धर्म

ज़्यादातर नमाज़ी खुतबा के दौरान सोते रहते हैं या झपकी लेते रहते हैं : मौलवी हज़रात भी रटा, रटाया रिवायती खुतबा पढ़ते हैं!

Azhar Shameemشاھین نیوز
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खुतबा अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है खिताब करना adress to the public अवाम को संबोधित करना , विषय कुछ भी हो। वैसे मस्जिदों में धार्मिक खुतबे ही होते हैं, कुरआन ,हदीस पर आधारित होते हैं।

अरब देशों में जुमा के दिन विस्तार से खुत्बा दिया जाता है और इमाम साहब 30 से 40 मिनट के खुतबे में कुरान, हदीस के हवाले से सामाजिक, राजनैतिक मसायल पर गुफ़्तगू करते हैं। सिरिया, यमन, फिलिस्तीन भी मुद्दा होता है तो अरब समाज के नौजवानों में फैली बुराई और इस्लाह पर भी बात होती है। अब चूंकि उनकी ज़ुबान अरबी है लिहाजा उन्हें सब समझ मे आता है। इधर हाल के वर्षों में अब ये होने लगा है की नमाज़ खत्म होने के बाद सुन्नत से पहले उर्दू या बंगला भाषा में खुतबे का सारांश पेश किया जाता है ताकि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के अजनबियों को भी समझ मे आ जाये कि इस जुमा किस टॉपिक पर बात हुई और क्या कहा गया ?

भारत में चूंकि हमारी ज़ुबान अरबी नही है लिहाजा हम खुतबा में क्या कहा जा रहा है समझ नही पाते हैं और इसीलिए हमारे अंदर बदलाव भी नही आ पाता है और ज़्यादातर नमाज़ी खुतबा के दौरान सोते रहते हैं या झपकी लेते रहते हैं। मौलवी हज़रात भी रटा, रटाया रिवायती खुतबा पढ़ते हैं।

हाँ जमात इस्लामी हिन्द के मुख्यालय पर स्थित मस्जिद में प्रत्येक जुमा को विशेष खुतबा दिया जाता है जो अधिकांशतः उर्दू में होता है और आखिरी हिस्सा अरबी में।

रामपुर में सय्यद अब्दुल्ला तारिक साहब भी किसी न किसी टॉपिक पर उर्दू में खुतबा देते हैं और मैंने सुना है केरल में स्थानीय भाषा मलयालम में और तमिलनाडु में तमिल भाषा मे खुतबा दिया जाता है।

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