विशेष

रानी रूपमती, बाज़बहादुर की मज़ार

 

Syed Faizan Siddiqui
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आज ही के दिन 29 मार्च 1561 को मुग़ल बादशाह अकबर ने मांडू के सुल्तान बाज बहादुर खान को सारंगपुर की जंग में हराकर मांडू फ़तह कर लिया था।
इस हार की वजह से रानी रूपमती और बाजबहादुर खान की प्रेम कहानी का अंत हो गया। इस जंग में मुग़ल सेना की कमान सेनापति अदम खान के पास थी जिन्होंने बड़ी आसानी से कला प्रेमी सुल्तान बाजबहादुर खान को हरा दिया था।

हालंकि खानदेश के मीरान मुबारक शाह द्वितीय और बुराहनपुर के तुफ़ैल खान ने बाजबहादुर का साथ दिया था जिसमें एक मुग़ल सेनापति पीर मुहम्मद भी मारे गए इसके बावजूद मुगलों को फ़तह हासिल हुई। रानी रूपमती को बंदी बना लिया गया। रूपमति बाजबहादुर की जुदाई बर्दाश्त नही कर पाई और जहरिला हीरा निगल कर जान दे दी।

मुगल बादशाह अकबर को रानी रूपमती की मौत पर बेहद अफसोस हुआ, उन्होंने बाजबहादुर की मजार पर ‘आशिक-ए-सादिक’(सच्चा आशिक़) और और रानी रूपमती की समाधि पर ‘शहीदे-ए-वफा’ की दासतां लिखवा दिया था….

फिलहाल मध्यप्रदेश में ये खूबसरत जगह देख रेख न होने की वजह से खंडहर हो चुकी है इन महलों की ख़ूबसूरती पहले जैसी नही रही।

रूपमती

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विकिपीडिया से

माण्डू का रूपमती मण्डप

रूपमती मालवा के अंतिम स्वाधीन अफगान सुलतान बाजबहादुर की प्रेयसी थी। बाजबहादुर और रूपमति के प्रेम कथानक को लेकर 1599 ई. में अहमद-उल्‌-उमरी ने फारसी में एक प्रेम-काव्य की रचना की थी और मुगल काल के अनेकानेक सुप्रसिद्ध चितेरों ने उसकी घटनाओं पर कई भावपूर्ण सुंदर चित्र बनाए थे। परंतु इस इतिहासप्रसिद्ध प्रेमिका की जीवनी का कोई भी प्रामाणिक विवरण प्राप्य नहीं है। प्राप्य ऐतिहासिक आधारग्रंथों में तद्विपयक उल्लेख अस्पष्ट या परस्पर विरोधी हैं। रूपमती को सारंगपुर की ब्राह्मण लिखा गया है। परंतु नर्मदा घाटी में प्रचलित आख्यानों के अनुसार रूपमती धरमपुरी या टांडापुर की राजपूत कन्या थी , इनका मकबरा अवश्य ही सारंगपुर (मालवा) में एक तालाब के बीच में बना हुआ है।

यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुंदरी थी; उसकी स्वरलहरी बहुत मधुर थी और वह गायन-वादन-कला में भी पूर्ण निष्णात थी। बाजबहादुर स्वयं भी गायन-वादन-कला का उस्ताद था। रूपमती के इन्हीं गुणों के कारण वह उसकी ओर आकर्षित हुआ था और तब उनमें परस्पर अगाध प्रेम हो गया। उस समय मालवा में संगीतविद्या बहुत ही बढ़ी चढ़ी थी; और अब तो बाजबहादुर और रूपमती दोनों ही उसकी उन्नति तथा साधना में ऐसे लीन हो गए कि जब अकबर के सेनानायक आदम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेनाएँ मालवा पर चढ़ आई और सारंगपुर के पास तक जा पहुँची तभी उन्हें उनका पता लगा। अंत में सन्‌ 1561 ई. में सारंगपुर के युद्ध में पराजित होकर बाजबहादुर को भागना पड़ा। तब रूपमती आदम खाँ की बंदिनी बनी। उसके रूप और संगीत से मुग्ध आदम खाँ ने जब रूपमती को अपनी प्रेयसी बनाना चाहा तब रूपमती ने विष खाकर बाजबहादुर के नाम पर जान दे दी और अपनी प्रेमकहानी को अमर कर दिया। रूपमती द्वारा रचित अनेक गीत और पद्य जनसाधारण में तब से प्रचलित हैं तथा अब तक मालवा के कई भागों में लोकगीतों के रूप में गाए जाते हैं।

रानी रूपमती की नगरी मांडू
विंध्य की खूबसूरत पहाड़ियों पर बसें मांडू को रानी रूपमती का शहर कहा जाता है, जहां पहुंचते ही आप हिंदुस्तान में घटी इश्क की सबसे खूबसूरत लेकिन दर्द भरी दास्तानों में से एक से रूबरू होता है. खास बात यह है कि आमतौर पर कोई भी शहर राजाओं और बादशाहों के नामों से पहचाना जाता है. लेकिन मांडू को रानी रूपमती का शहर शायद इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि राजा बाज बहादुर ने इस नगरी में जो खूबसूरत महल बनवाए, उनकी प्रेरणा उसे रानी रूपमती से ही मिली थी. यह महल आज भी दोनों को इश्क की गवाही खुद ब खुद बताते हैं कि रूपमती और बाज बहादुर एक दूसरे से कितना प्यार करते थे.

इस तरह शुरू हुई थी दोनों की प्रेम कहानी
मांडू में रहने वाली रूपमती अपने नाम के अनुरूप ही थी. जो न केवल सुंदर थी बल्कि गायन, वादन की कला में भी बहुत निपुण थी. राजा बाज बहादुर ने जब पहली बार रूपमती को देखा तो वे उसे दिल दे बैठे, उन्होंने रूपमती के सामने अपने इश्क का इजहार किया और दोनों एक दूसरे के हो गए. दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे, बिन बोले ही वे उनेक दिलों की बात समझ लेते थे. इसलिए राजा बाज बहादुर अपनी रानी की हर इच्छा का ध्यान रखते थे.

यह कहानी जुड़ी है मकबरे से

ईस्वी सन्‌ 1556 से 1561 तक मालवा के सुल्तान रहे बाज बहादुर और सारंगपुर के पास स्थित शाजापुर जिले के तिंगजपुर गांव की गरीब परिवार में पली बड़ी रूपमति नाम की सहज और सुंदर कन्या की अद्भुत प्रेम कथा को सदियों तक याद किया जाएगा। बाज बहादुर ने अपनी रानी के लिए मांडू (धार) में जहाज महल बनवाया ताकि उसकी मेहबूबा को महल से ही नर्मदा नदी के दीदार हो जाए। रानी रूपमति से बाज बहादुर को इस कदर मोहब्बत थी कि रानी की कब्र पर बाज बहादुर ने अपनी आखिरी सांसें गिन कर दुनिया छोड़ी और उनकी कब्र को भी अपनी मेहबूबा के पास बनवाया। जब से लेकर अब तक सारंगपुरवासियों के लिए यहां मकबरा ताजमहल की तरह सच्चे प्रेम का प्रतीक बना हुआ है।

यह है मकबरे का इतिहास

रानी की मौत के बाद मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने रानी को सारंगपुर में दफनाया और वह उसकी कब्र की देख-रेख करता था। वर्ष 1568 में बाज बहादुर बीमार हो गया तो दिल्ली से पालकी से सारंगपुर पहुंचा। जहां रूपमति की मजार पर पहुंचकर वह सिर रखकर रोने लगा और वहीं अपने प्राण छोड़ दिए। इसके बाद बाज बहादुर को रूपमति की कब्र के पास दफनाया गया। रानी रूपमति की कब्र पर शहीदे वफा और बाज बहादुर की कब्र पर आशिके सादिक लिखा गया। दोनों की अमर प्रेम कहानी का साक्षी यह मकबरा किसी समय एक भव्य स्मारक था। जिला पुरातत्व संग्रहालय राजगढ़ द्वारा भी मकबरे की देखरेख वर्तमान में नहीं होना भी इसकी बदहाली दर्शाती है।

मकबरे की नहीं हो रही देख-रेख

इस मकबरे की पर्यटन विभाग अनदेखी कर रहा है। नवदुनिया टीम ने इसकी वर्तमान स्थित देखी तो पता चला कि मकबरा पूरी तरह से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और उसकी देख-रेख के अभाव में स्मारक में पेड़-पौधे, घास एवं गंदगी का अंबार है। इसके अतिरिक्त इस सच्चे प्यार की निशानी स्थल पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है।

स्वच्छता अभियान बेहसर

गौरतलब है कि देश में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन इस मकबरे के पास फैली गंदगी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यहां पर सालों से साफ-सफाई नहीं हुई है। जबकि इसे धरोहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए जिम्मेदारों को ध्यान देना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

दीवारों पर नजर आते हैं प्रेमी-प्रेमिकाओं के नाम

जीर्णशीर्ण अवस्था में मौजूद इस मकबरे की दीवारों पर सैकड़ों प्रेमी-प्रेमिकाओं ने अपने दिल का हाल उकेरा रखा है। इसकी दीवारों पर किसी ने अपने नाम के साथ पे्रमिका तो किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी का नाम कोयले या पेंट से लिख कर बाज बहादुर और रानी रूपमति के अमर प्रेम की तरह सच्चे प्रेम की कसमें खाई है।

 

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