साहित्य

इस कश्ती को भी अब पार करे कोई…**रमज़ान** की आमद पर विक्रम प्रताप की नज़म!

**रमजान **
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कर्म मुझ पर भी मौला करे कोई
नही कहता गिरेबां गैर सिले कोई
मै भी हूँ मिटटी गर उसी के हाथो की
उसका हूँ तो मेरी और ना सुने कोई
दर दर फिरना मुझे भी गवारा तो नही
उसके ही दर से अब बिगड़ी बने कोई
नमाज़े पांच ना माथे पे निशाँ सजदे का
माह ऐ रमजान में एक आह् तो सुने कोई
जरा सी बात पे नाउम्मीद हो जाता हूँ
इस कश्ती को भी अब पार करे कोई
Jeffrey Partap


Vikram Partap Jp
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किसी हसरत की सुनवाई ना हो
तेरी क़फ़स से बस रिहाई ना हो
वर्क सफा की आबरू रह जाये
कतरन भेजी जो जलायी ना हो
ता उम्र तेरा ही रहूं उमीदवार मैं
तेरी और से चाहे करवाई ना हो
Vikram Partap

Vikram Partap Jp
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एक ग़ज़ल
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जफ़ा करो या वफ़ा करो
लाओ दिल के दफा करो
आखिर बुझ ने वाला हूँ
जानिब मेरे हवा करो
सिर झुका कर तस्लीम है
तुम मुकर्रर मेरी सज़ा करो
दामन तो अपना साफ है
शक्क मुझ पे बेवजह करो
निशाने तेरे पे’ प्रताप’ है
कैसे भी अब ज़िब्हा करो
Vikram Partap Jp


Vikram Partap Jp
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तुम बोलो जुगनू और हम चाँद ला दें
चुपके से दें दें तुझे हम ये नियामत
और फिर महताब तेरी चुनरी में सजा दें
Vikram Partap Jp

Vikram Partap Jp
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वो इश्क़ जिसे अंजाम दे ना पाये हम
ता ज़िन्दगी उसका साथ निभाये हम
ना ज़ख्म दिया मुकमिल ना दवा हमे
तेरे शहर से देख खाली हाथ आये हम
Vikram Partap Jp

Vikram Partap Jp

आज की सियासत पर
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बस्ती बस्ती राख हुई है
जले की कीमत लाख हुई है
जबसे आया वो सियासत में
ज़िन्दगी ज़िन्दा लाश हुई है
मज़हब पे टिकी है कुर्सी तेरी
हर सूं खु की बरसात हुई है
दंगे बने है ब्रह्म आस्त्र तेरे
चाल भी खूब कामयाब हुई है
मेरा कहना है मान लो यारो
नफरत से कब कोई बात हुई है
Vikram Partap Jp

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