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कुछ बहुत बड़ा होने वाला है : एक बड़ी जंग का मैदान सज रहा है : रिपोर्ट

अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से दिल पर पत्थर रख कर निकल रहा है, जाते जाते वो एशिया में जंग का माहौल तैय्यार कर रहा है, अफ़ग़ानिस्तान दो दशक से एशिया की राजनीती का ‘केंद्र’ बना रहा है, अमेरिका और उसके सहियोगी देशों को तालिबान के हाथों बहुत बुरी शिकश्त हासिल हुई है, आज वो दुनियांभर में अपना असर खो चुका है, अमेरिका जो अबसे 20 साल पहले था वो अब नहीं है वहीँ अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका के हमले के वक़्त जिस पोजीशन में तालिबान थे वो अब नहीं है, आज तालिबान विश्व विजेता है, उसने पूरी दुनियां को शिकश्त दी है, आज का अमेरिका कमज़ोर, पिटा हुआ है, अफ़ग़ानिस्तान के आलावा सीरिया, यमन, इराक में उसे ज़बरदस्त मार खानी पड़ी है, उधर दुनियां के अंदर शक्ति के समीकरण बदल गए हैं, इस वक़्त चीन और रूस अमेरिका को कहीं भी टिकने का मौका नहीं दे रहे हैं

याद रखें पाकिस्तान, भारत, ईरान आदि कई देशों में अफ़ग़ानिस्तान की राजनीती का असर रहता है, अफ़ग़ानिस्तान में दुनियां के सभी बड़े और शक्तिशाली देश अपनी अपनी जंग लड़ रहे हैं, अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने का सबसे ज़यादा नुक्सान भारत को उठाना पड़ेगा जबकि सबसे ज़यादा फ़ायदा पाकिस्तान, चीन और रूस को होना है

जानकारी के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान के अंदर 7 ट्रिलियन डॉलर्स से ज़यादा के ख़ज़ाने उसकी ज़मीन के अंदर मौजूद हैं, इन ख़ज़ानों में सोना, हीरे, यूरेनियम, पेट्रोलियम, गैस और इलेक्ट्रॉनिँक्स में काम आने वाले मटेरियल शामिल हैं, चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में खर्च करने के लिए 200 ट्रिलियन डॉलर का बजट रखा है, जैसे ही अफ़ग़ानिस्तान में अमन होगा चीन की कंपनियां वहां अपना काम स्टार्ट कर देंगी

अफ़ग़ानिस्तान के अंदर मौजूद ख़ज़ानों पर अमेरिका, इसराइल, फ्रांस, UK आदि की नज़र भी है मगर जंग की हार के बाद अब ये देश नयी जंग शुरू करने वाले जिसकी ज़द में एशिया के अन्य कई देश भी आ सकते हैं, सूत्रों के मुताबिक इस समय अफ़ग़ानिस्तान में 28 हज़ार ब्लैक वॉटर के आतंकवादी मौजूद हैं, तक़रीबन 20 हज़ार दाईश के आतंकवादी हैं, साथ ही 5-7 हज़ार तहरीके तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादी हैं, अमेरिका ने इन सभी आतंकवादियों को एक जुट कर दिया है और इनके सुपुर्द तालिबान से मुकाबले का काम कर दिया है, इस के आलावा जो बाइडेन की सरकार अशरफ गनी सरकार को 37 ब्लैक हॉक हेलीकाप्टर देने जा रही है, दो अन्य हेलीकाप्टर भी दिए जा रहे हैं, अशरफ गनी किसी भी सूरत में तालिबान के साथ सत्ता को साझा करना नहीं चाहता है बल्कि अब उसने अमेरिका के कहने पर तालिबान से लम्बी लड़ाई का फ़ैसला कर लिया है

अमेरिका पाकिस्तान से इस वक़्त चीन से ज़यादा तपा-भुना हुआ है, इतिहास में पहली बार पाकिस्तान ने अमेरिका को किसी बात पर ‘अब्सोल्युटली नॉट’ कह दिया है, इमरान ख़ान वैसे तो खुद ही बहुत तेज़तर्रार इंसान हैं और दबाव कितना भी हो उन से उम्मीद की जाती है कि उसमे आने वाले, ये उनके एक महान खिलाडी होने की खूबी कही जा सकती है साथ ही पाकिस्तान के पीछे चीन और रूस खुल कर खड़े हैं, चीन और रूस ने पाकिस्तान को हर तरह की मदद का भरोसा दे रखा है, इमरान खान ने अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने के लिए अपनी ज़मीन देने से इंकार कर दिया है जिसके बाद बाइडेन इमरान खान को सख्त सज़ा देना चाहता है साथ ही वो चीन का भी खेल ख़त्म करने की तरक़ीब सोच रहा होगा, जानकारी के मुताबिक इमरान खान की जान को ख़तरा देखते हुए पाकिस्तान की सेना ने उनकी सुरक्षा तीन गुना अधिक कर दी है

अमेरिका की प्लानिंग को इमरान खान ने धवस्त कर दिया जिसके बाद अब नए प्लान पर काम स्टार्ट कर दिया गया है, बाइडेन प्रशासन ने अशरफ गनी पर दाव लगा दिया है, उसे कहा गया है कि वो तालिबान के ख़िलाफ़ पूरी ताकात झोंक दे, इसके लिए तालिबान पर ज़यादा से ज़यादा हवाई हमलों के लिए कहा गया है, और अगर तालिबान काबुल पर कब्ज़े के लिए आगे बढ़ते हैं तो उन पर सैंकड़ों हेलीकॉप्टरों, लड़ाकू विमानों से गोलाबारी की जाएगी, अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान को पूरी तरह से सिविल वॉर में धकेलना चाहता है साथ ही इस लड़ाई को वो किसी न किसी तरह से पाकिस्तान ले जाना चाहता है, पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान की जंग में घसीटने के लिए आसान तरकीब है कि अमेरिका या उसके किसी सहियोगी देश में कोई वारदात अंजाम दी जाये और फिर उसमे पाकिस्तान के अंदर के आतंकवादियों के शामिल होने का ऐलान कर पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जाये

चीन 15 महिनों से लद्दाख में कब्ज़ा किये बैठा है, इस दौरान 12 दौर की 22 बार वार्ता हो चुकी है मगर नतीजा कुछ नहीं निकला है, सूत्रों के मुताबिक अब तो चीन ने उल्टा पहाड़ा पढ़ना शुरू कर दिया है कि पूरा लद्दाख उसका है और जहाँ भारत है वो उसका हिस्सा है जिस पर भारत ने कब्ज़ा किया हुआ है, ऐसी सूरत में भारत के पास आज नहीं तो कल लड़ाई के आलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा है, मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 50 हज़ार सैनिकों की नयी तैनाती लद्दाख के उन इलाकों में की है जहाँ चीन ने कब्ज़ा किया हुआ है, अब वहां भारत की दो लाख सेना मौजूद है उधर कोरोना काल में ही चीन ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं, उसने लद्दाख के कब्ज़ा किये इलाके में बैरीकें, बंकर, हेलिपैड, रनवे बना लिए हैं जबकि LAC पर S-400 एंटी मिसाइल सिस्टम, डबल इंजन लड़ाकू विमान, पहाड़ों में लड़ने वाले विशेष विमान, हेलीकाप्टर, आधुनिक ड्रोन, 5G इंटरनेट स्थापित कर लिया है

अमेरिका ऐसा देश है जिसका कोई दोस्त नहीं है, उसका जब तक अपना फ़ायदा होता है तब तक किसी भी देश से सम्बन्ध रखता है, इस समय उसे भारत की ज़रूरत है, पाकिस्तान और चीन से भारत के अपने मामलात ख़राब हैं ही इस सिचुएशन से अच्छा मौका और क्या हो सकता है, ऐसे में बहुत संभव है कि भारत का चीन या पाकिस्तान से युद्ध देखने को मिल जाए, वैसे भी देश के अंदर के हालात सरकार विरोधी हैं, किसान आंदोलन, कोरोना से तबाही, बेरोज़गारी, ग़रीबी, नौकरियों का अकाल, काम धंधे समाप्त हो चुके हैं, सरकार बुरी तरह से समस्याओं में घिरी हुई है, 10-15 दिन की झड़प अगर किसी देश से हो जाती है है तो अंदर के सभी मसले/मुद्दे एक झटके में ख़त्म हो सकते हैं

युद्ध की स्थिति में अमेरिका का हथियारों का कारोबार आसमान छूने लगेगा, उस बेशुमार कमाई होगी, भारत के अंदर राष्ट्रवाद की व्यार बहने लगेगी, टीवी चैनलों पर एंकर सैनिकों की वर्दी में नज़र आने लगेंगे

ख़तरा हक़ीक़त में मंडरा रहा है, अगर भारत की पाकिस्तान से जंग होती है तब भी चीन उसमे शामिल हो जायेगा और अगर चीन से भारत का युद्ध होता है तो पाकिस्तान चीन की तरफ से ज़रूर लड़ाई में शामिल हो जायेगा वहीँ इस सूरत में अमेरिका और क्वाड के देश साउथ चीन सी में चीन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल सकते हैं, इस तरह से देखें तो भारत, पाकिस्तान, चीन को एक साथ दो मोर्चों पर जंग करना पड़ेगी

रूस यहाँ चीन और पाकिस्तान के साथ होगा, अहम् भूमिका होगी फिर ‘तालिबान’ की, भारत अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका और अशरफ़ गनी की सरकार के साथ है, हाल ही में पाकिस्तान के लाहौर में जौहर कॉलोनी में आतंकवादी हमला हुआ था, ये हमला हाफ़िज़ सईद के मकान से दो मकान पहले हुआ था, पाकिस्तान के मीडिया ने इस हमले के लिए भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी RAW को ज़िम्मेदार ठहराया था, पाकिस्तान मीडिया के मुताबिक RAW ने अफ़ग़ानिस्तान में बैठ कर ये हमला करवाया है, तालिबान ऐलान कर चुके हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल किसी भी देश को किसी भी देश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं करने देंगे, तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच होने वाली निर्णायक लड़ाई में अब ज़यादा वक़्त बाकी नहीं बचा है, जुलाई के मध्य तक सभी विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से निकल जायेंगे, उसके बाद बहुत से बहुत दो महिने के अंदर तालिबान अशरफ गनी की सरकार का THE END कर देंगे, काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद भारत को बड़ा नुक्सान होगा, भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में भारी इन्वेस्टमेंट कई फीलड में किया हुआ है वो डूब जायेगा, ख़ास कर भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों को वहां से निकलना पड़ेगा, जिसका असर भारत की पाकिस्तान को लेकर जारी नीतियों पर पड़ेगा, भारत बलोचिस्तान में बिज़ी है, अफ़ग़ानिस्तान से बेस ख़त्म होने के बाद वहां जारी सारा ऑपरेशन खटाई में पड़ जायेगा, लोकल बलूचियों से सम्पर्क टूट जायेगा

एशिया में युद्ध की आशंकाओं से इस समय कोई भी इनक़ार नहीं कर सकता है, माना जा रहा है कि सितम्बर के महिने में लड़ाई शुरू हो सकती है, सितम्बर के बाद पहाड़ों पर बर्फ जमने लगती है, ठन्डे मौसम में लड़ने से कई फ़ायदे हैं, चीन के सैनिकों को उस मौसम में लड़ने का कोई अनुभव नहीं है, साथ ही पैदल सेना का मूवमेंट उस मौसम में बहुत लिमिटेड होगा, ज़यादतर कार्यवाहियां हावई या मिसाईल हमलों तक सीमित रहेंगी, इस में सैनिकों के हताहत होने का ख़तरा बहुत कम होता है और फिर जंग शुरू होने पर 10-15 दिन के अंदर विश्व के तमाम बाक़ी देश जंगबंदी करवाने के लिए मैदान में आ ही जायेंगे

अभी एक दिन पहले जम्मू में हाई सेक्युर्टी इलाके में वायु सेना के बेस पर ड्रोन हमला हुआ था, ये हमला आने वाले समय में होने वाली जंग का इशारा समझा जा सकता है, पुलवामा टाइप की घटनायें होती नहीं हैं करवायी जाती हैं, करवाने वाले कौन होते हैं ये बड़े ”राज़” की बात है, राज़ जिनके तार न जाने कहाँ से कहाँ तक फैले होते हैं

ओरेँज खाने से वजन कम होता है ऐसा हाकिम लोग कहते हैं, जो होगा वो हो के रहेगा, अमेरिका ऐसा ही चाहता है तो हम-आप क्यों फ़ालतू में परेशान हों, परेशान तो नागपुर के लोग भी नहीं होते वहां संतरा बहुत होता है, पुलवामा में अख़रोट और उम्दा क़िस्म की ‘केसर’ पैदा होती है,,,केसर मर्दाना ताक़त के लिए बहुत मुफ़ीद होती है, मर्दाना ताक़त की ज़रूरत स्वम सेवी लोगों को नहीं होती, वो अपना हर काम खुद करते हैं,,,परवेज़ ख़ान

अमर उजाला से ये रिपोर्ट देखें

ड्रोन हमले की इनसाइड स्टोरी

जम्मू में वायुसेना के टेक्निकल एयरपोर्ट पर ड्रोन से हमला होता है। उसके अगले दिन रतनूचक्क इलाके में सेना की ब्रिगेड हेडक्वार्टर पर ड्रोन दिखाई पड़ता है। ये सब महज एक संयोग नहीं है। ड्रोन हमले की बाकायदा एक इनसाइड स्टोरी है। इसमें चूक, तकनीक का अभाव और पड़ोसी देश की हताशा छिपी है। साथ ही पाकिस्तान के मीरपुर जिले में झेलम नदी के पास स्थित ‘मंगला’ डैम का इलाका भी इसी कहानी का हिस्सा है। मंगला डैम इलाके में पाकिस्तानी सेना, आईएसआई व आतंकी संगठनों को ड्रोन हमले की ट्रेनिंग दी जाती है।

जम्मू कश्मीर के रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, ड्रोन जम्मू एयरफोर्स स्टेशन तक पहुंच जाता है, अगले दिन फिर वही घटना दोहराई जाती है, लेकिन पता नहीं चला कि ड्रोन कहां से आया है।

जम्मू एयरफोर्स स्टेशन से पाकिस्तान बॉर्डर की वायु मार्ग दूरी 14 किलोमीटर है, जबकि सड़क के द्वारा 22 किलोमीटर है। दरअसल, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के पास अभी तक एंटी ड्रोन सिस्टम का अभाव है। चीन, 3600 ड्रोन एक साथ उड़ाकर यह दिखाता है कि उन्हें कंट्रोल कैसे किया जाता है, वहां से भारत को बहुत कुछ सीखने की जरुरत है।

एंटी ड्रोन तकनीक को लेकर धरातल पर कुछ नहीं हुआ
ड्रोन अटैक कोई नई बात नहीं है। चार पांच साल से इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। राजस्थान, गुजरात व पंजाब में ड्रोन के जरिए हथियार और ड्रग्स तो पहले भी आते रहे हैं। बीते आठ जून को जम्मू कश्मीर में ड्रोन से आई ड्रग्स पकड़ी गई थी।

खतरा बड़ा है, परमाणु संयंत्र भी जद में आ सकते हैं
रक्षा विशेषज्ञ अनिल गौर कहते हैं, पिछले तीन चार साल से एंटी ड्रोन सिस्टम लाने की बात चल रही है। धरातल पर कुछ नहीं हो सका है। अब ड्रोन के जरिए सैनिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है। इसके बाद पावर प्लांट, रिफाइनरी, न्यूक्लियर प्लांट, डैम और आयुध कारखाने भी ड्रोन हमले की जद में आ सकते हैं।

सऊदी अरब में ड्रोन हमले से रिफाइनरी को तबाह कर दिया गया था। आर्मेनिया-अजरबैजान की लड़ाई में ड्रोन की मदद से सैनिक ठिकाने, टैंक और हथियारों के जखीरे खत्म कर किए गए। भारत में अभी तक एंटी ड्रोन सिस्टम ही नहीं है। अगर ड्रोन दिख गया तो मार गिराएंगे। बकौल अनिल गौर, भारत पाकिस्तान बॉर्डर तो हजारों किलोमीटर लंबी है, कहां-कहां पर ड्रोन को देखकर शूट करेंगे।

रडार की पहुंच से दूर हैं क्वार्डकॉप्टर जैसे छोटे ड्रोन
इस्राइल, रूस और अमेरिका के पास बेहतरीन एंटी ड्रोन सिस्टम हैं। दूसरी तरफ भारत सरकार तीन साल से किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सकी। गणतंत्र दिवस पर डीआरडीओ की तरफ से कहा गया कि एंटी ड्रोन सिस्टम विकसित किया गया है, लेकिन उसके बाद क्या डेवेलपमेंट हुआ, कोई नहीं जानता।

ड्रोन गिराने वाले उपकरणों की कमी
आर्मी, एयरफोर्स, बीएसएफ और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के पास ऐसे तकनीकी उपकरणों का अभाव है, जिनकी मदद से ड्रोन को समय रहते गिराया जा सके। क्वार्ड कॉप्टर जैसे छोटे साइज वाले ड्रोन मौजूदा रडार प्रणाली की पहुंच से दूर हैं। छोटे ड्रोन का झुंड हो तो भी पता नहीं लगता, बड़ा ड्रोन ही रडार की जद में आ सकता है।

ड्रोन गन: एक किलोमीटर तक के दायरे में काम करती है। इसके द्वारा ड्रोन के रेडियो सिग्नल को जाम किया जा सकता है।

ड्रोन कैचर: इसके द्वारा उड़ते हुए ड्रोन पर जाल फेंका जाता है।

स्काईवॉल: इसमें नीचे से शूट किया जाता है। यह भी एक तरह का जाल होता है।
स्काई ड्रोन सिस्टम: इसमें पांच सौ से एक हजार मीटर की दूरी तक ड्रोन की फ्रीक्वेंसी कम कर दी जाती है। इस तकनीक की मदद से वह ड्रोन गिर जाता है।

चीन ने बनाए पक्षी जैसे दिखने वाले ड्रोन
रडार क्रॉस सेक्शन की मदद से पक्षी आकार के ड्रोन का पता लगाना मुश्किल होता है। चीन ने ऐसे ड्रोन तैयार किए हैं, जिन्हें देखकर मौजूदा रडार सिस्टम यह तय नहीं कर पाता कि वह पक्षी है या ड्रोन है।


महंगे हैं इस्राइल व रूस के एयर डिफेंस सिस्टम
सुरक्षा मामलों से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार, परंपरागत एयर डिफेंस सिस्टम में इस्राइली स्पाइडर और रूस में निर्मित ओएसए-ओके से केवल छोटे ड्रोन का पता चल सकता है, लेकिन इनकी कीमत बहुत ज्यादा है। नेवी के लिए स्मैश 2000 प्लस एंटी ड्रोन सिस्टम लाया गया है। आर्मी व दूसरे केंद्रीय सुरक्षा बलों को ऐसा सिस्टम मुहैया कराया जा सकता है।

सैनिक ठिकानों के आसपास बढ़ती तादाद बड़े खतरे का संकेत
रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन (रिटायर्ड) अनिल गौर ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया, जम्मू के आसपास बेतरतीब ढंग से लोग बसाए जा रहे हैं। जिस एयरफोर्स स्टेशन के पास ड्रोन हमला हुआ है, वहां से तीन सौ गज दूरी पर तवी नदी का किनारा है। वहां पर अवैध लोगों ने बसेरा कर लिया है।

कई तरह की चूक नजर आई
रोहिंग्या मुस्लिमों की भारी संख्या जम्मू में रह रही हैं। इनके पास पैन कार्ड और आधार कार्ड भी हैं। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि इन्हें सीमा पार से आर्थिक मदद मिलती है। नगरोटा में सैन्य प्रतिष्ठान के निकट पूर्व डिप्टी सीएम निर्मल सिंह ने अपना आवास बना लिया है। उन्हीं के पास कवींद्र गुप्ता को भी जमीन अलॉट कर दी गई। बकौल अनिल गौर, ये नौ मैन्स लैंड है, इसके बावजूद यहां जमीनें दी जा रही हैं। आर्मी ने इस मामले में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह एक बड़ी लापरवाही है। सेना ब्रिगेड के क्षेत्र में इस तरह का निर्माण सुरक्षा चक्र को भेद रहा हैं। आने वाले समय में यह बड़ी मुसीबत का संकेत है। सुरक्षा एजेंसियों को अंडर ग्राउंड वर्कर तलाशने होंगे। स्लीपर सेल की जानकारी रखनी होगी। इंटेलिजेंस अगर पुख्ता है तो ड्रोन कहां से आया और किस जगह वापस चला गया, ये सब अभी तक पता लग जाना चाहिए था। ये भी तो संभव है कि जम्मू के ही किसी इलाके से ड्रोन उड़ा हो। कई तरह की चूक तो हुई है।

पाकिस्तान का सीज फायर और आतंकी हमले के तार जुड़ रहे
पिछले कुछ माह से पाकिस्तान सीमा पर संघर्ष विराम यानी सीज फायर का पालन कर रहा है। बॉर्डर पर फायरिंग बंद है। घाटी में भी शांति रही है। लेकिन पिछले सप्ताह से आतंकियों ने कई घटनाओं को अंजाम दिया है। एकाएक इन घटनाओं में तेजी आ गई।

पाक को था एफएटीएफ का भय इसलिए फायरिंग बंद की
इस बाबत अनिल गौर कहते हैं, मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीति बनाने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) का डर पाकिस्तान को सता रहा था। उसने फायरिंग बंद की और आतंकियों के खिलाफ छोटी मोटी कार्रवाई कर यह दिखाना चाहा कि वह आतंक के खिलाफ है। एफएटीएफ की बैठक में पाकिस्तान को एक बार फिर ग्रे लिस्ट में बनाए रखने का फैसला किया गया।

एफएटीएफ के अध्यक्ष मार्कस प्लेयर ने कहा, पाकिस्तान को जो सुझाव दिए गए थे उनमें उसने काफी प्रगति की है। 27 में से 26 शर्तों को पूरा किया है, लेकिन अभी उसे आतंकवादियों को ज़िम्मेदार ठहराने और उन्हें सजा देने की दिशा में काम करना बाक़ी है। ऐसे में पाकिस्तान की बौखलाहट बढ़ गई।

इसलिए शुरू किए ड्रोन हमले
चूंकि भारतीय सेना बॉर्डर पर या सीमा के भीतर जब आतंकियों को मारती है तो पाकिस्तान को आतंक के मुद्दे पर घेर लिया जाता है। इसके चलते अब पाकिस्तान ने ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया है। मंगला डैम इलाके में क्वार्डकॉप्टर ड्रोन की ट्रेनिंग पर खास फोकस है। ये 4 से 6 पंखों वाला छोटा ड्रोन होता है। यह 18 से 20 किलो सामान ले जा सकता है। वहां पर चीन में निर्मित हाईटेक ड्रोन के अलावा आर्मेनिया-अजरबैजान की लड़ाई में इस्तेमाल हुए ड्रोन भी मौजूद हैं। इसके लिए भारत को एंटी ड्रोन सिस्टम, जितनी जल्दी हो सके, विकसित करना होगा।

सीमापार आतंकवाद हाईटेक हुआ, रक्षा विशेषज्ञों ने जताई चिंता

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों, एनएसजी के पूर्व अधिकारियों और सैन्य अधिकारियों में जम्मू में वायु सेना के अड्डे पर हुए विस्फोट को लेकर काफी बेचैनी है। उनके मुताबिक आतंकियों ने ड्रोन से हमला कर बड़ा संदेश दिया है। यह बेचैनी साउथ ब्लाक में भी है और सभी को फोरेंसिक जांच रिपोर्ट विस्तृत ब्यौरे का इंतजार है।

ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) सपन चटर्जी के अनुसार आतंकियों का सबसे बड़ा संदेश तो यही है कि भारत के सैन्य ठिकाने सुरक्षित नहीं हैं। आतंकी जब चाहेंगे, निशाना बना लेंगे। दूसरा बड़ा संदेश यह है कि भारत में सीमा पार का प्रायोजित आतंकवाद हाईटेक हो चुका है।

पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह जम्मू एयरफोर्स स्टेशन पर हुई आतंकी घटना को काफी गंभीरता से लेते हैं। एयर वाइस मार्शल का कहना है कि पाकिस्तान के पास इस क्षमता के छोटे ड्रोन होने की सूचना ही बड़ी बात है। सिंह कहते हैं कि उन्हें यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रायोजित ही लग रहा है। ड्रोन द्वारा बम लेकर एयरफोर्स स्टेशन तक आना एक बात है। इस बम का छोड़ा जाना और गिरते ही फट जाना दूसरी और गंभीर बात है। इसका अर्थ यह कि आतंकियों के पास न केवल तकनीकी रूप से सक्षम ड्रोन हैं, बल्कि उन्नत किस्म के (इम्पैक्ट इम्प्रूव्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोटक भी हैं।

क्या रहा होगा आतंकियों का उद्देश्य?
ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) सपन चटर्जी का कहना है कि अफगानिस्तान की सीमा को लेकर पाकिस्तान के ऊपर बहुत दबाव बढ़ा है। भारत ने अफगानिस्तान में अपने हितों की रक्षा के लिए थोड़ी तेजी दिखाई है। इसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को तंग किया होगा। दूसरा बड़ा कारण जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक, शांति और स्थायित्व के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ाने का प्रयास भी हो सकता है। क्योंकि इससे न केवल पाकिस्तान, बल्कि चीन की भी चिंता बढ़ेगी।

सपन चटर्जी के इस विश्लेषण से वाइस एयर मार्शल सिंह और रक्षा मामलों के जानकार रंजीत कुमार भी सहमत हैं। एनबी सिंह का कहना है कि एक दृष्टि से देखा जाए तो ड्रोन हमला करके आतंकियों का मकसद कोई बड़ा नुकसान या दहशत फैलाना नहीं था। उन्होंने जो स्थान चुना है, उसका मकसद केवल हमारी सुरक्षा व्यवस्था को ये बताना और यह संदेश देना भर था कि वह कहीं भी और कभी भी घुस सकते हैं।

आतंकियों के पास ड्रोन और इम्पैक्ट आईडी विस्फोटक?
वाइस एयर मार्शल और ब्रिगेडियर चटर्जी दोनों का कहना है कि ड्रोन की तकनीक में चीन का जवाब नहीं है। उसके पास उन्नत किस्म की फ्लाइंग बर्ड्स हैं। लेकिन पाकिस्तान के पास इस तरह की तकनीक होने में संदेह है। इसी तरह से ड्रोन ने जो विस्फोटक गिराया है, वह जमीन पर आते ही फटा (विस्फोट हुआ) है। इसका अर्थ यह हुआ कि आतंकियों ने इम्पैक्ट आईडी का इस्तेमाल किया है। दोनों तकनीकों का आतंकियों के पास आना कोई सामान्य बात नहीं है। हालांकि सपन चटर्जी कहते हैं कि इस तरह का ड्रोन हमला दो साल पहले सऊदी अरब के तेल भंडार पर हुआ था। लेकिन फिर भी घटना गंभीर है। समझा जा रहा है कि अभी विस्फोट की जांच चल रही है।

फोरेंसिक जांच के बाद ही मिलेगा सवालों का जवाब
फोरेंसिक जांच के बाद ही इसकी प्रकृति के बारे में पता चल पाएगा। इसी तरह से सेना, एनआईए और केन्द्रीय जांच एजेंसियां विस्फोट कराने वाले सूत्रधारों की खोज में लगी हैं। ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि यह ड्रोन विस्फोटक लेकर कहां से आया? यह घुसपैठ करके आए आतंकियों की करतूत है या फिर सीमापार से आया है? बताते हैं इसके प्रमाण मिलने के बाद केन्द्र सरकार इस बारे में किसी निर्णायक स्थिति में होगी।


क्या भारत के पास ऐसे ड्रोन मार गिराने के उपाय नहीं?
सैन्य विशेषज्ञों और सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार एनएसजी वायुसेना स्टेशन के भीतर तैनात है। एनएसजी के पास ड्रोन को मार गिराने की क्षमता है। इसके अलावा स्पेशल दस्ते इसमें सक्षम हैं। लेकिन इंफैट्री के जवान केवल इनपर निशाना साधकर गोली बारी ही कर सकते हैं।

बताते हैं कि ये ड्रोन बहुत कम ऊंचाई पर उड़ने वाले, आकार में बहुत छोटे, अधिकतम नॉन मेटैलिक और ऑपरेशन के दौरान बहुत कम ध्वनि निकालते हैं। इसलिए रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। पक्षियों जैसी मिलती जुलती आकृति के कारण सैटेलाइट आदि की पकड़ में भी आना मुश्किल होता है। इसलिए इस तरह के ड्रोन ऑपरेशन को नाकाम करने के लिए हमेशा सतर्कता ही सबसे उपयुक्त उपाय है।

क्या सरकार बढ़ाएगी देश का रक्षा खर्च?
मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले ने देश के सभी तटों पर निगरानी के उपकरण, पेट्रोलिंग आदि के नए पैरामीटर बनाने पर मजबूर कर दिया था। सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ मौजूदा घटना को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। ब्रिगेडियर(रि.) चटर्जी का कहना है कि इसका तोड़ निकालने वाली तकनीक और युद्ध पद्धति तैयार करनी होगी। यह सीधा मॉडर्न वारफेयर की तरफ संकेत है।

खतरे का संकेत, चेतावनी को नजरअंदाज नहीं कर सकते
रंजीत कुमार भी कहते हैं 24 घंटे लगातार सुरक्षा बलों को चौकस नहीं रखा जा सकता। लेकिन यह खतरे का संकेत है। इसलिए हमारे सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बारे में सोचना होगा। वैसे भी पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में पाकिस्तान की तरफ से पिछले साल भी काफी ड्रोन आए थे। तब भी यही संदेश था। एयर वाइस मार्शल सिंह कहते हैं कि दुश्मन चाहे आतंकी हो या फिर कोई देश, लेकिन सुरक्षा के बाबत मिलने वाली चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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