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इस्राईल को तुर्की की ज़रूरत क्यों है?

इस्राईल के समाचारपत्र हारेत्स ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसको यकाल्स साइदल ने लिखा है।

मुंगेरी लाल के सपने शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित होने वाले इस लेख में ईरान तथा इस्राईल के बीच टकराव और क्षेत्रीय शक्तियों तथा क्षेत्रीय नेताओं के व्यक्तित्व की समीक्षा की गई है। यहां पर इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है कि क्षेत्र के लिए इस्राईल और उसके षडयंत्र सबसे बड़ा ख़तरा बने हुए हैं।

लेख में कहा गया है कि तुर्की को अमरीका जैसे घटक की ज़रूरत है। दूसरी ओर इस्राईल को भी क्षेत्र में ईरान के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाने की ज़रूरत है। इन हालात में कमज़ोर हो रहे अर्दोग़ान से इस्राईल की निकटता से तेल अवीव को स्ट्रैटेजिक सफलता मिल सकती है।जिस प्रकार से मध्यपूर्व को शक्ति के हिसाब से तीन शक्तियों में बांटा जाता है जिनमे एक ईरान, दूसरे तुर्की और तीसरे नंबर पर इस्राईल और उसके अरब घटक बताए जाते हैं। इस हिसाब से इस्राईल के लिए ईरान के मुक़ाबले में स्वयं को मज़बूत बनाने का यह बेहतर अवसर है लेकिन यह काम करने के लिए उसको तुर्की की ज़रूरत है।

कुछ कारणों से अब इस्राईल और तुर्की के बीच मतभेद न होकर सुलह-सफाई का समय आ गया है। पहली बात यह है कि तुर्की और ईरान हालांकि एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं किंतु क़फ़क़ाज़, इराक़ और सीरिया के संबन्ध में दोनो देशों की नीतियों में समन्वय न होने के कारण तेहरान और अंकारा के संबन्धों किसी सीमा तक कमज़ोर हैं। दूसरी बात तो यह है कि तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान, इस्राईल के लिए कुछ एसे सिग्नेल भेज रहे हैं जिनका अर्थ है कि वे ज़ायोनी शासन के साथ संबन्ध सामान्य करने के इच्छुक हैं।

बाइडेन प्रशासन के काल में अर्दोग़ान के बारे में अमरीका के ढुलमुल रवैये के कारण इस्राईल दबाव की नीति अपना सकता है। इस हिसाब से इस्राईल, राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में अपने कुछ आंशिक लक्ष्यों को हासिल कर सकता है अर्थात तुर्की के निकट होकर अंकारा द्वारा फ़िलिस्तीनी संगठन हमास के समर्थन को कम करवा सकता है। हालांकि अर्दोग़ान की ओर से भी इस्राईल के साथ संबन्ध सामान्य करने में रुचि दिखाई जा रही है।

उन्होंने दो वर्षों के बाद इस्राईल के लिए तुर्की का नया राजदूत नियुक्त किया है। इसके बावजूद इस्राईल ने अर्दोग़ान की ओर से बढ़ाए जाने वाले क़दमों का खुलकर स्वागत इसलिए नहीं किया कि ज़ायोनी शासन की सुरक्षा एजेन्सियां, तुर्की को इस्राईल के लिए असुरक्षा के रूप में दर्शा रही हैं।

वर्तमान समय में इस्राईल की प्राथमिकता, ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने के साथ ही लेबनान में उसके घटक हिज़बुल्लाह पर लगाम कसना है। इस्राईल को अब जितना जल्दी हो सके तुर्की के साथ अपने संबन्ध सामान्य करने चाहिए अन्यथा मध्यपूर्व के हालात बदलने के दृष्टिगत यह अवसर भी इस्राईल के हाथों से निकल सकता है।

हमारे लिए यह कल्पना करना संभव नहीं है कि तुर्की इस्राईल और फ़्रार्स की खाड़ी के अरब देशों के गठबंधन से अपने हितों को जोड़ दें या फिर अपनी शक्ति को इस गठबंधन के लिए ईरान के विरुद्ध प्रयोग करने पर तैयार हो जाएं।

ईरान न यह कि तुर्की के लिए ख़तरा नहीं है बल्कि इसके विपरीत, इन दोनो पड़ोसी देशों में व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्र में बहुत पहले से सहयोग चला आ रहा है। संयुक्त सुरक्षा ख़तरों और अलगावादियों के ख़तरों ने इन दोनो देशों को शक्तिशाली घटक में बदल दिया है। इन बातों के बावजूद हालिया घटने वाली कुछ घटनाएं और इन दोनो पड़ोसी देशों के बीच कुछ दूरियां बनी हैं जिनको देखकर एसा लगता है कि इस्राईल इनका दुरूपयोग कर सकता है।

क़फ़क़ाज़ में तुर्की का बढ़ता प्रभाव ईरान के लिए चिंता का विषय है। आज़रबाइजान, शिया मुसलमानों का एक सैक्यूलर देश है जिसके इस्राईल और तुर्की से अच्छे संबन्ध हैं साथ ही ईरान के साथ भी कमज़ोर संबन्ध हैं। आज़रबाइजान ने इस्राईल और तुर्की के बीच वार्ता के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है।

इस्राईल के साथ संबन्ध सामान्य होने से तुर्की के भीतर भारी परिवर्तन हो सकते हैं जिसके कारण यह देश, इस्राईल-अरब गठबंधन की ओर झुकाव पैदा कर सकता है। वर्तमान समय में मध्यूपर्व में अमरीका की पराजय के बाद एक नई सुरक्षा व्यवस्था जन्म ले रही है। लेकिन फिर भी इस्राईल को बहुत ही सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। उसे यह समझना होगा कि तुर्की को बाइडन को खुश करने के लिए अमरीका के घटकों की ज़रूरत होगी। इन हालात में ईरान के तथाकथित ख़तरे के दृष्टिगत उसपर क़ाबू पाना इस्राईल और तुर्की दोनों के लिए बहुत ज़रूरी है। अब यह तेलअवीव की ज़िम्मेदारी है कि वह तुर्की के साथ संबन्ध बहाल करने की भूमि प्रशस्त करे और जल्द ही अपने पुराने प्रतिद्वदवी से संबन्ध बहाल करे।

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