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आखें खोल कर देखो, सुपर पॉवर, नुक्लेअर पॉवर, विश्व गुरु एक ‘कीटाणु’ के सामने बेबस हैं, फड़फड़ा रहे हैं,,,कोरोना वायरस ‘मौज़िज़ा’ है : विशेष

निजी तौर पर मै मतलब ‘लेखक’ बहुत ही आलसी इंसान हूँ, मगर बहुत चुस्त, फुर्ती में रहता हूँ जब मेरा कोई अपना काम करना होता है, कई दिनों तक लगातार बिना खाये पिए रह सकता हूँ, बहुत लम्बी दुरी तक पैदल चल सकता हूँ, महिनों किसी भी एक जगह पर बैठा रह सकता सकता हूँ, अब 50 साल की उम्र हो जाने पर भी मुझे अपनी सगी चाचियों के नाम नहीं मालूम, कभी एक पल के लिए भी सगी फूफी के घर जाना नहीं हुआ है, फूफीज़ाद भाई-बहन को मै पहंचानता नहीं हूँ, मेरे बचपन के दोस्तों के परिवार के बाकी लोगों के नाम आदि मुझे नहीं पता हैं जबकि उनसे बहुत ही गहरे रिश्ते हमेशा रहे हैं,,,इंसान की जिंदिगी के कई पहलू होते हैं, जैसा कुछ मेने ऊपर बयान किया है, ये लिखने की ज़रूरत नहीं थी मगर लिखा है कोई बात कहने, समझाने के लिए

हम हमेशा बहुत कुछ हासिल करने की फिक्र में रहते हैं, हर कोई कुछ बन जाना चाहता है, कोई मकाम/ओहदा/ऊँचा पद/बड़ी हैसियत/शौहरत/ढेर सारी दौलत पाना चाहता है, इस ‘टेम्परेरी जहान’ में ‘परमानेंट’ मुलाज़मत चाहता है, वो नाम रोशन करना चाहता है, बड़ा मकान, ज़मीन-ज़यादाद चाहता है,,,इन सब को पाने के लिए इंसान ‘इंसानियत’ से दूर होता चला जाता है और जब किसी के अंदर इंसानियत बाकी नहीं रहती है तब वो ‘बेशर्म’ हो जाता है और बेशर्म इंसान कोई भी हद पार कर सकता है, उसके लिए उसकी चाहतें/मकसद सबसे ऊपर होते हैं

आज 21वीं सदी चल रही है अब से सैंकड़ों, हज़ारों साल पहले का समाज केसा रहा होगा, सिर्फ सोच कर देखें, बहुत समय नहीं गुज़रा जब किसी नीची ज़ात वाले की शादी हो कर आती थी तो उस महिला की डोली पहले ‘ठाकुर’ की हवेली पर पहुँचती थी

एक बार दोपहर का वक़्त था, मै और मेरे साथ मलखान सिंह, चंदा हम लोग मंज़ूरगढ़ी गॉंव में हरिजन बस्ती में बैठे हुए थे, यहाँ तब हमारा अक्सर जाना होता था, गर्मी बहुत थी तो गंगा प्रसाद में चारपाही और कुर्सियां दरख्तों की छाया के नीचे लगा दीं, हमारे पास में कई और लोग जोकि गॉंव के ही हरिजन थे बैठ गयी और इधर-उधर की बातें होती रहीं, इस बीच मनोज कोल्ड्रिंक ले आया, सभी ने उसे पिया, ये लोग थे तो हरिजन मगर साफसफाई रखते थे, इनके लिबास भी साफ़ और अच्छे होते थे

मैंने यूँही एक लड़की के बारे में बात करते हुए कहा ”अम्मा” तुम्हारी आबादी में लड़कियां बहुत सुन्दर हैं,,,अम्मा ने कहा ”बाबूजी ये सब तुम्हारी ही औलादें हैं’,,’जब घरों में काम करने जाते हैं तो मर्दुए ‘जबरदस्ती’ खींच लेते हैं’,,,उफ्फफ्फ्फ़,,,मै ‘अम्मा’ का जवाब सुन कर ख़ामोश रह गया,,,, सोचें, हज़ारों साल पहले का समाज केसा रहा होगा, सिर्फ सोच कर देखें,,,तब किसी की औरत होती थी और किसी और के बच्चों को जनम देती थी, जो भी तकातवर होता वो जिस किसी महिला को को चाहता अपने पास रख लेता था, राजा, महाराजा हज़ारों महिलाओं को अपनी दासी बना कर रखते थे, बादशाह, नवाब, जागीदारों के हरम में हज़ारों औरतें होती थीं,,,नाम रौशन करना है,,,जान करवाली जाएँ तो,,,इसी लिए क़यामत के रोज़ हर इंसान को उसकी ‘माँ’ के नाम से पुकारा जायेगा, अगर बाप के नाम से पुकारा जाने लगा तो,,,मालूम होगा कि पतली गली से टोपी लगा कर जो चाचा जी आते थे अब्बा की जगह साथ में वो खड़े मिले,,,

ये दुनियां अपने तमामतर फैलाव के बावजूद एक दिन मिट जाएगी, और चाँद-सूरज-सितारे अपनी तमामतर रौशनी के बावजूद ख़त्म हो जायेंगे, ये पहाड़ अपने तमामतर ग़ुरूर और बुलंदी के बावजूद एक दिन रेज़रेज़ा हो जायेंगे, और समन्दरों का नीलापन ख़त्म होकर सारा पानी उबल जायेगा, परचम हिलाल का हरा रंग सुर्खी में बदल जायेगा बिलकुल पिघले हुए लोहे की तरह, ऐसे वक़्त में इंसान उस मकोड़े की मानिंद होगा कि जिसके घर में पानी आ गया हो, और वो परेशानी के साथ पुरअमन जगह की तलाश में दौड़ता है, और दौड़ता है, और दौड़ता है, कि कहाँ है जन्नतुल मावा, एक पुल को अपने और खुदा के दरिम्यां हायल देखता है, और ये पुल, ये पुल कभी चौड़ा होता है कभी बारीक़, कभी फैला हुआ और कभी पेचोख़म वाला, कभी तेज़ धार वाला, लड़खड़ा देने वाला, इस दुनियां में आमाल ही उसकी कैफियत और नौईयत का ताआयुन करते हैं, ज़ालिम हाकिमों के लिए बाल की तरह बारीक़ होता है और कदम लड़खड़ा देने वाला, लड़खड़ा देने वाला, उस रोज़ हमारे तमाम आज़ा-ओ-जवहरे हमारे इन्साफ़ या फिर नाइंसाफी की गवाही देंगे, और कोई अमल, कोई भी अमल नाइंसाफी से ज़यादा होलनाक़ नहीं है,,,,

 

इस वक़्त कोरोना ‘एक न नज़र आने वाला ज़र्रा’ ने पूरी दुनियां को हिला कर रख दिया है, भारत में आज इसने तबाही मचाई हुई है, ये बहुत मुश्किल वक़्त है, ऐसे वक़्त में लाज़मी है कि हर इंसान अल्लाह से करीब हो और अपने गुनाहों से तलाफ़ी करें, आखिर हमें लौट कर अल्लाह ही के पास जाना है, दुनियां की ये जिंदिगी ‘टेम्पोरेरी’ ‘एक सीमित समय’ के लिए है, यहाँ जो कुछ भी है, वो नहीं रहने वाला है, कोरोना का वायरस कोई अजूबा नहीं बल्कि ये ‘मौजिजज़ा’ है अल्लाह की क़ुदरत और बेमिसाल ताकत का, देखो, आखें खोल कर, सुपर पॉवर, नुक्लेअर पॉवर, विश्व गुरु एक ‘कीटाणु’ के सामने बेबस हैं, फड़फड़ा रहे हैं,,,,

याद रखो वो ‘अल्लाह’ जब चाहता है, जिसे चाहता है आज़माइश में डाल देता है और वोही तो है जो मुश्किल के बाद आराम देता है, तो अपने रब से मदद तलब करते रहो, हमें उसी की तरफ लौट कर जाना है

– परवेज़

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