धर्म

वाले दाग़िस्तानी के नाम से मशहूर अलीक़ेली ख़ान : पार्ट 2

अलीक़ुली ख़ान का जन्म इस्फ़हान में सन 1124 हिजरी के सफ़र महीने में हुआ था।

वे “वाले दाग़िस्तानी” के नाम से मशहूर हुए। अलीक़ुली ख़ान के पिता का नाम मुहम्मद अली ख़ान था जो वर्ष 1126 हिजरी में ईरवान के “बीगलर बीगी” के पद पर आसीन हुए। सातवीं से बारहवीं शताब्दी हिजरी में बीगलर बीगी, बड़े राज्यों के वरिष्ठ सैन्य कमांडर को कहा जाता था। यह पद हासिल होने के बाद मुहम्मद अली ख़ान इस्फ़हान से ईरवान चले गए। उस समय अलीक़ुली की आयु मात्र दो साल की थी जो अपने पिता के साथ ईरवान पहुंचे। नख़जवान में अलीक़ुली ख़ान के पिता का देहान्त हो गया। पिता के निधन के बाद वाले दाग़िस्तानी अपने परिवार के साथ इस्फ़हान लौट आए।

वर्ष 1129 हिजरी में उन्होंने इस्फ़हान में आरंभिक शिक्षा शुरू की और उस काल के ज्ञान व साहित्य के गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। उस काल में दाग़िस्तानी की अभिभावक्ता उनके चाचा, हसन अली ख़ान के ज़िम्मे थी। हसन अली ख़ान की एक बेटी थी जिसका नाम ख़दीजा सुल्तान था। ख़दीजा की आयु लगभग अलीक़ुली के बराबर थी।

वर्ष 1133 हिजरी में सुलतान हुसैन सफ़वी के दरबार में मंत्री के पद पर काम करने वाले अलीक़ुली ख़ान के पिता के चाचा फ़तह अली ख़ान को शासन हड़पने की कोशिश का आरोप लगाकर सभी सरकारी पदों से हटा दिया गया। इसके बाद उनके सभी रिश्तेदारों को भी उनके पदों से हटा कर जेल में डाल दिया गया जिनमें अलीक़ुली के चाचा और उनके भाई भी शामिल थे। उसी साल के अंत में अफ़ग़ानों ने इस्फ़हान पर हमला करके इस शहर का घेराव कर लिया। इस क्षेत्र में युद्ध की ज्वाला भड़क उठी यहां तक कि वर्ष 1135 के मुहर्रम महीने में महमूद अफ़ग़ान ने इस्फ़हान शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया और सुलतान हुसैन सफ़वी को पकड़ कर जेल में डाल दिया। इसके बाद वह गद्दी पर बैठा और वर्ष 1142 हिजरी तक उसने सात साल तक इस्फ़हान पर राज किया।

वाले दाग़िस्तानी अपने चाचा की बेटी ख़दीजा से प्यार करते थे। वाले ने अपनी जीवनी में इस बात की ओर इशारा किया है। वाले, ख़दीजा से प्रेम तो करते थे किंतु वे उसके साथ विवाह नहीं कर सके। अलीक़ुली की मां ने, ख़दीजा सुल्तान की मां के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसमें दोनों की शादी सादे ढंग से किये जाने की बात कही गई थी। कुछ दिनों बाद ख़दीजा के घर वालों ने महमूद अफ़ग़ान के दबाव और धमकियों के चलते विवश होकर उसकी शादी महमूद अफ़ग़ान के एक रिश्तेदार से कर दी। ख़दीजा से विवाह न करने के कारण वाले दाग़िस्तानी बहुत दुखी हुए जिसका वर्णन उन्होंने अपनी कविताओं और ग़ज़लों में बड़े मार्मिक ढंग से किया है।

अलीक़ुली उर्फ़ वाले दाग़िस्तानी, ख़दीजा को खो देने के कारण अत्यधिक दुखी रहले लगे थे। वे दर-दर घूमते रहते थे। सन 1144 हिजरी में नादिर शाह के सत्ता में आने के बाद बीस साल की उम्र में दाग़िस्तानी ने देश छोड़ने का फ़ैसला किया। अत्यधिक कठिनाइयां सहन करके वे भारत पहुंचे। अनेक जीवनी लेखकों के अलावा ख़ुद उन्होंने अपने इस सफ़र का कारण, अपने चाचा की बेटी ख़दीजा सुलतान से इश्क़ बताया है। दस्तावेज़ों के अनुसार वाले दाग़िस्तानी वर्ष 1146 हिजरी में भारत पहुंचे। अक्खर तथा मुलतान होते हुए पहले वे लाहौर पहुंचे और फिर वहां से शाहजहांबाद चले गए फिर वहीं रहने लगे। अपने जीवन के अन्तिम समय तक वे ईरान वापस जाने के बारे में सोचते रहे। अंततः सन 1170 में देहली में उनका देहान्त हो गया। वाले दाग़िस्तानी को देहली में ही दफ़्न किया गया। हालांकि यह बात उल्लेखनीय है कि उनकी क़ब्र की कोई निशानी अब बाक़ी नहीं है।

वाले दाग़िस्तानी एक कवि और लेखक थे। उनकी रचनाओं की संख्या बहुत है किंतु उनकी चार रचनाएं यादगार के रूप में मौजूद हैं। उनके काव्य संकलन में चार हज़ार बैत हैं। इस काव्य संकलन को “मीर शमसुद्दीन फ़क़ीर देहलवी” ने सन 1157 हिजरी क़मरी में संकलित किया था। उनके इस काव्य संकलन में दाग़िस्तानी की प्रेमिका के बारे में कहे गए उनके शेर मौजूद नहीं हैं जिनका निधन 1160 में हो गया था। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे पता चलता है कि जिस समय वाले दाग़िस्तान की कविताओं को एकत्रित किया गया है उसक समय उनकी प्रेमिका ख़दीजा जीवित थीं जिनके बारे में उन्होंने बाद में भी शेर कहे थे। इसके बाद दस वर्षों तक वे जीवित रहे और इस दौरान ही उन्होंने शायरी की। दाग़िस्तानी ने “रेयाज़ुश्शोअरा” नामक अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि उनके काव्यसंकलन को फ़क़ीर देहलवी ने एकत्रित किया है। उनके बहुत से शेरों को मीर शमसुद्दीन फ़क़ीर देहलवी अब्बासी ने भी एकत्रित किया है जिनकी कुल संख्या चार हज़ार बताई जाती है।

“तज़केरए मरदुम दीदे” के लेखक हाकिम लाहौरी का कहना है कि दाग़िस्तानी के लगभग सात हज़ार शेरे मौजूद हैं। इसकी अन्य स्थान पर पुष्टि भी हुई है। रामपुन की रज़ा लाइबरेरी में मौजूद दाग़िस्तानी के एक काव्य में 6821 बैत मौजूद हैं। इस काव्य में 18 क़सीदे, 561 ग़ज़लें, तीन मसनवी और 547 रुबाइयां पाई जाती हैं। उनके इस काव्य में उनकी अन्य पुस्तकों की तुलना में अधिक शेर मौजूद हैं। हालांकि इसमें दाग़िस्तानी के वह दो क़सीदे मौजूद नहीं हैं जो लंदन के इंडियाना आफ़िस तथा रेयाज़ुश्शोअरा में पाए जाते हैं।

वालेह दाग़िस्तानी ने तुर्की, फ़ारसी और उर्दू में शेर कहे हैं। उनके काव्य में एक ग़ज़ल तुर्की में और एक रुबाई उर्दू में भी है। हालांकि वालेह दाग़िस्तानी, फ़ार्सी कविता के जानेमाने कवि थे किंतु खेद की बात यह है कि उनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।

दाग़िस्तानी के व्यक्तित्व के बारे में उनकी जीवनी में हाकिम लाहौरी लिखते हैं कि वे अपने ही शेर बहुत पढ़ते थे। कभी-कभी दाग़िस्तानी रात के पहले पहर से सुबह तक शेर पढ़ा करते थे। कवियों का कहना है कि उनके शेर बहुत ही प्रभावी और अर्थपूर्ण हुआ करते थे।

अक़दे सुरैया के लेखक मुसहफ़ी हमदानी ने भी वालेह दाग़िस्तानी की कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा है कि हालांकि कहीं-कही पर उनके शेर नियमों के अनुरूप नहीं होते थे किंतु वाकपुटता की दृष्टि से वे बहुत गहरे हुआ करते थे। ख़ान आरज़ू, आज़ाद बिलग्रामी, आज़र बेगदिली, फ़क़ीर देहलवी और इसी प्रकार के बहुत से साहित्यकारों ने दाग़िस्तानी की रचनाओं और उनकी कविताओं का उल्लेख किया है।

बताया जाता है कि वर्तमान समय में संसार के विभिन्न पुस्तकालयों में वालेह दाग़िस्तानी के काव्य की 16 प्रतियां मौजूद हैं। इशक़ के बारे में उनके शेरों की स्वयं उन्होंने तथा अन्य बहुत से कवियों ने प्रशंसा की है। वालेह दाग़िस्तानी के हाथों की लिखी बयाज़ नामक पुस्तक दिल्ली की ग़ालिब एकेडमी में मौजूद है। यह किताब उन्होंने सन 1148 हिजरी में फ़ार्सी भाषा के कवियों और लेखकों के बारे में अब्दुल हकीम मासूम अलीख़ान के अनुरोध पर लिखी थी।

दाग़िस्तान के शेरों के अतिरिक्त उनके कुछ पत्र भी हैं जो उनकी यादगार के रूप में मौजूद हैं। यह एसे पत्र हैं जिन्हें दाग़िस्तानी ने अलग-अलग लोगों को विभिन्न विषयों पर भेजे थे। इनमें से कुछ गद्ध के रूप में तो कुछ पद्ध के रूप में हैं। इन्हीं पत्रों में कुछ पत्र वे ही हैं जिन्हें दाग़िस्तान ने अपनी प्रेमिका ख़दीजा के लिए लिखा था जो रामपूर की रज़ा लाइब्रैरी में रखे हुए हैं।

वाले दाग़िस्तानी की महत्वपूर्ण रचना का नाम रेयाज़ुश्शोअरा है। यह किताब उन्होंने भारत की यात्रा के दौरान लगभग 1160 से 1162 हिजरी के बीच लिखी थी। हालांकि सही तारीख़ के बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया है। किताब के अध्ययन से जो जानकारियां मिलती हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि इसका आरंभ 1160 हिजरी के निकट ही किया गया होगा।

वालेह दाग़िस्तानी इब्राहीम ख़लीफ़ा के संबन्ध में लिखते हुए बताते हैं कि इस रचना के लिखे जाने के समय तक अर्थात 1160 में शाहजहांपूर में थे। इसी प्रकार क़ज़लबाश ख़ान उम्मीद के बारे में वे लिखते हैं कि 1160 हिजरी से मैंने यह लिखना शुरू किया।

रेयाज़ुश्शोअरा में 2551 कवियों के जीवन, उनके दृष्टिकोण और उनकी साहित्यिक टीका-टिप्पणी के बारे में लिखा गया है। इसकी गणना फारसी भाषा की महत्वूपूर्ण साहित्यिक किताबों में होती है। मोहसिन नाजी नस्राबादी ने इसमें सुधार करके इसको 5 प्रतियों में बांटा है। इसमें से 4 प्रतियां तो कवियों के जीवन के बारे में जबकि एक अन्य प्रति किताब में पाए जाने वाले विषयों के बारे में है। इसको सन 2005 में ईरान में प्रकाशित किया जा चुका है।

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