साहित्य

“””वो बचपन के दिन सुहाने”””

Kaviraj A Kumar
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“””वो बचपन के दिन सुहाने !!”””
वो कागज़ की नाव, बारिश में चलाने में बड़ा मजा आता था,
वो छत के ऊपर से उड़ता हुआ aeroplane भी आनंद दे जाता था।
अब तो ये तरीके out dated हैं, हो गए हैं पुराने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
पापा कमा रहे थे,
और हम ज़िन्दगी के मज़े लिए जा रहे थे।
अहमियत समझें हैं अब, जब खुद लगे हैं कमाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
वो स्कूल के दोस्त, वो उनके साथ मस्ती,
तब हर खुशी थी कितनी सस्ती।
अब तो वो दोस्त भी हुए हैं बेगाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
Videogame ना मिलने पर ही tension हो जाती थी,
तब तो पढ़ाई भी tension ही नज़र आती थी।
Tension क्या होती है, ये तो हम अब जाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
Comics का वो बड़ा ज़बरदस्त दौर था,
चाचा-चौधरी और नागराज का तो जलवा ही कुछ और था।
पर अब तो सब, हो रहे हैं मोबाइल के दीवाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
पहले जब भी कहीं घूमने जाना होता था,
तो पापा को खूब मनाना होता था।
अब अपने बच्चे कहें, तो फुर्सत ना होने के होते हैं बहाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
साथ में खाना, साथ में पढ़ाई होती थी,
दीदी से बड़ी लड़ाई होती थी।
पर अब तो कभी-कभार ही आ पाते हैं मिलने-मिलाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
जब किसी बात पर मिलती थी सज़ा,
तब तो लगता था, बड़े होने में ही है मज़ा।
अब तो याद बचपन की लगी है तरसाने,
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।
याद आते हैं, वो बचपन के दिन सुहाने।।
Author- Kaviraj A Kumar
#KavirajAKumar

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