धर्म

पवित्र क़ुरआन चमकता हुआ सूर्य है जो अपने प्रकाशमयी मार्गदर्शन से अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है : ईश्वरीय वाणी पार्ट 33

क़ुराने मजीद के सूरए नूर की 35वीं आयत में उल्लेख है कि ईश्वर आसमान और ज़मीन का नूर अर्थात प्रकाश है।

उसके नूर की मिसाल ऐसी है जैसे ताक़ में एक दीप रखा हुआ हो, दीप एक फ़ानूस में हो, फ़ानूस मोती की तरह चमकते हुए तारे की भांति हो, और वह दीप ज़ैतून के एक ऐसे पवित्र वृक्ष के तेल से जल रहा हो कि जो न पूरबी हो न पश्चिमी, जिसका तेल ख़ुद ही ख़ुद जल उठने के निकट हो चाहे आग उसके निकट न जाए, प्रकाश पर प्रकाश, अल्लाह जिसको चाहता है अपने नूर की ओर मार्गदर्शन करता है, और वह लोगों से मिसालों द्वारा बात करता है, और वह हर चीज़ से अच्छी तरह अवगत है।

प्रकाश एक ऐसी चीज़ है कि जो ख़ुद भी उज्जवल होता है और दूसरी चीज़ों को भी उज्जवल कर देता है। इस्लामी संस्कृति में क़ुरान, ज्ञान, बुद्धि, मार्गदर्शन, पैग़म्बरे इस्लाम और इमामों को प्रकाश कहा गया है। प्रकाश भौतिक जगत में सबसे कोमल और सुन्दर चीज़ है कि जो हर सुन्दरता और कोमलता का स्रोत है।

भौतिक जगत में प्रकाश की सबसे अधिक गति है। प्रकाश द्वारा संसार की चीज़ों को देखा जा सकता है और उन्हें स्पष्ट किया जा सकता है। उसके बिना किसी चीज़ को नहीं देखा जा सकता। ज़मीन पर सूर्य का प्रकाश सबसे महत्वपूर्ण प्रकाश है कि जिससे फूल और वनस्पतियां उगते हैं बल्कि समस्त सृष्टि का जीवन उसी पर आधारित होता है। सूर्य प्रकाश के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

इस आयत में ईश्वर के नूर को ऐसे शमादान से उपमा दी गई है कि जिसमें उज्जवल दीप जल रहा है। पिछले ज़माने में दीपों को छोटे से ताक़ में या शमादान में रखते थे ताकि वह हवा और बारिश से सुरक्षित रहे। उस पर एक चिमनी रखते थे ताकि उसकी लौ सुरक्षित रहे और प्रकाश में वृद्धि हो जाए। इन दीपों को आम तौर पर बत्ती और तेल द्वारा जलाया जाता था। जलाने के लिए ज़ैतून का तेल बेहतरीन तेल है, और वह भी उस वृक्ष का कि जिसके हर भाग पर सूर्य का प्रकाश एक समान पड़ता हो, और वह बाग़ के पूरब में दीवार के पास स्थित न हो और न ही पश्चिमी भाग में कि जिसके केवल एक भाग पर प्रकाश पड़ता है, क्योंकि इसके परिणाम स्वरूप उसका फल आधा कच्चा और आधा पक्का होता है कि जिसका तेल साफ़ नहीं होता है।

इस आयत में ईश्वर को प्रकाश से उपमा दी गई है। क़ुरान ने ईश्वर के असतित्व को समझाने के लिए प्रकाश की मिसाल पेश की है। वह ईश्वर कि जो समस्त सृष्टि का रचयिता है और संसार को प्रकाशमय करता है। सृष्टि उसी के सहारे बाक़ी है। समस्त सृष्टि उसकी इच्छा से जीवित है और उसकी अनुकंपाओं से लाभ उठाती है। अगर एक क्षण के लिए भी उसकी कृपा न रहे तो हर चीज़ अँधेरे में फ़ना हो जाएगी।

ईश्वरीय मार्गदर्शन की मिसाल एक उज्जवल दीप की भांति है कि जो घरों को रोशन करता है और घर में रहने वालों को घुप अँधेरों से मुक्ति प्रदान करता है। ऐसा दीप कि जो हमेशा जलता और चमकता रहता है और कभी बुझता नहीं है। ईश्वरीय दूतों द्वारा उसका मार्गदर्शन मनुष्यों तक पहुंचा और ईमान वालों ने उसे स्वीकार कर लिया। वह दीप उन्हें हमेशा प्रकाश देता रहता है और अँधेरों में प्रकाश की ओर उनका मार्गदर्शन करता है।

जो चीज़ ईश्वर से जितना निकट होगी वह उतना ही अधिक प्रकाश प्राप्त करेगी। मोमिनों को ईश्वरीय प्रकाश की ओर मार्ग दिखाया जाएगा कि जिससे उनके दिल और मन चमक उठेंगे। मोमिन को सत्य की रोशनी में रास्ता प्राप्त होता है और मुक्ति मिलती है।

बाद की आयतों में उल्लेख किया गया है कि यह मार्गदर्शन का प्रकाश ऐसे घरों में है कि जिन्हें ईश्वर की अनुमति से श्रेष्ठता प्राप्त होती है और उनमें उसका नाम लिया जाता है। वे सुबह शाम उसका माला गुणगान करते हैं। ऐसे लोग कि जिन्हें कोई व्यापार और सौदा ईश्वर की याद और नमाज़ क़ायम करने और ज़कात देने से ग़ाफ़िल नहीं कर सकता।

ईश्वरीय मार्गदर्शन का दीप ऐसे घरों में जल रहा है कि जिनके निवासी ईश्वर की माला जपता है और नमाज़ पढ़ते हैं। ऐसे घर कि जिन्हें ईश्वर ने अन्य घरों पर वरीयता प्रदान की है और उन्हें धर्म में आस्था रखने वालों के बीच श्रेष्ठता प्रदान की है। काबा, मस्जिदें और धरती पर दूसरे धार्मिक स्थलों को यह विशेषता प्राप्त है। यह धार्मिक स्थल ईश्वर के स्मरण का केन्द्र हैं और वे लोग उनका सम्मान करते हैं कि जो सुबह शाम ईश्वर के गुणगान में व्यस्त रहते हैं और दुनिया के धोका देने वाले आकर्षण उन्हें सत्य के प्रति अनजान नहीं बनाते हैं। यह घर यह धार्मिक स्थल इन विशेषताओं द्वारा मार्गदर्शन का स्रोत हैं।

स्पष्ट सी बात है कि जिन लोगों को ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त होता है वे अपनी दुनियावी ज़रूरतों की आपूर्ति के लिए प्रयास करते हैं, मेहनत करते हैं, लेकिन यह प्रयास उनकी इबादतों और धार्मिक कार्यों में रुकावट उत्पन्न नहीं करते हैं।

39वीं और 40वीं आयतों में काफ़िरों की स्थिति बयान करने के लिए दो उदाहरण पेश किए गए हैं।

जो लोग काफ़िर हो गए उनके कार्य रेगिस्तान में मृगतृष्णा की भांति हैं, कि जिसे प्यासा इंसान दूर से पानी समझता है, लेकिन पास जाने पर उसे पता चलता है कि यह आँखों का धोखा था।

दूसरा उदाहरण पेश करते हुए कहा गया है कि इन काफ़िरों की गतिविधियां ऐसे अँधेरों की भांति हैं कि जो एक गहरे और तूफ़ानी महासागर के भीतर हैं और बड़ी सी लहर ने उसे ढका हुआ है, जिसके ऊपर दूसरी बड़ी लहर है और उसके ऊपर काला बादल छाया हुआ है और इस प्रकार ऐसे अँधेरें हैं कि जो एक दूसरे पर छाए हुए हैं। ऐसे कि अगर कोई उसमें फंस जाए और अपना हाथ देखना चाहे तो हाथ दिखायी नहीं देता है। अर्थात हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता।

क़ुराने मजीद ने काफ़िरों को ऐसे लोगों से उपमा दी है कि जो रेगिस्तान में पानी की खोज मे होते हैं और तपती हुई रेत पर वह मृगतृष्णा को पानी समझते हैं। ऐसा मृगतृष्णा कि जो कभी भी प्यासे की प्यास नहीं बुझा सकती। 40वीं आयत में ही एक दूसरे उदाहरण में उनकी स्थिति को ऐसे लोगों से उपमा दी गई है कि जो घुप अँधेरों में डूब गए हैं। पानी के नीचे का अँधेरा, तूफ़ानी मौजों के नीचे का अँधेरा और काले बादलों का अँधेरा, ऐसे अँधेरे हैं कि जो एक के ऊपर एक हैं।

स्पष्ट है कि ऐसे अँधेरे में निकटतम चीज़ भी दिखायी नहीं पड़ती है, यहां तक कि अगर इंसान अपना हाथ अपनी आँखों के निकट ले जाए तो भी उसे नहीं देख पाता है। ऐसे काफ़िर कि जो ईमान के प्रकाश से वंचित हैं, वे ऐसे लोगों की भांति होते हैं कि जो इस प्रकार के अँधेरे में फंस गए हैं। इसके विपरीत मोमिन या ईमान लाने वालों का विवेक प्रकाशमय होता है और वह प्रकाश के ऊपर प्रकाश की भांति हैं। लेकिन अगर ईश्वर ने किसी के लिए कोई प्रकाश नहीं रखा है तो उसे कोई प्रकाश नसीब नहीं होगा।

मोमिनों को हमेशा ईश्वरीय मार्गदर्शन का प्रकाश प्राप्त होता रहता है और वे एक के बाद दूसरे प्रकाश से लाभान्वित होते हैं। लेकिन काफ़िर एक के बाद दूसरे अँधेरे में डूबते चले जाते हैं।

जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) और मुसलमान मदीने की ओर पलायन कर गए तो मदीने के निवासियों ने कि जिन्हें अंसार कहा जाता था, उनका दिल खोलकर स्वागत किया। इस बीच अरबों की अधिकांश संख्या उनके विरोध में खड़ी हो गई। मुसलमानों का विरोध और उनके ख़िलाफ़ हिंसा इतनी अधिक थी कि वे हमेशा अपने पास हथियार रखते थे। रात में हथियार लेकर सोते थे और सुबह होने पर भी अपने पास हथियार रखते थे और हमेशा सतर्क रहते थे। मुसलमान इस परिस्थिति से आजिज़ आ गए। कुछ लोग खुलकर कहने लगे कि यह स्थिति कब तक जारी रहेगी? क्या कभी कोई ऐसा वक़्त आएगा कि हम निश्चिंत होकर रात को सो सकेंगे और सुकून की सांस ले सकेंगे। इस स्थिति में सूरए नूर की 55वीं आयत नाज़िल हुई। इस आयत ने उन्हें शुभ सूचना दी कि हां ऐसा समय निश्चित रूप से आएगा।

ईश्वर तुम में से उन लोगों से जो ईमान लाए हैं और अच्छे काम अंजाम देते हैं वादा करता है कि वह उन्हें धरती पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करेगा, जिस तरह उनके पूर्वजों को उत्तराधिकारी बनाया था।

जो लोग अच्छे कार्य अंजाम देते हैं, ईश्वर उनसे वादा करता है कि वह इस दुनिया में न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करेगा। समाज को हर प्रकार के अन्याय और अत्याचार से पाक कर देगा और शांति की स्थापना करेगा। यह वह वादा है कि जो पूर्वजों के साथ किया गया था और उसे पूरा किया गया।

इस्लामी ग्रंथों और पवित्र कथनों के अनुसार, इस आयत में बाहरवें इमाम (अ) के प्रकट होने और पूरे संसार में शासन की स्थापना करने की ओर संकेत किया गया है।

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