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ग्रामीण भारत की ग़रीबी : कृषि क्षेत्र में जो कुछ पैदा होगा, सभी की ख़रीद सरकार को ही करनी होगी!


– प्रो. अरुण कुमार का लेख-

किसान आंदोलन के सभी पक्षों से इसी बात के संकेत मिल रहे हैं कि सरकार और किसानों के बीच गतिरोध बना रहनेवाला है। इस बीच इसके महत्त्वपूर्ण मुद्दे भी अखबारों के मुख्य पृष्ठ और टीवी चैनलों के प्राइम टाइम विचार-विमर्श से धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। खास बात यह है कि दोनों पक्षों के बीच औपचारिक वार्ता बंद हो गई है। विरोध अब फैलते हुए देश के कई राज्यों में महापंचायत का रूप ले चुका है। फिर भी 2021-22 के बजट में और राष्ट्रपति के अभिभाषण में किसानों की समस्याओं का कोई खास जिक्र नहीं था।

सरकार के मंत्रीगण इस आंदोलन को लगातार यह कह कर अवमानित कर रहे हैं कि यह एक-दो राज्यों तक सीमित है या इसे आढ़तियों और विदेशी ताकतों की तरफ से शह मिल रही है। कई स्थानों पर किसान नेताओं का उत्पीड़न किया गया और उनसे जुर्माना वसूला गया। इन आरोपों और कार्रवाइयों से असल मुद्दों से ध्यान भटक जाता है और किसानों की पैदावार की कीमतों पर चर्चा नहीं होती, जबकि आंदोलन का मूल मुद्दा यही है। इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।

नीतियों की चोट
किसानों में अधिकांश की आय न्यूनतम होती है। उनका धंधा घाटे का है, क्योंकि उन्हें अपनी उपज की कीमत मुश्किल से मिलती है। बहुत-से किसान खेती छोड़कर ठीक-ठाक कमाई करने के इरादे से शहर की ओर जाते हैं। यही विस्थापित लोग गाँव में पैसा भेजकर अपने परिवार की मदद करते हैं। यह ग्रामीण भारत की गरीबी का दूसरा लक्षण है। महामारी ने उन विस्थापित मजदूरों की दशा को और बदतर बना दिया है, जिनका रोजगार छिन गया और वे वापस अपने गाँव लौट आए।

किसानों की आय एक राष्ट्रीय मुद्दा है, न कि सिर्फ पंजाब और हरियाणा का। यही कारण है कि मौजूदा सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वचन दिया था। अभी 2021 में किसानों की आय संभवतः 2015 से भी कम है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि नोटबंदी और महामारी के कारण मांग में कमी आई है। इन दोनों चीजों ने असंगठित क्षेत्र पर बहुत बुरा असर डाला, जबकि 94 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र पर जीएसटी और गैर-वित्तीय बैंकिंग कंपनियों के संकट की भी मार पड़ी। वर्ष 2016 से अब तक चार वर्षों में इन चार चीजों ने खेती की कमर ही तोड़ दी।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि किसान इस समय प्रचंड विरोध कर रहे हैं और यह विरोध सिर्फ पिछले कुछ महीनों से नहीं है, बल्कि विगत चार वर्षों से चल रहा है। वर्ष 2019 से पहले किसानों ने महाराष्ट्र और दिल्ली से बाहर एक बड़ा मार्च निकाला था। तमिलनाडु के किसानों ने जंतर मंतर पर लंबे समय तक प्रदर्शन किया था। मध्यप्रदेश के किसानों ने भी कड़ा प्रतिरोध किया। ये सारे विरोध-प्रदर्शन फसलों की बेहतर कीमत प्राप्त करने के लिए किए गए, ताकि उनकी आय में वृद्धि हो सके।

लागत नहीं निकलती
केंद्र और राज्य, दोनों ही सरकारें इस बात को समझती हैं। केंद्र सरकार ने 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले 2019-20 के बजट में किसान सम्मान निधि योजना की घोषणा की। इसके तहत बारह करोड़ किसान परिवारों को 6000 रुपए वार्षिक की मदद दी गई। तेलंगाना और ओड़िशा ने अपनी तरह से योजनाओं की घोषणा की। मध्यप्रदेश सरकार ने भावांतर योजना की घोषणा की ताकि किसानों को सरकार द्वारा घोषित एमएसपी मिल सके। ये आय और दाम को सहारा देनेवाली योजनाएं हैं जो इस बात की तस्दीक करती हैं कि किसानों को सही दाम नहीं मिल रहा है।

किसानों की उपज की कीमत का सवाल काफी अहम है क्योंकि इसी से इनकी आय का निर्धारण होता है। व्यवसाय की निगाह से देखें तो आय वही है जो लागत घटाने के बाद बचे। कीमत जितनी कम मिलती है, आय उतनी ही कम हो जाती है। इसीलिए किसान ऐसी कीमत की मांग करते हैं, जिससे खेती की लागत तो निकले ही, आमदनी भी हो। यही एमएसपी है, जिसका निर्धारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा किया जाता है।

खेती में दो तरह की लागत होती है। पहली वह होती है, जिसे बाजार से लिया जाता है। इसमें श्रमिकों का मेहनताना, खाद और कीटनाशक आदि शामिल हैं। दूसरी लागत किसान की खुद की मजदूरी, बीज और अपने औजार हैं। किसानों का कहना है कि लागत तय करते समय इनपर आंशिक तौर पर ही विचार किया जाता है। सरकार का दावा है कि एमएसपी लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा होती है, जबकि किसान बताते हैं कि पूरी लागत नहीं निकल रही है। मूल बात यही है कि उनका धंधा घाटे का है।

उद्योगों में सभी तरह की लागतों को शामिल करते हुए दाम तय किए जाते हैं। इसीलिए लाभ निहित होता है। खेती के क्षेत्र को लें। किसानों में 86 प्रतिशत छोटे व सीमांत किसान हैं। अमूमन इन किसानों को वही दाम स्वीकार करना पड़ता है, जो थोक बाजार अथवा खेत में उद्यमियों द्वारा इन्हें दिया जाता है। उद्योगों की तरह अपने उत्पाद की कीमत वे स्वयं नहीं तय कर सकते।

इसी से एमएसपी का महत्त्व बढ़ जाता है। किसानों के लिए न्यूनतम मूल्य दो कारणों से महत्त्वपूर्ण है। पहले तो इसलिए कि सभी लागतों को जोड़ना और उचित लाभ देना जरूरी है। दूसरे, यह और ज्यादा जरूरी इसलिए है कि वे बाजार में एमएसपी पर बेचने में सक्षम हों, उससे कम पर नहीं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एमएसपी का लाभ केवल 6 प्रतिशत किसान परिवारों को मिल पाता है। कुछ लोगों का अनुमान है कि इसे कम आँका गया है। (यानी एमएसपी पाने वाले किसान सिर्फ 6 प्रतिशत नहीं, इससे अधिक हैं)। दूसरी बात यह कि सिर्फ 23 फसलों पर ही एमएसपी घोषित की जाती है। ज्यादातर किसान एमएसपी का लाभ नहीं ले पाते हैं। खासतौर से वे किसान, जो कमजोर और छोटे हैं, बाजार में एमएसपी से कम मूल्य पर अपनी फसल बेचने पर मजबूर होते हैं। उनकी स्थिति कमजोर इसलिए होती है कि बिना कर्ज लिये वे न तो उत्पादन जारी रखने की स्थिति में होते हैं, न उपभोग की स्थिति में। बाजार में इसी कमजोरी के कारण किसान यह मांग कर रहे हैं कि एमएसपी को सभी के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए।

प्रश्न उठता है कि एमएसपी को सभी फसलों और सभी किसानों के लिए अनिवार्य तौर पर लागू क्यों नहीं किया जा सकता? कहा जाता है कि अगर यह हो गया तो कृषि क्षेत्र में जो कुछ पैदा होगा, सभी की खरीद सरकार को ही करनी होगी, निजी उद्यमी कुछ नहीं खरीदेंगे। यदि कृषि क्षेत्र में जीडीपी का कुल 14 प्रतिशत उत्पादन होता है तो सरकार को 28 लाख करोड़ मूल्य का उत्पाद खरीदना होगा। एमएसपी के आलोचकों का कहना है कि इतनी राशि कहाँ से आएगी।

बजटीय प्रभाव
इस मामले में बहुत-से कारक काम करते हैं। पहला यह कि किसान अपने उत्पाद का पर्याप्त हिस्सा अपने उपयोग के लिए रखते हैं और बचा हुआ हिस्सा बाजार में ले जाते हैं, जिसे सरकार को खरीदने की जरूरत होती है। दूसरा यह कि सरकार अपने उपभोग के लिए नहीं खरीदती है, बल्कि अर्थव्यवस्था-उपभोक्ता और उत्पादों के लिए खरीदती है। खाद्य उपभोग के लिए खरीदा जाएगा और कॉटन टेक्सटाइल उद्योग के लिए। इसलिए जो कुछ भी खरीदा जाएगा, उसे बेचा जाएगा और खरीद में लगा हुआ धन वापस सरकार के खजाने में आ जाएगा। यह वैसे ही है, जैसे व्यापारियों द्वारा बैंक से कार्यशील पूँजी उधार ली जाती है।

बजट से केवल सबसिडी की आवश्यकता होगी। यह बिक्री मूल्य और लागत मूल्य के बीच का अंतर है। लागत में गरीबों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के लिए प्रशासनिक खर्च भी शामिल होगा।

एमसएसपी की गारंटी की मांग का अर्थ यह नहीं है कि सरकार को सब कुछ खरीदना होगा। उसे खरीद का प्रस्ताव तभी देना होगा जब कीमतें एमएसपी से नीचे जा रही हों। एमएसपी के कानूनी रूप से बाध्यकारी होने के बावजूद निजी उद्यमी कम या अधिक मूल्य पर खरीद करेंगे। जब कीमत गिरने लगेगी तभी सरकार को खरीदने और भंडारण करने की जरूरत पड़ेगी और इससे कीमतें अपने आप चढ़ जाएंगी। इसलिए सरकार के ऊपर केवल भंडारण का बोझ पड़ेगा, सारी फसलों की कीमत का नहीं।

जब सभी कृषि उत्पादों के लिए एमएसपी घोषित हो जाएगा, तब फसलों का तरीका भी बदलेगा और कुछ राज्यों में गेहूँ और धान का अतिरिक्त उत्पादन रुक जाएगा। उदाहरण के तौर पर दलहन तथा तिलहन की पैदावार ज्यादा होगी, क्योंकि ये ज्यादा लाभकारी होंगे। इसलिए इस समय गेहूँ और धान के भंडारण पर दी जा रही अतिरिक्त सबसिडी में भारी कमी आएगी। किसानों को जब ऊंची कीमतें मिलनी लगेंगी तब उन्हें दी जा रही विभिन्न प्रकार की सबसिडी में कमी आ सकती है।

इसलिए यह जरूरी नहीं है कि सभी फसलों पर एमएसपी देने और उनकी खरीद करने से बजट पर आज दी जा रही विभिन्न सबसिडियों की तुलना में बहुत ज्यादा बोझ पड़े। निःसंदेह इसके लिए अधिक व्यापक और बेहतर प्रशासनिक मशीनरी की जरूरत पड़ेगी। ग्रामीण तथा शहरी मजदूरों और वेतनभोगी वर्ग के लिए महँगाई बढ़ सकती है। लिहाजा न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाना होगा। महामारी ने पहले ही इस बात को साबित कर दिया है कि मजदूरी में वृद्धि की जरूरत है, ताकि संकट के समय भी मजदूर जी सके। उद्योगों और व्यापारियों द्वारा बहुत ज्यादा लिये जा रहे लाभ पर लगाम लगाने की जरूरत है, क्योंकि इसी से मांग में कमी और आर्थिक मंदी आ रही है।

संक्षेप में, सभी फसलों के लिए एमएसपी घोषित करने से नीचे से विकास होगा और यह वर्तमान संसाधनों से संभव है। प्रशासनिक चुनौती के साथ महंगाई का दबाव भी आएगा, लेकिन सही बात यह है कि किसानों की आमदनी की कीमत पर दूसरे लोगों के जीवन स्तर को नहीं बढ़ाया जा सकता है।

अँगरेजी से अनुवाद- संजय गौतम

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