विशेष

🌹 अंग्रेज़ी भाषा में पहला विपश्यना ध्यान शिविर 🌹

मुदित मिश्र
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अब उन सबका आग्रह होने लगा कि उनके लिए मैं डलहौजी में एक शिविर अंग्रेजी में लगाऊं। परंतु मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं थी कि मैं धाराप्रवाह प्रवचन दे सकू। उनके लिए अलग से शिविर लगाना असंभव-सा लगा । उनमें से कुछ ने गुरुदेव को पत्र लिखा कि यह विद्या म्यंमा से भारत आयी और सब के लिए खोल दी गयी। परंतु यह व्यक्ति भाषा का बहाना बना कर हमें धर्म से वंचित करना चाहता है। गुरुदेव का फोन आया और डांट लगाते हुए उन्होंने कहा कि शिविर तुम थोड़े लगा रहे हो। शिविर तो मैं लगा रहा हूं। तुम इनकी बात मान कर डलहौजी में शिविर अवश्य लगाओ। धर्म मदद करेगा और सब ठीक होगा । तुम चिंता मत करो।

गुरुदेव की आज्ञा मान कर मैंने शिविर लगाया । डलहौजी की एक होटल में पहले भी हिंदी में शिविर लग चुका था। परंतु अंग्रेजी में यह पहला शिविर लगा। पहले दिन मुश्किल से 15 मिनट बोल पाया । दूसरे दिन आध घंटे तक बोला और तीसरे दिन से पूरे घंटे भर धाराप्रवाह प्रवचन देने लगा। किसी शब्द पर अटकता तो साधक मदद कर देते। शिविर बहुत अच्छा गया । हिंदी की भांति अंग्रेजी में भी धाराप्रवाह बोलने पर मुझे आश्चर्य हुआ और साधक भी चकित हुए । सचमुच शिविर मेरा नहीं था। पूज्य गुरुदेव का था, धर्म का था। मैं तो बेकार झिझक रहा था। सारी झिझक निकल गयी। सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। यह शिविर हम सब के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ।

शिविर-खर्च को लेकर उठीं शंकाएं
उन दिनों बहुत बड़ी संख्या में विदेश के हिप्पी शिविरों में आने लगे थे। लाभ मिलता है तो क्यों नहीं आते? परंतु विपश्यना विद्या का एक नियम और धर्म यह है कि सिखाने वाला अपना साधारण खर्च भी साधकों से नहीं लेता। इसके बदले वह स्वयं कुछ दान देता है। इससे एक ओर तो साधकों की संख्या बढ़ने लगी और दूसरी ओर यह प्रश्न उठा कि सिखाने वाला भी जब अपना खर्च स्वयं उठाता है तो शिविर का खर्च कहां से आता है? अवश्य ही कोई विदेशी संस्था इसका भार उठाती होगी। विशेषकर ईसाई नेताओं को शंका हुई कि मैं साधना के बहाने लोगों का धर्म-परिवर्तन करके उन्हें बौद्ध बनाने में लगा हूं। इसे जांचने के लिए अमृतसर की एक ईसाई मिशनरी के तीन प्रमुख नेता मुझसे डलहौजी में मिलने आये। उसी दिन शिविर आरंभ हो रहा था। मैंने उनसे कहा कि बातें करने से कुछ समझ में नहीं आयगा। जब यहां तक आ ही गये हो तो इस शिविर में दस दिन बैठ कर स्वयं जांच लो कि मैं क्या करता हूं और क्या सिखाता हूं? तीनों शिविर में बैठ गये। मेरी शिक्षा का नियम यह भी है कि मैं अपने प्रवचन में हर संप्रदाय के गुरुओं की जो अच्छी बातें हैं उन्हें प्रकाश में लाता हूं । इसी सिलसिले में जीसस क्राइस्ट के गुणों की चर्चा करते हुए उनके प्यार और करुणा का जिक्र किया। शिविर समाप्त होने पर उन तीनों में से एक सुपीरियर मदर मैरी कहने लगी, “Goenka you are teaching Christianity in the name of Buddha.” यानी, गोयन्काजी! आप बुद्ध के नाम पर ईसाइयत ही सिखा रहे हैं। अब यह बात फैलने लगी कि मेरी नीयत में कोई खोट नहीं है। मैं किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं करता, बल्कि धर्म की स्थापना करता हूं जो कि सब का है।

इस ईसाई संस्था का तो संदेह दूर हुआ लेकिन एक और नई समस्या खड़ी हो गयी । भारत सरकार को भी लगा कि मैं अवश्य ही किसी विदेशी संस्था की ओर से शिविर-संचालन का काम कर रहा हूं। अपना संदेह मिटाने के लिए उसने शिविरों में अपने जासूस भेजे । उनमें से एक ने यह सच्चाई मेरे सामने प्रकट की कि हमें तुम्हारी चेकिंग करने के लिए भेजा गया है। लेकिन हमें तो इसमें कहीं कोई खोट नजर नहीं आयी। किसी विदेशी संस्था का हाथ भी नजर नहीं आया। फिर भी सरकार की खोजबीन लंबे समय तक चलती रही।

पासपोर्ट और नागरिकता
इस बीच एक और घटना घटी । इतनी बड़ी संख्या में विदेशी हिप्पी शिविरों में आने लगे तो उन्होंने मांग की कि मैं उनके देश में जाकर शिविर लगाऊं ताकि उनके माता-पिता एवं मित्र-परिचित, जो भारत नहीं आ सकते, वे वहां के शिविरों में सम्मिलित होकर लाभान्वित हो सकें। गुरुदेव का कहना था कि धर्म भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में फैलेगा। अतः फ्रांस के साधकों की मांग आयी कि वहां शिविर लगाऊं । शिविर निश्चित हो गया परंतु बरमी सरकार के अपने नियमों के अनुसार मेरे पासपोर्ट पर किसी एक देश का ही इंडोर्समेंट था । मैं भारत अपनी मां की सेवा के लिए आया था । अतः इंडोर्समेट केवल भारत के लिए था । उस पर किसी दूसरे देश में जाने की अनुमति नहीं थी। तब सामने केवल एक ही रास्ता था कि मैं बरमी नागरिकता छोड़ कर भारत की नागरिकता ले लूं तो दुनिया के किसी भी देश में जाने की छूट मिल जायगी। परंतु भारत को मेरी गतिविधियों के बारे में गलतफहमी थी। उसके गुप्तचर आते रहे और अपनी रिपोर्ट देते रहे । उनमें से एक ने स्पष्ट रूप मे मुझे बताया कि आप पर सरकार को संदेह है। इसलिए केस बंद नहीं हुआ, चलता रहा। यानी, मुझे भारतीय नागरिकता मिलने में भी कठिनाई हुई। मुझे भारतीय पासपोर्ट मिले तो ही मैं विदेश-यात्रा कर सकू।

ऐसा संयोग हुआ कि उस समय देश के प्रधानमंत्री श्री मुरारजी देसाई थे। मेरे एक संबंधी उनसे मिलने गये। उन्होंने कहा कि जांच चल रही है, इसलिए नागरिकता अभी नहीं दे सकते । मेरा समधी, जो कि मुरारजी का मित्र भी था, उसने कहा कि मैंने इसकी जांच नहीं की होती तो अपनी भतीजी का इसके घर में ब्याह कैसे कर देता? यह सुन कर श्री मुरारजी देसाई हतप्रभ हो गये और तुरंत नागरिकता देने का आदेश पारित कर दिया।

फ्रांस में पहला शिविर
मुझे भारतीय नागरिकता मिली और फ्रांस में जो पहला शिविर निश्चित किया गया था, उसके पहले वीसा भी मिल गयी और मैंने वहां जाकर दो शिविरों का संचालन किया। उसके बाद दो शिविर यू.के. में और एक कनाडा के मांट्रियल में लगा।

परंतु इससे एक और कठिनाई खड़ी हो गयी। बरमी सरकार का नियम था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता बदल लेता है तो वह देश के लिए गद्दार हो गया। उसे म्यंमा जाने का वीसा (पार-पत्र) नहीं मिल सकता, ट्रांजिट वीसा भी नहीं। भारतीय नागरिकता मिलने से विदेशों में जाने की छूट तो मिल गयी परंतु अपनी मातृभूमि से वंचित हो गया। लेकिन इस बात का बहुत दुःख नहीं था। जिस उद्देश्य के लिए मैं बाहर आया था उसकी पूर्ति हो रही है, यही बड़े संतोष की बात थी।

अमेरिका में पहला शिविर
अमेरिका में पहला शिविर लगा। शिविर लगने के बाद पता चला कि जो लोग उसमें सम्मिलित हुए हैं, उनसे पैसा वसूला गया है । मैंने कहा अब आगे के सभी शिविर रद्द करते हैं और जब तक तुम्हारे पास शिविर लगवाने भर के पैसे न हों, कोई शिविर नहीं लगेगा। यह सुन कर वहां की एक महिला कु. केट प्राट ने एक बड़ी रकम लाकर दी और कहा कि यह मेरी ओर से दान है। मैं बदले में कुछ नहीं चाहती। इसके बाद वहां के सभी शिविर लगने आसान हो गये। शिविर के अंत में जो दान आता वह अगले शिविरों के लिए जमा कर लिया जाता। इस प्रकार विदेशों में भी निःशुल्क शिविर लगाने का काम आसान हो गया और सभी शिविर सफलतापूर्वक संपन्न होते चले गये।

मेरे बारे में उठी अफवाह

मैं विश्व के विभिन्न देशों में घूम कर शिविर लगाता रहा। इस बीच एक बड़ा अप्रिय प्रसंग आया । गुरुदेव के निकट संपर्की एक व्यक्ति ने यह हवा उड़ा दी कि गुरुदेव सयाजी ऊ बा खिन का साया मेरे सर से हट गया है। वे अब मुझे अपना आशीर्वाद नहीं प्रदान करेंगे। इस बात से बड़ा तहलका मचा । मैं अपने साधकों से क्या कहता? मैं जिस साधिका के घर रुका हुआ था वह अपवाह फैलाने वाले की बड़ी भक्त थी। उसे लगा कि मुझे धर्मकार्य से निकाल दिया गया है। इसीलिए सयाजी ने अपना साया मेरे सर से हटा लिया । अब मेरे शिविर कैसे सफल होंगे? . दूसरे दिन शिविर लगने वाला था । उसने कहा कि अब आ ही गये हैं तो शिविर लगने देते हैं। शिविर लगा और लोगों ने देखा कि वह बहुत सफल रहा। सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। अफवाह झूठी साबित हुई। उस फलाने वाले को मुंह की खानी पड़ी। गुरुदेव का आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहा और अब भी है। बाधाएं आती गयीं और उनका समाधान भी होता गया । यह गुरुदेव की ही कृपा थी। उसके बाद सारे शिविर सफलतापूर्वक सपन्न होते चले गये। विश्व में जहां कहीं शिविर लगा वह अत्यंत सफल हुआ, कहीं कोई बाधा नहीं आयी।
– एस.एन गोयन्दका जी
साभार: आत्म-कथन-२

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