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मानवाधिकारों का राग अलापने वाले ब्रिटेन का क्रूर चेहरा : वीडियो रिपोर्ट

ब्रिटेन में नागरिक व जनकल्याण संस्थाओं की जाँच के नतीजे से पता चलता है कि इस देश में कोरोना वायरस की चपेट में आने वालों में अश्वेत समाज के लोग यहाँ तक कि मेडिकल क्षेत्र में भी इसी समाज के लोग सबसे ज़्यादा चपेट में आए हैं।

मेडिकल क्षेत्र में कोविड-19 से मरने वाले कर्मचारियों में 72 फ़ीसद अश्वेत वर्ग के लोग हैं। चूंकि यह सामान्य हालत में मौत नहीं है, इसलिए इस मामले की जाँच होनी चाहिए। ब्रिटिश सांख्यिकी केन्द्र की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि इस देश में कोविड-19 से श्वेत वर्ण की तुलना में अश्वेत वर्ण के मरने वालों की तादाद 4 गुना ज़्यादा है। इस बारे में ब्रिटिश मीडिया के दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराने वाले रवैये की ब्रिटिश नागरिक आलोचना कर रहे हैं।

 

 

ब्रिटिश मीडिया कोविड-19 के ब्रिटिश वेरिएंट के दूसरे देशों में सफ़र से फैलने के ख़तरे की ओर से सचेत करने के बजाए, दक्षिण अफ़्रीक़ा के वेरिएंट के बारे में निरंतर रिपोर्ट प्रकाशित कर रहा था। मानो इस देश के वेरिएंट का दूसरे देशों में फैलना उनके लिए अहमियत नहीं रखता। यह नैतिकता के ख़िलाफ़ है।

ब्रिटेन में छपी रिपोर्टों के मुताबिक़, ब्रिटेन की कुल आबादी में 13 फ़ीसद अश्वेत हैं, लेकिन कुछ अस्पतालों में कोविड-19 के भर्ती मरीज़ों में 35 फ़ीसद अश्वेत हैं। ब्रिटिश सरकार की आलोचनाओं में टीकाकरण में भेदभाद का रवैया भी शामिल हो गया है। ब्रिटिश रिपोर्टों के मुताबिक़, इस देश में 80 साल से ज़्यादा उम्र के श्वेत वर्ण के टीका लगाने वालों की तादाद, इस उम्र के अश्वेतों की तुलना में दोगुना ज़्यादा है।

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