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म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का निष्कासन, नस्लीय सफ़ाया: रिपोर्ट

इस सवाल के जवाब में कि क्यों म्यांमार की फ़ौज, चरमपंथियों और बौद्ध भिक्षुओं ने रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसमलानों का नस्लीय सफ़ाया किया है, विभिन्न दृष्टिकोण पेश किए गए हैं। कुल मिलाकर इसके लिए आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक कारणों का उल्लेख किया गया है।

एक ऐसा अनुमान है कि रोहिंग्या मुसलमानों और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच धार्मिक टकराव रोहिंग्याओं के जनसंहार और निष्कासन का महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसके राजनीतिक और आर्थिक कारण भी हैं। राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक कारणों के अलावा इसका एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण, फ़ौजी कारण है। म्यांमार की फ़ौज ने दाइश और अल-क़ायदा जैसे चरमपंथियों की मौजूदगी के बहाने रखाइन प्रांत का सैन्यकरण किया और मुसलमानों की ज़मीनों को ज़ब्त कर लिया। इस रणनीति के तहत म्यांमार सेना ने इस इलाक़े में अपनी छावनियों का विस्तार किया और इसके लिए रोहिंग्या मुसलमानों की ज़मीनें ज़ब्त कर लीं और उनके घर-बर उजाड़ दिए। इस सैन्यकरण के पीछे असली उद्देश्य, अल्पसंख्यक रोहिंग्याओं का नस्लीय सफ़ाया है। इस प्रकार एक ओर रोहिंग्याओं को मिटाना और दूसरी ओर एक भाषा, एक संस्कृति और एक धर्म के ज़रिए म्यांमार को एक ही रंग में रंगना है। वर्ष 1980 में म्यांमार छोड़ने के लिए मजबूर की गईं न्यूरो सर्जन डॉक्टर अनीता शुग जो रोहिंग्या मामलों में यूरोपीय काउंसिल की अध्यक्ष हैं उनका कहना है कि म्यांमार की सरकार के साथ-साथ वहां की सेना के अधिकारियों के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को कड़ा एक्शन लेना चाहिए नहीं तो वह ऐसे ही रोहिंग्याओं को नरसंहार जारी रखेंगे। 1994 से रोहिंग्या मुसलमानों की ज़मीनों को ज़ब्त करने का सिलसिला बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। इसके लिए उनका दमन किया गया, उनका नरसंहार किया गया और महिलाओं का बलात्कार करके उन्हें उनके घरों से उजाड़ दिया गया। म्यांमार की फ़ौज का मक़सद सिर्फ़ ज़मीनों को ज़ब्त करना नहीं था, बल्कि उन्हें बांग्लादेश या दूसरे देशों की ओर भेजना था। इस तरह से रोहिंग्या मुसलमान, अपनी उपजाऊ ज़मीनें छोड़कर देश से भागने पर मजबूर हो गए।

म्यांमार की फ़ौज ने रोहिंग्याओं के खेतों और घरों को ज़ब्त कर लिया, और मॉडल गांव नामक परियोजना शुरू की। मॉडल गांवों का मक़सद, रोहिंग्या मुसलमानों से इस इलाक़े को ख़ाली करके उनकी ज़मीनों और घरों को बौद्ध और अर्धसैनिक बलों को देना था, जो रोहिंग्याओं के नस्लीय सफ़ाए में शामिल रहे हैं। इसके पीछे आबादी के अनुपात को बिगाड़ना और इलाक़े में रोहिंग्या मुसलमानों को अल्पसंख्यक बनाना है, ताकि म्यांमार के जातीय-धार्मिक एकीकरण के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके। वास्तव में, यह कहा जा सकता है कि मॉडल गांवों के निर्माण की योजना में कि जिसके तहत रोहिंग्या मुसलमानों की ज़मीनों को उनसे छीना गया, आबादी की संरचना बौद्धों के पक्ष में हो गई है और नस्लीय सफ़ाए की अमानवीय परियोजना भी पूरी हो गई है। मॉडल गांवों की परियोजना के साथ ही रोहिंग्याओं के विनाश और बौद्धों को बसाने तथा हिंसा द्वारा रखाइन प्रांत के सैन्यीकरण को अंजाम दिया गया है। म्यांमार के यांगून में सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन क्वीनले का कहना है कि म्यांमार में रोहिंग्याओं के साथ-साथ अन्य समुदायों को भी कट्टरपंथी गुटों और सेना के अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा है। म्यांमार में राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सामरिक जटिल कारण पाए जाते हैं, जिनका उद्देश्य रोहिंग्याओं का नस्लीय सफ़ाया करना है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विशेषज्ञों ने इस पर गहरी चिंता जताई है। नस्लीय सफ़ाए की घटनाओं के विशेषज्ञ विलियम बिशस का कहना हैः जब मैं देखता हूं कि नस्ल बढ़ाने पर रोक लगाई जा रही है, लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को नकारा जा रहा है और रोहिंग्याओं से उनके इलाक़ों में ज़िंदगी गुज़ारने का हक़ छीना जा रहा है, तो इसका मतलब है कि नस्लीय सफ़ाया हो रहा है। वहीं रोहिंग्या मुसलमान विशेषकर बच्चे दुनिया से अपील कर रहे हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाए, उनका भी इस पृथ्वी पर जीने का उनता ही अधिकार है जितना किसी अन्य जातियों और समुदाय का है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों के उच्चायुक्त एंड्रयू किल्मो ने बांग्लादेशी शिविरों में रोहिंग्या शरणार्थियों की स्थिति को नज़दीक से देखा है। उनका कहना हैः म्यांमार की सेना ने आतंकवाद का सहारा लिया है और पूर्व योजना के तहत अकाल को हथियार बनाकर, रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश भागने पर मजबूर किया है। रोहिंग्या मुसलमानों के नस्लीय सफ़ाए में म्यांमार सेना और सरकार की मुख्य भूमिका है। एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा जो रोहिंग्याओं के नरसंहार और निष्कासन के पीछे के राजनीतिक उद्देश्यों और आर्थिक उद्देश्यों को साबित करता है, विकास परियोजना है। इस परियोजना के व्यापक आयाम हैं और ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया है कि यह पूरे देश के विकास के लिए तैयार की गई है। लेकिन रखाइन प्रांत में स्थानीय रोहिंग्या मुसलमानों के हितों की परवाह किए बिना इसे लागू किया गया है और उन्हें उनके गांवों को ख़ाली करने के लिए मजबूर किया गया है। ऐसे सुबूत हैं कि रोहिंग्याओं का दमन करके और हिंसा के ज़रिए उनका निष्कासन किया गया है, जिसके बाद खनन और संबंधित सुविधाओं के रूप में आधुनिकीकरण और पर्यटन समेत विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया है। आतंकवादी गुट 969 ने बौद्ध भिक्षुओं के दिशा निर्देशों के मुताबिक़, रोहिंग्या मुसलमानों पर बर्बरतापूर्ण अत्याचार किए। आम लोगों में भय उत्पन्न करने के लिए बौद्ध आतंकवादियों ने रोहिंग्या मुस्लिम महिलाओं का उनके पतियों के सामने बलात्कार किया और उनके बच्चों के सिर क़लम किए। इस बौद्ध आतंकवादी गुट ने इन अत्याचारों के ज़रिए लोगों में ऐसा भय उत्पन्न किया कि वे अपना घर-बार छोड़कर बांग्लादेश की ओर भागने पर मजबूर हो गए। म्यांमार के कट्टरपंथी बौद्ध भिक्षुओं के मुख्यालय मा.बा.था के प्रमुख विमाला का कहना है कि रोहिंग्याओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है, वह बांगाल से आए हैं और हम उन्हें यहां पसंद नहीं करते हैं।

लंदन स्थित चथम हाउस थिंक टैंक ने नवम्बर 2020 की अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि रोहिंग्या मुसलमान, अब अपने देश म्यांमार वापस नहीं लौट पाएंगे, इस संकट के नतीजे में लाखों लोग म्यांमार और बांग्लादेश की सीमावर्ती पट्टी पर बस जायेंगे। म्यांमार-बांग्लादेश सीमा पर बमबारी से जान बचाकर भागने वालों के भयावह और दुखद दृश्यों ने वैश्विक आक्रोश पैदा किया है। कम से कम पांच लाख लोगों को उनके घरों और जीवन से क्रूरता से निकाल दिया गया, जो कीचड़ भरे शरणार्थी टेंटों में शरण दी गई है। म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का निष्कासन 1962 से लेकर अब तक म्यांमार के सैन्य शासकों की भेदभावपूर्ण नीतियों का परिणाम है। दक्षिण-पूर्व एशिया अब चीन और उसके प्रतिद्वंद्वियों अमरीका, भारत और जापान के बीच एक भूराजनीतिक विवाद का मंच बन गया है। यह सभी इस क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए एक अघोषित युद्ध की स्थिति में हैं।

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