इतिहास

भारत का इतिहास : पूर्व मध्यकालीन भारत – 240 ई.पू– 800 ई : गुप्त साम्राज्य-280–550 ई : पार्ट 26

गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी सदी के अन्त में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। गुप्त कुषाणों के सामन्त थे। इस वंश का आरंभिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में था। लगता है कि गुप्त शासकों के लिए बिहार की उपेक्षा उत्तर प्रदेश अधिक महत्त्व वाला प्रान्त था, क्योंकि आरम्भिक अभिलेख मुख्यतः इसी राज्य में पाए गए हैं। यही से गुप्त शासक कार्य संचालन करते रहे। और अनेक दिशाओं में बढ़ते गए। गुप्त शासकों ने अपना अधिपत्य अनुगंगा (मध्य गंगा मैदान), प्रयाग (इलाहाबाद), साकेत (आधुनिक अयोध्या) और मगध पर स्थापित किया।

गुप्तों की उत्पत्ति

गुप्त राजवंशों का इतिहास साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों प्रमाणों से प्राप्त है। इसके अतिरिक्त विदेशी यात्रियों के विवरण से भी गुप्त राजवंशों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

साहित्यिक साधनों में पुराण सर्वप्रथम है जिसमें मत्स्य पुराण, वायु पुराण, तथा विष्णु पुराण द्वारा प्रारम्भिक शासकों के बारे में जानकारी मिलती है।
बौद्ध ग्रंथों में ‘आर्य मंजूश्रीमूलकल्प’ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त ‘वसुबन्धु चरित’ तथा ‘चन्द्रगर्भ परिपृच्छ’ से गुप्त वंशीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
जैन ग्रंथों में ‘हरिवंश’ और ‘कुवलयमाला’ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।

स्मृतियों में नारद, पराशर और बृहस्पति स्मृतियों से गुप्तकाल की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी मिलती है।

लौकिक साहित्य के अन्तर्गत विशाखदत्त कृत ‘देवीचन्द्रगुप्तम्’ (नाटक) से गुप्त नरेश रामगुप्त तथा चन्द्रगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है। अन्य साहित्यिक स्रोतों में – अभिज्ञान शाकुन्तलम्, रघुवंश महाकाव्य, मुद्राराक्षस, मृच्छकटिकम, हर्षचरित, वात्सायनन के कामसूत्र आदि से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था एवं नगर जीवन के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।

अभिलेखीय साक्ष्य के अन्तर्गत समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति लेख सर्वप्रमुख है, जिसमें समुद्रगुप्त के राज्यभिषेक उसके दिग्विजय तथा व्यक्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। अन्य अभिलेखों में चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि से प्राप्त गुहा लेख, कुमार गुप्त का विलसड़ स्तम्भ लेख स्कंद गुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख, जूनागढ़ अभिलेख महत्पूर्ण हैं।

विदेशी यात्रियों के विवरण में फ़ाह्यान जो चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। उसने मध्य देश के जनता का वर्णन किया है। 7वी. शताब्दी ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से भी गुप्त इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। उसने बुद्धगुप्त, कुमार गुप्त प्रथम, शकादित्य तथा बालदित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है। उसके विवरण से यह ज्ञात होता है कि कुमार गुप्त ने ही नालन्दा विहार की स्थापना की थी।

गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। इस संबंध में कुछ विचारक इसे शूद्र अथवा निम्नजाति से उत्पन्न मानते है जबकि कुछ का मानना है कि गुप्तों की उत्पत्ति ब्राह्मणों से हुई है। इस संबंध में विभिन्न् विचारकों के विचार निम्नलिखित हैं।

गुप्तों की उत्पत्ति जाति इतिहासकार
1- शूद्र तथा निम्न जाति से उत्पत्ति काशी प्रसाद जायसवाल
2- वैश्य एलन, एस.के. आयंगर, अनन्द सदाशिव अल्टेकर, रोमिला थापर, रामशरण शर्मा
3- क्षत्रिय सुधारक चट्टोपाध्याय, आर.सी.मजूमदार, गौरी शंकर हीरा चन्द्र ओझा
4- ब्राह्मण डॉ राय चौधरी, डॉ रामगोपाल गोयल आदि

गुप्तकालीन प्रशासन

गुप्त सम्राटों के समय में गणतंत्रीय राजव्यवस्था का ह्मस हुआ। गुप्त प्रशासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर आधारित था। देवत्व का सिद्वान्त गुप्तकालीन शासकों में प्रचलित था। राजपद वंशानुगत सिद्धान्त पर आधारित था। राजा अपने बड़े पुत्र को युवराज घोषित करता था। उसने उत्कर्ष के समय में गुप्त साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंघ्यपर्वत तक एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैला हुआ था।

राजस्व के स्रोत

गुप्तकाल में राजकीय आय के प्रमुख स्रोत ‘कर’ थे, जो निम्नलिखित हैं-

भाग- राजा को भूमि के उत्पादन से प्राप्त होने वाला छठां हिस्सा।
भोग- सम्भवतः राजा को हर दिन फल-फूल एवं सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर।
प्रणयकर- गुप्तकाल में ग्रामवासियों पर लगाया गया अनिवार्य या स्वेच्छा चन्दा था। भूमिकर भोग का उल्लेख मनुस्मृति में हुआ है। इसी प्रकार भेंट नामक कर का उल्लेख हर्षचरित में आया है।

व्यापार एवं वाणिज्य

गुप्त काल में व्यापार एवं वाणिज्य अपने उत्कर्ष पर था। उज्जैन, भड़ौच, प्रतिष्ष्ठान, विदिशा, प्रयाग, पाटलिपुत्र, वैशाली, ताम्रलिपि, मथुरा, अहिच्छत्र, कौशाम्बी आदि महत्त्वपूर्ण व्यापारिक नगर है। इन सब में उज्जैन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल था क्योंकि देश के हर कोने से मार्ग उज्जैन की ओर आते थे। स्वर्ण मुदाओं की अधिकता के कारण ही संभवतः गुप्तकालीन व्यापार विकास कर सका।

सामाजिक स्थिति

गुप्तकालीन भारतीय समाज परंपरागत 4 जातियों –

– ब्राह्मण
– क्षत्रिय
– वैश्य एवं
– शूद्र में विभाजित था।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में तथा वराहमिहिर ने वृहतसंहिता में चारों वर्णो के लिए अलग अलग बस्तियों का विधान किया है।
न्याय संहिताओं में यह उल्लेख मिलता है कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रीय की परीक्षा अग्नि से, वैश्य की परीक्षा जल से तथा शूद्र की विषय से की जानी चाहिए।

धार्मिक स्थिति

गुप्त साम्राज्य को ब्राह्मण धर्म व हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान का समय माना जाता है। हिन्दू धर्म विकास यात्रा के इस चरण में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए जैसे मूर्तिपूजा हिन्दू धर्म का सामान्य लक्षण बन गई। यज्ञ का स्थान उपासना ने ले लिया एवं गुप्त काल में ही वैष्णव एवं शैव धर्म के मध्य समन्वय स्थापित हुआ। ईश्वर भक्ति को महत्त्व दिया गया। तत्कालीन महत्त्वपूर्ण सम्प्रदाय के रूप में वैष्णव एवं शैव सम्प्रदाय प्रचलन में थे।

कला और स्थापत्य

गुप्त काल में कला की विविध विधाओं जैसे वस्तं स्थापत्य, चित्रकला, मृदभांड कला आदि में अभूतपूर्ण प्रगति देखने को मिलती है। गुप्त कालीन स्थापत्य कला के सर्वोच्च उदाहरण तत्कालीन मंदिर थे। मंदिर निर्माण कला का जन्म यही से हुआ। इस समय के मंदिर एक ऊँचे चबूतरें पर निर्मित किए जाते थे। चबूतरे पर चढ़ने के लिए चारों ओर से सीढ़ियों का निर्माण किया जाता था। देवता की मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया था और गर्भगृह के चारों ओर ऊपर से आच्छादित प्रदक्षिणा मार्ग का निर्माण किया जाता था। गुप्तकालीन मंदिरों पर पाश्वों पर गंगा, यमुना, शंख व पद्म की आकृतियां बनी होती थी। गुप्तकालीन मंदिरों की छतें प्रायः सपाट बनाई जाती थी पर शिखर युक्त मंदिरों के निर्माण के भी अवशेष मिले हैं। गुप्तकालीन मंदिर छोटी-छोटी ईटों एवं पत्थरों से बनाये जाते थे। ‘भीतरगांव का मंदिर‘ ईटों से ही निर्मित है।

गुप्तकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है। बार्नेट के अनुसार प्राचीन भारत के इतिहास में गुप्त काल का वह महत्त्व है जो यूनान के इतिहास में पेरिक्लीयन युग का है। स्मिथ ने गुप्त काल की तुलना ब्रिटिश इतिहास के एजिलाबेथन तथा स्टुअर्ट के कालों से की है। गुप्त काल को श्रेष्ठ कवियों का काल माना जाता है।

गुप्त काल स्वर्ण काल के रूप में

गुप्त काल को स्वर्ण युग (Golden Age), क्लासिकल युग (Classical Age) एवं पैरीक्लीन युग (Periclean Age) कहा जाता है। अपनी जिन विशेषताओं के कारण गुप्तकाल को ‘स्वर्णकाल‘ कहा जाता है, वे इस प्रकार हैं- साहित्य, विज्ञान, एवं कला के उत्कर्ष का काल, भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार का काल, धार्मिक सहिष्णुता एवं आर्थिक समृद्धि का काल, श्रेष्ठ शासन व्यवस्था एवं महान्सम्राटों के उदय का काल एवं राजनीतिक एकता का काल, इन समस्त विशेषताओं के साथ ही हम गुप्त को स्वर्णकाल, क्लासिकल युग एवं पैरीक्लीन युग कहते हैं। कुछ विद्वानों जैसे आर.एस.शर्मा, डी.डी. कौशम्बी एवं डॉ. रोमिला थापर गुप्त के ‘स्वर्ण युग‘ की संकल्पना को निराधार सिद्ध करते हैं क्योंकि उनके अनुसार यह काल सामन्तवाद की उन्नति, नगरों के पतन, व्यापार एवं वाणिज्य के पतन तथा आर्थिक अवनति का काल था।

गुप्त साम्राज्य का इतिहास

 

श्रीगुप्त ने गुप्त राजवंश के संस्थापक रूप में इस वंश को आगे बड़ाया और इस वंश में कई महान शासक हुए। सबसे पहले Gupta Empire में श्रीगुप्त का पुत्र घटोत्कचगुप्त राजा बना। उसके बाद घटोत्कच गुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम राजा बने। और, चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उनके पुत्र समुद्रगुप्त राजा बने। समुद्रगुप्त के प्रश्चात उनके पुत्र रामगुप्त राजा बने। रामगुप्त के बाद उनके छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय राजा बने। और, इनकी शासनकाल को स्वर्णयुग भी कहा गया है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त प्रथम राजा बने। कुमारगुप्त प्रथम के बाद उनके पुत्र स्कन्दगुप्त इस वंश के राजा बने थे।

स्कंदगुप्त की मृत्य के प्रश्चात पुरुगुप्त राजा बना। पुरुगुप्त, कुमारगुप्त का पुत्र था और स्कन्दगुप्त का सौतेला भाई था। पुरुगुप्त के तीन पुत्र थे कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त और नरसिंहगुप्त बालादित्य। और, पुरुगुप्त के बाद उनका उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय राजा बने। कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त ने गुप्त साम्राज्य पर शासन किया। उसके बाद नरसिंहगुप्त बालादित्य इस गुप्त साम्राज्य के आखरी शक्तिशाली राजा थे। नरसिंहगुप्त के प्रश्चात उनके पुत्र कुमारगुप्त तृतीय राजा बना। कुमारगुप्त तृतीय के प्रश्चात उनके पुत्र दामोदरगुप्त ने शासन किया। और, आखिर में महासेनगुप्त इस साम्राज्य में शसन किया था। लेकिन तबतक गुप्त राजवंश कमजोर हो गया था। और, लम्बी अवधि के बाद Gupta Empire का पतन हो गया था। इसके साथ गुप्त काल में कई महान कवि और विद्वान् हुए थे। तथा, संस्कृति और साहित्य का भी अच्छा प्रसार हुआ था।

The Gupta Empire in Ancient India

Gupta Empire की नींव तीसरी तथा चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ था।
मौर्याकाल की तीसरी शताब्दी ईस्वी में तीन राजवंशो का उदय हुआ था।
जिनमे मध्य भारत में नाग शक्ति, दक्षिण भारत में वाकाटक शक्ति तथा पूर्वी भारत में गुप्त वंश की शक्ति प्रमुख थे।
मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को जाता है।
गुप्त राजवंश प्राचीन भारत के सभी राजवंशों में से प्रमुख एक राजवंश था।
तथा, इस गुप्त वंश का प्राचीन शुरुवाती राज्य आधुनिक भारत के उत्तर प्रदेश तथा बिहार है।

गुप्त साम्राज्य के प्रारंभिक शुरूवात 280 ईशा के आसपास थी।
लेकिन, इस साम्राज्य के पूर्ण शासन काल 319 ईसा से 540 ईसा तक थी।

Gupta Empire में संस्थापक के रूप में श्रीगुप्त को जाना जाता है।
हालांकि पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त को ‘आदिराज’ कहकर सम्बोधित किया गया है।
यानि श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक था।
क्यों की उस समयकाल में महाराजा की उपाधि ‘सामन्तों’ को प्रदान की जाती थी,
इसीलिए श्रीगुप्त भारशिवों शासक के अधीन प्रयाग राज्य का शासक था।
श्रीगुप्त के वाद इस राजवंश में श्रीगुप्त का पुत्र घटोत्कच गुप्त प्रथम राजा बना।
280 ईसा के आसपास गुप्त साम्राज्य में पहले राजा हुये।
इस साम्राज्य में शासक घटोत्कच का राज्य मगध के आस-पास तक ही सीमित था।
और, लगभग 467 ईसा तक यह साम्राज्य का राज था।
और, प्रारम्भिक गुप्त राजाओं का साम्राज्य गंगा द्रोणी, प्रयाग, साकेत (अयोध्या) तथा मगध तक फैला फैला हुआ था।

King Chandragupta I

Gupta Empire में घटोत्कच गुप्त के बाद उनके पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम राजा बने थे।
इस साम्राज्य के चन्द्रगुप्त प्रथम स्वतन्त्र मगध शासक था।
चन्द्रगुप्त प्रथम का शासन काल 320 ईसा से 334 ईसा के आसपास थी।
और, उन्होंने मगध साम्राज्य को विस्तृत करने के लिए लिच्छवि राज्य से भी संबंध जोड़े थे,
लिच्छवि के राजकुमारी कुमारदेवी के साथ चन्द्रगुप्त प्रथम का विवाह हुआ था।
जिसके फलस्वरूप, मगध लिच्छवि राज्य के क्षेत्र में समाहित हो गया।
और, इस सम्बन्ध को स्थापित करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्य मगध को राजनैतिक दृष्टि से सुदृढ़ तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्धशाली बना दिया था।
तथा, चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशाम्बी और कौशल जैसे राज्यों के महाराजाओं को भी जीत लिया था।
और, अपने राज्य में समाहित करने के साथ साथ साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित कर दी थी।
चन्द्रगुप्त प्रथम ने ‘महाराजा धिराज’ की उपाधि प्राप्त की थी।
और, चन्द्रगुप्त प्रथम के शासनकाल में ही उन्होंने अपने विवाह की स्मृति में कुमार देवी तथा उनके चित्र के सिक्के भी चलाए थे।

Gupta Empire king Samudragupta

Gupta Empire में चंद्रगुप्त प्रथम के प्रश्चात उनके पुत्र समुद्रगुप्त इस राजवंश का राजा बने थे।
समुद्रगुप्त कुमारदेवी तथा चंद्रगुप्त प्रथम का पुत्र था।
और, समुद्रगुप्त 335 ईसा से 380 ईसा पूर्व तक अपने राजगद्दी पर शासन किया था।
इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी।
समुद्रगुप्त प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त राजवंश का असाधारण सैनिक योग्यता वाला एक महानतम शासक था।
और, हरिषेण जेसे विद्बान इनके साम्राज्य के मन्त्री तथा दरबारी कवि थे ।
इसके साथ वे समुद्रगुप्त की राजसभा के एक महत्वपूर्ण सभासद भी थे।
और, इन्होने प्रसिद्ध कृति ‘प्रयाग प्रशस्ति’ में समुद्रगुप्त की वीरता का वर्णन किया है।
समुद्रगुप्त को नेपोलियन की भी उपाधि दी गई थी।
समुद्रगुप्त का महत्वपूर्ण अभियान दक्षिण की तरफ़ था।
और, उन्होंने दक्षिण में बारह विजयों किये थे।
और, समुद्रगुप्त एक अच्छे शासक होने के साथ साथ वे एक संगीतज्ञ, कवि और कला के जानकर भी थे।
तथा, गुप्त साम्राज्य में समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक विस्तार और प्रसिद्ध सांस्कृतिक दृष्टि कोण के कारण इसे प्रतिष्ठा काल भी माना गया है।
इसके साथ समुद्रगुप्त ने लिच्छवियों के दूसरे राज्य नेपाल को भी अपने राज्य में मिला लिया था।
समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जो की उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक था।
तथा, पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था।
लेकिन, सिन्ध, गुजरात, कश्मीर और पश्चिमी राजस्थान को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इस साम्राज्य में सम्मिलित था।
तथा, दक्षिण के शासक तथा पश्चिम भारत की विदेशी शक्तियाँ भी इनकी अधीनता को स्वीकार करती थीं।
और, समुद्रगुप्त ने भी ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि को धारण की थी।
इस साम्राज्य में समुद्रगुप्त ने सर्बप्रथम अश्वमेध यज्ञ भी कराये थे।

Gupta King Ramagupta

380 ईसा में समुद्रगुप्त का देहान्त के प्रश्चात, उनके पुत्र रामगुप्त Gupta Empire के राजा बने।
और, रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय थे।
लेकिन, रामगुप्त एक कायर राजा था।
जिसके चलते वे शकों द्वारा पराजित होने वाद एक अपमान जनक सन्धि कर अपने पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शकराजा के पास भेंट कर दिया था ।
इसी के कारण रामगुप्त निन्दनीय के पात्र हो गया था।
लेकिन, रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय बड़ा ही पराक्रमी तथा स्वाभिमानी था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ध्रुवस्वामिनी को उद्धार किया।
और, अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या कर 375 इसा में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने राजगद्दी पर आसीन हुये ,
तथा, ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर उन्हें अपना पत्नी बना लिया,
और, सुचारु रूप से शासन करने लगे थे।

Gupta Empire king Chandragupta II Vikramaditya (Golden Age)

चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त साम्राज्य की शासक बनने के वाद ,
उन्होंने वसुबन्धु को अपने दरबारी मन्त्री के रूप में नियुक्त किया था।
वसुबन्धु जो की प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान थे।
तथा, शकों के ऊपर भी चन्द्रगुप्त द्वितीय ने बिजय हासिल की थी।
जिसके कारण इनकी साम्राज्य की शक्ति और बड़ गई थी।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजवंश के साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित की थी।
उन्होंने, नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया था।
और, राजकुमारी कुबेर नागा ने एक कन्या को जन्म दिया था।
इस कन्या की नाम प्रभावती गुप्त थी।
तथा, चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने साम्राज्य का और बिस्तार करने के लिए वाकाटकों राजवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध भी जोड़े थे।
उन्होंने अपने पुत्री प्रभावती गुप्त की विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया था।
और, वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्‍ति से शकों का उन्मूलन कर दिया किया था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय अपने साम्राज्य की परिपक्क शासक होने के साथ साथ वे उच्चकोटि का विद्वान तथा विद्या का उदार संरक्षक भी था।
और, वे एक महान संगीतज्ञ भी थे, जिसे वीणा वादन का शौक था।
तथा, उन्हें कविराज भी कहा गया है।
और, अशीम पराक्रमी के कारण वे विक्रमादित्य के नाम से भी संसार में प्रसिद्ध हुये थे।
तथा, चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है।

The winning sequence of Chandragupta II

शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने साम्राज्य को केवल मजबूत नही किया,
बल्कि उसका पश्चिमी समुद्र पत्तनों पर भी अधिपत्य स्थापित कर दिया था।
और, इस विजय के पश्चात चन्द्रगुप्त द्वितीय ने आपने Gupta Empire की राजधानी को उज्जैन में स्थापित कर दिया था।
इनका साम्राज्य पश्‍चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तापघटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।
तथा, उनके शासनकाल में ही चीनी बौद्ध यात्री फाहियान भारत आये थे।
फाहियान ने 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत की यात्रा की थी।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सबसे पहले शकों द्वारा परेशानी करने वाली गुजरात के काठियावाड़ तथा पश्‍चिमी मालवा को 389 ईसा से 412 ईसा के मध्य में आक्रमण कर विजित किया था।
उसके वाद, चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सिन्धु के पाँच मुखों को पार कर वाहिकों पर विजय प्राप्त की थी।
तथा, वाहिकों का समतुल्य कुषाणों के समरूप पाया गया है।
उसके प्रश्चात, उन्होंने बंगाल के शासकों के संघ के ऊपर विजय प्राप्त किया था।
महाशैली स्तम्भ लेख के अनुसार यह सभी के ऊपर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विजय पाई थी।
और, अपने साम्राज्य में विलीन कर विस्तृत कर दिया था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय की शासनकाल में ही उन्होंने अपने दरबार में विद्वानों तथा कलाकारों को आश्रय प्रदान किया था।
उनके दरबार में विशाखदत्त, शूद्रक, ब्रम्हगुप्त, विष्णुशर्मा, भास्कराचार्य, अमरसिंह, शंकु, वाराहमिहिर, आर्यभट्ट, विशाखदत्त, धन्वन्तरि और कालिदास जैसे नौ रत्न थे।
जो इस दरबार के गौरव थे।
और, 414 ईसा में चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु हो गई थी।

Gupta EmpireGupta Empire-Gupta Empire king Kumaragupta I

चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद 415 ईसा में उनके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम ने Gupta Empire की राजगद्दी संभाली थी।
वह चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्नी ध्रुवदेवी की सबसे बड़ा पुत्र था।
तथा, गोविन्दगुप्त उनका छोटा भाई था।
और, वे वैशाली का राज्यपाल था।
इसके साथ कुमारगुप्त प्रथम ने अपने शासनकाल में भी समुद्रगुप्त की समरूप दक्षिण भारत में विजय अभियान चलाया था।
और, कुमारगुप्त ने भी समुद्रगुप्त की तरह अश्‍वमेध यज्ञ कराये थे,
तथा, समुद्रगुप्त की तरह कुमारगुप्त प्रथम ने भी सिक्के चलाये थे।
और, मिलरक्द अभिलेख से मालूम परता हे की,
कुमारगुप्त प्रथम का शासनकाल सुव्यवस्था तथा शान्ति का शासनकाल था।
उन्होंने अपने साम्राज्य को संयोजित और सुखद बनाये रखा था।
कुमारगुप्त प्रथम ने भी समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त प्रथम तथा द्वितीय की तरह कई उपाधियाँ धारण कीं थी।
श्री महेन्द्र सिंह, महेन्द्र कुमार, महेन्द्रा दिव्य और श्री महेन्द्र जैसे उपाधियाँ उनके अधिकार में था।
कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में ही नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई थी।
और, 455 ईसा में कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु हो गई थी।
कुमारगुप्त ने चालीस वर्षों तक अपने साम्राज्य पर शासन किया था।
इसके इलावा, कुमारगुप्त प्रथम स्वयं एक वैष्णव धर्मानुयायी था।
और, उन्होंने धर्म सहिष्णुता नीति का भी पालन किया था।

Gupta Empire king Skandagupta

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के समय ही पुष्यमित्र ने Gupta Empire पर आक्रमण किया था।
पुष्यमित्र उत्तर भारत के एक महान राजा थे।
और, वे शुंग साम्राज्य के संस्थापक भी थे।
लेकिन, कुमारगुप्त प्रथम की पुत्र स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्र को युद्ध में परास्त कर दिया था।
और, 455 ईसा में गुप्त साम्राज्य के राजा के रूप में सिंहासन पर बैठा था।
उन्होंने, बारह वर्ष तक साम्राज्य में शासन किया था।
तथा, विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि उपाधियाँ भी धारण कीं थी।
स्कन्दगुप्त के शासनकाल में ही उन्हें कई प्रकार के कठिनाइओ और परेशानीओ का सामना करना पड़ा था।
जैसे, उनके शासन काल में भारी वर्षा के कारण मौर्यकाल में बनी सुदर्शन झील का बाँध टूट गया था।
जिसके चलते दो माह के भीतर स्कन्दगुप्त ने अपने प्रचुर धन को व्यय करके पत्थरों की जड़ाई द्वारा उस झील के बाँध को पुनर्निर्माण करवा दिया था।
लेकिन, सबसे अधिक परेशानी स्कन्दगुप्त को हूणों कबीले की लोगो ने किया था।
हूण एक लुटेरी और जंगली जाति थी,
और, जिनका मूल स्थान वोल्गा के पूर्व में था।
वोल्गा यूरोप की एक नदी है।
और, इन्ही हूणों की एक शाखा ने हिंदुकुश पर्वत को पार करके फ़ारस तथा भारत की ओर रुख किया था।
तथा, हूणों ने सबसे पहले गांधार पर कब्जा कर लिया और फिर गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) पर आक्रमण कर दिया था।
लेकिन, स्कंदगुप्त ने इसी हूणों की आक्रमण पर इस जंगली जाति को करारी शिकस्त दी थी।
जिसके चलते अगले 50 वर्षों तक हूणों ने भारत की तरह रुख नहीं किया।
और, इसी गुप्त राजवंश में स्कन्दगुप्त आखिरी शक्तिशाली सम्राट थे।
इसके इलावा स्कन्दगुप्त एक उदार शासक भी था,
जिन्हे, प्रजा के सुख-दुःख प्रति निरन्तर चिन्ता रहती थी।
और, उनकी मृत्यु 467 ईसा में हुई थी।

Decline Gupta Empire

स्कंदगुप्त की मृत्य के प्रश्चात पुरुगुप्त गुप्त राजसिंहासन पर बैठा था।
लेकिन बृद्ध होने के कारण वे सुचारु रूप से अपने शासन को चला नही पाये थे।
पुरुगुप्त कुमारगुप्त का पुत्र था।
और, स्कन्दगुप्त का सौतेला भाई था।
तथा, कुमारगुप्त द्वितीय, बुधगुप्त और नरसिंहगुप्त बालादित्य पुरुगुप्त के पुत्र थे।
पुरुगुप्त के वाद 445 ईसा में कुमारगुप्त द्वितीय ने Gupta Empire पर शासन किया था।
तथा, कुमारगुप्त द्वितीय के प्रश्चात बुधगुप्त ने 475 ईसा से 495 ईसा तक गुप्त राजवंश पर शासन वनाये रखे थे।
बुधगुप्त के प्रश्चात उनका छोटा भाई नरसिंहगुप्त बालादित्य ने शासन किया था।
पुरुगुप्त के सभी पुत्र में से नरसिंहगुप्त बालादित्य सबसे शक्तिशाली तथा पराक्रमी था।
और, इन्होने जंगली कविले हूणों के निष्ठुर राजा मिहिरकुल को भी पराजित कर दिया था।
नालन्दा मुद्रा लेख में नरसिंहगुप्त को परम भागवत के रूप भी कहा गया है।
नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के राजा बना था।
इसके प्रश्चात कुमरगुप्त तृतीय के मृत्यु के बाद उसका पुत्र दामोदरगुप्त ने शसन किया था।
और, दामोदरगुप्त के बाद उनका पुत्र महासेनगुप्त शासक बना था।
उन्होंने असम नरेश सुस्थित वर्मन को भी पराजित किया था।
तथा, महासेनगुप्त के निधन के बाद उनके पुत्र देवगुप्त और उसके प्रश्चात माधवगुप्त इस गुप्त साम्राज्य के शासक थे।
लगभग 200 – 260 वर्षों के आसपास गुप्त साम्राज्य ने शासन किया था।
और, फिर इस साम्राज्य की नीव कमजोर हो गई थी।
जिसके कारण, 540 ईसा के आसपास गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया था।

Administration of the Gupta Empire

गुप्त प्रशासन अत्यधिक विकेन्द्रीकृत था,
वंशानुगत अनुदानों में यह अर्थव्यवस्था के अर्ध – सामंती चरित्र को दर्शाता है।
इसमें स्वयं शासित जनजातियों और जनजातियों के राज्यों का एक संघ शामिल था।
जो गुप्त के प्रमुख अक्सर शाही शक्तियों के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करते थे।
इस प्रशासन में राजाओं को मंत्रिपरिषद के एक मंत्री द्वारा सहायता प्रदान की जाती थी।
इस तरह की एक परिषद का अस्तित्व प्रयाग स्तंभ शिलालेख में निहित है,
जो सिंहासन के लिए समुद्रगुप्त के चयन पर ‘सभा’ सदस्यों की प्रसन्नता की बात करता है।
गुप्त राजाओं ने महादृज, सम्राट, एकधिराज, चक्रवर्तिन जैसे अतिरंजित उपाधियाँ लीं थी,
जो उनके बड़े साम्राज्य और साम्राज्यवादी स्थिति को दर्शाते थे।
तथा, राजकुमार को नियुक्त करने की प्रथा प्रचलन थी।
और, कुमारमात्य ने गुप्तों के अधीन उच्च अधिकारियों की भर्ती के लिए मुख्य कैडर का गठन भी किया था।
जिसमे मंत्री, सेनापति, न्याय के महादंदनायका मंत्री नियुक्त होके आते थे,
इसके साथ शांति और युद्ध के संधिविग्रह मंत्री भी थे,
जिन्हें आनुवंशिक रूप से चुना जाता था।
संधिविग्रह का कार्यालय सबसे पहले समुद्रगुप्त के अधीन आता था।
जिसके लिए हरिषेण को उन्होंने इस पद के लिए नियुक्त किया था।
इसके इलावा अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी भी थे, जैसे शाही महल की महाप्रतिहार, प्रमुख, घुड़सवार सेना की प्रमुख महाशवपति, हाथी वाहिनी के प्रमुख,
तथा, नगर-रक्षक विभाग के मुख्य अधिकारी आदि ..

Gupta Empire Administrative Unit

गुप्त काल के प्रान्त को भुक्ति कहा जाता था।
जिनमे से कुछ महत्वपूर्ण भुक्ति थे, पूर्वी मालवा, पश्चिमी मालवा, मगध, बर्धमान, पुंड्रवर्धन, तेराभुक्ति उत्तरेन बिहार, सौराष्ट्र, बर्धमान और मगध।
और, शहर का प्रदर्शन के लिए एक परिषद था,
जिसे पौर कहा जाता था,
जिसमे, नगर निगम के अध्यक्ष, मुख्य लेखाकार, कारीगरों के एक प्रतिनिधि और व्यापारियों के श्रेणी के मुख्य प्रतिनिधि शामिल थे।
जबकि मौर्यों के तहत, शहर समिति को मौर्य सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था,
और, गुप्तों के तहत, इसमें स्थानीय प्रतिनिधि शामिल थे।
तथा, गुप्त काल के दौरान ही प्रशासनिक अधिकार का विघटन शुरू हुआ था।
और, इस गुप्त शासनकाल में ही ग्राम प्रधान पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गए थे।
इस गुप्त काल में पहली बार नागरिक और आपराधिक कानून को स्पष्ट रूप से परिभाषित और परिसीमित किया गया था।
तथा, गुप्त राजा मुख्यतः रूप से भूमि राजस्व पर निर्भर थे,
जो की 1/4 से 1/6 बिच में उत्पादन के ऊपर कर संचित करते थे।
और, गुप्त काल में सेना जब ग्रामीण इलाकों से गुजरते थे,
उहा के लोगों द्वारा सेना को खिलाया जाता था,
और,इस कर को सेनाभक्त कहा जाता था।
तथा, ग्रामीणों को भी शाही सेना और अधिकारियों की सेवा के लिए वशिष्ठ नामक श्रम के अधीन किया गया था।
गुप्त काल में भूमि से जुड़ी अग्रहरा और देवघर जैसे अनुदान शामिल था।
और, भूमि अनुदान में नमक और खानों पर शाही अधिकारों का एकाधिपत्य हस्तांतरण था।

The economy of the Gupta Empire

गुप्त शासनकाल में अर्थव्यवस्था भूमि के अंतर्गत था।
गुप्त काल में भूमि को पांच समूहों में वर्गीकृत किया गया था।
जैसे की क्षत्रभूमि कृषि योग्य भूमि में वर्गीकृत था।
तथा, खिला को बंजर भूमि में भाग किया गया था।
और, वास्तु भूमि को रहने योग्य भूमि तथा चरगाह भूमि को चरागाह भूमि में वर्गीकृत किया गया था।
इसके साथ अपराजत भूमि को वन भूमि में भाग किया गया था।
और, पुष्पाला नामक एक अधिकारी ने जिले में सभी भूमि के भूमि हस्तांतरण के अभिलेख (record) को बनाए रखा था।
तथा, गुप्तों ने स्थानीय विनिमय के लिए अच्छी संख्या में चांदी के सिक्के भी जारी किए थे।
और, लम्बी अवधि के व्यापार में गुप्त अवधि में गिरावट देखी गई थी।
क्यों की तीसरी शताब्दी ईस्वी के बाद रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार में गिरावट आई थी।
और, भारतीय व्यापारियों ने दक्षिण पूर्व एशियाई व्यापार पर अधिक भरोसा करना शुरू कर दिया था।
जिसके चलते व्यापार वेवस्ता की रफ़्तार धीमी हो गई थी।
और, गुप्तकाल में सभी प्रान्त पर व्यापार को संभालने के लिए कुछ विशेष थे।
जैसे पूर्वी तट के बंदरगाह को ताम्रलिप्ति और घंटशाला संभालते थे।
तथा, दक्षिण पूर्व एशिया के साथ उत्तर भारतीय व्यापार को कंदूरा संभालते थे।
और, पश्चिमी तट की भार भड़ौच, चुल तथा कल्याण के ऊपर थी।
तथा, कैम्बे ने भूमध्य और पश्चिम एशिया के साथ व्यापार किया था।

Culture of the Gupta Empire

गुप्त काल में वास्तुकला के प्रति विशेष जोर दिया गया था।
और, वास्तुकला को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था। जैसे,

देवगढ़ (झांसी जिला, यूपी), भूरा का शिव मंदिर (नागोद, एमपी), विष्णु और कंकाली मंदिर (तिगावा, एमपी), नचना कुथवा का पार्वती मंदिर (पन्ना जिला, एमपी), खोह का शिव मंदिर ( सतना, पन्ना, एमपी), भितरगाँव के कृष्ण ईंट मंदिर (कानपुर, उत्तर प्रदेश), सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर (लक्ष्मण, एमपी), तथा विष्णु मंदिर और वराह मंदिर (एमपी)

तथा, इस साम्राज्य ने वास्तुकला की महान ऊंचाइयों को प्राप्त किया था।
नागर शैली (शिखर शैली) को विकसित करके, गुप्त कला ने भारतीय वास्तुकला के इतिहास में प्रवेश किया था।
गुप्त काल में मंदिरो की वास्तुकला सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक थी।
और, मंदिर की वास्तुकला अपने गर्भगृह (श्रीनाथ कक्ष) के साथ जिसमें भगवान की प्रतिमा रखी गई थी, गुप्तकाल से शुरू हुई थी।
देवगढ़ के दशावतार मंदिर के अवशेष, सबसे अलंकृत और खूबसूरती से बना गुप्ता मंदिर भवन का उदाहरण है।
और, पहली बार हमें विष्णु, शिव और अन्य देवताओं के चित्र भी इस अवधि में मिलते हैं।
बुद्ध की सबसे अच्छे छवियों के नमूने में से सारनाथ का एक बैठा हुआ बुद्ध चित्र है,
जो बुद्ध को धम्म का उपदेश देता हुआ दर्शाता है।
तथा, ब्राह्मणवादी चित्रों में से शायद सबसे प्रभावशाली उदयगिरि में एक गुफा के द्वार पर राहत के रूप में उकेरा गया था।
इस काल की चित्र बाग (धार जिला, एमपी) और अजंता (औरंगाबाद जिला, महाराष्ट्र) में पाई जाती है।

The literature of the Gupta Empire

गुप्त काल की अवधि में कुछ पुरानी धार्मिक हिंदू ग्रंथ/पुस्तकें लिखी गईं थी।
जैसे मनु स्मृति, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, अर्थात वायु पुराण, रामायण और महाभारत,
और, कुछ बौद्ध पाठ थे विशुदिमाग (बौद्धघोष) तथा अभिधर्मा कोष (दिग्नागा)
और, जैन पाठ थे न्यवतारम (सिद्देना)
इसके साथ कुछ महर्तपूर्ण साहित्य भी थे,
जैसे धर्मनिरपेक्ष साहित्य में प्रमुख थे, कुमारसम् भावम्, रघुवंशम, मेघदूतम्, अभिज्ञान शाकुण तालम् (कालिदास), ऋतुसम्हर (प्रथम काव्य), मालविकाग्निमित्र (पहला नाटक), पंचतंत्र (विष्णु शर्मा), मुदर्रक्ष (विशाखदत्त), किरातार्जुनीय (भैरवी), विक्रमवृष्टि यम और कामसूत्र (वात्स्यायन)
और, कुछ वैज्ञानिक साहित्य थे, वृहत् संहिता, लगहु जातक (वाममहिरा), वृहत् जातक, अष्टांग हृदय चिकित्सा (वाग्भट्ट), आर्यभटीय, सूर्य सिद्धान्त (आर्यभट्ट), नवनिधिम (धन्वंतरि), ब्रह्मसिद्धांत (ब्रह्मगुप्त) तथा पंच सिद्धान्तक
और, इनमे से कुछ साहित्य को अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया था।
जैसे मनुस्मृति तथा अभिज्ञान शकुंतलम (यानी शकुंतला की मान्यता) का अनुवाद विलियम जोन्स द्वारा अंग्रेजी में किया गया था।
और, ‘अभिज्ञान शकुंतलम साहित्य को कालिदास द्वारा लिखा गया था।
इसके साथ कालिदास को भारत का शेक्सपियर भी कहा जाता है,
तथा, कामसूत्र के ऊपर सबसे शुरुआती किताब भी है।
और, वैज्ञानिक साहित्य ब्रह्मसिद्धांत का अनुवाद ‘सिंध-हिंद’ के तहत किया गया था।
तथा, शहर के जीवन के यथार्थवादी, गुणी दरबारी वसंतसेना की प्रेम कहानी, मृच्छकटिका (यानी मिट्टी की गाड़ी) और एक गरीब ब्राह्मण चारुदत्त जैसे कुछ चित्रण भी उल्लेखनीय है।

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Gupta Empire Society

Gupta Empire में समाज की वर्ण व्यवस्था को जातियों के प्रसार के कारण परिवर्तित किया गया था।
और, इस समाज में मुख्य रूप से तीन उपादान थे,
जैसे बड़ी संख्या में विदेशियों को भारतीय समाज में आत्मसात किया गया था।
तथा, उन्हें क्षत्रिय के रूप में जाना जाता था।
और, भूमि अनुदान के माध्यम से ब्राह्मणवादी समाज में आदिवासी लोगों का एक बड़ा अवशोषण हुआ था।
इसके साथ आरोपित जनजातियों को शूद्र वर्ण में समाहित कर लिया गया था।
तथा, व्यापार और शहरी केंद्रों की गिरावट और शिल्पों के स्थानीय चरित्र के परिणामस्वरूप शिल्पियों के समाज को अक्सर जातियों में बदल दिया जाता था।
और, इस अवधि में शूद्रों के सामाजिक पदों में सुधार के साथ साथ उन्हें महाकाव्यों और पुराणों को सुनने के भी अनुमति थी।
तथा, कृष्ण नामक देवता की पूजा भी शूद्रों द्वारा किया जाता था।
और, तीसरी शताब्दी के बाद से ही समाज में अस्पृश्यता का प्रचलन तेज हो गया था।
इस अवधि में महिलाओं की स्थिति भी खराब हो गई थी।
तथा, बहुविवाह प्रचलन सामान्य था।
और, महिलाओं के आभूषण और वस्त्रों के रूप में स्त्रीधन के अलावा किसी भी संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया गया था।
गुप्त शासक के संरक्षण में, वैष्णववाद बहुत लोकप्रिय था।
क्यों की देवताओं की संबंधित संघों के साथ उनकी एकता द्वारा लोकप्रियता मूर्ति को सक्रिय किया गया था।
जिससे विष्णु के साथ लक्ष्मी का जुड़ाव तथा पार्वती का शिव के साथ जुड़ाव हो गया था।
और, इसी गुप्त काल से ही मूर्ति पूजा हिंदू धर्म की एक सामान्य विशेषता बन गई थी।
तथा, इस अवधि में ही वज्रयानिज्म और बौद्ध तांत्रिक पंथों के विकास काल था।

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