इतिहास

भारत का इतिहास : प्राचीन भारत : शक साम्राज्य, 123 ई.पू–200 ई – शकों की उत्पत्ति तथा प्रसार : पार्ट 21

 

शक वंश 100 ई. पू.

शक और शाक्य दोनों में फर्क है। बौद्ध पाठ्यों में शाक्य मुख्यत: गौतम गोत्र के क्षत्रिय बताए गए हैं। शाक्यों का हिमालय की तराई में एक प्राचीन राज्य था, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी, जो अब नेपाल में है। शाक्य प्रथम शताब्दी ई.पू में प्राचीन भारत का एक जनपद था। हम यहां शाक्य की बात नहीं ‘शक’ की बात कर रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि पुराणों अनुसार शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए। महाभारत में भी शकों का उल्लेख है। शक साम्राज्य से संबंधित मथुरा के राजकीय संग्रहालय में मूर्ती, स्तंभ, सिंह शीर्ष स्तंभ, मुद्रा आदि कई वस्तुएं रखी हुई है। गार्गी संहिता, बाणभट्ट कृत हर्षचरित में भी शकों का उल्लेख मिलता है।

एक जैन जनश्रुति के अनुसार भारत में शकों को आमंत्रित करने का श्रेय आचार्य कालक को है। ये जैन आचार्य उज्जैन के निवासी थे और वहां के राजा गर्दभिल्ल के अत्याचारों से तंग आकर सुदूर पश्चिम के पार्थियन राज्य में चले गए थे। कालकाचार्य ने शकों को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। कालक के साथ शक लोग सिन्ध में प्रविष्ट हुए और इसके बाद उन्होंने सौराष्ट्र को जीतकर उज्जयिनी पर भी आक्रमण किया और वहां के राजा गर्दभिल्ल को परास्त किया।

शक कौन थे, इस पर विवाद हो सकता है। वे मध्य एशिया से खदेड़े गए थे तब उन्होंने सिंध पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया था। सिंध से वे देश के अन्य हिस्सों में फैल गए। सिंध से पंजाब, सौराष्ट्र, मथुरा, नासिक और उज्जैन तक इन्होंने अपना शासन विस्तार कर लिया था।

शकों का भारत के इतिहास पर गहरा असर रहा है। शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है। हालांकि यह शोध का विषय है। इतिहाकारों में इसको लेकर मतभेद हैं। इतिहासकार मानते हैं कि शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था।

‘युइशि’ लोग तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला-मकान की मरुभूमि के सीमांत पर निवास करते थे। युइशि लोगों पर जब चीन के हूणों ने आक्रमण किया तो उनको अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने शकों पर आक्रमण कर उनका स्थान हड़प लिया तब शकों को अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। हूणों ने युइशियों को धकेला और युइशियों ने शकों को। शकों ने बाद में बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर हिन्दूकुश के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अंत शक जाति के आक्रमण द्वारा ही हुआ था। शकों ने फिर पार्थिया के साम्राज्य पर आक्रमण किया। पारसी राजा मिथिदातस द्वितीय (123-88 ईपू) ने शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। मिथिदातस की शक्ति से विवश शकों ने वहां से ध्यान हटाकर भारत की ओर लगा दिया।

भारत में शकों का शासन

शुंग वंश के कमजोर होने के बाद भारत में शकों ने पैर पसारना शुरू कर दिया था। संपूर्ण भारत पर शकों का कभी शासन नहीं रहा। भारत के जिस प्रदेश को शकों ने पहले-पहल अपने अधीन किया, वे यवनों के छोटे-छोटे राज्य थे। सिन्ध नदी के तट पर स्थित मीननगर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। भारत का यह पहला शक राज्य था। इसके बाद गुजरात क्षेत्र के सौराट्र को जीतकर उन्होंने अवंतिका पर भी आक्रमण किया था। उस समय महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग को शकों ने सातवाहन राजाओं स छीना था और उनको दक्षिण भारत में ही समेट दिया था। दक्षिण भारत में उस वक्त पांडयनों का भी राज था।

शक राजाओं ने गांधार, सिन्ध, महाराष्ट्र, मथुरा और अवंतिका आदि क्षे‍त्रों के कुछ स्थानों पर लंबे काल तक राज किया था। उज्जयिनी का पहला स्वतंत्र शक शासक चष्टण था। इसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया है। इसके अनुसार इस वंश का राज्य 130 ई. से 388 ई. तक चला, जब संभवतः चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इस कुल को समाप्त किया। उज्जैन के क्षत्रपों में सबसे प्रसिद्ध रुद्रदामा (130 ई. से 150 ई.) था।

माना जाता है कि आजादी के बाद जब इतिहास लिखा गया तो हिन्दू विजयों और प्रतीकों को जानबूझकर हाशिये पर धकेला गया और उन लोगों का महिमामंडन ज्यादा किया गया जिन्होंने भारत पर आक्रमण करके यहां की संस्कृति और सभ्यता को लगभग तहस नहस कर दिया। भारतीय वीरता के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जिसे कभी उद्घाटित नहीं किया ग्या क्योंकि वह हिन्दू अस्मिता और गौरव से जुड़ा हुआ था। ऐसे ही एक अध्याय का नाम है ‘द ग्रेट विक्रामादित्य’। जब विक्रमादित्य ने शकों को समूल से हराकर उन्हें देश से बाहर धकेल दिया था जब उन्हें इस विजय के बाद शाकारी उपाधी से सम्मानीत किया गया था।

इस विजय की याद में ही महान विक्रमादित्य ने एक संवत शुरू किया था जिसे आज हम विक्रम संवत कहते हैं। दरअसल कहानी कुछ यूं है कि ईसा के 100 वर्ष पहले भारत पर शकों के आक्रमण की शुरुआत हुई। ग्रीक प्रदेश बैक्ट्रिया को जीतने के बाद शकों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। संपूर्ण भारत में शक तेजी से तूफान की तरह फैल गए थे और उन्होंने लगभग संपूर्णा भारत पर कब्जा ही कर लिया था। सिंध से लेकर वे दक्षिण के आंध्र तक चले गए थे।

महाजनपदों में विभाजित भारत के अधिकतर हिस्से शकों के अधिन हो गए थे। सिंध, पंजाब, कश्मीर, अफगान, राजस्थान और गुजरात में तो इनकी सत्ता मजबूत हो गई थी। साथ ही उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्से भी इनके अधीन हो चले थे। ऐसे में इतिहास के पटल पर एक शक्तिशाली राजा का प्रादुर्भाव हुआ, मालवपति गंधर्वसेन पुत्र विक्रमादित्य का।

भारत के उस कठिन समय के शक्तिशाली गण मालवगण के अधिपति विक्रमादित्य ने यौद्धेय गण और बाकी गणों को संघटित कर एक बड़ी सेना खड़ी की। अत्यंत निपुण सेनानी विक्रमादित्य के नेतृत्व में इस संघटित भारतीय सेना की शकों से भीषण लड़ाई हुई और एक के बाद एक युद्ध जीतते हुए विक्रम की सेना आगे बढ़ती गई और उन्होंने शकों को हर जगह से उखाड़ फेंका। शक सत्ता से बेदखल हो गए लेकिन उनके कुछ समूह भारतीय धर्म और संस्कृति में ही घुल मिल कर रहने लगे।

इस युद्ध में शकों का राजा नह्वान भी मारा गया। विक्रम की सेना ने संपूर्ण अखंड भारत पर अपना परचम लहराकर अपनी शक्ति सिद्ध कर दी और वे सम्राट शाकारी विक्रमादित्य नामक उपाधी से नवाजे गए। ईसा पूर्व 57 साल पहले भारतीयों की इस अविस्मरणीय जीत को याद रखने के लिए ही विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत करवाई। विक्रमादित्य के बाद लगभग 135 साल बाद राजा शालिवाहन (गौतमीपुत्र सातकर्णि ) ने भी शकोंं को रौंद डाला और अपनी एक नई कालगणना शुरू की जिसे ‘शालिवाहन शक’ कहा जाता है।

शक सत्ता से बेदखल हो चले थे लेकिन कमजोर नहीं पड़े थे। उसी दौर में कुषाणों ने भारत पर हमला बोल दिया। कुषाणों के आते ही भारत के शकों ने अपने आप उनकी शरण ली। कुषाणों में कनिष्क नामक राजा बहुत प्रसिद्द हुआ। उसने बौद्ध धर्म अपनाकर अफगानिस्तान से लेकर मथुरा तक अपना राज्य कायम कर लिया था। उसके राज्य की सिमाएं विशाल थी। हिंदुकुश के पार तक उसका साम्राज्य था।

कनिष्क की मृत्यु के बाद कुषाण साम्राज्य कमजोर होने लगा तो भारत के शकों ने अधिपत्य को अस्वीकार किया और वे स्वतंत्र होकर रहने लगे। गुजरात, सौराष्ट्र और मालवा के कुछ भाग पर पुन: शकों का अधिकार था तो गांधार, सिंध इत्यादि पर कुषाणों ही अधिकार रहा। इस तरह शकों का सम्राज्य 123 ईपू से 200 ईस्वी तक चलता रहा और उसके बाद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने फिर से वही कार्य किया जो कि महान सम्राट शाकारी विक्रमादित्य ने किया था। चंद्रगुप्त के बाद सबसे महान सम्राट हुए जिनका नाम था समुद्र गुप्त।

पाटलिपुत्र के छोटे से राज्य के शासक समुद्र गुप्त ने उत्तर भारत के सभी छोटे बड़े राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया और वे अब पश्‍चिम की ओर बढ़ने लगे थे। इससे पहले की वह कुषाणों पर हमले करते, कुषाणों ने खुद होकर उसका विवाह अपनी कन्या से करवाते हुए उनकी शरणागति ली और इस प्रकार कुषाण हमेशा के लिए हिंदुत्व में विलीन हो गए। समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने राज्य संभाला।

शकों की उत्पत्ति तथा प्रसार

शक मूलतः सीरदरया के उत्तर में निवास करने वाली एक खानदेश तथा बर्बर जाति थी। चीनी ग्रंथों से पता चलता है कि, 165 ईसा पूर्व के लगभग यू-ची नामक एक अन्य जाति ने उन्हें परास्त कर वहाँ सेर खदेङ दिया। शकों ने सीरदया पार कर बल्ख (बैक्ट्रिया) पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ के यवनों को परास्त कर भगा दिया। परंतु यू-ची जाति ने वहाँ भी उनका पीछा किया तथा पुनः परास्त हुये।

पराजित शक जाति दो शाखाओं में विभक्त हो गयी। उनकी एक शाखा दक्षिण की ओर गयी तथा कि-पिन (कपिशा) पर अधिकार कर लिया। दूसरी शाखा पश्चिम में ईरान की ओर गईा।वहाँ उसे शक्तिशाली पार्थियन सम्राटों से युद्ध करना पङा।

शकों ने दो पार्थियन राजाओं फ्रात द्वितीय तथा आर्तबान पार्थियन सम्राटों को पराजित कर पूर्वी ईरान तथा एरियाना के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया।

परंतु पार्थियन नरेश मिथ्रदात द्वितीय ने शकों को बुरी तरह परास्त कर ईरान के पूर्वी प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। यहाँ से भागकर शक हेलमंड घाटी (दक्षिणी अफगानिस्तान) में आये तथा वहीं बस गये। इस स्थान को शकस्थान (सीस्तान) कहा गया।

यहाँ से कंधार और बोलन दर्रा होते हुये वे सिंधु नदी – घाटी में जा पहुँचे। उन्होंने सिंध प्रदेश में अपना निवास-स्थान बना लिया। शकों के साथ संपर्क के कारण इस स्थान को शक-द्वीप कहा गया।

इस प्रकार भारत में शक पूर्वी ईरान से होकर आये थे। उन्होंने पश्चिमोत्तर प्रदेशों से यवन-सत्ता को समाप्त कर उत्तरापथ एवं पश्चिमी भारत के बङे भू-भाग पर अपना अधिकार कर लिया। तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र, उज्जयिनी आदि स्थानों में शकों की भिन्न-2 शाखायें स्थापित हुई। शक नरेशों के भारतीय प्रदेशों के शासक क्षत्रप कहे जाते थे।

शकों के प्रमुख लेख निम्नलिखित हैं-

– राजवुल का मथुरा सिंह शीर्ष, स्तंभलेख।
– शोडास का मथुरा दानपत्रलेख।
– नहपानकालीन नासिक के गुहालेख।
– नहपानकालीन जुन्नार का गुहालेख।
– उषावदान के नासिक गुहालेख।
रुद्रदामन का अंधौ (कच्छ की खाङी) का लेख।
रुद्रदामन का गिरनार (जूनागढ) का लेख।

सातवाहन राजाओं के लेखों से शकों के साथ उनके संबंधों का ज्ञान होता है। लेखों के अतिरिक्त पश्चिमी तथा उत्तरी पश्चिमी भारत के बङे भाग से शक राजाओं के बहुसंख्यक सिक्के प्राप्त हुए हैं। कनिष्क के लेखों से पता चलता है, कि कुछ शक-क्षत्रप तथा महाक्षत्रप उसकी अधीनता में देश के कुछ भागों में शासन करते थे।

रामायण तथा महाभारत जैसे भारतीय साहित्यों में यवन, पल्लव आदि विदेशी जातियों के साथ शकों का उल्लेख होता है। कात्यायन एवं पतंजलि भी शकों से परिचित थे। मनुस्मृति में भी शकों का उल्लेख मिलता है।

पुराणों में भी शक, मुरुण्ड, यवन जातियों का उल्लेक मिलता है।

कई अन्य भारतीय ग्रंथ, जैसे – गार्गीसंहिता, विशाखादत्त कृत देवीचंद्रगुप्तम, बाण कृत हर्षचरित, राजशेखर कृत काव्यमीमांसा में भी शकों का उल्लेख मिलता है।

जैन ग्रंथों में शकों के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथानक में उज्जयिनी के ऊपर शकों के आक्रमण तथा विक्रमादित्य द्वारा उनके पराजित किये जाने का उल्लेख मिलता है।

भारतीय साहित्य में शकों के प्रदेस को शकद्वीप अथवा शकस्थान कहा गया है।

शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था। इनकी सही नस्ल की पहचान करना कठिन रहा है क्योंकि प्राचीन भारतीय, ईरानी, यूनानी और चीनी स्रोत इनका अलग-अलग विवरण देते हैं। फिर भी अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि ‘सभी शक स्किथी थे, लेकिन सभी स्किथी शक नहीं थे’, यानि ‘शक’ स्किथी समुदाय के अन्दर के कुछ हिस्सों का जाति नाम था।

शक साम्राज्य (123 ई.पू–200 ई.)

शक साम्राज्य
– भूमक
– नहपान
– कम्बोजिका
· राजुबुल
· शोडाष
· यशोभोतिक
· चष्टन
· रुद्रदामन
· गर्दभिल्ल
· उषवदात

भूमक

भूमक शकों के क्षहरात वंश का प्रथम क्षत्रप था। उसे सम्भवत: कुषाण साम्राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग के शासन का भार सौंपा गया था। उसके जो सिक्के प्राप्त हुए हैं, उनके प्रकार तथा उन पर लिखित अभिलेखों से ज्ञात होता है कि भूमक नहपान का पूर्वगामी था। परंतु दोनों के बीच वास्तविक सम्बन्ध क्या था, यह ज्ञात नहीं है। भूमक के सिक्कों से ज्ञात होता है कि क्षत्रप के राज्य में सिर्फ़ ब्राह्मी के प्रचलन वाले क्षेत्र, जैसे- मालवा, गुजरात तथा सौराष्ट्र ही नहीं थे, बल्कि पश्चिमी राजस्थान तथा सिन्ध के भी क्षेत्र थे, जहाँ खरोष्ठी का प्रचलन था।

महान क्षत्रप

भूमक अपने समय के महान् क्षत्रपों में गिना जाता था। उसके बाद नहपान ही ‘क्षहरात वंश’ का शासक व गद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। भारत में शक राजा अपने आप को ‘क्षत्रप’ कहते थे। शक शासकों की भारत में दो शाखाएँ हो गई थीं। एक ‘उत्तरी क्षत्रप’ कहलाते थे, जो तक्षशिला एवं मथुरा में थे और दूसरे ‘पश्चिमी क्षत्रप’ कहलाते थे, जो नासिक एवं उज्जैन के थे। पश्चिमी क्षत्रप अधिक प्रसिद्ध थे। यूची आक्रमणों के भय से कई क्षत्रप ई. पू. पहली शती से ईस्वी की पहली शती के बीच उत्तर पश्चिम से दक्षिण की ओर बढ़ आए थे और नासिक के क्षत्रपों तथा उज्जैन के क्षत्रपों की दो शाखाओं में बँट गए थे। नासिक के क्षत्रपों में दो प्रसिद्ध शासक भूमक और नहपान थे। वे अपने को ‘क्षयरात क्षत्रप’ कहते थे। ताँबे के सिक्कों में भूमक ने अपने आपकों क्षत्रप लिखा है।

सिक्के

भूमक के अनेक सिक्के उपलब्ध हुए हैं, जो महाराष्ट्र और काठियावाड़ से मिले हैं। इससे अनुमान किया जाता है कि महाराष्ट्र और काठियावाड़ दोनों उसके शासन में थे। क्षहरात कुल का सबसे प्रसिद्ध शक क्षत्रप नहपान था। इसके सात उत्कीर्ण लेख और हज़ारों सिक्के उपलब्ध हुए हैं। सम्भवतः यह भूमक का ही उत्तराधिकारी था, पर इसका भूमक के साथ क्या सम्बन्ध था, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। नहपान का राज्य बहुत ही विस्तृत था। यह बात उसके जामाता उषावदात के एक लेख से ज्ञात होती है। इस लेख के कुछ अंश निम्नलिखित हैं-

“सिद्ध हो। राजा क्षहरात क्षत्रप नहपान के जामाता, दीनाक के पुत्र, तीन लाख गौओं का दान करने वाले, बार्णासा (नदी) पर सुवर्णदान करने वाले, देवताओं और ब्राह्मणों को सोलह ग्राम देने वाले, सम्पूर्ण वर्ष ब्राह्मणों को भोजन कराने वाले, पुण्यतीर्थ प्रभास में ब्राह्मणों को आठ भार्याएँ देने वाले, भरुकच्छ दशपुर गोवर्धन और शोर्पारण में चतुःशाल वरुध और प्रतिश्रय देने वाले, आराम, तडाग, उदपान बनवाने वाले, इवा पारातापी करवेणा दाहानुका (नदियों पर) नावों और …..धर्मात्मा उपावदात ने गोवर्धन में त्रिरशिम पर्वत पर यह लेण बनवाई……..”

क्षत्रप शाखाएँ

क्षत्रपों की दो शाखाएँ थीं, यथा पश्चिमी क्षत्रप कुल, जिसका प्रवर्तन भूमक ने महाराष्ट्र में किया और उज्जयिनी का महाक्षत्रप कुल, जिसे चष्टन (‘चस्टन’ अथवा ‘सष्टन’) ने प्रचलित किया था। इन दोनों कुलों के प्रवर्तक शक आक्रान्ताओं के सरदार थे। पश्चिमी क्षत्रप कुल के आरम्भ की तिथि निश्चित नहीं है। कदाचित उसकी राजधानी नासिक थी और केवल दो शासकों, भूमक और नहपान के ही नाम ज्ञात हैं। दोनों में किसी की भी तिथि निश्चित नहीं है। विद्वानों ने भूमक का काल ईसा की प्रथम शताब्दी का प्रारम्भिक वर्ष माना है और नहपान का काल दूसरी शताब्दी का प्रारम्भिक वर्ष।

नहपान

नहपान ‘क्षहरात वंश’ का ख्यातिप्राप्त व बहुत ही योग्य शासक था। भूमक के बाद उसे ही क्षहरात वंश का शासक व गद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। इसका शासनकाल सम्भवतः 119 से 224 ई. तक रहा। नहपान ने अपनी मुद्राओं पर ‘राजा’ की उपाधि धारण की थी।

नहपान का साम्राज्य उत्तर में अजमेर एवं राजपूताना तक विस्तृत था। इसके अन्तर्गत काठियावाड़, दक्षिणी गुजरात, पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, नासिक व पूना आदि सम्मिलित थे।
ऋषदत्त (उषादत्त) जो कि नहपान का दामाद था, नहपान के समय में उसके दक्षिणी प्रान्त गोवर्धन (नासिक) तथा मामल्ल (पूना) का वायसराय था।
नहपान के समय में स्वर्ण के कर्षापण का विनिमय दर 1:35 था।
इसके समय में भड़ौच बन्दरगाह द्वारा उज्जैन, प्रतिष्ठान से लाए गए व्यापारिक सामान को पश्चिमी देशों को भेजा जाता था।
सम्भवतः सातवाहन नरेश गौतमी शातकर्णी ने नहपान को परास्त कर उसकी हत्या कर दी थी, जिसका साक्ष्य ‘जोगलथम्बी’ में पाए गए सिक्कों से होता है।
कुछ लोग नहपान को ही शक संवत का प्रवर्तक मानते हैं।

कम्बोजिका

राजुबुल की पत्नी कंबोजिका ने मथुरा में यमुना नदी के तट पर एक बौद्ध-बिहार निर्मित कराया था, जिसके लिए शोडास ने कुछ भूमि दान में दी थी। राजबुल अथवा राजवुल (प्रथम शताब्दी) मथुरा का इन्डो सीथियन शासक 1869 ई. में मथुरा से पत्थर का यह ‘सिंह-शीर्ष’ मिला जो लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूज़ियम’ में रखा हुआ है। इस पर खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में कई लेख हैं। इनमें क्षत्रप शासकों के नाम मिलते हैं।
एक शिलालेख में महाक्षत्रप राजुबुल की पटरानी कमुइअ (कंबोजिका) के द्वारा बुद्ध के अवशेषों पर एक स्तूप तथा एक ‘गुहा विहार’ नामक मठ बनवाने का उल्लेख मिलता है। संभवत: यह मठ मथुरा में यमुना-तट पर वर्तमान सप्तर्षि टीला पर रहा होगा। यहीं से ऊपर उल्लेखित ‘सिंह-शीर्ष’ मिला था।

राजुबुल

 

महाक्षत्रप राजुल की अग्रमहिषी महाराज्ञी कम्बोजिका

राजबुल अथवा राजवुल (प्रथम शताब्दी) मथुरा का इन्डो सीथियन शासक। 1869 ई. में मथुरा से पत्थर का यह ‘सिंह-शीर्ष’ मिला जो लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखा हुआ है।

इस पर खरोष्ठी लिपि और प्राकृत भाषा में कई लेख हैं। इनमें क्षत्रप शासकों के नाम मिलते हैं। एक शिलालेख में महाक्षत्रप राजुबुल की पटरानी कमुइअ (कंबोजिका) के द्वारा बुद्ध के अवशेषों पर एक स्तूप तथा एक ‘गुहा विहार’ नामक मठ बनवाने का उल्लेख मिलता है। संभवत: यह मठ मथुरा में यमुना-तट पर वर्तमान सप्तर्षि टीला पर रहा होगा। यहीं से ऊपर उल्लेखित ‘सिंह-शीर्ष’ मिला था। इसके नाम रजुबुल, रंजुबुल और राजुल भी मिलते हैं। यह पहले शाकल का शासक था। हगान और हगामष से इसका क्या संबंध था, यह स्पष्ट नहीं।

शोडाष

शोडास (सोडास) (शासन-काल ई. पूर्व 80 से ई. पूर्व 57) राजुबुल (राजवुल) का पुत्र था। शोडास ने मथुरा पर लम्बे समय तक शासन किया। राजबुल के बाद उसका पुत्र शोडास (लगभग ई. पूर्व 80-57) शासनाधिकारी हुआ। 1869 ई. में मथुरा से पत्थर के एक ‘सिंह-शीर्ष’ के शिलालेख पर शोडास की उपाधि ‘क्षत्रप’ अंकित है, किन्तु मथुरा में ही मिले अन्य शिलालेखों में उसे ‘महाक्षपत्र’ कहा गया है। अनेक सिक्कों का मिलना इसका प्रमाण है। जिन पर “महाक्षत्रप” सम्बोधन है। कंकाली टीला (मथुरा) से प्राप्त एक शिलापट्ट पर सं0 (?) 72 का ब्रह्मी लेख है, जिसके अनुसार ‘स्वामी महाक्षत्रप’ शोडास के शासनकाल में जैन भिक्षु की शिष्या अमोहिनी ने एक जैन विहार की स्थापना की । राजुबुल की पत्नी कंबोजिका ने मथुरा में यमुना नदी के तट पर एक बौद्ध-बिहार निर्मित कराया था, जिसके लिए शोडास ने कुछ भूमि दान में दी थी । मथुरा के हीनयान मत वाले बौद्धों की ‘सर्वास्तिवादिन्’ नामक शाखा के भिक्षुओं के निर्वाह के लिए यह दान दिया गया था। सिंह-शीर्ष के इन खरोष्ठी लेखों से ज्ञात होता है कि शोडास के काल में मथुरा के बौद्धों में हीनयान तथा महायान (महासंधिक)– मुख्यतः इन दोनों शाखाओं के अनुयायी थे और इनमें परस्पर वाद-विवाद भी होते थे।

शोडाष के सिक्के

शोडाष के सिक्के दो प्रकार के है, पहले वे है जिन पर सामने की तरफ खड़ी हुई लक्ष्मी की मूर्ति तथा दूसरी तरफ लक्ष्मी का अभिषेक चित्रित है। इन सिक्कों पर हिन्दी में ‘राजुबुल पुतस खतपस शोडासस’ लिखा हुआ है ।दूसरे प्रकार के सिक्कों पर लेख में केवल ‘महाक्षत्रप शोडासस’ चित्रित है । इससे अनुमान होता है कि शोडाष के पहले वाले सिक्के उस समय के होगें जब उसका पिता जीवित रहा होगा और दूसरे राजुबुल की मृत्यु के बाद, जब शोडाष को राजा के पूरे अधिकार मिल चुके होगें । शोडाष तथा राजुबुल के सिक्के हिंद -यूनानी शासक स्ट्रैटो तथा मथुरा के मित्र-शासकों के सिक्कों से बहुत मिलते-जुलते हैं । शोडाष के अभिलेखों में सबसे महत्त्वपूर्ण वो लेख है जो एक सिरदल (धन्नी) पर उत्कीर्ण है। यह सिरदल मथुरा छावनी के एक कुएँ पर मिली थी, जो कटरा केशवदेव से लाई गई प्रतीत होती है।

शासन काल

महाक्षत्रप शोडाष का शासन-काल ई. पूर्व 80 से ई. पूर्व 57 के बीच माना जाता है। यह सबसे पहला अभिलेख है जिसमें मथुरा में कृष्ण-मंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है। शोडाष का समकालीन तक्षशिला का शासक पतिक था। मथुरा के उक्त सिंह- शीर्ष पर खुदे हुए एक लेख में पतिक की उपाधि ‘महाक्षत्रप’ दी हुई है। तक्षशिला से प्राप्त सं078 में एक दूसरे शिलालेख में ‘महादानपति’ पतिक का नाम आया है। सम्भवतः ये दोनो पतिक एक ही है और जब शोडाष मथुरा का क्षत्रप था उसी समय पतिक तक्षशिला में महाक्षत्रप था। मथुरा-लेख में पतिक के साथ मेवकि का नाम भी आता है। गणेशरा गाँव (जि0 मथुरा) से मिले एक लेख में क्षत्रप घटाक का नाम भी है। शोडाष के साथ इन क्षत्रपों का क्या संबंध था, यह विवरण कहीं नहीं मिलता है। ई. पूर्व पहली शती का पूर्वार्द्ध पश्चिमोत्तर भारत के शकों के शासन का समय था । इस समय में तक्षशिला से लेकर उत्तरी महाराष्ट्र् तक शकों का ही एकछ्त्र राज्य हो गया था।

यशोभोतिक

यशोभोतिक उज्जयिनी का महाक्षत्रप था। उसके नाम से ही यह स्पष्ट है कि वह एक शक था।

उज्जयिनी के महाक्षत्रपों ने दीर्घकाल तक शासन किया। इस वंश का प्रवर्तक यशोभोतिक का पुत्र ‘चस्तन’ अथवा ‘चष्टन’ था।
यशोभोतिक शक जाति से था। उसका शासन काल लगभग 130 ई. में आरम्भ हुआ और उसके वंशज 388 ई. तक राज्य करते रहे। इस वंश का सबसे महान् शासक चष्टन का पौत्र रुद्रदामा प्रथम (130-150 ई.) था।

चष्टन

उज्जयिनी के ‘कार्दम वंश’ का प्रथम शक क्षत्रप शासक चष्टन था।
इस वंश का शासन काल सम्भवतः 130 ई. से 388 ई. तक माना जाता है।
चष्टन सम्भवतः पहले कुषाणें की अधीनता में सिंध क्षेत्र का क्षत्रप था।
नहपान की मृत्यु के बाद उसे कुषाण साम्राज्य के दक्षिण पश्चिमी प्रान्त का वायसराय नियुक्त किया गया था।
वायसराय बनने के बाद उसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया है।
‘अन्धै’ के अभिलेख से ज्ञात होता है कि 130 ई. में चष्टन अपने पौत्र रुद्रदामन के साथ मिलकर शासन कर रहा था।
चष्टन ने चाँदी और सोने के बहुत सिक्के चलाए, जिनमें से कुछ प्राप्त हुए हैं।
टॉल्मी के भूगोल से पता चलता है कि, अवन्ति या पश्चिम मालवा की राजधानी पर ‘हिमास्टेनीज’ का अधिकार था।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि, चष्टन ने नहपान द्वारा खोए हुए कुछ प्रदेशों को सातवाहनों से पुनः जीतकर उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया था।

रुद्रदामन

रुद्रदामन ‘कार्दम वंशी’ चष्टन का पौत्र था, जिसे चष्टन के बाद गद्दी पर बैठाया गया था। यह इस वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था और इसका शासन काल 130 से 150 ई. माना जाता है। रुद्रदामन एक अच्छा प्रजापालक, तर्कशास्त्र का विद्वान् तथा संगीत का प्रेमी था। इसके समय में उज्जयिनी शिक्षा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन चुकी थी।

रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उसके जूनागढ़ (गिरनार) से शक संवत 72 (150 ई.) के अभिलेख से मिलती है।
रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से उसके साम्राज्य के पूर्वी एवं पश्चिमी मालवा, द्वारका के आस-पास के क्षेत्र, सौराष्ट्र, कच्छ, सिंधु नदी का मुहाना, उत्तरी कोंकण आदि तक विस्तृत होने का उल्लेख मिलता है।
इसी अभिलेख में रुद्रदामन द्वारा सातवाहन नरेश दक्षिण पथस्वामी में ही उसे ‘भ्रष्ट-राज-प्रतिष्ठापक’ कहा गया है।
इसने चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री द्वारा बनवायी गई, सुदर्शन झील के पुननिर्माण में भारी धन व्यय करवाया था।
रुद्रदामन कुशल राजनीतिज्ञ के अतिरिक्त प्रजापालक, संगीत एवं तर्कशास्त्र के क्षेत्र का विद्वान् था।
इसके समय में संस्कृत साहित्य का बहुत विकास हुआ था।
रुद्रदामन ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा अभिलेख (जूनागढ़ अभिलेख) जारी किया।
उसके समय में उज्जयिनी शिक्षा का प्रमुख केन्द्र थी।
पश्चिमी भारत का अन्तिम शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय था।
चौथी शताब्दी ई. के अन्त में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने इस वंश के अन्तिम रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकों के क्षेत्रों को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

गर्दभिल्ल

गर्दभिल्‍ल शकवंशी एक राजा का नाम है, जिसका मौर्यकालीन बुंदेलखंड पर अधिकार रहा था।

हिन्दू धर्म के भविष्य पुराण के अनुसार राजा विक्रमादित्‍य के पिता का नाम गन्‍धर्वसेन था।
मालवा (मगध) देश में गन्‍धर्व के स्‍थान पर श्वेताम्बर मान्‍यता के अनुसार गर्दभिल्‍ल का नाम आता है अथवा गर्दभी विद्या जानने के कारण यह राजा गर्दभिल्‍ल के नाम से प्रसिद्ध हो गया था।
एक जैन जनश्रुति के अनुसार भारत में शकों को आमंत्रित करने का श्रेय आचार्य कालक को है। ये जैन आचार्य उज्जैन के निवासी थे और वहां के राजा गर्दभिल्ल के अत्याचारों से तंग आकर सुदूर पश्चिम के पार्थियन राज्य में चले गए थे।

उषवदात

उषवदात ऋषवदत्त, शक क्षहरात राजवंश के द्वितीय नरेश नहपान का जामाता और सामंत। नहपान की पुत्री और उसके जामाता–दोनों के नाम हिंदू थे, क्रमश: दक्षमित्रा और उषवदात (ऋषभदत्त)। शकों ने इस प्रकार भारत में बसकर हिंदू धर्म को अंगीकार कर लिया था, ये नाम इसके उदाहरण हैं। उषवदात का राज्यकाल तो स्पष्ट विदित नहीं है क्योंकि उसके स्वामी और संबंधी स्वयं नहपान की शासनतिथियों के संबंध में विद्वानों के अनेक मत हैं। साधारणत: नहपान का राज्यकाल पहली और दूसरी सदी ईसवी में रखा जाता है। इससे प्राय: इसी काल उषवदात का भी समय होना चाहिए। उषवदात के अनेक लेख मिले हैं। जिनमें से एक में उसे स्पष्टत: शक कहा गया है। उसके अभिलेख नासिक के पांडुलेण, पूना जिले के जुन्नार तथा कार्ले में मिले हैं। उसके समय में मालवों के आक्रमण महाराष्ट्र पर हो रहे थे जिन्हें रोकने का प्रयत्न उत्तमभद्र कर रहे थे। उत्तमभद्रों की सहायता के लिए स्वामी नहपान ने उषवदात को भेजा था। जिसमें उषवदात ने विजय प्राप्त कर सम्राट् नहपान का आधिपत्य आधुनिक अजमेर के निकट तक फैला दिया था। अजमेर के पास पुष्कर क्षेत्र में उषवदात ने अनेक दान किए थे। इससे अधिक उस हिंदूधर्मा शक के विषय में इतिहास को कुछ ज्ञात नहीं।

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