साहित्य

दाग़ देहलवी : उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’। हिन्दोस्तां में धूम हमारी ज़बां की है।।

Syed Faizan Siddiqui
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🕛 17 मार्च 1905 ई०
#HeroOfNation
#PoetOfNation

शुरू करता हूँ अपने पसंदीदा शेर से…
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद ।
बंदगी से ख़ुदा नही मिलता ।।
उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’ ।
हिन्दोस्तां में धूम हमारी ज़बां की है ।।

उर्दू शायरों में दाग देहलवी का शुमार ऊपर के बड़े शायरों में होता है। हालांकि आप लोहारू रियासत के वली अहद भी थे । लेकिन उन्होंने अपनी शायरी में रूमानियत और शोखी का ऐसा मीठा घोल डाला है कि उसका स्वाद आज भी नौजवानों की ज़बाँ पर तारी है। उर्दू शायरी में मुहावरों के इस्तेमाल के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। दाग़ देहलवी का पूरा नाम दबीर उददौला फसीह उल मुल्क़ नवाब मिर्जा खां बहादुर नाज़िम यार जंग था। उनका जन्म 25 मई, 1831 को दिल्ली के लोहारू हाउस में हुआ और 1905 में लकवे की वजह से हैदराबाद में उनकी मौत हो गई। जब दाग़ पांच-छह साल के थे, तभी इनके पिता मर गए। इसके बाद इनकी मां ने बहादुर शाह ‘जफर’ के बेटे मिर्जा फखरू से निकाह कर लिया। इसके बाद वे 12 साल तक दिल्ली के लाल किले में रहे। यहां इन्हें शानदार तालीम मिली। इसी दौरान उनके शायरी का फन निखर कर सामने आया। इन्हीं बारह वर्षों में उन्होंने अपनी शायरी से अपने युग के बुजुर्ग शायरों को चौंका दिया। इनमें ग़ालिब, मौमिन, ज़ौक, शेफ्ता जैसे अजीम शायर शामिल थे। उन्होंने शायरी का उस्ताद ज़ौक को बनाया। इन्होंने अपनी आंखों के सामने 1857 का गदर देखा। दिल्ली की सड़कों पर बिछी लाशें देखीं। इन सबका असर उनकी शायरी में दिखता है। दिल्ली के उजड़ने के बाद रामपुर आ गए, जहां उन दिनों असीर, अमीर, जहीर, निज़ाम और जलाला जैसे उस्तादों की आवाजों से आबाद था। यहां दाग़ देहलवी की शायरी भी खूब फली-फूली और उनकी आशिकाना तबीयत भी। मुन्नीबाई हिजाब नाम की एक गायिका और तवायफ से दाग़ देहलवी का मशहूर इश्क इसी माहौल की देन था। उनका यह इश्क आशिकाना कम, शायराना ज़्यादा था। दाग़ देहलवी उस वक्त पचास पार कर चुके थे, जब मुन्नीबाई की शोहरत परवान पर थी। अपने इस इश्क की दास्तान को उन्होंने फरयादे दाग़ में लिखा है। मुन्नीबाई से दाग़ का यह लगाव जहां रंगीन था, वहीं संगीन भी। मुन्नीबाई पर रामपुर के नवाब के छोटे भाई हैदरअली की ख़ास मेहरबानी थी। यह जानते हुए भी कि हैदर अली का रकीब होना उनके लिए भारी पड़ सकता है, उन्होंने हैदर अली तक अपना पैगाम भिजवा दिया-

दाग़ हिजाब के तीरे नजर का घायल है।
आप के दिल बहलाने के और भी सामान हैं

लेकिन दाग़ बेचारा हिजाब को न पाए तो कहां जाए।
लेकिन कमाल तो यह है कि इस गुस्ताखी के बावजूद हैदर अली ने दाग़ की इस गुस्ताखी को न सिर्फ माफ कर दिया, बल्कि उनके खत के जवाब में खुद मुन्नीबाई को उन्होंने अपना पैगाम देकर भेजा। उन्होंने लिखा था- ‘दाग़ साहब, आपकी शायरी से ज़्यादा हमें मुन्नीबाई अज़ीज़ नहीं है।’

मुन्नीबाई बेहद महत्वाकांक्षी तवायफ थी, इसलिए नवाब हैदर अली के भेजे जाने की वजह से वह दाग़ साहब के पास आई तो ज़रूर, लेकिन उन्हें जल्द ही छोड़ कर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के बाज़ार की ज़ीनत बन गयी। नवाब रामपुर कल्बे अली खां के देहांत के बाद दाग़ देहलवी रामपुर में ज्यादा दिन नहीं टिके। वह नवाब महबूब अली खां के पास हैदराबाद में चले आए।

दाग़ देहलवी अब ढलती उम्र से निकलकर बुढ़ापे की सीमा में दाखिल हो चुके थे। उन्हें कई बीमारियों ने घेर लिया था। हैदराबाद में दाग़ को पांव जमाने में साढ़े तीन साल से ज्यादा लग गए। उनके पास कुछ नहीं बचा था। उन्हें फौरी तौर पर एक काम की ज़रूरत थी। उस जमाने के हैदराबाद के रईस राजा गिरधारी प्रसाद बाकी, महाराज किशन प्रसाद शाद ने उनके लिए बहुत कोशिशें कीं, लेकिन कुछ बन नहीं पा रहा था। वह अपने घर से अलग बुढ़ापे में जवानों की तरह रोजगार की तलाश में हाथ-पैर मार रहे थे। नवाब और उनके मित्रों की शान में कसीदे लिख रहे थे। मजारों की चौखटों पर दुआएं मांग रहे थे। दोस्तों की मदद के सहारे किसी तरह दिन कट रहे थे। साढे़ तीन साल की फाकाकशी के बाद नवाब ने उन्हें अपना उस्ताद बना लिया।

दाग़ देहलवी जैसे ही अच्छी हालत में पहुंचे, मुन्नीबाई जिसने किसी से निकाह कर लिया था, उसे तलाक देकर हैदराबाद 72 साल के दाग़ देहलवी के पास चली आई। तब तक मुन्नीबाई बालों में खिजाब और मुंह में नकली डाट लगाने लगी थी। लेकिन दाग़ देहलवी की मुंह बोली बेटी को ये पसंद न आया, इस वजह से यह मिलन लंबा नहीं चला।
फारसी ज़ुबान से ग़ज़ल को निकाल कर हिंदोस्तानी जुबान में लाने वालों में दाग़ देहलवी का नाम प्रमुख है। दाग़ शायरी के बड़े शिक्षक या उस्ताद भी थे। इनके शिष्य हजारों में थे। इनमें अल्लामा इ़कबाल, सीमाब अकबराबादी, जिगर मुरादाबादी जैसे अज़ीम शायर भी शामिल हैं। बल्कि अल्लामा इक़बाल के बारे में लिखते हैं कि शेर ओ-शायरी से इक़बाल की मुनासिबत बचपन से ही ज़ाहिर थी कभी कभी ख़ुद भी शेर मौज़ू करलिया करते थे मगर किसी को सुनाते न थे, लिखतें और फ़ाड़ कर फेंक देते थे,उस वक़्त पूरी बर्रे सग़ीर, दाग़, के नाम से गुंज रहा था ख़ुसुसन उर्दू ज़ुबान पर उनकी गिरफत थी, लिहाज़ा दाग़ देहलवी को इक़बाल ने एक खत लिखा जिसमे उन्होंने शागिरद बन्ने की खुवाईश ज़ाहिर की,दाग ने बा ख़ुशी इक़बाल को अपना शागिर्द बनालिया, कुछ दिनों बाद दाग़ ने अपनी बेमिसाल बसीरत से भाप लिया कि इस हीरे को तराशा नही जा सकता,दाग़ ने इक़बाल को यह कह कर फ़ारिग कर दिया की आप के क़लाम को इस्लाह की ज़रूरत नही, मगर इक़बाल इस मुख़्तसर अरसा दराज़ की शागिर्दी पर हमेशा नाज़ा रहे और कुछ यही हाल दाग़ देहलवी का रहा ।

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