साहित्य

हे महादेव! हो कहाँ…?…धरा है कराह रही….मंजुल सिसोदिया

मंजुल सिसोदिया
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हे महादेव !हो कहाँ?
धरा है कराह रही।
शब्द भी डरे हुये,
भाव हैं सहम गये।
धुआँ है शहर शहर,
प्रकृति का कैसा क़हर।
कंधों को तरस रही,
पडी़ हैं कितनी अरथियाँ।
चितायें हैं चेता रही,
दे रही चेतावनी।
हे महादेव! हो कहाँ?
धरा है कराह रही।
घर आँगन क्यूँ?
अंगारों से दहक गये।
इतनें पर भी,,,,,,,,,,,
नेता क्यूँ सटक गये?
कुर्सी की चमक देख,
कैसे, बच्चों से मचल गये।
साम, दाम, दंड, भेद,
सब,हैंअपना रहे।
हे महादेव! हो कहाँ?
धरा है कराह रही।
कोरोना आ जाये चाहे,
आ जाये उसका बाप भी।
प्राण चले जायें भले,
कुर्सी न जाये कभी।
वीभत्स राग है छिडा़,
वक्त है ज़िद पे अडा़।
आकाश भी है देखता,
मूक है बना हुआ।
हे महादेव!हो कहाँ?
धरा है कराह रही।
फिर भी नेता क्यूँ ?
निडर हैं बनें हुये।
झोंक रहे मानुष को,
काल के गाल में।
शक्ल भी न दिखायेंगे,
पडे़ हुये अकाल में।
चीत्कार कर रही,
माँओं की सूनी गोदियाँ।
हे महादेव! हो कहाँ?
धरा है कराह रही।
मांगने पर देंगे क्या?
भूखों को देंगे रोटियां।
कुर्सी के निमित्त हैं जो,
नौच रहे इक दूजे की बोटियाँ।
दिन हैं क्या दिखा दिये,
प्राण सब के थका दिये।
जब न रहेगा कोई,
राज किस पे करोगे तुम।
खु़दा जब मांगेगा,
जवाब कैसे दोगे तुम?
हे महादेव!हो कहाँ?
धरा है करा रही।
शब्द है डरे हुये,
भाव हैं सहम गये।
हे महादेव! हो कहाँ,,,,,,,,,,,,,, ?
मंजुल सिसोदिया

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