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क़रीब आ रहे हैं ईरान और सऊदी अरब : रिपोर्ट

सऊदी अरब के अधिकतर अधिकारियों को अकसर यह शिकायत रहती है कि ईरान इलाक़े में अस्थिरता फैला रहा है। लेबनान से लेकिर सीरिया, इराक़, यमन और ख़ुद सऊदी अरब के भीतर तक हर जगह ईरान सक्रिय है मगर हमारे विचार में सऊदी अधिकारियों की सबसे बड़ी ग़लती यही है कि वह इस पूरे इलाक़े में अस्थिरता और अशांति के मूल कारण को देखना ही नहीं चाहते।

सऊदी विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ने हाल ही में कहा कि ईरान से क़रीब होने का अच्छा अवसर है बल्कि उसके साथ साझीदारी भी हो सकती है मगर शर्त यह है कि ईरान इलाक़े में अस्थिरता पैदा करने वाला अपना रवैया बदले और यमन में बम बनाने वाले आतंकियों की मदद रोक दे। सऊदी विदेश मंत्री यह क्यों भूल जाते हैं कि यमन पर छह साल से बमों की बरसात सऊदी अरब कर रहा है, सऊदी अरब ने सीरिया को गृह युद्ध की आग में झोंकने के लिए अरबों डालर की रक़म पानी की तरह बहाई, सऊदी अरब ने इराक़ पर अमरीका के हमले की खुलकर मदद की, सऊदी अरब ने लीबिया पर नैटो के हमले में साथ दिया। यह सारी गतिविधियां अरब जगत को भयानक संकट में डाल देने वाली साबित हुईं। सऊदी अरब यह सब कुछ कर रहा है और उसका दावा है कि वह ईरान के एजेंडे को नाकाम बनाने के लिए काम कर रहा है।

ईरान भी सऊदी अरब और दूसरे देशों की तरह अपने हितों की रक्षा करता है और इलाक़े में अपना असर और प्रभाव बढ़ाने के लिए एजेंडे पर काम कर रहा है मगर सबसे बड़ा फ़र्क़ यह है कि ईरान अपना एजेंडा अपनी क्षमताओं और संसाधनों की मदद से आगे बढ़ा रहा है, अपनी रक्षा शक्ति में विस्तार करके अपनी योजनाओं को लागू कर रहा है मगर अरब देशों की बात की जाए तो वे अपने संसाधन तो इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन अपने एजेंडे के लिए नहीं बल्कि अमरीका और इस्राईल के एजेंडे पर अपनी दौलत लुटा रहे हैं। अरब देशों ने अपने ही अरब पड़ोसियों को तबाह करने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है। इराक़, सीरिया, लीबिया, यमन में इसकी मिसालें साफ़ नज़र आ जाएंगी। अरब सरकारों ने फ़िलिस्तीन मुद्दे जैसे अरब जगत के सबसे प्रमुख विषय को अमरीकी व इस्राईली एजेंडे के चक्कर में पड़कर भुला दिया।

सऊदी विदेश मंत्री को यह ग़लतफ़हमी है कि ईरान सऊदी अरब के क़रीब जाने के लिए बेताब है। हम इसे ग़लतफ़हमी इसलिए कहते है कि इलाक़े में परिवर्तनों को देखिए तो साबित होता है कि सारे हालात ईरान के फ़ेवर में बदलते जा रहे हैं।

ईरान ने चीन के साथ 25 साल का बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक व रणनैतिक समझौता किया है जिसके तहत चीन इस देश में 450 अरब डालर का महत्वपूर्ण निवेश करेगा।

दूसरी बात यह कि अमरीका भी ईरान के साथ समझौते की कोशिश में लगा हुआ है और परमाणु समझौते में वापस जाना चाहता है जिससे वह ट्रम्प के शासनकाल में निकल गया था। ईरान मज़बूत स्थिति में है और मांग कर रहा है कि अमरीका पहले सारे प्रतिबंध हटाए उसके बाद कोई बात करे।

तीसरी बात ईरान एक मज़बूत एलायंस का हिस्सा बनता जा रहा है जिसमें रूस और चीन जैसी शक्तियां शामिल हैं जबकि पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की भी इसका हिस्सा बन सकते हैं।

चौथी बात यह है कि ईरान ने इराक़, यमन, लेबनान और फ़िलिस्तीन में अपने भाइयों की मदद के लिए अपने संसाधन इस्तेमाल किए और अरब सरकारों का यह हाल है कि वह अमरीका और इस्राईल की गोद में छलांग लगाकर बहुत ख़ुश हो रही हैं।

ओबामा प्रशासन ने सऊदी अरब को धोखा देते हुए ईरान से समझौता कर लिया था जबकि इस बीच सऊदी अरब को वह हथियार भी बेच रहा था। हो सकता है कि वही सीन एक बार फिर दोहाराया जाए और बाइडन भी सऊदी अरब को एक बार फिर ठेंगा दिखाते हुए ईरान से समझौता कर लें।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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