धर्म

#ख़िलाफ़त_ए_हज़रत_अली

वसीम खान

हज़रत अली रजिअल्लाह तआला अन्हो चार साल नौ महीना खलीफ़ा रहे । और आपकी हुकूमत बड़े इंसाफ़ की हुकूमत थी । खलीफ़ा होते हुए भी आप की यह हालत थी कि एक मोटा – सा तहबंद बांधे रहते थे , उस पर एक मोटी रस्सी लिपटी होती थी । कभी एक चादर मोढ़ लेते और एक से तहबंद का काम लेते । इस हाल में कूफ़े के बाजारों में यह देखते फिरते थे कि कहीं दुकानदार नाप – तौल में कमी तो नहीं करते । एक दिन बाजार में खड़े थे , देखा कि एक लौंडी रो रही है । पूछा तुम क्यों रो रही हो ? कहने लगी , मेरे आका ने एक दिरहम की खजूर मंगाई थीं वह उसे पसन्द नहीं आयीं , इसलिए भेज दी , अब दुकानदार वापस नहीं लेता । हजरत अली रजिअल्लाह तआला अन्हो ने दुकानदार से कहा , भाई खजूर बेचने वाले ! अपनी खजूरें ले ले और दिरहम वापस कर दे । उसने आप को धक्का दिया । यह देख कर लोग जमा हो गये और कहने लगे , तू नहीं जानता ? यह अमीरुल मोमिनीन हैं । दुकानदार ने यह सुनकर खजूरें ले ली और दिरहम वापस कर दिए और हजरत अली रजिअल्लाह तआला अन्हो से कहने लगा , ‘ मैं चाहता हूं कि आप मुझसे खुश हो जायें । ‘ आपने फ़रमाया कि , ‘ मुझे सिर्फ़ यही बात खुश कर सकती है कि तू लोगों को उनका पूरा हक़ दे दिया करो । आपके कपड़ों में कितने ही पेवन्द होते थे । कपड़ा फट जाता था तो उसे अपने आप सी लेते थे । जूती फट जाती थी तो उस की मरम्मत भी आप ही कर लिया करते थे । ठंड के मौसम में भी उनका यही हाल होता था कि एक ही चादर ओढ़े हुए हैं और ठन्ड से सारा बदन कांप रहा है । एक बार कपड़ा खरीदने निकले । आप का गुलाम कंबर साथ था । दो मोटी – मोटी चादरें खरीदी । फिर कंबर से कहने लगे इनमें से जो तुझे पसन्द है वह ले ले । एक उसने ले ली और दूसरी आप ने ओढ़ नी ।
येह थी पुरी दुनिया पर राज करने वाले ख़लीफा की जिंदगी 😰

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *