इतिहास

भारत का इतिहास : प्राचीन भारत : शुंग वंश, 184–123 ई.पू व : मत्स्य पुराण – मनुस्मृति : पार्ट 18

मत्स्य पुराण

वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित ‘मत्स्य पुराण’ व्रत, पर्व, तीर्थ, दान, राजधर्म और वास्तु कला की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुराण है। इस पुराण की श्लोक संख्या चौदह हज़ार है। इसे दो सौ इक्यानवे अध्यायों में विभाजित किया गया है। इस पुराण के प्रथम अध्याय में ‘मत्स्यावतार’ के कथा है। उसी कथा के आधार पर इसका यह नाम पड़ा है। प्रारम्भ में प्रलय काल में पूर्व एक छोटी मछली मनु महाराज की अंजलि में आ जाती है। वे दया करके उसे अपने कमण्डल में डाल लेते हैं। किन्तु वह मछली शनै:-शनैष् अपना आकार बढ़ाती जाती है। सरोवर और नदी भी उसके लिए छोटी पड़ जाती है। तब मनु उसे सागर में छोड़ देते हैं और उससे पूछते हैं कि वह कौन है?

प्रलय काल

भगवान मत्स्य मनु को बताते हैं कि प्रलय काल में मेरे सींग में अपनी नौका को बांधकर सुरक्षित ले जाना और सृष्टि की रचना करना। वे भगवान के ‘मत्स्य अवतार’ को पहचान कर उनकी स्तुति करते हैं। मनु प्रलय काल में मत्स्य भगवान द्वारा अपनी सुरक्षा करते हैं। फिर ब्रह्मा द्वारा मानसी सृष्टि होती है। किन्तु अपनी उस सृष्टि का कोई परिणाम न देखकर दक्ष प्रजापति मैथुनी-सृष्टि से सृष्टि का विकास करते हैं।

वंश

इसके उपरान्त ‘मत्स्य पुराण’ में मन्वन्तर, सूर्य वंश, चंद्र वंश, यदु वंश, क्रोष्टु वंश, पुरू वंश, कुरु वंश और अग्नि वंश आदि का वर्णन है। फिर ऋषि-मुनियों के वंशों का उल्लेख किया गया है।

राजधर्म और राजनीति

इस पुराण में ‘राजधर्म’ और ‘राजनीति’ का अत्यन्त श्रेष्ठ वर्णन है। इस दृष्टि से ‘मत्स्य पुराण’ काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। प्राचीन काल में राजा का विशेष महत्त्व होता था। इसीलिए उसकी सुरक्षा का बहुत ध्यान रखना पड़ता था। क्योंकि राजा की सुरक्षा से ही राज्य की सुरक्षा और श्रीवृद्धि सम्भव हो पाती थी। इस दृष्टि से इस पुराण में बहुत व्यावहारिक ज्ञान दिया गया है। ‘मत्स्य पुराण’ कहता है कि राजा को अपनी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त शंकालु तथा सतर्क रहना चाहिए। बिना परीक्षण किए वह भोजन कदापि न करे। शय्या पर जाने से पूर्व अच्छी प्रकार से देख ले कि उसमें कोई विषधर आदि तो नहीं छोड़ा गया है। उसे कभी भीड़ या जलाशय में अकेले प्रवेश नहीं करना चाहिए। अनजान अश्व या हाथी पर नहीं चढ़ना चाहिए। किसी अनजान स्त्री से सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए।

दुर्ग

इस पुराण में छह प्रकार के दुर्गों- धनु दुर्ग, मही दुर्ग, नर दुर्ग, वार्क्ष दुर्ग, जल दुर्ग औ गिरि दुर्ग के निर्माण की बात कही गई है। आपातकाल के लिए उसमें सेना और प्रजा के लिए भरपूर खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र एवं औषधियों का संग्रह करके रखना चाहिए। उस काल में भी राज्य का जीवन आराम का नहीं होता था। राजा को हर समय काक दृष्टि से सतर्क रहना पड़ता था। इसीलिए उसे विश्वसनीय कर्मचारियों का चयन करना पड़ता था। उनसे मधुर व्यवहार बनाना पड़ता था।

तथा च मधुराभाषी भवेत्कोकिलवन्नृप:।

काकशंकी भवेन्नित्यमज्ञातवसतिं वसेत्॥ (मत्स्य पुराण 2/96/71)

अर्थात् राजा को कोयल के समान मधुर वचन बोलने वाला होना चाहिए। जो पुर या बस्ती अज्ञात है, उसमें उसे निवास करना चाहिए। उसे सदैव कौए के समान शंकायुक्त रहना चाहिए। भाव यही है कि राजा को एकाएक किसी पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए। उसे सदैव अपनी प्रजा का विश्वास और समर्थन प्राप्त करते रहना चाहिए। गुप्तचरों द्वारा राज्य की गतिविधियों का पता लगाते रहना चाहिए।

श्रीवृद्धि तथा समृद्धि

‘मत्स्य पुराण’ में पुरुषार्थ पर विशेष बल दिया गया है। जो व्यक्ति आलसी होता है और कर्म नहीं करता, वह भूखों मरता है। भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाला व्यक्ति कभी भी जीवन में सफल नहीं हो सकता। श्रीवृद्धि तथा समृद्धि उससे सदैव रूठी रहती है।

स्थापत्य कला

इस पुराण में ‘स्थापत्य कला’ का भी सुन्दर विवेचन किया गया है। इसमें उस काल के अठारह वास्तुशिल्पियों के नाम तक दिए गए हैं। जिनमें विश्वकर्मा और मय दानव का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें बताया गया है कि सबसे उत्तम गृह वह होता है, जिसमें चारों ओर दरवाज़े और दालान होते हैं। उसे ‘सर्वतोभद्र’ नाम दिया गया है। देवालय और राजनिवास के लिए ऐसा ही भवन प्रशस्त माना जाता है। इसी प्रकार ‘नन्द्यावर्त्त’, ‘वर्द्धमान’ , ‘स्वस्तिक’ तथा ‘रूचक’ नामक भवनों का उल्लेख भी किया गया है। राजा के निवास गृह पांच प्रकार के बताए गए हैं। सर्वोत्तम गृह की लम्बाई एक सौ साठ हाथ (54 गज) होती है।

प्राकृतिक शोभा

उस काल में आज की भांति नए घर में प्रवेश हेतु शुभ मुहूर्त्तो की गणना पर पूरा विचार किया जाता था। तभी लोक गृह प्रवेश करते थे। ‘मत्स्य पुराण’ में प्राकृतिक शोभा का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया गया है। हिमालय पर्वत, कैलाश पर्वत, नर्मदा एवं वाराणसी के शोभा-वर्णन में भाषा और भाव का अति सुन्दर संयोग हुआ है-

तपस्तिशरणं शैलं कामिनामतिदुर्लभम्।

मृगैर्यथानुचरितन्दन्ति भिन्नमहाद्रुमम्॥ (मत्स्य पुराण 1/51/12)

अर्थात् यह हिमालय पर्वत तपस्वियों की पूर्णतया रक्षा करने वाला है। यह काम-भावना रखने वालों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। यह हाथियों के समान महान् और विशाल वृक्षों से युक्त है। मृगों की भांति अनुचरित है अर्थात् जिस प्रकार मृगों के सौन्दर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता, उसकी प्रकार हिमालय की शोभा का भी वर्णन करना बड़ा कठिन है।

सावित्री सत्यवान

इस पुराण का सबसे महत्त्वपूर्ण आख्यान ‘सावित्री सत्यवान’ की कथा है। पतिव्रता स्त्रियों में सावित्री की गणना सर्वोपरि की जाती है। सावित्री अपनी लगन, दूरदृष्टि, बुद्धिमत्ता और पतिप्रेम के कारण अपने मृत पति को यमराज के पाश से भी छुड़ा लाने में सफल हो जाती है।

शकुन-अपशकुन

इसके अतिरिक्त ‘मत्स्य पुराण’ में देवी और विष्णु की उपासना, वाराणसी एवं नर्मदा नदी का माहात्म्य, मंगल-अमंगल सूचक शकुन, स्वप्न विचार, अंग फड़कने का सम्भावित फल; व्रत, तीर्थ और दान की महिमा आदि का वर्णन अनेकानेक लोकोपयोगी आख्यानों के माध्यम से किया गया है।

विराट रूप

‘नृसिंह अवतार’ की कथा, भक्त प्रह्लाद को विष्णु के विराट रूप का दर्शन तथा देवासुर संग्राम में दोनों ओर के वीरों का वर्णन पुराणकार की कल्पना का सुन्दर परिचय देता है। इस पुराण का काव्य तत्त्व भी अति सुन्दर है। वर्णन शैली अत्यन्त सहज है। अनेक स्थलों पर शब्द व्यंजना का सौन्दर्य देखते ही बनता है।

आयुर्वेद चिकित्सा

इस पुराण की एक विशेषता और भी है। पुराणकार को आयुर्वेद चिकित्सा का अच्छा ज्ञान प्राप्त था, ऐसा प्रतीत होता है। क्योंकि इसमें औषधियों और जड़ी-बूटियों की एक लम्बी सूची दी गई है। साथ ही साथ यह भी बताया गया है कि कौन-सी दवा किस व्याधि के काम आती है। इसका वर्णन विस्तार के साथ इस पुराण में किया गया है।

मूर्तियों के निर्माण

देवताओं की मूर्तियों के निर्माण की पूरी प्रकिया और उनके आकार-प्रकार का पूरा ब्योरा ‘मत्स्य पुराण’ में उपलब्ध होता है। प्रत्येक देवता की मूर्ति के अलग-अलग लक्षण बताए गए हैं। साथ ही उनके विशेष चिह्नों का विवरण भी दिया गया है। एक जगह तो यहाँ तक कहा गया है कि मूर्ति की कटि अठारह अंगुल से अधिक नहीं होनी चाहिए। स्त्री-मूर्ति की कटि बाईस अंगुल तथा दोनों स्तनों की माप बारह-बारह अंगुल होनी चाहिए। इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक भाग की माप बड़ी बारीकी से प्रस्तुत की गई है। इससे पुराणकार की सूक्ष्म परख और कलात्मक दृष्टि का पता चलता है। वस्तुत: कला, धर्म, राजनीति, दान-पुण्य, स्थापत्य, शिल्प और काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से यह एक उत्तम पुराण है।

स्वयंभुव मनु

मनु जो एक धर्मशास्त्रकार थे, धर्मग्रन्थों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है। ये ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से थे जिनका विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न शतरूपा से हुआ था। उत्तानपाद जिसके घर में ध्रुव पैदा हुआ था, इन्हीं का पुत्र था। मनु स्वायंभुव का ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत पृथ्वी का प्रथम क्षत्रिय माना जाता है। इनके द्वारा प्रणीत ‘स्वायंभुव शास्त्र’ के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्र और पुत्री का समान अधिकार है। इनको धर्मशास्त्र का और प्राचेतस मनु अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

परिचय

आपव नामक प्रजापति के धर्म से अयोनिज कन्या शतरूपा का जन्म हुआ। आपव (जो कि बाद में स्वायंभुव मनु कहलाये) ने प्रजा की रचना करने के उपरांत शतरूपा को अपनी पत्नी बना लिया। उसके पुत्र का नाम वीर हुआ। वीर ने प्रजापति कर्दम की कन्या काम्या से विवाह किया तथा दो पुत्रों को जन्म दिया- (1) प्रियव्रत तथा (2) उत्तानपाद। मनु की विस्तृत संतति में ही ध्रुव, वेन इत्यादि हुए। वेन से मनुगण बहुत रुष्ट थे क्योंकि वह अनाचारी था। मुनियों ने उसके दाहिने हाथ का मंथन किया, जिससे राजा पृथु का जन्म हुआ। वे राजसूय यज्ञ करने वाले राजाओं में सर्वप्रथम था। प्रजाओं को जीविका देने की इच्छा से उसने पृथ्वी से अन्न तथा दूध का दोहन आरंभ किया जा सके। साथ-साथ राक्षस, पितर, देवता, अप्सरा, नाग इत्यादि सब इस कर्म में लग गये। कालांतर में उसके दो पुत्र हुए अंतर्धान तथा पातिन। अंतर्धान से शिखंडिनी ने हविर्धान को जन्म दिया। अग्नि की पुत्री घिषणा से हविर्धान ने छह पुत्रों को जन्म दिया- प्राचीनवर्हिस्, शुक्र, गय, कृष्ण, ब्रज और अजिन। प्राचीनवर्हिस ने घोर तप करके समुद्र-कन्या सवर्णा से विवाह किया। उसके दस पुत्र हुए जो एक ही धर्म का पालन करते थे। वे प्रचेता नाम से विख्यात हुए।

ब्रह्मा चिंतातुर थे। ‘संभवत: देव ही नहीं चाहता कि सृष्टि का विस्तार हो, अन्यथा इतने प्रयत्न के उपरांत भी मैं सृष्टि का विस्तार नहीं कर पा रहा हूं।’ उनके ऐसा सोचते ही उनका शरीर ‘क’ कहलाता है। अत: दोनों भाग काय (शरीर) कहलाये। उनमें से एक मनु (पुरुष) था, दूसरी शतरूपा (स्त्री) थी। स्वायंभुव मनु ने शतरूपा से पांच संतान प्राप्त कीं: दो पुत्र- प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा तीन कन्याएं- आकूति, देवहूति तथा प्रसूति। मनु ने ब्रह्मा से पूछा कि वे प्रजा के निवास के लिए कौन-सा स्थान ठीक समझते हैं? ब्रह्मा ने चिंतन आरंभ किया, अत: जल में डूबी हुई पृथ्वी को जल के ऊपर लाने का कार्य विष्णु (बाराह) ने किया।

मनु का उल्लेख ऋग्वेद काल से ही मानव सृष्टि के आदि प्रवर्तक और समस्त मानव जाति के आदि-पिता के रूप में किया जाता रहा है। इन्हें ‘आदिपुरुष’ भी कहा गया है। आरंभ में मनु और यम का अस्तित्व अभिन्न था। बाद में मनु को जीवित मनुष्यों का और यम को दूसरे लोक में, मृत मनुष्यों का आदिपुरुष माना गया।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार एक मछली ने मनु से प्रलय की बात कही थी और बाद में इन्हीं से सृष्टि चली। अन्यत्र ये विराट के पुत्र बताए गए हैं जिनसे प्रजापतियों की उत्पत्ति हुई। मत्स्य पुराण मनु को ‘मनुस्मृति’ का रचयिता और एक शास्त्र प्रवर्तक मानता है। पुराणों के अनुसार मनु चौदह हुए हैं।
वैदिक संहिताओं में मनु को ऐतिहासिक व्यक्ति माना गया है। ये सर्वप्रथम मानव था जो मानव जाति के पिता तथा सभी क्षेत्रों में मानव जाति के पथ प्रदर्शक स्वीकृत हैं। वैदिक कालीन जलप्लावन की कथा के नायक मनु ही है

मनु को विवस्वान या वैवस्वत , विवस्वन्त (सूर्य) का पुत्र; सावर्णि (सवर्णा का वंशज) एवं सांवर्णि संवरण का वंशज) कहते हैं। प्रथम नाम पौराणिक है, जबकि दूसरे नाम ऐतिहासिक हैं। सावर्णि को लुड्विग तुर्वसुओं का राजा कहते हैं, किन्तु यह मान्यता सन्देहपूर्ण है।

पुराणों में मनु को मानव जाति का गुरु तथा प्रत्येक मन्वन्तर में स्थित कहा गया है। वे जाति के कर्त्तव्यों (धर्म) के ज्ञाता है।

भगवद्गीता (10.6) भी मनुओं का उल्लेख करती है। मनु नामक अनेक उल्लेखों से प्रतीत होता है कि यह नाम न होकर उपाधि है। मनु शब्द का मूल मन् धातु (मनन करना) से भी यही प्रतीत होता है। मेधातिथि, जो मनुस्मृति के भाष्यकार हैं, मनु को उस व्यक्ति की उपाधि कहते हैं, जिसका नाम प्रजापति है। वे धर्म के प्रकृत रूप के ज्ञाता थे एवं मानव जाति को उसकी शिक्षा देते थे। इस प्रकार यह विदित होता है कि मनु एक उपाधि है।

मनुरचित ‘मानव धर्मशास्त्र’ भारतीय धर्मशास्त्र में आदिम व मुख्य ग्रंथ माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में जहाँ मानव धर्मशास्त्र के अवतरण आये हैं वे सूत्र रूप में हैं और प्रचलित मनुस्मृति के श्लोकों से नहीं मिलते। वह सूत्रग्रन्थ ‘मानव धर्मशास्त्र’ अभी तक देखने में नहीं आया। वर्तमान मनुस्मृति को उन्हीं मूल सूत्रों के आधार पर लिखी हुई कारिका मान सकते हैं। वर्तमान सभी स्मृतियों में यह प्रधान समझी जाती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ
=================

ब्रह्म पुराण,2।1-33
श्रीमद् भागवत, तृतीय स्कंध, 12 । 52-56। 13
ऋग्वेद 1.80, 16;8.63,1;10.100,5) आदि;

अथर्ववेद 14.2,41; तैत्ति0

संहिता 1.5,1,3;7.5,15,3;6,7,1;3,3,2,1;5.4,10,5;6.6,6,1;

शतपथ ब्राह्मण 1.1,4,14
काठ0 संहिता 11.2
ऋग्वेद 8.52,1
अथर्ववेद 8.10,24
ऋग्वेद 8.51,1

क्यों मनुस्मृति को कोसना

 

मनीषा यादव

वह बीती शताब्दी का तीसरा दशक था और 1927 का साल. बाबा साहब अंबेडकर ने कुछ लोगों के साथ मिलकर ‘मनुस्मृति’ की तत्कालीन प्रति जलाई थी. संयोग से उसी साल महात्मा गांधी दक्षिण भारत के गांवों और कस्बों में ब्राह्मण-अब्राह्मण और वर्ण-धर्म जैसे विषयों पर लोगों से चर्चा कर रहे थे. 16 सितंबर, 1927 को तमिलनाडु के तंजौर में उनका पूरा भाषण ही इन्हीं पर केंद्रित था. इन विषयों पर उनसे हुए तीखे-मीठे सवाल-ज़वाब का महादेव देसाई द्वारा किया गया समेकन यंग इंडिया के 24 नवंबर, 1927 के अंक में छपा था. इन सवालों में से दो सवाल सीधे मनुस्मृति पर ही केंद्रित कुछ इस तरह थेे :

सवाल – मनुस्मृति में (वर्ण-धर्म का) जो सिद्धान्त दिया गया है क्या आप उसका समर्थन करते हैं?

गांधीजी – सिद्धांत उसमें है, लेकिन उसका व्यावहारिक रूप मुझे पूरी तरह जमता नहीं. इस ग्रंथ के कई अंश हैं जिन पर गंभीर आपत्तियां हो सकती हैं. मुझे लगता है कि वे अंश उसमें बाद में जोड़ दिए गए हैं.

सवाल – क्या ‘मनुस्मृति’ में बहुत सी अन्यायपूर्ण बातें कही गई हैं?

गांधीजी – हां, उसमें स्त्रियों और तथाकथित नीची ‘जातियों’ के बारे में बहुत सी अन्यायपूर्ण बाते हैं. इसलिए तथाकथित शास्त्रों को बहुत सावधानी के साथ पढ़ने की आवश्यकता है.

भारत में वामपंथ, दक्षिणपंथ और अन्य नामधारी पंथ-सुपंथ से संबद्ध राजनीतिक इतिहासकारों की बौद्धिक लापरवाही, शोधकार्य में आलस्यता, निम्नस्तरीय भाषा-ज्ञान, संदिग्ध सत्यनिष्ठा, वैचारिक पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों का एक बढ़िया उदाहरण मनुस्मृति भी है

गांधीजी के उपरोक्त दोनों जवाबों से दो बातें साफ होती थीं. एक तो यह कि इस ग्रंथ के आपत्तिजनक अंश इसमें बाद में जोड़े गए हो सकते हैं. और दूसरा यह कि उन्होंने मनुस्मृति के नाम से प्रचलित संस्करण को ‘तथाकथित शास्त्रों’ की श्रेणी में ही रखा था. वर्ण-धर्म की एक वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए इस पूरी बहस में गांधीजी ने अपना पक्ष भगवद्-गीता के आधार पर रखा था, जिसमें जन्म के बजाय गुण, कर्म और स्वभाव को मनुष्य के वर्ण का आधार बताया गया था और जिससे समानता और स्वतंत्रता के किसी भीे सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता था.

एक अन्य अवसर पर मनुस्मृति पर अपनी स्थिति और स्पष्ट करते हुए गांधीजी ने कहा था –

‘मैं मनुस्मृति को शास्त्रों का हिस्सा अवश्य मानता हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं मनुस्मृति के नाम से चल रही किसी पुस्तक में छपे हर एक श्लोक को अक्षरशः सत्य मानता हूं. छपी हुई किताब में इतने विरोधाभास भरे पड़े हैं कि यदि आप एक हिस्से को स्वीकार करें, तो आपको उन अन्य हिस्सों को अस्वीकार करना ही पड़ेगा जो उससे बिल्कुल भी मेल नहीं खाते… दरअसल आज किसी के भी पास मूल ग्रंथ की प्रति है ही नहीं.’

मनुस्मृति के नाम से प्रचलित इसकी मौजूदा प्रतियां भारुचि, मेधातिथि, गोविंदराज एवं कूल्लूक भट्ट इत्यादि द्वारा अलग-अलग समय पर (7वीं से 13वीं सदी के बीच) किए गए संकलनों और भाष्यों (कमेंटरी) पर आधारित हैं

ठीक इसी तरह वासुदेव कृष्ण के चरित्र के बारे में विभिन्न परस्पर-विरोधी बातों पर अपनी स्थिति साफ करते हुए गांधीजी ने कहा था –

‘मुझे ज्ञात नहीं है कि महाभारत के कृष्ण कभी जीवित थे या नहीं. मेरे कृष्ण का किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. मैं अपना सिर ऐसे कृष्ण के आगे नहीं झुकाऊंगा जो अहंकार पर चोट लगने के कारण किसी का वध करे… मेरे समक्ष यदि यह सिद्ध कर दिया जाए कि महाभारत भी उसी अर्थ में इतिहास है जिस अर्थ में आधुनिक ऐतिहासिक पुस्तकें हैं, महाभारत का प्रत्येक शब्द सही है और महाभारत के कृष्ण ने उसमें बताए गए कुछ कृत्य सचमुच किए थे; तो मैं हिन्दू समाज से बहिष्कृत होने का खतरा मोल लेकर भी निस्संकोच उस कृष्ण को अवतार मानने से इंकार कर दूंगा… महाभारत की जो प्रति हमें आजकल उपलब्ध है, उसे मैं मूल की दोषरहित प्रतिलिपि भी नहीं मानता. इसके विपरीत मैं समझता हूं कि उसमें समय-समय पर बहुत से परिवर्तन हुए हैं (यंग इंडिया, एक अक्टूबर, 1925).’

पंचमकार (यानि मदिरा, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन) की खुली छूट थी. शक्तिपूजा के नाम पर उभरे साक्तों ने भी इसी दुराचार को अपनाया. यहां तक कि ब्रह्मचर्य साधना की अनिवार्य शर्त वाले बौद्ध साधक भी पथभ्रष्ट हो गये और खुल कर इन्हीं पांच चीजों के भोग में लग गए. अभक्ष्याभक्ष और अगम्यागमन की हद तक इन सबका पतन हुआ.

satyagrah.com

जाति the CASTE ( FB पेज)

================
ब्राह्मण मनु के द्वारा रचित मनुस्मृति की कुछ झलकियाँ
जिससे आप भी निश्चय कर सको कि इसका जलना क्यों अनिवार्य है। न केवल किताब रूप में बल्कि विचार रूप में भी जलानी होगी।
स्वगार्थं उभयार्थं वा विप्रान् आराधयेत्तु सः।
जात ब्राह्मण शब्दस्य सा ह्यहस्य कृतकृत्यता॥10/122॥
यदि स्वर्ग जाने की इच्छा हो तब तो बिना कुछ लिए ही ब्राह्मण की सेवा करे। यदि ‘ब्राह्मण के बन गए’ तो सारा जीवन ही सफल समझो।
उच्छिष्ट मन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च।
पुलाकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः॥10/125॥
शूद्र को झूठा अन्न, फटे कपड़े और बिछौने देना चाहिए; क्योंकि शूद्र को कोई पाप नहीं होता है। देखिए-अगला श्लोक तय्यार है।
न शूद्रे पातकं किंचित् न सः संस्कारमर्हति।
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति-न धर्मात् प्रतिषेधनम्॥10/126॥
शूद्र के लिए कोई संस्कार नहीं है और उनको धर्म में कोई अधिकार नहीं है। हाँ! स्वधर्म अर्थात् सेवा करने का सर्वाधिकार प्राप्त है। क्या खूब!!!
एक जातिः द्विजातींस्तु वाचा दारुणयाक्षिपन्।
जिह्वाया प्राप्नुयात् छेदं जघन्य प्रभवोहिसः॥8/270॥
यदि शूद्र द्विजों को गाली देवे तो उसकी जीभ काट ली जाए, क्योंकि वह पैदायशी नीच है।
नामजातिग्रहं त्वेषां अभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्यो ऽयोमयः शंकुः ज्वलन्नास्ये दशांगुलः॥8/271॥
यदि द्विजों का नाम लेकर शूद्र यह कह बैठे कि ‘ब्राह्मण’ बना है �����ो उसके मुख में दस अंगुल की लोहे की शलाका जलती-जलती घुसेड़ देवे।
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणा मस्य कुर्वतः।
तप्त मासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रेच पार्थिवः॥8/272॥
यदि शूद्र ब्राह्मण को कोई धर्म की बात कह दे तो उसके मुख और कान में राजा खौलता हुवा गरम तेल डलवा दे। परमात्मा बचावे! हिन्दुओं के रामराज्य और स्वराज्य से। नहीं तो ये लोग अपनी मनुस्मृति के आधार पर सब कुछ करेंगे। इन्होंने क्या नहीं किया। सबसे बढ़िया कहे जाने वाले रामराज्य में शम्बूक नामक शूद्र का सिर सिर्फ़ इसलिए स्वयं आदर्श राजा राम ने काट दिया कि वह तप करता था, मुनि बनता था, देखिए-तब भी वे लोग वेद नहीं मानते थे। मनुस्मृति मानते थे। वेद में तो शूद्र के लिए लिखा है-तप से शूद्रम्, अर्थात् शूद्र की तपस्या करने का पूर्ण अधिकार है। यह है मनुस्मृति का अन्याय!!
श्रुतं देशं च जातिं च कर्म शरीर मेव च।
वितथेन ब्रुबन् दर्पात् दाप्यः स्यात् द्विशतं दमम्॥8/273॥
यदि कोई अपनी जात छिपावे (जैसा कि आजकल छोटी जाति वालों को मजबूरी करना पड़ता है) तो उससे दो सौ पण जुर्माना लिया जावे।
येन केन चित् अंगेन हिंस्यात् श्रेष्ठमन्त्यजः।
छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनो रनुशासनम्॥8/279॥
अन्त्यज (शूद्र और अछूत) जिस किसी अंग से द्विजों को मारे उसका वहीं अंग काट लिया जावे।
सहासनममि प्रेप्सुः उत्कृष्टस्यावकृष्टजः।
कट्या कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वास्यावकर्त्तयेत्॥8/281॥
यदि अछूत द्विज के बराबर दूरी आदि पर बैठ जावे तो उसके चूतड़ पर गरम लोहे से दाग दे अथवा थोड़े चूतड़ ही कटवा दे।
अब्राह्मणः संग्रहणे प्राणान्तं दंडमर्हति।
चतुर्णामपि वर्णानां दारा रचयतमा सदा॥8/359॥
यदि शूद्र किसी की स्त्री को भगा ले तो उसको फाँसी का दंड दिया जावे; क्योंकि चारों वर्णों की स्त्रियों की रक्षा कोशिश के साथ करनी चाहिए परन्तु ब्राह्मण यदि किसी की स्त्री को भगाले तो जुर्माना तक न करे। देखिए एक श्लोक में लिखा है-‘कन्यां भजन्तीं उत्कृष्टां न किंचिदपि दापयेत्’॥8/365॥
ऊर्ध्वं नाभे र्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः।
तस्मात् मेध्यतम् त्वस्य मुखमुत्ता स्वयम्भुवा॥1/92॥
नाभि से ऊपर शरीर पवित्र है, उसमें भी मुख अत्यन्त पवित्र है। इसलिए पाँव (शूद्र) तो अपवित्र ही रहेंगे।
उत्तमांगोद्भवात् ज्यैष्ठयात् ब्रह्मणश्चैव धारणात्।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः॥1/93॥
मुख से पैदा होने के कारण ब्राह्मण सबसे बड़े हैं और सृष्टि के मालिक हैं।
यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः।
कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः॥1/95॥
देवता लोग ब्राह्मणों के मुख द्वारा ही भोजन करते हैं इस लिए संसार में ब्राह्मण से बढ़कर कोई प्राणी नहीं है।
सर्वस्वं ब्राह्मणस्येदं यत् किंचित् जगती गतम्।
श्रेष्ठयेनाभिजने नेदं सर्वं वै ब्राह्मणोर्हति॥1/100॥
संसार में जो कुछ है सब ब्राह्मण का है, क्योंकि जन्म से ही वह सबसे श्रेष्ठ है।
स्वमेव ब्राह्मणो भुंक्तो स्वं वस्ते स्वं ददाति च।
आनृशंस्यात् ब्राह्मणस्य भुंजते हीतरे जनाः॥1/101॥
ब्राह्मण जो कुछ भी खाता है, पहिनता और देता है सब अपना ही है। संसार के सब लोग ब्राह्मण की कृपा से ही खाते-पीते और लेते देते हैं।
बिदुषा ब्राह्मणोनेदं अध्येतव्यं प्रयत्नतः।
शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यङ् नान्येन केनचित्॥1/103॥
विद्वान् ब्राह्मण को चाहिए कि इस मनुस्मृति शास्त्र को खूब प्रयत्न से पढ़े और ब्राह्मण को ही पढ़ावे। दूसरे कदापि न पढ़ने पावें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *