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प्रधान न्यायाधीश शरद बोबडे, भीमराव आंबेडकर ने संस्कृत को देश की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था!

प्रधान न्यायाधीश शरद बोबडे ने कहा है कि भीमराव आंबेडकर ने संस्कृत को देश की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया था। दरअसल वह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे को अच्छी तरह समझते थे और यह भी जानते थे कि लोग क्या चाहते हैं।

चीफ जस्टिस ने यहां महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में अपने संबोधन में कहा कि प्राचीन भारतीय ग्रंथ न्यायशास्त्र अरस्तू और फारसी तर्कशास्त्र से जरा भी कमतर नहीं है। और हमें अपने पूर्वजों की प्रतिभाओं को छोड़ने या उनसे लाभान्वित नहीं होने का कोई कारण नहीं है। इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सहित अन्य लोग वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये शरीक हुए।

आंबेडकर की 130वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए बोबडे ने कहा, आज सुबह मैं उधेड़बुन में था कि मुझे किस भाषा में अपना भाषण देना चाहिए। आंबेडकर की जयंती पर मुझे भाषा के पुराने जद्दोजहद से गुजरना पड़ रहा है कि किस भाषा में मैं भाषण दूं और किस में कामकाज करूं।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी कई याचिकाएं हैं कि मातहत अदालतों की भाषा क्या होनी चाहिए। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। डॉ आंबेडर ने इस पहलू को बहुत पहले ही भांप लिया था और इसलिए उन्होंने भारत की आधिकारिक भाषा संस्कृत को बनाने का प्रस्ताव रखा था।

उन्होंने कहा कि यह आंबेडकर के विचार थे कि हो सकता है तमिल उत्तर भारत में स्वीकार्य न हो। उसी तरह हिंदी दक्षिण भारत में स्वीकार्य न हो, लेकिन संस्कृत के उत्तर और दक्षिण में विरोध की कोई संभावना नहीं थी, इसलिए उन्होंने यह प्रस्ताव दिया था।

दलित समाज की उपेक्षा पर कांग्रेस ने सरकार को घेरा
डा. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर कांग्रेस ने उन्हें याद करते हुए केंद्र सरकार पर हमला बोला। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार आंबेडकर के सपनों पर कुठाराघात कर रही है।

भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। राज्यसभा सांसद मल्लिकार्जुन खरगे, महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला, महिला कांग्रेस अध्यक्ष सुष्मिता देव आदि ने दलित समाज के अधिकारों और सुविधाओं में की गई कटौती पर सवाल उठाए।

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