिज़िया एवं अजलीरिया से तथा पूर्व में संयुक्त अरब गणराज्य एवं सूडान से घिरा हुआ है। इस संघ राज्य का संपूर्ण क्षेत्रफल १७,५९,५०० वर्ग किलोमीटर है।

भूमध्य सागर एवं रेगिस्तान के प्रभाव के कारण मौसमी परिवर्तन हुआ करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में ट्रिपोलिटैनिया के समुद्री किनारे का ताप ४१ डिग्री सें. से ४६ डिग्री सें. के मध्य रहता है। सुदूर दक्षिण में ताप्त अपेक्षाकृत ऊँचा रहता है। उत्तरी सिरेनेइका का ताप २७ डिग्री सें. से लेकर ३२ डिग्री सें. के मध्य रहता है। टोब्रुक (Tobruk) का जनवरी का औसत ताप १३ डिग्री सें. तथा जुलाई और औसत ताप २६ डिग्री सें. रहता है। भिन्न भिन्न क्षेत्रों में वर्षा का औसत भिन्न भिन्न है। ट्रिपोलिटैनिया तथा सिरेनेइका के जाबाल क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत १५ से २० इंच तक है। अन्य क्षेत्रों में आठ इंच से कम वर्षा होती है। वर्षा प्राय: अल्पकालीन शीत ऋतु में होती है और इसके कारण बाढ़ आ जाती है।

यहाँ अनेक प्रकार के आवर्धित फल के पेड़, छुहारा, सदाबहार वृक्ष तथा मस्तगी (mastic) के वृक्ष हैं। सुदूर उत्तर में बकरियाँ तथा मवेशी पाले जाते हैं। दक्षिण में भेड़ों और ऊटों की संख्या अधिक है। चमड़ा कमाने, जूते, साबुन, जैतून का तले निकालने तथा तेल के शोधन करने के कारखाने हैं। यहाँ सन् १९६३ में एक सीमेंट फैक्टरी की स्थापना की गई है। जौ और गेहूँ की खेती होती है।

यहाँ पेट्रोलियम के अतिरिक्त फ़ॉस्फ़ेट, मैंगनीज़, मैग्नीशियम तथा पोटैशियम मिलते हैं। खानेवाला समुद्री नमक यहाँ का प्रमुख खनिज है।

ट्रिपोली तथा बेंगाज़ि यहाँ की संयुक्त राजधानियाँ हैं। अप्रैल, १९६३ ई. में संविधान का संशोधन हुआ, जिसके अनुसार स्त्रियों को मताधिकार दिया गया और संघीय शासनव्यवस्था के स्थान पर केंद्रीय शासनव्यवस्था लागू की गई। इस नई व्यवस्था की दस इकाइयाँ हैं, जिनके प्रधान अधिकारी ‘मुहाफिद’ कहलाते हैं।

सेबहा से ट्रिपोली तक तट के साथ साथ तथा देश के भीतरी भाग में अच्छी सड़कें हैं। यहाँ पर्याप्त संख्या में हल्की रेल लाइनें हैं। ट्रिपोली, बेंगाज़ि तथा टाब्रुक बंदरगाह है। इद्रिस तथा बेनिना यहाँ के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं।

भूगोल

लीबिया 1,75 9,540 वर्ग किलोमीटर (679,362 वर्ग मील) से अधिक है, जो इसे आकार में दुनिया का 16 वां सबसे बड़ा देश बनाता है। लीबिया भूमध्य सागर से उत्तर में है, पश्चिम में ट्यूनीशिया और अल्जीरिया, दक्षिणपश्चिम नाइजर, चाड द्वारा दक्षिण, सूडान द्वारा दक्षिणपूर्व और पूर्व में मिस्र द्वारा। लीबिया अक्षांश 19 डिग्री और 34 डिग्री एन, और अक्षांश 9 डिग्री और 26 डिग्री ई के बीच है।

1,770 किलोमीटर (1,100 मील) पर, लीबिया की तटरेखा भूमध्यसागरीय सीमा के किसी भी अफ्रीकी देश का सबसे लंबा है।.] लीबिया के उत्तर में भूमध्य सागर के हिस्से को अक्सर लीबिया सागर कहा जाता है। जलवायु प्रकृति में ज्यादातर शुष्क और रेगिस्तानी है। हालांकि, उत्तरी क्षेत्र हल्के भूमध्य जलवायु का आनंद लेते हैं।.

प्राकृतिक रूप गर्म, शुष्क, धूल से भरे सिरोको के रूप में आती हैं (लीबिया में गिब्ली के रूप में जाना जाता है)। यह वसंत और शरद ऋतु में एक से चार दिनों तक उड़ने वाली दक्षिणी हवा है। वहां धूल तूफान और मिट्टी के तूफ़ान भी हैं। ओसा भी पूरे लीबिया में बिखरे हुए पाए जा सकते हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण घाडम्स और कुफरा हैं। रेगिस्तान पर्यावरण की मौजूदा उपस्थिति के कारण लीबिया दुनिया के सबसे सुन्दर और सूखे देशों में से एक है।

इतिहास

लीबिया के पहले निवासी बर्बर जनजाति के थे। 7 वीं शताब्दी में ईसापूर्व में , फोएनशियनों ने लीबिया के पूर्वी हिस्से को उपनिवेशित किया, जिसे साइरेनाका कहा जाता है, और यूनानियों ने पश्चिमी भाग का उपनिवेश किया, जिसे त्रिपोलिटानिया कहा जाता है। त्रिपोलिटानिया कार्थगिनियन नियंत्रण हिस्सा था। यह 46 ईस्वी से रोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया। पहली शताब्दी ईस्वी में साइरेनिका रोमन साम्राज्य से संबंधित था। जिसके बाद 642 ईस्वी में अरबो ने हमला किया था और विजयी प्राप्त की। 16 वीं शताब्दी में, त्रिपोलिटानिया और साइरेनाका दोनों नाममात्र रूप से तुर्क साम्राज्य का हिस्सा बन गए।

1 9 11 में इटली और तूर्की के बीच शत्रुता के फैलने के बाद, इतालवी सैनिकों ने त्रिपोली पर कब्जा कर लिया। लिबिया ने 1914 ईस्वी तक इटाली से लड़ना जारी रखा, जिसके द्वारा इटली ने अधिकांश भूमि को नियंत्रित किया। इटली ने 1934 में लीबिया को उपनिवेश के रूप में औपचारिक रूप से एकजुट ट्रिपोलिटानिया और साइरेनाका को जोड़ा।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लीबिया एक रेगिस्तानी लड़ाई का दृश्य था। 23 जनवरी, 1943 को त्रिपोली के पतन के बाद, यह सहयोगी प्रशासन के अधीन आया। 1949 में, संयुक्त राष्ट्र ने मतदान किया कि लीबिया स्वतंत्र होना चाहिए, और 1951 में यह लीबिया यूनाइटेड किंगडम बन गया। 1958 में गरीब देश में तेल की खोज हुई और अंततः इसकी अर्थव्यवस्था में बदलाव आया।

प्रशासन

इस राष्ट्र में निम्न लिखित प्रान्त है-

अलबतनान प्रान्त
दरनऩ प्रान्त
अलजबल अलणख़ज़र प्रान्त
अलमर्ज प्रान्त
बनग़ाज़ी प्रान्त
उल्लू अहात प्रान्त
अलकफ़रऩ प्रान्त
सुरत प्रान्त
मरज़क प्रान्त
सबिया प्रान्त
वादी अलहयाऩ प्रान्त
मसरातऩ प्रान्त
अलमरक़ब प्रान्त
तरह बिल्ल्स् प्रान्त
अलजफ़ारऩ प्रान्त
अलज़ावीऩ प्रान्त
अलनक़ात अलख़मस प्रान्त
अलजबल अलगर बी प्रान्त
नालोत प्रान्त
गात प्रान्त
अलजफ़रऩ प्रान्त
वादी अलिशा ती-ए- प्रान्त

धर्म

लीबिया में लगभग 97% आबादी मुसलमान हैं, जिनमें से अधिकतर सुन्नी शाखा से संबंधित हैं। इबादी मुसलमानों और अहमदीयो की छोटी संख्या देश में रहती है।.जिसके बाद ईसाई, बुद्ध, यहूदी धर्मो के अनुयायी एक अल्पशंकयक के रूप में निवास करते है।

मुअम्मर अल-गद्दाफ़ी

مُعَمَّر القَذَّافِي
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अफ़्रीकी संघ की बैठक (२००९) में गद्दाफ़ी
लीबिया का नेता एवं मार्गदर्शक
पद बहाल
२ मार्च १९७७ – २३ अगस्त २०११
राष्ट्रपति
पूर्वा धिकारी पद सृजन
उत्तरा धिकारी पद समाप्ति
लीबिया की क्रांतिकारी कमान परिषद का अध्यक्ष
पद बहाल
१ सितंबर १९६९ – २ मार्च १९७७
प्रधानमंत्री महमूद मुलेमान अल मग़रीबी
अबदेस्सलाम जल्लाउद
अब्दुल अती-ओबेईदी
पूर्वा धिकारी इदरीस (बादशाह)
उत्तरा धिकारी स्वयं(महासचिव, जनरल पीपुल्स कॉन्ग्रेस)
महासचिव, जनरल पीपुल्स कॉन्ग्रेस
पद बहाल
२ मार्च १९७७ – २ मार्च १९७९
प्रधानमंत्री अब्दुल अती अल-ओबेईदी
पूर्वा धिकारी स्वयं अध्यक्ष, रिवॉल्यूश्नरी कमाण्ड काउन्सिल
उत्तरा धिकारी अब्दुल अती अल-ओबेईदी
लीबिया के प्रधान मंत्री
पद बहाल
१६ जनवरी १९७० – १६ जुलाई १९७२
पूर्वा धिकारी महमूद सुलेमान अल-मग़रिबी
उत्तरा धिकारी अब्देस्सलाम जल्लाउद
अध्यक्ष, अफ़्रीकी संघ
पद बहाल
२ फ़रवरी २०९ – ३१ जनवरी २०१०
पूर्वा धिकारी जकाया किकवेते
उत्तरा धिकारी बिन्गु वा मुथारिका
जन्म जून १९४२
सिरते, इतालवी लीबिया
(अब लीबिया)
मृत्यु 20 अक्टूबर 2011 (उम्र 69)
सिरते या सिरते एवं मिस्राता के बीच, लीबिया
राजनीतिक दल अरब सोशलिस्ट यूनियन (लीबिया) (१९७१-१९७७)
जीवन संगी फ़ातिहा अल-नूरी (१९६९-१९७०)
साफ़िया फ़रकाश एल-ब्रसाई (१९७१-२०११)

शैक्षिक सम्बद्धता – मिलिट्री युनिवर्सिटी अकादमी
धर्म इस्लाम

निष्ठा – लीबिया लीबिया साम्राज्य (१९६१–१९६९)
लीबिया लीबियाई अरब गणराज्य (१९६९-१९७७)
लीबिया लीबियई अरब जमहीरिया (१९७७-२०११)
सेवा/शाखा – लीबियाई सेना
सेवा काल – १९६१-२०११
पद – कर्नल
कमांड – लीबियाई सशस्त्र बल
लड़ाइयां/युद्ध – लीबियाई-मिस्री युद्ध
चैडियाई-लीबियाई संघर्ष
युगांडा-तंजानिया युद्ध
२०११ लीबियाई गृह युद्ध
पुरस्कार – ऑर्डर ऑफ़ युगोस्लैव स्टार
ऑर्डर ऑफ़ गुड होप

मुअम्मर अल-गद्दाफ़ी (अरबी : معمر القذافي‎) (७ जून १९४२ – २० अक्टूबर २०११) सन् १९६९ से लीबिया के शासक बने हुए थे। उन्हें ‘कर्नल गद्दाफ़ी’ के नाम से जाना जाता था।

कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी ने लिबिया पर कुल 42 साल तक राज किया और वे किसी अरब देश में सबसे अधिक समय तक राज करने वाले तानाशाह के रूप में जाने जाते रहे। उन्होंने अपने को क्रांति का प्रथप्रदर्शक और राजाओं का राजा घोषित कर रखा था।

गद्दाफ़ी के दावों पर यकीन करें तो उनके दादा अब्देसलम बोमिनियार ने इटली द्वारा लिबिया को कब्ज़ा करने की कोशिश के दौरान लड़ाई लड़ी थी और १९११ के युद्ध में मारे गये थे। वे उस युद्ध के पहले शहीद थे।

गद्दाफी ने 1952 के आसपास मिस्र के राष्ट्रपति गमल अब्देल नसीर से प्रेरणा ली और 1956 मंउ इज़राइल विरोधी आंदोलन में भाग भी लिया। मिस्र में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई भी की। १९६० के शुरुवाती दिनों में गद्दाफ़ी ने लिबिया की सैन्य अकादमी में प्रवेश लिया, जिसके बाद उन्होंने यूरोप में अपनी शिक्षा ग्रहण की और जब लिबिया में क्रांति हुई तो उन्होंने लिबिया की कमान संभाली.

गद्दाफ़ी के विरोधियों का कहना है कि कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी भी राजा की तरह खुद को लीबिया का सर्वे सर्वा समझने लग गये। आरोप है कि भ्रष्टाचार के जरिए गद्दाफ़ी ने अकूत संपत्ति कमाई और विदेशी बैंकों में जमा किया।

बाद में पिछले साल दिसंबर में ट्यूनीशिया की राजनीतिक क्रांति ने गद्दाफ़ी की भी जड़ें हिला दी। ट्यूनीशिया के बाद मिस्र में प्रदर्शन हुए. वहां हुस्नी मुबारक को जाना पड़ा. मोरक्को के राजा ने जनता के गुस्से को भांपते हुए जनमत संग्रह कराया. गद्दाफ़ी अपनी जनता का मूड नहीं भांप सके और अरब की क्रांति की भेंट चढ़ गए।२० अक्टूबर,२०११ को एक संदिग्ध सैन्य हमले में गद्दाफ़ी मारे गये। कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी के खात्मे के साथ ही लीबिया में ४२ साल लंबे तानाशाही शासन के अंत हो गया और शनिवार यानि २२ अक्टूबर को लीबिया आज़ादी मुल्क घोषित कर दिया जाएगा। लीबिया की अंतरिम सरकार चला रही नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल (राष्ट्रीय अंतरिम परिषद या एन॰ टी॰ सी॰) लीबिया को आज़ाद मुल्क घोषित करेगी। इसके साथ ही लीबिया में पूरी तरह से लोकतांत्रिक सरकार बनने की उलटी गिनती भी शुरू हो गई है।

लीबिया के अंतरिम प्रधानमंत्री और एन॰ टी॰ सी॰ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले महमूद जिबरिल ने गद्दाफ़ी की मौत के बाद ऐलान किया, ‘अब लीबिया के लिए नई शुरुआत का समय आ गया है। नया और एकता के सूत्र में बंधा लीबिया।’ गद्दाफ़ी की मौत के बाद लीबिया में जश्न का माहौल है। दुनिया के अलग-अलग इलाकों में रह रहे लीबियाई नागरिक भी तानाशाही शासन के अंत पर खुशी मना रहे हैं। लेकिन दुनिया के कई देश लीबिया के भविष्य को लेकर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं जाहिर कर रहे हैं। दुनिया के कई मुल्क लीबिया को शुभकामनाएं देने के साथ आशंका भी जाहिर कर रहे हैं कि इस देश में अराजकता का माहौल जल्द ख़त्म हो पाएगा।

ख़बरों के मुताबिक अपने आख़िरी समय में अपने गृह नगर सिर्ते में छुपा गद्दाफ़ी वहाँ से भागने की फिराक में था। वह अपने काफिले के साथ वहाँ से जैसे ही निकला, फ्रेंच लडा़कू विमानों ने उस पर हमला कर दिया। हवाई हमले के बाद गद्दाफ़ी का काफिला नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल की फ़ौज के साथ झड़प में फंस गया। माना जा रहा है कि इस दौरान हुई गोलीबारी में गद्दाफ़ी ज़ख़्मी हो गया। इसके बाद वह ज़मीन पर घिसटते हुए एक पाइप के पास जाकर छुप गया। कुछ घंटों बाद एन॰ टी॰ सी॰ के लड़ाकों ने गद्दाफ़ी को पानी की निकासी के लिए बने एक पाइप के पास से खोज निकाला।

बताया जा रहा है कि इनमें से एक ने अपने जूते से गद्दाफ़ी की पिटाई की। चश्मदीदों के मुताबिक गद्दाफ़ी दया की भीख मांग रहा था। वहीं, गद्दाफ़ी के शव के साथ एंबुलेंस में सवार अब्दल-जलील अब्दल अज़ीज़ नाम के डॉक्टर का दावा है कि गद्दाफ़ी को दो गोलियाँ लगी थीं। अज़ीज़ के मुताबिक एक गोली गद्दाफ़ी सिर में और सीने पर लगी थी।

पहली बार आज आजाद राज्य बना था Libya

21 दिसंबर का दिन Libya (लीबिया) के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। 1951 में इसी दिन लीबिया के पहली बार आजाद राज्य बनने की घोषणा हुई थी। इसी दिन राजा इदरिस की सरपरस्ती में लीबिया में संवैधानिक और वंशानुगत राजशाही स्थापित हुई थी। उन्होंने इसे ‘युनाइटेड किंगडम ऑफ लीबिया’ नाम दिया था। इदरिस ही लीबिया के पहले और अंतिम सम्राट भी रहे। इदरिस का राज्य बनने से पहले तक लीबिया काफी गरीब देश था। लेकिन इदरिस के आने के बाद ही 1959 में वहां तेल के भंडार की जानकारी हुई और उसे बेचकर देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा जा सका।

लेकिन लीबिया के ये खुशहाल वक्त ज्यादा सालों तक नहीं रह सका। लीबिया के बढ़ते प्रभाव पर उस वक्त विद्रोही मिलिट्री ऑफिसर मुअमर गद्दाफी की नजर पड़ गई। फिर 1969 में गद्दाफी ने लीबिया सम्राज्य पर हमला बोल दिया और राजा इदरिस के शासन को उखाड़ फेंका। गद्दाफी ने तब किंगडम ऑफ लीबिया की जगह इस स्थान को लीबियन अरब रिपब्लिक नाम दिया था।

गद्दाफी के शासन के समय लीबिया

लीबिया का मुअम्‍मार गद्दाफी जिस पर आतंकवाद को बढ़ावा देने और आतंकियों के साथ मिले होने का आरोप लगा। अमेरिका ने वर्ष 2011 में दुनिया को जितनी बातों के बारे में बताया, भारत में भी कई लोग आज तक उन्‍हीं बातों को सच मानने लगे हैं।

अमेरिकी चुनावों का समय था और कई लोग खासकर से रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप अक्‍सर यह कहते कि अगर आज सद्दाम हुसैन और गद्दाफी जिंदा होते तो दुनिया की तस्‍वीर ही अलग होती।

गद्दाफी को कर्नल गद्दाफी के नाम से भी जाना जाता था। आज भी लीबिया के नागरिकों का एक बड़ा तबका इस बात से असहमत नजर आता है कि गद्दाफी एक तानाशाह था या फिर वह आतंकियों को बढ़ावा देता था।

घर हर व्‍यक्ति का मानवाधिकार
गद्दाफी का मानना था कि घर हर व्‍यक्ति और परिवार के लिए मानवाधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में घर पर किसी और का हक नहीं होना चाहिए। गद्दाफी की वर्ष 1975 में पब्लिश हुई ग्रीन बुक में यह बात लिखी थी।

शिक्षा और इलाज में बेस्‍ट था
गद्दाफी के शासन काल में लीबिया अरब और अफ्रीकी क्षेत्र में एक ऐसा देश था जहां के नागरिकों को सर्वश्रेष्‍ठ शिक्षा और इलाज की सुविधा थी। अगर किसी नागरिक को लीबिया में किसी एजुकेशनल कोर्स या फिर इलाज की सुविधा लेने की इच्‍छा नहीं होती थी तो फिर उसे विदेश जाने के लिए सरकार की ओर से पैसा मिलता था।

दुनिया का आंठवां अजूबा सिंचाई प्रोजेक्‍ट
गद्दाफी जिस समय लीबिया के शासक थे तो उन्‍होंने देश में मानवनिर्मित एक नदी की डिजाइन तैयार की थी। इस नदी को यहां का सबसे बड़ा सिचाईं प्रोजेक्‍ट भी कहते हैं और इस नदी से सिंचाईं के अलावा पूरे लीबिया में लोगों को पानी आसानी से मिलता था। खुद गद्दाफी ने इसे ‘दुनिया का आंठवां’ अजूबा करार दिया था।

फ्री में शुरू होता बिजनेस
अगर किसी लीबियन नागरिक को किसी फार्म हाउस के जरिए बिजनेस की शुरुआत करनी होती तो फिर उसे एक घर मिलता, फार्म के लिए जमीन दी जाती और मुफ्त में खेती के लिए बीज दिए जाते थे।

बच्‍चे के जन्‍म पर 5000 अमेरिकी डॉलर
कोई भी लीबियन महिला अगर किसी बच्‍चे को जन्‍म देती तो उसको खुद के लिए और उसके बच्‍चे के लिए सरकार की ओर से 5,000 अमेरिकी डॉलर दिए जाते थे।

बिजली मिलती थी फ्री
गद्दाफी के शासन में नागरिकों को मुफ्त बिजली सप्‍लाई होती थी। लीबिया में बिजली पूरी तरह से फ्री थी और किसी भी तरह के बिल की कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं थी।

पेट्रोल सबसे सस्‍ता
गद्दाफी के समय लीबिया में पेट्रोल की कीमत 0.14 अमेरिकी डॉलर प्रति लीटर तक होती थी।

देश में बढ़ाया शिक्षा का स्‍तर
गद्दाफी से पहले लीबिया में सिर्फ 25 प्रतिशत लोग ही शिक्षित थे लेकिन गद्दाफी के शासनकाल में यह आंकड़ा 87 प्रतिशत तक पहुंच गया था।

जीरो प्रतिशत इंट्रेस्‍ट पर मिलता था लोन
लीबिया दुनिया की अकेला ऐसा देश था जिसके पास खुद का बैंक था और इसकी वजह से यहां के नागरिकों को जीरो प्रतिशत इंट्रेस्‍ट पर कर्ज मिलता था। लीबिया पर किसी भी देश का कोई कर्ज भी नहीं था।

गोल्‍ड दीनार
गद्दाफी ने अपने शासनकाल के खत्‍म होने से पहले पूरे अफ्रीकी क्षेत्र में सिर्फ एक ही मुद्रा लाने की तैयारी कर ली थी।

स्वतंत्र लीबिया के सभी शासकों और राष्ट्रपतियों की सूची

फैज़ सराज के पास लीबिया का एक सच्चा नेता बनने का मौका है, अगर वह विरोधी ताकतों को एकजुट कर सकता है

एक स्वतंत्र लीबिया के अस्तित्व के वर्षों में, राजाओं, अध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्रपति पद का दौरा किया। सुप्रीम पीपुल्स कांग्रेस के सचिव-जनरल वास्तव में राष्ट्रपति थे। 1969 से 2011 तक, लीबिया का एकमात्र वास्तविक शासक मुअम्मर गद्दाफी था। उनका चुनाव और उद्घाटन एक औपचारिकता थी, क्योंकि गद्दाफी ने किसी भी स्थिति में सारी शक्ति केंद्रित कर दी थी। स्वतंत्र लीबिया के नेताओं की सूची:

1951-1969 – राजा इदरीस प्रथम। गद्दाफी प्रशासन के राजा पर राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों के आरोप लगाने की तमाम कोशिशों के बावजूद, यह इदरीस प्रथम था जो अपने शासनकाल के दौरान अधिकांश बेदोइन कुलों को रैली करने में कामयाब रहा। सबसे पहले, इदरिस यूनाइटेड किंगडम के लीबिया का राजा था (1963 तक)। 1963 में, राज्य को लीबिया के राज्य के रूप में जाना गया। इदरीस मैं 1969 में उनके उखाड़ फेंकने तक सिर बना रहा;

1969-1977 – मुअम्मर गद्दाफी। वह तख्तापलट में सत्ता में आए, रिवोल्यूशनरी कमांड काउंसिल के अध्यक्ष बने। तुरंत ही राजा इदरीस I के समर्थकों पर क्रूरतापूर्वक नकेल कस दी, 1977 तक देश को लीबिया अरब गणराज्य कहा गया;

1977-1979 – मुअम्मर गद्दाफी। उस क्षण से 2011 तक, राज्य को महान समाजवादी पीपुल्स लीबिया अरब जामहीरिया कहा जाता था। गद्दाफी के पास लीबिया क्रांति के नेता का आजीवन खिताब था। 1977 से लीबिया में राष्ट्रपति पद को लीबिया के जनरल पीपुल्स कांग्रेस का महासचिव कहा जाता है;

1979-1981 – अब्दुल अती अल-ओबेदी। लीबिया में बार-बार उच्च सरकारी पदों पर आसीन;

1981-1984 – मुहम्मद अल-ज़रुक रजब। अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद, वह लीबिया (प्रधान मंत्री) की सुप्रीम पीपुल्स कमेटी के महासचिव बने;

1984-1990 – मिफ्ताह उस्ता उमर। उन्होंने देश में कई पदों के लिए सर्वोच्च पद संभाला। स्वास्थ्य देखभाल सुधारों को लागू किया, क्योंकि उनके पास बाल रोग विशेषज्ञ का डिप्लोमा था;

1990-1992 – अब्दुल रज्जाक अल-सास;

1992-2008 – जेंटानी मुहम्मद अल-जेंटानी। मैं कई वर्षों तक सत्ता में रहने में सक्षम था, हर चीज में असली नेता गद्दाफी को खुश करने की कोशिश कर रहा था;

2008-2009 – मिफ्ता मोहम्मद केब्बा;

2009-2010 – मुबारक अब्दला राख-शामेख;

2010-2011 – मुहम्मद अबुल-कासिम अल-जवाई;

2011-2012 – मुस्तफा मुहम्मद अब्द-अल-जलील। संक्रमणकालीन राष्ट्रीय परिषद के एकमात्र अध्यक्ष;

2012-2013 – मोहम्मद अल-माक्रिफ;

2013-2014 – नूरी अबुस्सैनी;

2014-2016 – अगुइला सलह इस्सा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा चुने गए लीबिया के पहले नेता;

2016 फ़ैज़ सराज। उनकी स्थिति को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति परिषद का अध्यक्ष कहा जाता है।

लीबिया के राष्ट्रपति की कार्यकारी शाखा, स्थिति और कर्तव्यों की विशेषताएं

गद्दाफी की मंजूरी के बिना (1969-1979 आधिकारिक तौर पर, 2011 तक, वास्तव में), लीबिया में एक भी कानून नहीं अपनाया गया था

औपचारिक रूप से, देश में सत्ता सुप्रीम पीपुल्स कमेटी की अध्यक्षता में थी, जो 2011 तक चली। गद्दाफी की मृत्यु के बाद, लीबिया एक क्रांतिकारी भँवर में डूब गया, इसलिए शक्ति को 2011 तक प्रक्षेपण में माना जाना चाहिए। सुप्रीम पीपुल्स कमेटी (VNK) को जनरल पीपुल्स कांग्रेस द्वारा हर साल अपने सदस्यों में से नियुक्त किया जाता था। समिति के सभी निर्वाचित सदस्य व्यक्तिगत रूप से OIC के सचिवालय के लिए जिम्मेदार थे। अधिकांश मंत्रालय सूरत शहर में स्थित थे, जहाँ गद्दाफी का निवास स्थान था।

2006 में, बगदादी अल-महमौदी OWC के महासचिव बने। इसके बावजूद, गद्दाफी देश का वास्तविक शासक बना रहा। जिसमें असीमित शक्ति थी:

नेता मंत्रालयों और अन्य अधिकारियों को भंग और बना सकता है;
वह सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर थे;
अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में एक देश का प्रतिनिधित्व किया;
व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय संधियों का समापन;
अपराधियों को क्षमा करने का अधिकार था और इसी तरह।

राष्ट्रपति के आदेश (गद्दाफी, वास्तव में, यह वे थे) एक विधायी प्रकृति के थे।

2011 तक देश में विधायी शक्ति यूनिवर्सल पीपुल्स कांग्रेस (डब्ल्यूपीसी) से संबंधित थी। उनके सभी निर्णय केवल गद्दाफी के “दाखिल” के साथ किए गए थे। इस विधायिका में पीपुल्स कांग्रेस की नगरपालिका और प्राथमिक समितियों के आधे सदस्य शामिल थे, जो इसमें स्वचालित रूप से शामिल थे। देश में विभिन्न ट्रेड यूनियनों के सदस्यों में से VNK के दूसरे हिस्से का चयन किया गया था। कुल मिलाकर, 1,000 से अधिक प्रतिनियुक्ति थीं, जिन्होंने लोगों के लिए एक गलत धारणा बनाई थी, उन्हें विश्वास था कि वे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से राज्य को सीधे नियंत्रित करते हैं।

अधिकांश अरब राज्यों की तरह लीबिया में न्यायपालिका, कुरान की प्रस्तावना पर बनी थी। कानूनी ढांचा, अपने यूरोपीय अर्थों में, अनुपस्थित था। लीबिया के सभी न्यायाधीशों को सार्वभौमिक राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा नियुक्त किया गया था, जो गद्दाफी पर निर्भर थे। सामान्य नागरिकों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लिए, उन्होंने एक विशेष समिति बनाई जो कथित रूप से न्यायाधीशों को नियुक्त करती है – न्यायपालिका की सर्वोच्च परिषद। लीबिया प्रणाली में 4 उदाहरण शामिल थे:

सर्वोच्च न्यायालय;
अपील के न्यायालय;
पहले उदाहरण के न्यायालय;
विश्व के न्यायाधीश।

1988 में, लीबिया में एक अभियोजक का कार्यालय दिखाई दिया। वर्तमान में, अदालत प्रणाली संरक्षित है, लेकिन चूंकि देश में अराजकता है, इसलिए उनके पास वास्तविक शक्ति नहीं है।

1973 में, कुरान को कानून के मुख्य स्रोत, तरल इस्लामी अदालतों के रूप में मान्यता दी गई, और न्यायाधीश धर्मनिरपेक्ष बन गए। गद्दाफी आजादी के सभी केंद्रों को नष्ट करने की कोशिश कर रहा था, क्योंकि इस्लामिक अदालतें राज्य को जमा नहीं करती थीं। लीबिया के नेता की आकांक्षाओं के बावजूद, अदालतें अभी भी मुफ्ती पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, इसने आम लोगों को दिखाया कि अदालतें राजनीति से बाहर थीं। समस्याओं से खुद की अधिकतम सुरक्षा के लिए गद्दाफी ने धर्मनिरपेक्ष अदालतों को नागरिक स्थिति और संपत्ति की स्थिति के केवल सवालों को हल करने की अनुमति दी। अदालतें लीबिया की राजनीतिक प्रणाली के सबसे लोकतांत्रिक तत्व थे।

लीबिया में, अभी भी सैन्य और क्रांतिकारी अदालतों का एक पूरा नेटवर्क है, जो जल्दी और कुशलता से काम करने के आदी हैं, अक्सर सबूत इकट्ठा करके अपने काम को जटिल किए बिना। यह याद करते हुए कि आम लोग “रोटी और सर्कस” चाहते हैं, गद्दाफी ने लोगों की अदालतों की एक प्रणाली बनाई, जिसने जोरदार प्रदर्शन प्रक्रियाओं का संचालन किया, जो आसानी से सार्वजनिक निष्पादन में प्रवाहित हुई।

लीबिया में सरकार की संवैधानिक नींव

गद्दाफी की ग्रीन बुक देश के प्रमुख संवैधानिक दस्तावेजों में से एक थी

2011 के गृह युद्ध के बाद, राज्य की कानूनी नींव नहीं बदली है, देश में पहले की तरह ही दस्तावेज प्रभावी हैं:

1969 का संविधान;

1977 में लोगों की शक्ति की स्थापना की घोषणा;

“ग्रीन बुक” गद्दाफी।

लीबिया के शासक को विधायी गतिविधि के मामले में एक सक्रिय स्थिति द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था, इसलिए देश को आवश्यक और समय पर कानूनों की कमी का अनुभव नहीं हुआ।

लीबिया के नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और स्वतंत्रता को 1969 के संविधान में कदैफी द्वारा ग्रीन बुक के तीसरे खंड में निर्धारित किया गया था। नागरिकों की गारंटी थी:

सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना कानून के समक्ष समानता
निजी संपत्ति और घर की अक्षमता
बोलने की स्वतंत्रता
शरण का अधिकार
स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा तक पहुँचने का अधिकार।

गारंटी कृत अधिकारों के अलावा, लीबिया के नागरिकों के पास कई जिम्मेदारियां थीं। उदाहरण के लिए, देश की भलाई के लिए सैन्य सेवा और श्रम। लीबिया के सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए लिंग, जाति और विश्वास की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के कर्तव्य को ग्रीनड बुक ऑफ गद्दाफी में विस्तार से बताया गया।

एक स्वतंत्र राज्य का गठन

तेल की खोज को 1959 में सफलता के साथ ताज पहनाया गया। देश की अर्थव्यवस्था को शक्तिशाली धक्का लगा है

राजा के सत्ता में आने के बाद, देश एक संघीय द्वैतवादी राजशाही बन गया। राजशाही के प्रमुख की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन निरपेक्ष नहीं:

राजा ने मंत्रिमंडल के सदस्यों को नियुक्त किया;
मंत्रियों ने निर्णय लिए, लेकिन चैंबर ऑफ डेप्युटी के प्रति जवाबदेह थे;
चैंबर ऑफ डेप्युटीज़ का चुनाव लोकप्रिय चुनाव द्वारा किया गया था;
सीनेट को राजा द्वारा 50%, प्रांतों की विधायिका द्वारा 50% चुना गया था।

नए राज्य को एक अविकसित अर्थव्यवस्था प्राप्त हुई, जो शुरुआती वर्षों में स्क्रैप के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के लिए बख्तरबंद वाहनों की बिक्री द्वारा समर्थित थी।

1959 में, देश में बड़े तेल क्षेत्रों की खोज की गई थी। राज्य के बजट में तेल डॉलर का एक बड़ा प्रवाह डाला गया। इसने राज्य को लीबिया में अपने सैन्य ठिकानों को तैनात करने वाले विदेशी राज्यों की सहायता को छोड़ने की अनुमति दी।

1 सितंबर, 1969 को लीबिया में, एक क्रांति हुई, जिसका उद्देश्य राजशाही को उखाड़ फेंकना है। कैप्टन मुअम्मर गद्दाफी ने निर्धारित सैन्य अधिकारियों के एक समूह के साथ मिलकर राजा इदरिस आई को उखाड़ फेंका और एक क्रांतिकारी अभियान परिषद की अध्यक्षता में लीबियाई अरब गणराज्य में बदल गया। सरकार ने कई सुधारों को लागू किया है:

1969 में, मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर दिया गया था। इसका कारण एक तख्तापलट की तैयारी का आरोप था;
गदाफी प्रधानमंत्री बने;
1975 में, अधिकारियों ने गद्दाफी की अध्यक्षता में जनरल नेशनल कांग्रेस बनाई।

एक साल बाद, कांग्रेस का नाम बदलकर “राष्ट्रीय” कर दिया गया।

2 मार्च 1977 को, देश का नाम बदलकर सोशलिस्ट पीपुल्स लीबिया अरब जमाहीरिया कर दिया गया। क्रांतिकारी कमान परिषद को समाप्त कर दिया गया था। कदैफी राज्य प्रमुख बने। 1992 में, लीबिया के नागरिकों ने दो यात्री विमानों को उड़ा दिया, देश आर्थिक प्रतिबंधों की एक श्रृंखला के तहत गिर गया। एम्बार्गो 1999 तक चला, जिसमें प्रतिबंधों को हटा दिया गया था, जो हथियारों के व्यापार पर प्रतिबंध को बनाए रखता था। 2006 में, अलगाव के लंबे वर्षों के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका और लीबिया के बीच राजनयिक संबंधों को नवीनीकृत किया गया था।

2011 में, देश ने कई लोकप्रिय विद्रोह का अनुभव किया जो एक पूर्ण पैमाने पर गृह युद्ध में विकसित हुआ। शत्रुता समाप्त होने के बाद लीबिया में सत्ता जनरल नेशनल कांग्रेस को सौंप दी गई। विभिन्न जनजातियों के प्रतिनिधियों और धार्मिक संप्रदायों के बीच सशस्त्र संघर्ष समय-समय पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में भड़कते हैं।

ओटोमन्स और इटालियंस के शासन के तहत लीबिया

1580 में ओटोमन तुर्कों ने लीबिया में सत्ता प्राप्त की

1510 से 1551 तक माल्टा के आदेश पर शासन किया। वह ओटोमन साम्राज्य के दबाव का विरोध नहीं कर सका, जिसने 1551 में आसपास के सभी भूमि पर नियंत्रण स्थापित किया। 1580 में, फेज़ान के शासकों ने खुद को जागीरदार के रूप में मान्यता दी, तुर्क ने अपने प्रोटेक्टिव डिप्टी को नियुक्त किया। ओटोमन्स का मुख्य कार्य इस क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करना था, जिसने एक ही केंद्रीकृत शक्ति को निहित किया। सभी लीबिया की भूमि त्रिपोली के गवर्नरशिप में एकजुट हुई। क्षेत्र में राजनीतिक स्थिति अस्थिर थी, सत्ता अक्सर बदल जाती थी:

16 वीं शताब्दी के अंत में, त्रिपोली में जनीसरीज़ का एक मजबूत दल भेजा गया था;
1611 में, कोर के प्रमुख सुलेमान सफ़र ने ओटोमन साम्राज्य पर अपनी जागीरदार निर्भरता से विदा हुए बिना, खुद को सरकार का मुखिया घोषित करते हुए पाशा को हटा दिया;
1711 तक, सुलेमान सफ़र के वंशजों ने त्रिपोली पर शासन किया, अपनी जागीरदार निर्भरता को बनाए रखते हुए, क्योंकि जनश्री कोर को लगातार प्रतिकृति की आवश्यकता थी;
1711 में, ओटोमन साम्राज्य ने नियमित रूप से Janissary पुनःपूर्ति भेजना बंद कर दिया। इस क्षेत्र में अराजकता और सैन्य तख्तापलट का युग था।

1870 में, लीबिया के क्षेत्र एकजुट हो गए थे, इटली के प्रभाव में गिर गए थे। यूरोपीय अपने सैनिकों को पेश करने के लिए तेज थे, लेकिन स्थानीय बेडौइन के नेता हिंसक प्रतिरोध को व्यवस्थित करने में सक्षम थे। 1914 तक, इटली ने पूरे देश में सशस्त्र टुकड़ी तैनात कर दी थी, लेकिन सेनानियों ने तुरंत उन्हें फेज़ान से विस्थापित कर दिया। पहला इटालो-सेनुसिटी युद्ध शुरू हुआ। 1932 तक लड़ाई का आयोजन किया गया, सेनसिट टुकड़ियों ने सख्ती से प्रतिरोध किया, गुरिल्ला रणनीति का सहारा लिया। विद्रोहियों के अंतिम ओएसिस – एल कुफरा पर कब्जा करने के बाद युद्ध समाप्त हो गया। लीबिया आधिकारिक तौर पर एक इतालवी उपनिवेश में बदल गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, लीबिया इतालवी-जर्मन कोर और ब्रिटिश सेना के बीच लड़ाई का दृश्य बन गया। 1943 में, अपने जर्मन सहयोगियों का समर्थन खोने के बाद, इटालियंस ने लीबिया के क्षेत्र को मित्र देशों की सेना के पास छोड़ दिया। युद्ध के बाद, देश ने आजादी मांगी:

1950-1951 में, राष्ट्रीय संविधान सभा ने काम किया;
1951 में, साइरेनिका इदरिस अल-सेनुसी का अमीर लीबिया का राजा बन गया;
दिसंबर 1951 में, एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा की गई थी।

नए राज्य में फीजैन, त्रिपोलिंजिया, साइरेनिका प्रांत शामिल थे।

तुर्क विजय से पहले लीबिया राज्य का गठन

फारसी योद्धाओं ने आधुनिक लीबिया के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की, सिकंदर महान ने पूर्व यूनानी नीतियों को मुक्त कर दिया।

आधुनिक लीबिया के क्षेत्रों में बस्तियाँ आठवीं सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में दिखाई दीं। लीबिया में आधुनिक इतिहासकारों के लिए जाना जाने वाला राज्य साइरेनिका था, इसका नाम इस क्षेत्र में स्थित ग्रीक पॉलिस साइरेन से आता है। इस राज्य में पांच नीतियां शामिल थीं, इसलिए इसे पेंटापोलिस भी कहा जाता था। साइरेनिका के विकास के चरण:

525 ई.पू. – फारसी साम्राज्य का विस्तार;
331 ई.पू. – अलेक्जेंडर द ग्रेट की विजय और महान सेनापति की मृत्यु के बाद टॉलेमी के राज्य में साइरेनिका का प्रवेश;
74 ई.पू. – साइरोनिका को स्वेच्छा से रोमन गणराज्य के टॉलेमिक वंश के अंतिम प्रतिनिधि के लिए स्थानांतरित किया गया था।

रोमनों ने नई भूमि पर सुधारों की एक श्रृंखला की, जिसके बाद तटीय शहरों और अंतर्देशीय क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया। स्थानीय आबादी अभी भी ग्रीक और पुनिक पहचान के हिस्से को संरक्षित करने में कामयाब रही।

300 ईस्वी में, साइरेनिका ने क्रेते प्रांत को छोड़ दिया, एक अलग रोमन प्रांत बन गया। लगभग 100 वर्षों के बाद, इसे लोअर और अपर लीबिया में विभाजित किया गया। 642-644 में, पूर्व रोमन प्रांतों को अरब कलिपेट के योद्धाओं द्वारा जीत लिया गया था, जिसका नेतृत्व अम्र इब्न अल-अस ने किया था। 9 वीं शताब्दी में त्रिपोलिंजिया पर अघ्लाबिड्स के ट्यूनीशियाई राजवंश का शासन था, जिन्होंने प्राचीन रोम के समय में निर्मित सिंचाई नहरों के हिस्से को बहाल किया था। इस क्षेत्र को सक्रिय रूप से बसाया जाने लगा, प्राचीन शहरों और बस्तियों को बहाल किया गया।

909 में, लीबिया के आधुनिक क्षेत्र में सत्ता सईद इब्न हुसैन को सौंप दी गई, जिन्होंने इफ्रीकिया के शासकों को उखाड़ फेंका और फातिम वंश की स्थापना की। केवल कुछ वर्षों के शासन में, एक नया जंगी साम्राज्य लगभग पूरे उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र पर कब्जा करने में सक्षम था। और फिर से त्रिपोलिंजिया के इतिहास में, मूलभूत परिवर्तन हुए:

फैलीमिड्स ने खिल्लियन जनजातियों को आधुनिक लीबिया के क्षेत्रों को आबाद करने के लिए बुलाया;
जंगली जनजातियों ने गैर-अरब आबादी को व्यवस्थित रूप से नष्ट करना शुरू कर दिया;
सबसे बड़े स्थानीय शहर नष्ट हो गए।

क्षेत्र का इस्लामीकरण पूरा हो चुका है। फातिमिड्स के पतन के बाद, 1250 तक, देश में अय्यूब राजवंश का शासन था। 1250 के बाद से, मामलुक सल्तनत के गवर्नर देश पर शासन करने लगे।

ममलुकों में केवल औपचारिक शक्ति थी, वास्तव में, इस क्षेत्र पर स्थानीय खानाबदोश जनजातियों के नेताओं का शासन था। उन्हें कर देना असंभव था। राजकोष की पुनःपूर्ति के मुख्य स्रोत तीर्थयात्रियों और सिर्फ लूटपाट के आरोप थे। 12 वीं शताब्दी में, फेज़ान राज्य, बानी खट्टब वंश द्वारा शासित, लीबिया के दक्षिण-पश्चिमी भूभाग में बाहर खड़ा था। अपने अनुकूल स्थान के लिए धन्यवाद, नया राज्य सहारा के माध्यम से ओज और व्यापार मार्गों को नियंत्रित कर सकता है। क्षेत्र के धन ने आक्रमणकारियों को उदासीन नहीं छोड़ा:

13 वीं शताब्दी में, फेज़ान ने खुद को बोर्न राज्य के जागीरदार के रूप में पहचाना;
XIV सदी की शुरुआत में, भूमि के दक्षिणी भाग को कनीम साम्राज्य द्वारा जीत लिया गया था;
XVI सदी में, बानी वंश खट्टाब के अंतिम प्रतिनिधि को मुहम्मद अल-फैसी द्वारा हटा दिया गया था।

मारज़ुक वंश ने इतालवी उपनिवेश तक लीबिया पर शासन किया।

‘उमर मुख्तार’ साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाला एक महान क्रांतिकारी योद्धा

साम्राज्यवाद जिस समय भारत मे 23 मार्च 1931 को 3 बहादुर योद्धाओ को फांसी चढ़ा रहा था। उसी साल 16 सितम्बर 1931 को साम्राज्यवादी ताकते लीबिया में लीबिया के 73 साल के महान योद्धा उमर मुख्तयार को फांसी चढ़ा रही थी। ये उन सभी योद्धाओ को साम्राज्यवाद के खिलाफ मानवता के लिए, अपनी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लुटेरो के खिलाफ युद्ध लड़ने का इनाम था।

हम को आज 73 साल के उस महान योद्धा के बारे में जानना जरूरी है। जिसने नाजीवाद के खिलाफ 20 साल सशस्त्र संघर्ष किया। एक गुरिल्ला वार किया। बड़ी ही बहादुरी से अपनी जनता के लिए लड़ते हुए शहीद हुआ। साम्राज्यवादी ताकते जिनके पास आधुनिक हथियार, टैंक, तोब, प्रशिक्षित सेनाथी लेकिन फिर भी इतिहास गवाह है कि ये सब होते हुए भी साम्राज्यवाद को पूरे विश्व मे सहस्त्र संघर्ष में आम जनता जो देशी हथियारों से लड़ रही थी, से मुँह की खानी पड़ी है। पूरे विश्व मे साम्राज्यवाद ने छल-कपट से लड़ाइयां जीती है।

जब यूरोप के साम्राज्यवादी मुल्को ने एशिया और अफ्रीका के मुल्को को गुलाम बनाने के लिए अपनी आधुनिक सेनाये वहाँ भेजी तो उनकी इस लूट के खिलाफ साधारण से दिखने वाले आम इंसान, योद्धा के रूप में सामने आए। जिन्होंने अपने लोगो के सामने मजबूती से लड़ने की मिशाल पेश की, अन्याय के खिलाफ उनको एकजुट किया वही साम्राज्यवादीयों के सामने वो चैलेंज पेश किया की खुद साम्राज्यवादियों ने उनकी बहादुरी के सामने घुटने टेक दिये। इन्ही योद्धाओ में एक महान बहादुर योद्धा थे लीबिया के मुख़्तार – उमर मुख़्तार.

उमर मुख़्तार का जन्म 1859 ईसवी में हुआ और वे एक स्कूल के अध्यापक थे 1895 ईसवी में वे सूडान चले गये उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध मेहदी सूडानी के आंदोलन में भाग लिया परंतु इस आंदोलन की विफलता के पश्चात वे पुन: लीबिया लौट गये।

1911 में इटली ने उस्मानी शासन से युद्ध करके लीबिया को अपने नियंत्रण में ले लिया उमर मुख्तार ने लीबियाई कबीलों के योद्धाओं की सहायता से इटली के साम्राज्यवादियोंके विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन आरंभ किया और उन्हें भारी क्षति पहुँचाई। इंक़लाबी उमर मुख़तार को 16 सितम्बर 1931 को 20 साल के जद्दोजेहद के बाद इटली की फ़ौज फांसी पर चढ़ा देती है।

एक वाक़ीया

उमर मुख़तार के साथियो ने इटली के 2 सिपाही को पकड़ा और उन्हे क़त्ल करने की कोशिश करने लगे तभी उमर मुख़तार ने उन्हे रोकत हुए कहा :- हम बंदियों को नही मारते ..! इस पर गुरिल्ला लड़ाको ने कहा – वो तो बंदियों को मारते हैं। इसके बाद उमर मुख़तार ने जो जवाब दिया वो काबिले तारीख़ है उमर मुख़तार ने कहा – वो जानवर है लेकिन हम नही.

ये वाक्य क्रांतिकारियों की दिशा बताता है कि हम जानवर नही जो खून बहाते फिरे हम क्रांतिकारी है हम खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे है। हमने हथियार आत्मरक्षा में उठाया है। क्योंकि दुश्मन भी हथियार से लैस है और वैहसी जानवर बना हुआहै। ये पूरे विश्व के क्रांतिकारियों की दिशा है।

सन 1929 में इटली जब लीबिया पर अपना कब्ज़ा करने की लगातार कोशिश कर रहा था तब लीबिया के बागियों का सरदार उमर मुख़्तार इटली की सेना को नाकों तले चने चबवा रहा था। मुसोलिनी को एक ही साल में चार जनरल बदलने पड़े। अंत में हार मान कर मुसोलिनी को अपने सबसे क्रूर सिपाही जनरल ग्राज़ानी को लीबिया भेजना पड़ा। उमर मुख़्तार और उसके सिपाहियों ने जनरल ग्राज़ानी को भी बेहद परेशान कर दिया। जनरल ग्राज़ानी की तोपों और आधुनिक हथियारों से लैस सेना को घोड़े पर सवार उमर मुख़्तार व उनके साथी खदेड़ देते। वे दिन में लीबिया के शहरों पर कब्ज़ा करते और रात होते-होते उमर मुख्तार उन शहरों को आज़ाद करवा देता।

उमर मुख़्तार इटली की सेना पर लगातार हावी पड़ रहा था और नए जनरल की गले ही हड्डी बन चुका था। अंततः जनरल ग्राज़ानी ने एक चाल चली। उसने अपने एक सिपाही को उमर मुख्तार से लीबिया में अमन कायम करने और समझौता करने के लिए बात करने को भेजा। उमर मुख्तार और जनरल की तरफ से भेजे गए सिपाही की बात होती है. उमर अपनी मांगे सिपाही के सामने रखते हैं. सिपाही चुप चाप उन्हें अपनी डायरी में नोट करता जाता. सारी मांगे नोट करने के बाद सिपाही उमर मुख्तार को बताता है की ये सारी मांगे इटली भेजी जाएंगी और मुसोलिनी के सामने पेश की जाएंगी। इटली से जवाब वापस आते ही आपको सूचित कर दिया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा जिसके चलते उमर मुख़्तार को इंतज़ार करने को कहा गया। उमर मुख्तार इंतज़ार करते हैं। इटली की सेना पर वे अपने सारे हमले रोक देते हैं। मगर इटली से जवाब आने की बजाएआते है?

खतरनाक हथियार, बम और टैंक – जिससे शहर के शहर तबाह कर दिए जा सके। समय समझौते के लिए नहीं हथियार मंगाने के लिए माँगा गया था। कपटी ग्राज़ानी अपनी चाल में सफल होते हैं। नए हथियारों से लीबिया के कई शहर पूरी तरह से तबाह कर दिए जाते हैं।

नाजी कर्नल एक जगह कहता है कि आज उमर मुखतार को मार गिराएंगे। पहले पुल कब्जे में लेंगे टैंक, मशीनगन से हमला करेंगे। दूसरा अफसर कहता है कि मैं हैरान हूं कि बागियों ने पुल क्यों नही उड़ाया। कर्नल बोलता है कि उमर मुख्तार सिर्फ लड़ना जानता है दिमाक चलाना नही जानता है। वो आप लोगो की तरह कोई मिलेट्री स्कूल में नही गया था। सभी हंसते है।

ये ही सेना की बेवकूफी उन सब को मौत के मुँह में धकेल देती है क्योकि उमर का जो गुरिल्ला वार का अनुभव था वो बड़ी से बड़ी सेना को भी घुटने पर ले आये। मैदान ए जंग मे उमर मुख़्तार दो साल तक टिके रहे औऱ इटली की फ़ौज के साथ हुए एक झड़प में घायल हुए उमर मुख़्तार को 11 सितम्बर 1931 को जनरल ग्राज़ानी की फ़ौज ने गिरफ़्तार कर लिया, 15 सितम्बर 1931 को हाथों में, पैरों में, गले में हथकड़ी जकड़ उमर मुख़्तार को जनरल ग्राज़ानी के सामने पेश किया गया, 73 साल के इस महान बुजर्ग योद्धा से जनरल ग्राज़ानी ने कहा “तुम अपने लोगों को हथियार डालने को कहो” ठीक पीर अली ख़ान की तरह इसका जवाब उमर मुख़्तार ने बड़ी बहादुरी से दिया और कहा “हम हथियार नही डालंगे, हम जीतेंगे या मरेंगे और ये जंग जारी रहेगी। तुम्हे हमारी अगली पीढ़ी से लड़ना होगा औऱ उसके बाद अगली से… और जहां तक मेरा सवाल है मै अपने फांसी लगाने वाले से ज़्यादा जी लूँगा ..और उमर मुख़्तार की गिरफ़्तारी से जंग नही रुकने वाली… जनरल ग्राज़ानी ने फिर पुछा “तुम मुझसे अपने जान की भीख क्युं नही मांगते? शायद मै युं दे दुं…

उमर मुख़्तार ने कहा “मैने तुमसे ज़िन्दगी की कोई भीख ऩही मांगी दुनिया वालों से ये न कह देना के तुमसे इस कमरे की तानहाई मे मैने ज़िन्दगी की भीख मांगी” इसके बाद उमर मुख़्तार उठे और ख़ामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल गए। इसके बाद 16 सितम्बर सन 1931 को इटली के साम्राज्यवाद के विरुद्ध लीबिया राष्ट्र के संघर्ष के नेता उमर मुख़्तार को उनके ही लोगो के सामने फांसी दे दी गयी। जिस निडरता से उमर मुखतार फांसी के फंदे की तरफ बढ़ता है। ये सिर्फ एक मजबूत वैचारिकता से लैस कोई महान योद्धा ही कर सकता है। उमर की फांसी के बाद लीबिया के आम जनमानस में जो रोष और आंखों में पानी था वैसा ही ठीक हाल नाजी सेना के बहुत से सैनिको और ऑफिसरों का भी था।

नाजी सेना को लगा था कि उमर मुखतार को मारने से युद्ध रुक जाएगा। लेकिन उमर तो पहले ही कहते थे कि ये युद्ध हमारी आजादी तक चलेगा, मेरे मरने से ये युद्ध बन्द होने वाला नही है मेरे बाद मेरी आने वाली पीढ़िया ये लड़ाई लड़ेगी उसके बाद उससे अगली पीढ़ी लड़ेगी।

आज पूरे विश्व मे ये ही तो लड़ाई चल रही है। उमर मुख्तारके बाद की दूसरी-तीसरी पीढ़िया लीबिया, सीरिया, फिलस्तीन से लेकर पूरे विश्व में साम्राज्यवाद की लूट के खिलाफ मजबूती से लड़ रही है।

भारत मे भी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने का अपना लम्बा इतिहास रहा है। उसीइ तिहासको आगे बढ़ाते हुए भारत मे भी तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ गुरिल्ला वार मजबूती से जड़े जमाये है। जिसका साम्राज्यवाद और उसकी पिट्ठू लुटेरी सत्ता के खिलाफ लड़ने का एक शानदार इतिहास है। भारत में भी कितने ही महान योद्धाओ ने जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए अपनी शहादते दी है। भारत मे भी कितने ही क्रांतिकारी योद्धाओ को धोखे से बातचीत के लिए बुलाकर सत्ता ने निर्ममता से उनका कत्ल किया है।

ये युद्ध जारी है और रहेगा तब तक जब तक इंसान का इंसान शोषण बन्द नही करता, जब तक ये साम्राज्यवादी लूट बन्द नही होती जब तक ये लड़ाई जारी रहेगी।

MedWave Shipping Libya
@MedWave1
Definitely snowing heavily in #Libya .. affecting all segments of daily Life including #Shipping and #Ports operations

@MedWave Shipping Libya
@MedWave1
#LIBYA #ليبيا #Libye

The History of the Real Libya as We Should All Know and Appreciate it

Amnesty International
@amnesty
Feb 17
For 10 years, accountability and justice in #Libya were sacrificed in the name of peace and stability. Neither were achieved.

Unless those responsible for violations are brought to justice, the systematic human rights abuses and endless suffering in Libya will continue.

احمد القماطي
@AhmedGamaty
Happy to see #Tripoli celebrating today on the 10th anniversary of #Libya’s revolution. Strong message that Libyans are still proud of their revolution despite the immense hardships, especially after the recent war waged attempting to return us to dictatorship. Happy 17th Feb

Angela O’Brien
@GrecianGirly
The old town of Nalut, Libya.

This place looks absolutely fascinating!!!

Libyan Tales
Flag of Libya
@libyantales

Italian troops entering and occupying #Tripoli, #Libya during the Turco-Italian War (Italo-#Turkish War) which took place between September 1911 and October 1912. Photo dated 1911 or 1912.

Two brothers celebrating the 10th anniversary of Libyan revolution, #Tripoli #Libya

Erdogan : Chance for peace in Libya shouldn’t be wasted

The Turkish President, Recep Tayyip Erdogan, said Thursday that there’s an opportunity for peace and stability in Libya, adding that such a chance shouldn’t be wasted.

Erdogan’s remarks came in a phone call with his Russian counterpart, Vladimir Putin, Turkish Presidency said in a statement, adding that the two Presidents had reviewed bilateral relations and regional issues, including Libya and Syria.

Erdogan reiterated earlier in phone calls with the Head of the Presidential Council, Mohammed Menfi, and Prime Minister, Abdul-Hamid Dbeibah, that Turkey would remain in support of the political process in Libya to establish peace and security in the country. He also stressed Ankara’s keenness on boosting cooperation with Libya in the upcoming period.

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