धर्म

इस्लामी जगत में मस्जिद की अहमियत और मौजूदा दौर में इसके रोल : पार्ट 16

जैसा कि पिछले कार्यक्रम में आपको बताया कि मस्जिद बनाने का मुख्य लक्ष्य ईश्वर की उपासना के लिए विशेष स्थल का बनाना है और इसे मस्जिद इसलिए कहते हैं क्योंकि वहां लोग सजदे की मुद्रा में ईश्वर के सामने अपनी तुच्छता को स्वीकार करते हैं।

लेकिन मस्जिद की दूसरी उपयोगिता भी है। इस्लाम के उदय के आरंभिक समय में मस्जिद पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी के ज़रूरी कर्तव्यों को अंजाम देने, ईश्वर के संदेश को पहुंचाने और धर्म के प्रचार का गढ़ हुआ करती थी। पैग़म्बरे इस्लाम मस्जिद में उपदेश व नसीहत की सभाएं आयोजित करते थे। लोगों को भलाई के लिए इस तरह उपदेश देते कि उनके दिल नर्म हो जाएं। पैग़म्बरे इस्लाम लोगों के मार्गदर्शन के लिए सभाओं के आयोजन का व्यवहारिक नमूना पेश करने के साथ साथ अपने अनुयाइयों को इस तरह की सभाओं के आयोजन के लिए प्रेरित भी करते थे। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम का एक कथन है, “स्वर्ग के बाग़ों की ओर बढ़ो! पूछा गया कि स्वर्ग के बाग़ से आपका अभिप्राय क्या है? आपने फ़रमाया, ईश्वर की याद की सभाओं का आयोजन करो।”

पैग़म्बरे इस्लाम जिस समय मस्जिद में उपदेश देते थे तो पूरा माहौल अध्यात्म से भरा रहता था। जिसमें ज़रा भी मार्गदर्शन हासिल करने की योग्यता होती वह तुरंत इस्लाम को स्वीकार कर लेता था। पैग़म्बरे इस्लाम का उपदेश सिर्फ़ भाषण तक सीमित न था बल्कि उनके आकर्षक व्यवहार ने मस्जिद को लोगों के मार्गदर्शन का केन्द्र बना दिया था। पैग़म्बरे इस्लाम के व्यवहार व चरित्र का लोगों के मन पर ऐसा असर होता था कि कभी कोई उनकी हत्या के इरादे से आता तो उनकी ईश्वर की ओर बुलाने वाली बातों को सुनकर ईश्वर के अनन्य होने और पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी का इक़रार करता और इस्लाम को स्वीकार कर लेता। ऐसे ही लोगों में एक व्यक्ति का उमैर बिन वहब है जो मक्के से ज़हर में बुझी हुयी तलवार लेकर मदीना में मस्जिदुन नबी पहुंचा था।

इतिहास के अनुसार, बद्र नामक जंग के बाद उमैर बिन वहब और सफ़वान बिन उमैया काबे के पास आपस में बात कर रहे थे। उमैर उन लोगों में था जो मक्के में पैग़म्बरे इस्लाम को सताते थे। बद्र नामक जंग में उमैर का बाप गिरफ़्तार हो गया था। उमैर बद्र में मारे जाने वालों के बारे में बात कर रहा था कि सफ़वान ने कहा, उनके बाद जीवन में कोई मज़ा नहीं रहा।

उमैर ने कहा, सही कहते हो। अगर मैं अपना क़र्ज़ अदा कर पाता और इस ओर से संतुष्ट होता कि मेरे बाद मेरे बच्चे बर्बाद न होंगे तो मोहम्मद तक पहुंच कर उन्हें क़त्ल कर देता। सफ़वान ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कहा, “तुम्हारा क़र्ज़ मैं अदा कर दूंगा और तुम्हारे बच्चों को अपने बच्चों की तरह समझूंगा।” तब उमैर ने कहा कि यह राज़ मेरे और तुम्हारे बीच रहे। उसके बाद उमैर ने अपनी तलवार ज़हर से बुझाई और मदीना की ओर चल पड़ा। उमैर ने मदीना पहुंच कर तलवार के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के पास पहुंचने की कोशिश की। पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ अनुयाइयों ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें ऐसा करने से मना करते हुए कहा, “उसे छोड़ दो।” उमैर सामने गया और उसने अंधकार के दौर में प्रचलित सलाम किया। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि ईश्वर ने इससे बेहतर तरीक़ा हमे दिया है जो स्वर्ग वालों का तरीक़ा है और वह सलामुन अलैकुम है। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने उससे पूछा कि किस लिए आए हो? उमैर ने कहा कि मेरे पिता आपके हाथों क़ैद हैं, उनके लिए आया हूं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “क्या इससे हट कर कोई और बात नहीं है जिसके लिए तुम आए हो, क्योंकि तुम और सफ़वान काबे के पास बैठे हुए बद्र में मारे जाने वालों के बारे में बातें कर रहे थे। तुमने कहा था कि अगर कर्ज़ न लिया होता, बच्चे छोटे न होते और क्षमता होती तो ख़ुद मुहम्मद तक पहुंच कर उन्हें क़त्ल कर देता। उस वक़्त सफ़वान ने कहा कि मैं तुम्हारे बच्चों की सरपरस्ती अपने ज़िम्मे लेता हूं और तुम्हारा क़र्ज़ भी अदा कर दूंगा और अब जिस काम को तुम अंजाम देना चाहते हो उसे मेरे और तुम्हारे अलावा सिर्फ़ ईश्वर जानता है।”

यह सुनना था कि उमैर के होश उड़ गए। उसने कहा मैं गवाही देता हूं कि आप ईश्वर के पैग़म्बर हैं। सच है कि आपको आसमान से ख़बर मिलती है लेकिन हम आपको झुठलाते थे। चूंकि इस बाते से मेरे और सफ़वान के अलावा कोई अवगत न था इसलिए मुझे विश्वास है कि ईश्वर ने आपको सूचित किया है। उस ईश्वर का आभार व्यक्त करता हूं जिसने मेरा इस्लाम की ओर मार्गदर्शन किया और मुझे सभी रास्ता दिखाया। उसके बाद उमैर ने कलमा पढ़ा कि कोई पूज्य नहीं सिवाए ईश्वर के और मोहम्मद ईश्वर के पैग़म्बर हैं। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने साथियों से कहा, “अपने धार्मिक बंधु को धार्मिक बातें और क़ुरआन सिखाओ और उनके क़ैदी को भी आज़ाद कर दो।”

‘मस्जिदे उमवी’ सीरिया की सबसे अहम जामा मस्जिद है। यह मस्जिद दमिश्क़ शहर के पुराने भाग में स्थित है। इसे इस्लामी जगत की सबसे ख़ूबसूरत मस्जिदों में गिना जाता है। यह सुसज्जित और बहुत ख़र्च के साथ बनी थी। ‘मस्जिदे उमवी’ मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा बनायी गयी सादा मस्जिद से बहुत भिन्न थी। सन 87 हिजरी क़मरी में उमवी शासक वलीद बिन अब्दुल मलिक ने ‘मस्जिदे उमवी’ की बुनियाद रखी थी। इतिहासकारों के अनुसार, वलीद ने इस्लामी जगत से लगातार सात साल हासिल हुए कर को इस मस्जिद के निर्माण पर ख़र्च किया था।

जिस स्थान पर ‘मस्जिदे उमवी’ है उस स्थान पर पुरातनविदों के अनुसार आग के पूजने वालों का उपासना स्थल था। इस तरह इस मस्जिद का इतिहास ईसापूर्व से मिलता है। रोमी साम्राज्य ने इस उपासना स्थल पर क़ब्ज़े के बाद इसे अपना उपासना स्थल क़रार दिया। उसके बाद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के प्रकट होने और ईसाई धर्म के फैलने से यह उपासना स्थल गिरजाघर बन गया। यह स्थिति इसी तरह जारी रही यहां तक कि मुसलमानों ने सीरिया को फ़त्ह किया और वे इस स्थान को नमाज़ पढ़ने के लिए इस्तेमाल करते रहे। अलबत्ता मुसलमानों ने इसके एक भाग को गिरजाघर के रूप में ईसाइयों के लिए बाक़ी रखा। यह स्थिति लगभग 70 साल तक जारी रही और मुसलमान-ईसाई एक दूसरे के पड़ोस में धार्मिक कर्तव्य अंजाम देते रहे। 705 ईसवी में जब मुसलमानों का शासन उमवी शासक वलीद बिन अब्दुल मलिक के हाथ में पहुंचा तो उसने गिरजाघर वाले भाग को भी मस्जिद से जोड़ दिया। उमवी शासक ने प्राचीन गिरजाघर पर रोमी वास्तुकला में बनी पुरानी बुर्जियों को मीनार में बदल दिया और उसके ऊपर से अज़ान दी जाने लगी। उमवी शासन से पहले मीनार के निर्माण का चलन न था और इसकी पहल उन बुर्जियों के आधार पर है जो सीरिया के उपासना स्थलों में थी।

वलीद ने ईरान और भारतीय मिस्त्रियों व वास्तुकारों को इस मस्जिद के निर्माण के लिए दमिश्क़ बुलाया और उसे सुसज्जित करने के लिए मरमर सहित दूसरे सुदंर पत्थर लगवाए। खंबों पर सोने और चांदी के पानी चढ़ाए, तथा मेहराब को रत्नों, सोने व चांदी की क़िन्दीलों और मुअर्रक़ नामी विशेष प्रकार की सुंदर टाइलों से सजाया।

इस मस्जिद के शबिस्तान नामक स्थान के ऊपर एक नस्र या उक़ाब नामक गुंबद बनाया गया। शबिस्तान बड़ी मस्जिदों के उस भाग को कहते हैं जो छतदार होता है और उसमें खंबे एक आकार के और दूसरे के समानांतर होते हैं कि उसमें एक तरफ़ से मस्जिद के प्रांगण में जाने का रास्ता होता है। ‘मस्जिदे उमवी’ के शबिस्तान के पूर्वी छोर में 20 और पश्चिमी छोर में 20 खंबे और चार मुख्य खंबे मस्जिद के बीच में हैं जो बहुत बड़े हैं और इन्हीं खंबों पर मस्जिद का गुंबद टिका है जिसका नाम ‘क़ुब्बतुन नस्र’ है।

विभिन्न शताब्दियों में ‘मस्जिदे उमवी’ का दायरा बढ़ता गया और इसमें बहुत से निर्माण कार्य हुए। इस मस्जिद के आंगन में 3 गुंबद और एक छोटा गुंबद है। क़ुब्बतुल माल नामक गुंबद मस्जिद के दाहिने छोर पर है। 172 हिजरी क़मरी में मंसूर अब्बासी के भतीजे व दमिश्क़ के शासक फ़ज़्ल बिन सालेह के आदेश पर प्रांगण के दाहिने छोर पर इस गुंबद को बनवाया गया और चूंकि उसमें मस्जिद की मूल्यवान चीज़े रखी जाती थीं इसलिए इसका क़ुब्बतुल माल पड़ गया।

369 हिजरी क़मरी में प्रांगण के बीच में ‘क़ुब्बतुल वज़ू’ नामक गुंबद बनाया गया। यह छोटा गुंबद मरमर के पत्थर के 6 खंबों पर टिका है। यह गुंबद ‘सख़रे क़ुर्बान’ के नाम से भी मशहूर है। कहा जाता है कि हज़रत आदम के बेटे हज़रत हाबील ने उस भेड़ को इसी चट्टान पर रखा था जिसे वह ईश्वर के सामने बलि के रूप में पेश कर रहे थे और चूंकि उसे ईश्वर वे क़ुबूल किया था इसलिए वह आग से जल गयी और क़ाबील ने ईश्वर के लिए बलिदान के रूप में गेंहू की बालियां रखी थीं जो क़ुबूल न हुयी और वह उसी हालत में बाक़ी रही, इस वजह वह अपने भाई हज़रत हाबील से जलने लगा और उसने उनकी हत्या कर दी। उस दिन से यह स्थान सख़रा के नाम से मशहूर हुआ।

‘मस्जिदे उमवी’ के पूर्वी प्रांगण में बाबुस साआत नामक द्वार के पास ‘क़ुब्बतुस साआत’ नामक गुंबद है। यह गुंबद पांचवी शताब्दी हिजरी में बना था और इसी स्थान पर मस्जिद की घड़ी रखी जाती थी।

जैसा कि पहले इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि इस मस्जिद की पहली मिनार उमवी शासन काल में बनी थी। ‘मस्जिदे उमवी’ में तीन बड़ी मीनारे हैं जो पत्थर की चौकोर बनी हैं। ये मीनारें मस्जिद के उत्तरी, दक्षिण-पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी छोर पर बनी हैं। पूर्वी मीनार ‘मनारतुल बैज़ा’ और ‘ मनारह ईसा’ के नाम से मशहूर हैं। कुछ लोगों की यह आस्था है कि दुनिया के अंत के समय हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इसी मीनार पर आसमान से उतरेंगे। उत्तरी मीनार ‘मिनारतुल उरूस’ के नाम से मशहूर है। इस मीनार को इसलिए मिनारतुल उरूस कहते हैं क्योंकि प्राचीन समय में लोग शादी के समय इस मीनार पर चेराग जलाते और उसे रंग बिरंगे कपड़ों व रूमालों से सजाते थे और उनका मानना था कि ऐसा करने से बर्कत होती है। पश्चिमी मीनार ‘आक़ बाय’ के नाम से मशहूर थी।

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