विशेष

अमेरिका, इस्राईल, UK, फ्रांस, स्पेन ने बनाया नया आतंकी संगठन : अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, चीन के झियांग प्रान्त में उतारने की तैय्यारी है : रिपोर्ट

नए मामलता अफ़ग़ानिस्तान को लेकर सामने आ रहे हैं, ट्रम्प ने क़तर की राजधानी दोहा में तालिबान के साथ शांति समझौता किया था, जिसके मुताबिक 31 अप्रैल तक अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका, नेटो समेत सभी विदेशी सैनिक बाहर निकल जायेंगे, ट्रम्प की हार के बाद बने नए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानिस्तान को लेकर ट्रुप्स अलग नयी नीति पर चल रहे हैं, बाइडेन अफगानिस्तान से निकलने से पहले एशिया के कई देशों में आग लगा देना चाहता है

अमेरिका 31 अप्रैल आखिरी तारीख जोकि समझौते में तै हुई थी पर अफ़ग़ानिस्तान से निकलना नहीं चाहता है, उसने 1 सितम्बर 2021 तक का समय माँगा है, इन चार महिनों में अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में कबायली, मस्लकी लड़ाई भड़काना चाहता है साथ ही दाइश के आतंकवादियों को इराक, सीरिया से लाकर अफ़ग़ानिस्तान में उतारेगा, जानकारी के मुताबिक इस बार इस्राईल, UK, फ्रांस, स्पेन अमेरिका ने दाइश में जो यहूदी भर्ती किये हैं, उनके चेहरों पर बड़ी बड़ी दाढ़ियां रखवाई, उन्हें इस्लामी तौर तरीके सिखाये गए हैं साथ ही उन्हें अरबी भाषा पढ़ाई गयी है, इस नए दाईश को कई देशों में तबाही की ज़िम्मेदारी मिलने वाली है, अनेक देशों की दौलत, ताकात, ख़ुफ़िया एजेंसियां इनकी मदद करेंगी, नया देश ‘इस्लाम /मुसलमानों’ को बदनाम करने, बर्बाद करने का नया औज़ार होगा, इनकी खौफनाक कार्यवाहियों की ख़बरों को दिखाने, छापने के लिए अमेरिकी मित्र देशों के मीडिया, सोशल मीडिया को इस्तेमाल किया जायेगा, इस काम के लिए हज़ारों करोड़ का ‘गुप्त’ फण्ड अमेरिका ने खर्च करने के लिए रखा हुआ है, मीडिया और सूत्रों के मुताबिक तक़रीबन दो हज़ार करोड़ केवल मीडिया प्रचार में खर्च करने के लिए रखे गए हैं

अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के लिए अमेरिका को वक़्त चाहिए ताकि अपनी हार का कुछ तो बदला ले सके, अमेरिका का नया दाइश बेहद खतरनाक है, इस संगठन के लोगों को खौफ फैलाने के लिए ऐसे तरीके सिखाये गए हैं जो लोगों को डरा देगा, ऐसे ज़ुल्म देखने को मिलेंगे जो पहले कभी नहीं हुए होंगे

अमेरिका अपने इन आतंकियों को अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के झियांग प्रान्त में उतारने की तैय्यारी में है,

तालिबान ने एलान किया हुआ है कि अगर अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से 31 अप्रैल तक नहीं निकला तो एक मई से अमेरिकी, नेटो के सैनिकों पर मौत बन कर टूट पड़ेंगे, इस बार तालिबान अकेले भी नहीं हैं, तालिबान के साथ चीन, ईरान, पाकिस्तान, रूस, तुर्की है, तालिबान प्रवक्ता ने कहा है कि इस सप्ताह तुर्की में होने वाली अफ़ग़ान शांति वार्ता में वो शामिल नहीं होगा, तुर्की में होने वाली वार्ता में भारत, अमेरिका को भी शामिल होना है


अमरीका के इशारे पर दाइश ने अफगानिस्तान का रुख किया

अफगानिस्तान पर सोवियत संघ ने 70 के दशक के अंतिम वर्षों में हमला किया और इस देश पर क़ब्ज़ा कर लिया।

इस अवैध क़ब्ज़े की वजह से भी क्षेत्र में वहाबी विचारधारा को फलने फूलने में काफी मदद मिली। वहाबियों ने एक इस्लामी देश पर अवैध क़ब्ज़े की बात करके इस देश में अपने सदस्यों और समर्थकों को एकजुट किया। सोवियत संघ को धूल चटाने के लिए अमरीका मैदान में आया और सऊदी अरब व अमरीका के प्रयासों से अफगानिस्तान में तथाकथित जेहाद शुरु हो गया। इस तथाकथित जेहाद के लिए दुनिया के विभिन्न देशों से लोग, अफगानिस्तान पहुंचने लगे और उन सब का मक़सद एक ही था, सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध। यह युद्ध इस्लाम के नाम पर लेकिन अमरीका के हितों की रक्षा के लिए किया जा रहा था। इन सब को वहाबियों की कट्टरपंथी विचारधारा, एक मंच पर लायी थी और इसी देश में कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा परवान चढ़ी और फिर उसामा बिन लादिन के नेतृत्व में अलकायदा जैसा भयानक आतंकवादी संगठन बना और फैलता चला गया। यह संगठन भी इस्लाम के नाम पर बना था लेकिन उसके पीछे अमरीका था।

अलक़ायदा से तो सब परिचित हैं। वास्तव में अलकायदा की बुनियाद ही, चरमपंथी और वहाबी विचारधारा पर पड़ी है । अलकायदा के सभी सदस्य, वैचारिक दृष्टि से इब्ने तैमिया और मुहम्मद बिन अब्दुलवह्हाब के अनुयाई हैं। इब्ने तैमिया इस्लामी जगत में चरमपंथ का जनक समझा जाता है और मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने, इब्ने तैमिया की विचारधारा पर वहाबियत का ताना बाना बुना। अलकाएदा ने जेहाद का गलत अर्थ निकाल कर विभिन्न देशों में हिंसा की और आतंकवादी हमले किये। अलकायदा के अधिकांश सदस्य पश्चिमी एशिया विशेषकर सऊदी अरब से संबंध रखते हैं।

सन 2001 में अफगानिस्तान पर अमरीका ने हमला किया। इस हमले का उद्देश्य, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध बताया गया था। इस हमले की वजह से अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार का अंत हो गया और अलकायदा भूमिगत हो गया और उसके बहुत से सदस्य अफगानिस्तान छोड़ कर भाग गये । इस तरह अब अलकाएदा एक प्रकार से अमरीका के लिए लाभहीन हो चुका था और अब किसी नये संगठन की ज़रूरत थी जो अलकाएदा के अभियान को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा सके।

अमरीका ने सन 2003 में इराक़ पर चढ़ाई कर दी और इस देश पर भी अमरीका ने क़ब्ज़ा कर लिया । अमरीकी कब्ज़े के साथ ही पूरे देश में अराजकता फैल गयी। हर तरफ हंगामा और अशांति थी। इराक़ के इस प्रकार के वातावरण में अमरीका और ब्रिटेन की खुफिया एजेन्सियों ने अपना काम शुरु किया और उनके षडयंत्र के परिणाम में तकफीरी कट्टरपंथी विचारधारा मज़बूत होने लगी और वहाबी तकफीरी संगठनों ने इराक़ की परिस्थितियों से गलत फायदा उठाते हुए हमले शुरु कर दिये। इराक़ में इस प्रकार के आतंकवादी हमले, अबू मुसअब ज़रक़ावी के नेतृत्व में बनने वाले एक गुट ने आरंभ किये। अबू मुसअब ज़रक़ावी ने सब से पहले जमाअतुत्तौहीद नामक एक संगठन बनाया। दिसंबर सन 2004 में बिन लादिन ने अबू मसअब ज़रक़ावी को इराक़ में अलकायदा का प्रतिनिधि घोषित कर दिया और फिर इस देश में हिंसा का तांडव शुरु हो गया। इराक़ की सड़कों, होटलों और बाज़ारों में बम धमाके होने लगे और इराकी जनता बड़ी संख्या में मारी गयी मरने वालों में अधिकांश शिया समुदाय के इराक़ी थे।

सन 2006 में अबू मुसअब ज़रक़ावी मारा गया और उसके मारे जाने के बाद ” मुजाहेदीन परिषद” ने एक बयान जारी करके, तथाकथित ” इराक़ की इस्लामी सरकार” अर्थात “आईएसआईएस” के गठन की घोषणा कर दी जिसे अरबी में “दाइश” कहा जाने लगा। इस नये संगठन का नेतृत्व अबू उमर अलबगदादी के ज़िम्मे बताया गया। दस्तावेज़ों से पता चलता है कि सद्दाम के समर्थक बास पार्टी के सदस्यों और “दाइश” के आतंकवादियों के मध्य निकट सहयोग था और वह एक दूसरे की खूब मदद करते थे। दाइश ने पूरे इराक़ में मौत का बाज़ार गर्म कर दिया लेकिन अप्रैल सन 2010 में अबू उमर अलबगदादी मारा गया और उसके बाद दाइश का नेतृत्व अबू बक्र अलबगदादी ने संभाला और फिर दुनिया ने हिसां व मौत का वह तांडव देखा जिसकी मिसाल अतीत में नहीं मिलती।

सन 2013 के आंरभ में आतंकवादी संगठन, दाइश का गठन हुआ। हालांकि दाइश ने अलकाएदा के कोख से जनम लिया है लेकिन कई आयामों से उसकी कार्यशैली, अलकायदा से बिल्कुल भिन्न है। दाइश, विभिन्न क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करके शासन करने का इरादा रखता है जिसका आरंभ उसने इराक़ और सीरिया से किया था लेकिन प्रतिरोध मोर्चे की वजह से उसे हार का सामना करना पड़ा। इराक़ और सीरिया में हारने के बाद अमरीका के इशारे पर इस भयानक संगठन ने अफगानिस्तान का रुख किया और अब वह इस युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में पैर पसार रहा है। दाइश के अस्तित्व में आने के चाहे जितने कारण हों लेकिन यह निश्चित है कि उसका जन्म, अमरीका, सऊदी अरब और इस्राईल के त्रिकोण के प्रयासों से और वहाबियत की कोख से हुआ है। अमरीका की प्रिसंटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेर नार्ड हेकल इस बारे में कहते हैं कि दाइश, वह वहाबियत है जिसे सधाया न गया हो, वहाबियत, दाइश से सब से अधिक निकट है और उन दोनों की जड़ें एक हैं तथा हिंसा दोनों की विचारधारा का अभिन्न अंश है।

आतंकी संगठनों के पीछे क्या है बड़ी ताक़तों का खेल!

अफ़गानिस्तान की दुनिया भर के लोगों में एक खास तरह की छवि है। हथियार बंद क़बीले, कट्टरपंथ, तालिबान , दाइश और अलकाएदा जैसे विषय, अफगानिस्तान के साथ जुड़े हैं।

अफगानिस्तान, पिछले तीन दशकों से प्राक्सी वॅार का भी केन्द्र रहा है। अफगानिस्तान में सऊदी अरब , अमरीका और इस्राईल जैसी सरकारें, दाइश और अन्य आतंकवादी गुटों को अपने उद्देश्यों के लिए प्रयोग करती हैं।

हालांकि आतंकवादी संगठन दाइश ने अपनी तथाकथित इस्लामी खिलाफत का केन्द्र इराक़ और सीरिया को बना रखा था लेकिन जब इन क्षेत्रों में उसकी खिलाफत मिट्टी में मिल गयी तो उसने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत तथा दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रों में अपना ठिकाना खोजने की कोशिश की। 13 जनवरी सन 2015 को जारी होने वाले एक वीडियो में दाइश ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि वह अफगानिस्तान व पाकिस्तान में ” खुरासान” नामक अपनी शाखा खोल रहा है। इस वीडियो में पाकिस्तान तालिबान के पूर्व प्रवक्ता, शहीदुल्लाह शहीद ने दाइश के कई कमांडरों का नाम लिया और उन्हें अफगािनस्तान के अलग अलग इलाक़ों का प्रमुख बताया।

आतंकवादी संगठन दाइश जिसे आईएसआईएस भी कहा जाता है अतिवादी तकफीरी विचारधारा रखता है जिसका प्रेरणा स्रोत वहाबियत है। इस विचारधारा में हिंसा व कट्टरपंथ को महत्व प्राप्त है। दाइश की विचारधारा के अनुसार, वहाबियत से अलग हर विचारधारा और हर मत, धर्म विरोधी और अधर्म है। ब्रिटेन की खुफिया एजेन्सी एम आई-6 के पूर्व अधिकारी, एलस्टर क्रोक इस बारे में कहते हैं ः दाइश मूल रूप से एक वहाबी संगठन है और निश्चित रूप से सऊदी अरब में प्रचिलत वहाबी विचारधारा से प्रेरित एक आंदोलन है जो वास्तव में वहाबियत की आरंभिक विचारधारा से कई गुना अधिक कट्टर है।

वैसे यह भी एक हक़ीक़त है कि हालिया दशकों में आतंकवादी संगठनों को बनाने में वहाबी विचारधारा की मुख्य भूमिका रही है और यह सब को मालूम है कि वहाबियत की विचारधारा का आरंभ ब्रिटिश एजेंट मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने किया था। मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने एकेश्वरवाद को पुनर्जीवन प्रदान करने के दावे के साथ इब्ने तैमिया के कट्टरपंथ पर आधारित विचारों का प्रचार व प्रसार किया।

मुहम्मद अब्दुल वहाब

इब्ने तैमिया ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के बहुत से विचारों का विरोध किया। इब्ने तैमिया इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार स्वयं को हंबली मुसलमान कहते थे लेकिन इस बात पर ज़ोर देते थे कि यहूदी किसी भी दशा में झूठ नहीं बोलते और न ही किसी चीज़ में फेर बदल करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने इस दावे के लिए यह दलील पेश की कि पैग़म्बरे इस्लाम ने यहूदियों का विरोध नहीं किया। वहाबियत ने भी इस विचार को अपनाया और इसी आधार पर वह ज़ायोनियों का समर्थन करती है। अमरीकी पत्रकार और लेखक स्टीवन कोल कहते हैं कि अब्दुलवहाब, मक्का की यात्रा करने वाले मुसलमानों का अपमान करते थे और पैग़म्बरे इस्लाम के दृष्टिगत इस्लामी संस्कारों के बजाए वह क़बाइली अरबों के संस्कारों को अधिक पसंद करते थे।

सन 1795 में वहाबियों ने सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ के नेतृत्व में पहले इराक़ के कर्बला नगर की घेराबंदी की और फिर नगर में घुस कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मज़ार के दर्शन के लिए इस नगर में मौजूद श्रद्धालुओं का जनसंहार किया । नगर में खूब लूट मार की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोज़े को तबाह कर दिया। वहाबियों ने अपनी पाश्विक युद्ध शैली और हिंसा के बल पर ताइफ़, मक्का, जद्दा, मदीना और हिजाज़ के लगभग सभी मुख्य नगरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस तरह से ब्रिटेन की साज़िश और सहयोग से हिजाज़, सऊदी अरब बन गया और वहाबियत ताकतवर होती चली गयी।

सन 1904 से 1919 तक फार्स की खाड़ी में ब्रिटेन के मशहूर और बेहद शक्तिशाली जासूस ” सर पेर्सी कॅाक्स” ने सऊदी अरब के गठन में मुख्य भूमिका निभाई थी। उन्होंने शाह अब्दुल मलिक को ट्रेंनिंग देने में भी अहम रोल अदा किया था और सऊदी अरब के राजनीतिक विभाजन की ज़िम्मेदारी भी उन्ही की थी। हिजाज़ के शासक के रूप में अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुर्रहमान आले सऊद, और ब्रिटेन के प्रतिनिधि के रूप में सर कॅाक्स ने 26 दिसंबर सन 1915 को सात अनुच्छेदों पर आधारित एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके आधार पर ब्रिटेन ने सऊदी अरब को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया और यह वादा किया ब्रिटेन हमेशा हर युद्ध में आले सऊद का साथ देगा। उस समय से आज तक सऊदी अरब पाकिस्तान व अफगानिस्तान सहित क्षेत्र में आतंकवादी संगठनों का समर्थन करता रहा है और उन्हें बनाता और ट्रेनिंग देता रहा है।

अजीत डोभाल, दाइश के सरगना से मिलने इराक़ गये थे

पाकिस्तान के भूतपूर्व गृहमंत्री ने अमरीका और एफएटीएफ पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि इन लोगों ने भारत से होने वाले आतंकवाद की ओर से अपनी आंखें बंद कर ली हैं।

रहमान मलिक ने कहा है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल आतंकवादी संगठन दाइश के प्रमुख से मिलने के लिए सन 2014 में इराक गए थे।

सीनेटर रहमान मलिक ने कहा कि अमेरिकी पत्रिका फॅारेन पॅालीसी ने भारत को दाइश का नया चेहरा कहा है और संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी रिपोर्ट में भारत में दाइश के फैलाव को खतरनाक कहा है

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए रहमान मलिक ने दावा किया कि 44 भारतीय बैंकों ने एक अरब डॉलर का संदिग्ध लेनदेन किया है। अमेरिका द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 44 भारतीय बैंक संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हैं।

रहमान मलिक ने कहा कि पाकिस्तान का एक संदिग्ध लेनदेन पाया गया और फिर इसे एफएटीएफ की ग्रे सूची में डाल दिया गया। उन्होंने कहा कि मैंने भारत के खिलाफ कार्यवाही लिए एफएटीएफ के अध्यक्ष को दो पत्र लिखे हैं। उन्होंने एफएटीएफ पर पाकिस्तान के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया।

सीनेटर रहमान मालिक ने आरोप गलाया कि भारत सरकारी स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों के वित्तपोषण में शामिल है और मैं सन 2015 से कह रहा हूं कि भारत दाइश की आर्थिक मदद कर रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *