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पानी के लिए जंग कल्पना के बजाए ज़मीनी सच्चाई बनती जा रही है : जल संकट पर विशेष रिपोर्ट

हम सब जानते हैं कि आजकल मानव समाज की सबसे अहम चिंताओं में से एक पानी की कमी है और इसके समाधान के लिए अनेक तरीक़े पेश किए गए हैं। इस कार्यक्रम में भी हम आपको पानी की कमी के संकट से मुक़ाबले की एक शैली से परिचित कराएंगे। यह शैली ग्रे वाॅटर या धूसर जल के इस्तेमाल की है। मीठे पानी की सुरक्षा और ज़मीन के ऊपर और नीचे जलस्रोतों की रक्षा ग्रे वाॅटर के इस्तेमाल के कुछ फ़ायदे हैं।

ग्रे वाॅटर पुनः प्रयोग होने वाले पानी को कहते हैं जो घरेलू सिवरेज से निकलता है। कपड़े व बर्तन धोने और नहाने के बाद जो पानी निकलता है उसे ग्रे वाॅटर कहा जाता है। इस पानी को सिंचाई, शौचालयों के साइफ़न या इमारतों के निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। ग्रे वाॅटर शहरों के सिवरेज से निकलने वाले 50 से 80 प्रतिशत तक के पानी पर आधारित होता है। ग्रे वाॅटर में शौचालयों में इस्तेमाल होने वाले पानी को छोड़ कर हर तरह का पानी शामिल होता है। ग्रे वाॅटर या घरेलू सिवरेज के पानी में और शौचालय के पानी में बहुत अंतर है क्योंकि शौचालय के पानी को गंदे पानी के रूप में जाना जाता है जिसमें मानव मल शामिल होता है।

इस बारे में जो शोध किए गए हैं उनसे पता चलता है कि आज ऐसे बहुत से देशों में, जिन्हें पानी की कमी का सामना है, ग्रे वाॅटर का इस्तेमाल हो रहा है और इससे उनका जल संकट किसी हद तक कम हुआ है। खेद की बात है कि बहुत से देशों में प्रचलित एक ग़लत सोच यह है कि पीने के पानी को खेतों और पार्कों की सिंचाई और शौचालयों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिससे फ़िल्टर किए गए और पीने के पानी का एक बड़ा भाग व्यर्थ हो जाता है। जबकि पौधों की सिंचाई या शौचालयों के साइफ़न जैसे सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए ग्रे वाॅटर जैसे स्रोतों का इस्तेमाल होना चाहिए।

घर के पौधों की सिंचाई ग्रे वाॅटर के इस्तेमाल की सबसे मुख्य और सुरक्षित जगह है। सन 2010 में क्लोरेडो विश्व विद्यालय की ओर से किए जाने वाले शोध के अनुसार सिंचाई के लिए ग्रे वाॅटर के इस्तेमाल में कोई नुक़सान नहीं है। इसके अलावा अब कुछ देशों में विकसित तकनीकों के माध्यम से स्नानगृह और शौचालय का ग्रे वाॅटर, शौचालयों के साइफ़न में फिर से लौटाया जाता है और उसका दोबारा इस्तेमाल होता है। बताया जाता है कि इस तरह का सिस्टम पानी के इस्तेमाल की दर को 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इसी तरह ग्रे वाॅटर को घर में हीटिंग के उपकरणों के ईंधन की आपूर्ति के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण स्वरूप हम्माम को गर्म करने के सिस्टम के लिए ग्रे वाॅटर के इस्तेमाल से पानी के व्यर्थ जाने की दर में 60 प्रतिशत कमी आई है।

काले और सफ़ेद पानी से ग्रे वाॅटर का अंतर इस बात का कारण बना है कि बहुत से देश इसके संबंध में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम तैयार करें। इसे पानी के इस्तेमाल में कमी और पानी के अभाव से मुक़ाबले के एक साधन के तौर पर प्रयोग करें। अलबत्ता ग्रे वाॅटर और उसके इस्तेमाल की जगह की स्वच्छता के बारे में जो संवेदनशीलता पाई जाती है, वह इस बात का कारण बनी है कि विभिन्न देश इसके इस्तेमाल के बारे में कड़े क़ानून बनाएं। कुछ देशों में सिवरेज के पानी के इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी है और कुछ देशों में इस संबंध में कई सीमितताएं हैं।

उदाहरण स्वरूप ब्रिटेन में इसकी अनुमति है और नागरिक विशेष तकनीकें इस्तेमाल करके अपने पौधों की सिंचाई और शौचालय के लिए ग्रे वाॅटर का इस्तेमाल कर सकते हैं। कनाडा में भी, जबकि वहां पर्याप्त मात्रा में पानी पाया जाता है, नागरिकों को इस बात की अनुमति हासिल है कि वे कपड़े धोने, सिंचाई करने और शौचालय के लिए ग्रे वाॅटर इस्तेमाल करने हेतु अपने घरों में विशेष तकनीक का प्रयोग करें। इस देश में बारिश के पानी को भी ग्रे वाॅटर की श्रेणी में रखा गया है।

ग्रे वाॅटर को इस्तेमाल करने के मामले में आस्ट्रेलिया सबसे मशहूर देशों में से एक है। इस देश के कुछ लोग तो ग्रे वाॅटर को नहाने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। जापान में रिसाइक्लिंग सिस्टम के माध्यम से ग्रे वाॅटर को इमारतों में इस्तेमाल करने का चलन काफ़ी पहले से है और इसमें निरंतर वृद्धि हो रही है। इस प्रकार से कि सन 1969 में ग्रे वाॅटर की परियोजनाएं 18 थीं जो सन 2010 में बढ़ कर 104 तक पहुंच गईं। वर्तमान समय में इन परियोजनाओं की संख्या बहुत अधिक है।

अरब देशों में भी पानी की कमी, जल संकट और जलवायु के परिवर्तन के कारण जल स्रोतों के उपयोग के लाभदायक तरीक़ों और खेतीबाड़ी के लिए फ़िल्टर्ड सिवरेज के माध्यम से पानी की आपूर्ति की शैलियों की खोज की जा रही है। इस संबंध में मिस्र, सीरिया, संयुक्त अरब इमारात और सऊदी अरब सबसे बड़े उपभोगता माने जाते हैं और दोबारा इस्तेमाल होने वाले पानी का लगभग 75 प्रतिशत भाग इन्हीं से विशेष है।

ग्रे वाॅटर को फिर से इस्तेमाल करने के सिस्टमों में सस्ती और हाथ से अंजाम दी जाने वाली शैलियों से लेकर पानी को फ़िल्टर करने तक के तरीक़े शामिल हैं जो उस पानी से चर्बी और ठोस पदार्थों को निकाल देते हैं। आरंभिक फ़िल्टर सिस्टम में तलछट रोकने वाले एक या कई टैंक होते हैं जो एक फ़िल्टर की मदद से पानी में मौजूद चर्बी और ठोस पदार्थ को निकाल कर उसे ग्रे वाॅटर में बदल देते हैं जो सिंचाई के लिए पूरी तरह से तैयार होता है। ये सिस्टम बहुत सस्ता व किफ़ायती है और ज़मीन के नीचे सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है। दूसरे स्तर के फ़िल्टर सिस्टमों में तेल, चर्बी और ठोस कणों की अधिक मात्रा को पानी से निकाला जाता है और उस पानी को ज़मीन के ऊपर की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

ग्रे वाॅटर के दोबारा इस्तेमाल के सिस्टमों की सफलता, बड़ी हद तक उसकी देखभाल के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर निर्भर है। ग्रे वाॅटर का लगाया गया एक यंत्र, घर के मालिक या उस यंत्र से लाभ उठाने वाले के कांधों पर कुछ ज़िम्मेदारियां डालता है जो उस सिस्टम को तैयार करने वाली कंपनी के दिशा निर्देशों के अनुसार उसकी सही देख-भाल पर आधारित हैं। उपभोगता को ये बात सुनिश्चित बनानी चाहिए कि वह जिस सिस्टम की देखभाल कर रहा है वह पूरे समय सही काम कर रहा है और अगर उसमें कभी भी गड़बड़ हो तो उसे तुरंत ठीक किया जाए।

घरों में इस्तेमाल होने वाले पानी से लाभ उठाने के लिए सबसे पहले बर्तन धोने के सिंक, वाॅश बेसिन और हम्माम जैसे सिवरेज के भागों में एक पाइप लाइन बिछानी होती है। उसके बाद इस सिस्टम के माध्यम से दो चरणों में इस पानी को फ़िल्टर करना होता है। पहला चरण पानी का नीचे जा कर बैठ जाना है और दूसरा चरण पानी की सफ़ाई के फ़िल्टरों का इस्तेमाल है। इस पानी के पुनः प्रयोग के लिए ज़रूरी है कि हर घर में आंतरिक सिस्टम के काम करते समय, पानी की निकासी के उक्त भागों को दूसरे भागों से अलग कर दिया जाए या दूसरे शब्दों में घर में इस्तेमाल हो चुके पानी की निकासी के भाग को दो अलग अलग भागों में बांट दिया जाए।

शायद पहली नज़र में ऐसा लगे कि ग्रे वाॅटर को एकत्रित करके उसे इस्तेमाल के लायक़ बनाने वाले सिस्टम को स्थापित करना बड़ा मुश्किल काम होगा और इस पर बड़ा ख़र्च आता होगा और संभव है कि आपको अपने घर के क़रीब इस सिस्टम के लिए ज़रूरी उपकरण भी न मिलें क्योंकि यह सिस्टम नया है लेकिन इनमेें से कोई भी बात, इस पर ध्यान न देने का बहाना नहीं बन सकती। आप अभी से अपने घर में ग्रे वाॅटर इकट्ठा करके उसे दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं। हम आपको इसका तरीक़ा बताते हैं।

सबसे पहले घर के किसी कोने में एक बालटी रखिए और घर के गुलदानों के नीचे मौजूद पानी को इकट्ठा करके उसे दोबारा गुलदानों में डालने के लिए इस्तेमाल कीजिए। दूसरे यह कि जब आप नल में गर्म पानी आने के लिए उसे खोलते हैं तो गर्म पानी के आने तक जो ठंडा पानी आता है, उसे बेकार में मत बहाइये बल्कि नल के नीचे एक बालटी रखिए और उसमें वह ठंडा पानी इकट्ठा कीजिए। इस पानी को आप कपड़े और बर्तन धोने और दूसरे कामों में इस्तेमाल कर सकते हैं। तीसरे यह कि अगर आप घर वालों के छोटे कपड़ों को हाथ से धोते हैं तो धोवन या मैले पानी को फेंकिए मत, आप उसे ट्वाइलेट के साइफ़न में इस्तेमाल कर सकते हैं।

चौथे यह कि कपड़े धोने की मशीन में पानी की निकासी के लिए जो पाइप होता है उसे सीवरेज से न जोड़िए, इस पानी को भी ट्वाइलेट के साइफ़न में इस्तेमाल किया जा सकता है। पांचवें यह कि अगर आप अधिक बारिश वाले इलाक़े में रहते हैं तो छत से नीचे आने वाले पानी के पाइप या डाउन पाइप की ओर से निश्चेत न हो जाइये। आप उनके नीचे एक ख़ाली बालटी रख सकते हैं और जब बारिश ज़्यादा हो रही हो तो आप इस पानी से अपने फ़्लैट में उगाए गए फूल-पौधों की सिंचाई कर सकते हैं या फिर साइफ़न में इस्तेमाल कर सकते हैं, यह एक स्वच्छ और मुफ़्त पानी है।

हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि पेय जल की बड़ी मात्रा से सिंचाई करना, पानी को बर्बाद करना और फ़ुज़ूलख़र्ची है, ख़ास कर ऐसे समय में जब पौधे, इस्तेमाल हो चुके पानी से, जिसमें उनके लिए पौष्टिक तत्व भी होते हैं, बेहतर ढंग से बढ़ते हैं। ग्रे वाॅटर का इस्तेमाल, पर्यावरण के लिए पैदा होने वाली बहुत सी समस्याओं का बड़ा ठोस समाधान है और संभावित रूप से निकट भविष्य में इसके अलावा कोई दूसरा बुनियादी समाधान बचेगा भी नहीं। अब सवाल यह है कि क्या प्रयोग हो चुके पानी का दुबारा इस्तेमाल, सुरक्षित है? जवाब हैः हां, बिलकुल सुरक्षित है। इस समय अमरीका के इलाक़े में 2.2 करोड़ लोगों के लिए ग्रे वाॅटर के 80 लाख सिस्टम हैं। पिछले 60 साल के दौरान जब प्रति वर्ष एक अरब लोगों ने प्रयोग हो चुके पानी का इस्तेमाल किया, अब तक उक्त पानी से बीमारी फैलने का एक भी मामला सामने नहीं आया।

अंत में यह अहम बात भी याद रखनी चाहिए कि ग्रे वाॅटर को किसी भी स्थिति में पीने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इस पानी को पौधों के ऊपर भी नहीं डाला जाना चाहिए क्योंकि यह पौधों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। इसी तरह ग्रे वाॅटर को कभी भी इकट्ठा नहीं करना चाहिए। बहुत ही गुणवत्ता वाला ग्रे वाॅटर पाया जाता है जिसे पौधों की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है बल्कि अल्प अवधि के लिए उसे स्टोर भी किया जा सकता है। ये ग्रे वाॅटर, बारिश का पानी है जिसके लिए सिर्फ़ इकट्ठा और स्टोर करने की सैद्धांतिक शैली इस्तेमाल करने की ज़रूरत होती है। इस काम के माध्यम से धरती पर रहने वालों के लिए अच्छे भविष्य की आशा रखी जा सकती है क्योंकि इस समय भी धरती को पानी की कमी या दूसरे शब्दों में जल संकट का सामना है।


पानी के लिए जंग अब कल्पना के बजाए ज़मीनी सच्चाई बनती जा रही है? जल संकट पर एक और विशेष पेशकश

अमरीकी लेखक माइकल टी क्लार ने सन 2001 में एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ” तनाव का नया भुगोल “। इस लेख में उन्होंने विश्व वासियों को इस प्रकार से चेतावनी दी थीः निकट भविष्य में झड़पों के इलाक़े वह इलाक़े होंगे जहां प्राकृतिक संसाधन अधिक होंगे।

उत्पादन और मांग की प्रक्रिया से पैदा होने वाले दबाव और उसके साथ बढ़ती आबादी और दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में तेज़ी से बढ़ने वाली आर्थिक गतिविधियों की वजह से महत्वपूर्ण पदार्थों तक पहुंच की भूख बहुत अधिक बढ़ गयी है। इस आधार पर ऊर्जा और जीवन के लिए ज़रूरी पदार्थों की कमी की वजह से बचे हुए संसाधनों पर क़ब्ज़े के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी।

वह दुनिया में तेल के इस्तेमाल में वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि सन 2000 में दुनिया में प्रतिदिन 77 मिलयन बैरल तेल का इस्तेमाल होता था और सन 2020 में 110 मिलयन बैरल हो जाएगा लेकिन यह सच्चाई है कि तेल उत्पादन, हर रोज़ बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर सकता और इसी लिए ऊर्जा की मांग बढ़ जाएगी लेकिन पानी की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। आज इन्सान, आधे से अधिक पानी, पीने, धोने, खाने और उद्योग के लिए इस्तेमाल करता है और अधिक पानी की ज़रूरत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इस आलेख में आया है कि पानी की पर्याप्त मात्रा रखने वाले कुछ क्षेत्रों को छोड़ कर अन्य सभी इलाक़ों में सन 2050 तक पानी के लिए संघर्ष तेज़ हो जाएगा और मौसम का बदलाव और धरती का बढ़ता तापमान भी पानी की मांग को अधिक कर रहा है। पानी के लिए भविष्य में युद्ध की झलक, सूडान, मिस्र, इस्राईल, सीरिया, जार्डन, भारत और पाकिस्तान के बीच झगड़ों में मिल रही है और यह वास्तव में पूरी दुनिया के लिए एक प्रकार की चेतावनी भी है। दुनिया और विशेषकर पश्चिमी एशिया में युद्ध के छाए काले बादलों के बीच बढ़ते जल संकट को लेकर रेड क्रास सोसाइटी के अधिकारी माइकल तल्हामी ने कई वर्षों पहले इस संबंध में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि … माइकल तल्हामी का कहना है कि पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ़्रीक़ा में लगातार युद्ध की स्थिति बनी रहने की वजह से इन इलाक़ों में लगातार जल संकट बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि अगर यह हालात जारी रहे तो आने वाले दिनों में यमन और सीरिया सहित कई पश्चिमी एशिया के देशों में जल संकट इतना बढ़ जाएगा कि मानवीय जीवन इन देशों में ख़तरे में पड़ जाएगा।

विश्व की वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनज़र, हम चाहें या न चाहें, वर्तमान परिस्थितियों को समझें या न समझें, पानी की कमी एक संकट में बदल चुकी है। इन हालात में अगर दुनिया के विभिन्न इलाक़ों में पानी के लिए युद्ध छिड़ जाए तो इस पर किसी को हैरत नहीं होना चाहिए और अगर जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकाला गया तो सब को यह यक़ीन रखना चाहिए कि पानी के लिए टकराव और भी अधिक गंभीर रूप से होगा। पानी के लिए तनाव के कुछ नमूने आप को लेटिन अमरीका में नज़र आ जाएंगे। इस संबंध में अंतर-अमेरिकी विकास बैंक में कैंपोस जी जल और स्वच्छता विभाग के प्रमुख सर्जियो आई का कहना है … सर्जियो का कहना है कि हमारे सामने सबसे प्रमुख मुद्दा साफ पानी और उसके वितरण का है। हम लगातार लैटिन अमेरिका के सभी देशों के साथ बात कर रहे हैं। लैटिन अमेरिका में जारी जल संकट को समझाने के लिए आपको हम कोचाबामा ले चलते हैं। सन 1999 के अंत से लेकर सन 2000 के मध्य तक बोलोविया के चौथे सबसे बड़े नगर कोचाबामा में निरंतर प्रदर्शन हुए। इस प्रदर्शन की वजह , जल निगम का निजीकरण था। जल निगम के निजीकरण के खिलाफ लोगों में आक्रोश था और वह सड़क पर उतर कर उसका प्रदर्शन कर रहे थे। इसे सरकार के खिलाफ एक विद्रोह भी कहा गया। यह तनाव उस समय पैदा हुआ जब एक नयी नयी बनने वाली कंपनी ने बांध बनाने का फैसला किया जिससे पानी की क़ीमत में वृद्धि हो गयी जिसके बाद एक संघ बनाया गया और उसने पूरे नगर में प्रदर्शन शुरु कर दिया। प्रदर्शनों में एक व्यक्ति की मौत भी हुई। इन प्रदर्शनों को पानी के संकट का एक गंभीर लक्षण समझा गया।

अफ्रीका जाएं तो भी वहां हमें यही दशा नज़र आती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नील नदी के लिए तनाव, इस्राईल की साज़िश की वजह से बढ़ रहा है जिसमें अमरीका भी पूरी तरह से शामिल है। यह तनाव वास्तव में एक युद्ध की आहट है। एथोपिया की ओर से अन्नेहज़ा बांध का निर्माण इस युद्ध के फलीते में आग लगाएगा। एथोपिया द्वारा इस बांध के निर्माण की फंडिग, इस्राईल के साथ ही साथ यूएई और अमरीका भी कर रहा है। एथोपिया की ओर से अन्नेहज़ा बांध के निर्माण के फैसले के मिस्र के पानी को काबू में रखने की कोशिश कहा जा रहा है और इससे मिस्र में पानी का संकट शुरु हो जाएगा।

जार्डन के अलग़द समाचार पत्र ने पानी के संकट पर एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था। एशिया में पानी के लिए नया मोर्चा। इस लेख में चीन पर यह आरोप लगाया गया है कि वह पूर्वी एशिया में पानी के स्रोतों पर क़ब्ज़ा कर रहा है। लेख में कहा गया है कि कई दशकों के दौरान चीन ने पानी के सिलसिले में अपने पड़ोसियों के लिए कई प्रकार के खतरे पैदा किये हैं और उसने पानी को अपने पड़ोसियों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने और प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रयोग किया है, वह नदियों पर धड़ल्ले से बांध बना रहा है और इस तरह से वह नेपाल, क़ाज़ेकिस्तान, जैसे मकोंग नदी के तटवर्ती देश और अपने छोटे पड़ोसियों को चीन पर निर्भर रख रहा है। इस बारे में विऑन नामक एक चैनल ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन कई देशों में लगभग 87 हज़ार बांधों का निर्माण कर रहा है।

चीन ने अब तक पानी के बंटवारे पर अपने किसी भी पड़ोसी देश के साथ समझौता नहीं किया है लेकिन सूचनाओं और जानकारियों के बारे में वह सहयोग करता है ताकि बाढ़ आदि से लोगों की सुरक्षा की जाए मगर एक बार उसने भारत के साथ सूचनाएं साझा करने से भी इन्कार कर दिया था जिसकी वजह से भारत के पूर्वोत्तर में बाढ़ से बचाव की सरकारी क्षमता कमज़ोर हो गयी जिसके बाद ब्रहमपुत्र नदी में जब बाढ़ आयी तो उसने तिब्बत से निकले के बाद और बांग्लादेश में प्रवेश से पहले भारत में तबाही मचा दी थी। चीन दुनिया के उन तीन देशों में शामिल है जिन्होंने सन 1997 में अंतराष्ट्रीय जलमार्ग के कन्वेशंन के खिलाफ वोटिंग की थी। इस समझौते में कहा गया है कि संयुक्त तट रखने वाले देशों के लिए एक दूसरे के साथ जानकारियों का आदान प्रदान किया जाना आवश्यक है लेकिन भारत के साथ उसने एक समझौता किया है जिसके आधार पर ब्रहमपुत्र नदी के बारे में सूचनाओं का आदान प्रदान होता है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूरी दुनिया के देश अन्य देशों को नदियों के बारे में सूचनाएं निशुल्क देते हैं लेकिन चीन रक़म लेकर ही यह काम करता है जबकि अंतरराष्ट्रीय समझौते में कहा गया है कि यह सेवा निशुल्क होना चाहिए। इस प्रकार से हम देखते हैं कि पानी पर आगे क्या कुछ हो सकता है और पानी का मानव जीवन में क्या महत्व है इस पर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है इस लिए पूरी दुनिया को देर होने से पहले इस बेहद गंभीर संकट की आहट पर कान धरना चाहिए और उसके लिए गंभीर कदम उठाना चाहिए।

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