इतिहास

भारत का इतिहास : पूर्व मध्यकालीन भारत- 240 ई.पू– 800 ई : राजपूत काल 900–1162 ई : पार्ट 39

राजपूत काल

राजपूतों के इतिहास के बारे में अभिलेखों एवं समकालीन तथा बाद के कुछ साहित्यों से जानकारी मिलती है। अभिलेखों में ग्वालियर एवं ऐहोल अभिलेख तथा साहित्य में नयचन्द्रसूरि का ‘हम्मीर महाकाव्य’, पद्मगुप्त का ‘नवसाहसांकचरित’, हलायुध की ‘पिंगलसूत्रवृति’, ‘कुमारपाल चरित’, ‘वर्ण रत्नाकार’ एवं पृथ्वीराजरासो आदि प्रमुख है।

राजपूत का अर्थ

राजपूत शब्द संस्कृत के ‘राजपूत्र’ का अपभ्रंश है। सामान्यत: इसका अर्थ होता है, ‘राजा का पुत्र’ या शाही परिवार के किसी व्यक्ति का ‘राजपूत्र’। सम्भवतः प्राचीन काल में इस शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में न करके राजपरिवार के सदस्यों के लिए किया जाता था, पर हर्ष की मृत्यु के बाद राजपूत या राजपूत्र शब्द का प्रयोग जाति के रूप में होने लगा।

राजपूतों की उत्पत्ति

इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति के विषय में विद्धानों के दो मत प्रचलित हैं- एक का मानना है कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी है, जबकि दूसरे का मानना है कि, राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय है। हर्षवर्धन की मृत्यु के उपरान्त जिन महान् शक्तियों का उदय हुआ था, उनमें अधिकांश राजपूत वर्ग के अन्तर्गत ही आते थे।ऐजेन्ट टोड ने 12वीं शताब्दी के उत्तर भारत के इतिहास को ‘राजपूत काल’ भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीन काल एवं मध्य काल को ‘संधि काल’ भी कहा है। इस काल के महत्त्वपूर्ण राजपूत वंशों में राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश, चौहान वंश, चंदेल वंश, परमार वंश एवं गहड़वाल वंश आदि आते हैं।

साम्राज्य विस्तार

बंगाल पर पहले पाल वंश का अधिकार था, बाद में सेन वंश का अधिकार हुआ। उत्तरकालीन पाल शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘महीपाल’ था। जिसने उत्तरी भारत में महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण के समय क़रीब पचास वर्षों तक राज किया। इस काल में उसने अपने राज्य का विस्तार बंगाल के अलावा बिहार में भी किया। उसने कई नगरों का निर्माण किया तथा कई पुराने धार्मिक भवनों की मरम्मत करवाई, जिनमें से कुछ नालन्दा तथा बनारस में थे। उसकी मृत्यु के बाद कन्नौज के गहड़वालों ने बिहार से धीरे-धीरे पालों के अधिकार को समाप्त कर दिया और बनारस को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। इसी दौरान चौहान अपने साम्राज्य का विस्तार अजमेर से लेकर गुजरात की ओर कर रहे थे। वे दिल्ली और पंजाब की ओर भी बढ़ रहे थे। इस प्रयास में उन्हें गहड़वालों का सामना करना पड़ा। इन्हीं आपसी संघर्षों के कारण राजपूत पंजाब से ग़ज़नवियों को बाहर निकालने में असफल रहे। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर ग़ज़नवियों ने उज्जैन पर भी आक्रमण किया।

इतिहासकारों के मत

डॉ. गौरी शंकर ओझा राजपूतों की उत्पत्ति प्राचीन क्षत्रिय जाति से मानते हैं। राजतरंगिणी में 36 क्षत्रिय कुलों का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान् राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से उत्पन्न बताते हैं। यह अनुश्रति पृथ्वीराजरासो (चन्द्ररबरदाई कृत) के वर्णन पर आधारित है। पृथ्वीराजरासो के अतिरिक्त ‘नवसाहसांक’ चरित, ‘हम्मीररासो’, ‘वंश भास्कर’ एवं ‘सिसाणा’ अभिलेख में भी इस अनुश्रति का वर्णन मिलता है। कथा का संक्षिप्त रूप् इस प्रकार है- ‘जब पृथ्वी दैत्यों के आतंक से आक्रांत हो गयी, तब महर्षि वशिष्ठ ने दैत्यों के विनाश के लिए आबू पर्वत पर एक अग्निकुण्ड का निर्माण कर यज्ञ किया। इस यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई। भारत में अन्य राजपूत वंश इन्हीं की संतान हैं। ‘दशरथ शर्मा’, ‘डॉ. गौरी शंकर ओझा’ एवं ‘सी.वी. वैद्य’ इस कथा को मात्र काल्पनिक मानते हैं।

विदेशी जाति का मत

विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्त्वपूर्ण स्थान ‘कर्नल जेम्स टॉड’ का है। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे।

विलियम क्रुक ने ‘कर्नल जेम्स टॉड’ के मत का समर्थन किया है। ‘वी.ए. स्मिथ’ के अनुसार शक तथा कुषाण जैसी विदेशी जातियां भारत आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई।

भारतीय इतिहासकारों में ‘ईश्वरी प्रसाद’ एवं ‘डी.आर. भंडारकर’ ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर तथा कनिंघम के अनुसार राजपूत विदेशी थे। इन तमाम विद्वानों के तर्को के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि राजपूत क्षत्रियों के वंशज थे, फिर भी उनमें विदेशी रक्त का मिश्रण अवश्य था। अतः वे न तो पूर्णतः विदेशी थे, न तो पूर्णत भारतीय।

राजपूत समाज का मुख्य आधार

राजपूत राज्यों में भी सामंतवादी व्यवस्था का प्रभाव था। राजपूत समाज का मुख्य आधार वंश था। हर वंश अपने को एक योद्धा का वंशज बताता था, जो वास्तविक भी हो सकता था और काल्पनिक भी। अलग-अलग वंश अलग-अलग क्षेत्रों पर शासन करते थे। इनके राज्यों के अंतर्गत 12, 24, 48 या 84 ग्राम आते थे। राजा इन ग्रामों की भूमि अपने सरदारों में बाँट देता था, जो फिर इसी तरह अपने हिस्से की भूमि को राजपूत योद्धाओं को, अपने परिवारों और घोड़ों के रख-रखाव के लिए बाँट देते थे। राजपूतों की प्रमुख विशेषता अपनी भूमि, परिवार और अपने मान-सम्मान के साथ लगाव था। हर राजपूत राज्य का राजा अधिकतर अपने भाइयों की सहायता से शासन करता था। यद्यपि सारी भूमि पर राजा का ही अधिकार था। भूमि पर नियंत्रण को सम्मान की बात समझने के कारण विद्रोह अथवा उत्तराधिकारी के न होने जैसी विशेष स्थितियों में ही राजा ज़मीन वापस ले लेता था।

अनुशासनहीनता

राजपूतों की समाज व्यवस्था के लाभ भी थे और नुक़सान भी। लाभ तो यह था कि राजपूतों में भाईचारे और समानता की भावना व्याप्त थी, पर दूसरी ओर इसी भावना के कारण उनमें अनुशासन लाना कठिन था। उनकी दूसरी कमज़ोरी आपसी संघर्ष था, जो पुश्तों तक चलता था। पर उनकी मूल कमज़ोरी यह थी कि, वे अपने ही अलग गुट बनाते और दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे। वे भाईचारे की भावना में ग़ैर राजपूतों को शामिल नहीं करते थे। इससे शासन करने वाले राजपूतों और आम जनता, जो अधिकतर राजपूत नहीं थी, के बीच अन्तर बढ़ता गया। आज भी राजपूत राजस्थान की आबादी के कुल छ्ह प्रतिशत के लगभग हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में भी राजपूतों तथा उनके द्वारा शासित प्रदेशों की पूरी आबादी के बीच यही अनुपात रहा होगा।

धार्मिक स्वतंत्रता

उस काल में अधिकतर राजपूत राजा हिन्दू थे, यद्यपि कुछ जैन धर्म के भी समर्थक थे। वे ब्राह्मण और मन्दिरों को बड़ी मात्रा में धन और भूमि का दान करते थे। वे वर्ण व्यवस्था तथा ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों के पक्ष में थे। इसलिए कुछ राजपूती राज्यों में तो भारत की स्वतंत्रता और भारतीय संघ में उनके विलय तक ब्राह्मणों से अपेक्षाकृत कम लगान वसूल किया जाता था। इन विशेषाधिकारों के बदले ब्राह्मण राजपूतों को प्राचीन सूर्य और चन्द्रवंशी क्षत्रियों के वंशज मानने को तैयार थे।

पृथ्वीराज रासो

पृथ्वीराज रासो हिन्दी भाषा में लिखा गया एक महाकाव्य है, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन-चरित्र का वर्णन किया गया है। यह कवि चंदबरदाई की रचना है, जो पृथ्वीराज के अभिन्न मित्र तथा राजकवि थे। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शती की रचना है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त इसे 1400 वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की ऐतिहासिकता विवादग्रस्त है

हिन्दी साहित्य का महाकाव्य

इस पुस्तक के बारे में संदेह यह है कि यह रचना ‘डिंगल’ की है अथवा ‘पिंगल’ की। यह ग्रंथ एक से अधिक रचयिताओं का हो सकता है। ‘पृथ्वीराज रासो’ ढाई हज़ार पृष्ठों का संग्रह है। इसमें पृथ्वीराज व उनकी प्रेमिका संयोगिता के परिणय का सुन्दर वर्णन है। यह ग्रंथ ऐतिहासिक कम काल्पनिक अधिक है। ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा ‘आल्हाखण्ड’ हिन्दी साहित्य के आदि काल के दो प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। पृथ्वीराज रासो को हम साहित्यिक परम्परा का विकसनशील महाकाव्य और आल्हाखण्ड को लोक-महाकाव्य की संज्ञा दे सकते हैं। रासो का वृहत्तम रूपान्तर जो नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित है, 69 समय (सर्ग) का विशाल ग्रन्थ है। इसमें अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन-वृत्त के साथ सामन्ती वीर-युग की सभ्यता, रहन-सहन, मान-मर्यादा, ख़ान-पान तथा अन्य जीवन-विधियों का इतना क्रमवार और सही वर्णन हुआ है कि इसमें तत्कालीन समग्र युगजीवन अपने समस्त गुण-दोषों के साथ यथार्थ रूप में चित्रित हो उठा है।

विवरण

अध्यात्म, राजनीति, धर्म, योग, कामशास्त्र, मन्त्र-तन्त्र, युद्ध, विवाह, मृगय, मन्त्रणा, दौत्य, मानवीय सौन्दर्य, संगीत-नृत्य, वन उपवन-विहार, यात्रा, पशु-पक्षी, वृक्ष, फल-फूल, पूजा-उपासना, तीर्थ-व्रत, देवता-मुनि, स्वर्ग, राज-दरबार, अन्त:पुर, उद्यान गोष्ठी, शास्त्रार्थ, वसन्तोत्सव तथा सामाजिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज – तात्पर्य यह कि तत्कालीन जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं बचा है, जो रासों में न आया हो। किन्तु इन विषयों में भी युगप्रवृत्ति के अनुसार सबसे अधिक उभार मिला है युद्ध, विवाह, भोग विलास तथा मृगया के ही वर्णनों को और यही कारण है कि ‘पृथ्वीराज रासो’ में चारित्र्य की वह गरिमा नहीं आ पायी है, जो आदर्श महाकाव्य के लिए आवश्यक हैं।

महाकाव्य का विषय

रासो के 65 वें सर्ग में पृथ्वीराज की रानियों के नाम गिनायें गये हैं, जिनकी संख्या तेरह है। इनमें से केवल चार के विवाह उभय पक्ष की स्वेच्छा से हुए, शेष सबको बलात हरण किया गया था, जिनके लिए युद्ध भी करने पड़े थे। इन विवाहों के वर्णन रासों में अत्यधिक विस्तार से मिलते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि ये ही उक्त महाकाव्य के प्रमुख विषय है।

राजनीतिक स्थिति का वर्णन

शहाबुद्दीन गौरी के आक्रमणों के समय पृथ्वीराज इतना विलासी हो गया था कि संयोगिता के महल से बाहर निकलता ही नहीं था। उसकी सहायता के लिए रावल समर सिंह दिल्ली आकर ठहरते थे, किन्तु पृथ्वीराज को इसकी सूचना लेने की भी फुर्सत नहीं थी। प्रजा में कष्ट और असन्तोष बढ़ता गया। अन्त में वह शहाबुद्दीन द्वारा बन्दी बनाकर गज़नी ले जाया जाता है, जहाँ चंदबरदाई के संकेतों से गौरी को बिंधकर स्वयं भी मर जाता है। इस प्रकार रासो हमारे पतन और गम की कहानी है।

कथानक की शिथिलता


चंदबरदाई

रासों में कथानक की शिथिलता, विश्रृंखलता तथा असन्तुलित योजना भी अत्यधिक खटकती है। कथानक का जो एक क्षीण तन्तु है, वह भी बीच-बीच में विवाह, मृगया आदि के उबा देने वाले लम्बे वर्णनों के कारण टूट जाता है। कथानक में सुनिश्चित योजना तथा समानुपातिक संघटन के अभाव का कारण कदाचित यह भी है कि उसके वर्तमान रूपान्तर में मूल रचना के अतिरिक्त प्रक्षेप भी अत्याधिक परिमाण में हुए हैं। अत: ‘पृथ्वीराज रासो’ उत्कृष्ट कोटि के महाकाव्यों की श्रेणी में रखें जाने के योग्य नहीं जान पड़ता।

रामचंद्र शुक्ल के अनुसार

रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में लिखा है – ‘पृथ्वीराज रासो ढाई हज़ार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है जिसमें 69 समय (सर्ग या अध्याय) हैं। प्राचीन समय में प्रचलित प्राय: सभी छंदों का व्यवहार हुआ है। मुख्य छंद हैं कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या। जैसे कादंबरी के संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण के पुत्र ने पूरा किया है वैसे ही रासो के पिछले भाग का भी चंद के पुत्र ‘जल्हण’ द्वारा पूर्ण किया जाना कहा जाता है।’ रासो के अनुसार जब शहाबुद्दीन गौरी पृथ्वीराज को कैद करके गजनी ले गया तब कुछ दिनों पीछे चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया।

जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है –

पुस्तक जल्हन हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज।
रघुनाथचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्ध रिय जिमि।
पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्ध रिय तिमि

कथानक

पृथ्वीराज रासो में आबू के यज्ञकुंड से चार क्षत्रिय कुलों की उत्पत्ति तथा चौहानों के अजमेर में राजस्थापन से लेकर पृथ्वीराज के पकड़े जाने तक का सविस्तार वर्णन है। इस ग्रंथ के अनुसार पृथ्वीराज अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के पुत्र और अर्णोराज के पौत्र थे। सोमेश्वर का विवाह दिल्ली के तुंवर (तोमर) राजा अनंगपाल की कन्या से हुआ। अनंगपाल की दो कन्याएँ थीं सुंदरी और कमला। सुंदरी का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल के साथ हुआ और इस संयोग से जयचंद राठौर की उत्पत्ति हुई। दूसरी कन्या कमला का विवाह अजमेर के चौहान सोमेश्वर के साथ हुआ जिनके पुत्र पृथ्वीराज हुए। अनंगपाल ने अपने नाती पृथ्वीराज को गोद लिया जिससे अजमेर और दिल्ली का राज एक हो गया।


संयोगिता का स्वयंवर

जयचंद को यह बात अच्छी न लगी। उसने एक दिन राजसूय यज्ञ करके सब राजाओं को यज्ञ के भिन्न-भिन्न कार्य करने के लिए निमंत्रित किया और इस यज्ञ के साथ ही अपनी कन्या संयोगिता का स्वयंवर रचा। राजसूय यज्ञ में सब राजा आए पर पृथ्वीराज नहीं आए। इसपर जयचंद ने चिढ़कर पृथ्वीराज की एक स्वर्णमूर्ति द्वारपाल के रूप में द्वार पर रखवा दी। संयोगिता का अनुराग पहले से ही पृथ्वीराज पर था, अत: जब वह जयमाल लेकर रंगभूमि में आई तब उसने पृथ्वीराज की मूर्ति को ही माला पहना दी। इस पर जयचंद ने उसे घर से निकालकर गंगा किनारे के महल में भेज दिया। इधर पृथ्वीराज के सामंतों ने आकर यज्ञ विध्वंस किया। फिर पृथ्वीराज ने चुपचाप आकर संयोगिता से गंधर्व विवाह किया और अंत में वे उसे हर ले गए। रास्ते में जयचंद की सेना से बहुत युद्ध हुआ, पर संयोगिता को लेकर पृथ्वीराज कुशलतापूर्वक दिल्ली पहुँच गए। वहाँ भोगविलास में ही उनका समय बीतने लगा, राज्य की रक्षा का ध्यान न रह गया।

ऐतिहासिकता का अभाव

बल का बहुत कुछ ह्रास तो जयचंद तथा और राजाओं के साथ लड़ते-लड़ते हो चुका था और बड़े-बड़े सामंत मारे जा चुके थे। अच्छा अवसर देख शहाबुद्दीन चढ़ आया, पर हार गया और पकड़ा गया। पृथ्वीराज ने उसे छोड़ दिया। वह बार-बार चढ़ाई करता रहा और अंत में पृथ्वीराज पकड़कर गजनी भेज दिए गए। कुछ काल के पीछे कवि चंद भी गजनी पहुँचे। एक दिन चंद के इशारे पर पृथ्वीराज ने शब्दबेधी बाण द्वारा शहाबुद्दीन को मारा और फिर दोनों एक-दूसरे को मारकर मर गए। शहाबुद्दीन पृथ्वीराज के बैर का कारण यह लिखा गया है कि शहाबुद्दीन अपने यहाँ की एक सुंदरी पर आसक्त था, जो एक-दूसरे पठान सरदार हुसैनशाह को चाहती थी। जब ये दोनों शहाबुद्दीन से तंग हुए तब हारकर पृथ्वीराज के पास भाग आए। शहाबुद्दीन ने पृथ्वीराज के यहाँ कहला भेजा कि उन दोनों को अपने यहाँ से निकाल दो। पृथ्वीराज ने उत्तर दिया कि शरणागत की रक्षा करना क्षत्रियों का धर्म है, अत: इन दोनों की हम बराबर रक्षा करेंगे। इसी बैर से शहाबुद्दीन ने दिल्ली पर चढ़ाइयाँ कीं। यह तो पृथ्वीराज का मुख्य चरित्र हुआ। इसके अतिरिक्त बीच-बीच में बहुत-से राजाओं के साथ पृथ्वीराज के युद्ध और अनेक राजकन्याओं के साथ विवाह की कथाएँ रासो में भरी पड़ी हैं। ऊपर लिखे वृत्तांत और रासो में दिए हुए संवतों का ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बिल्कुल मेल न खाने के कारण अनेक विद्वानों ने पृथ्वीराज रासो को पृथ्वीराज के समसामयिक किसी कवि की रचना होने में पूरा संदेह किया है और उसे सोलहवीं शताब्दी में लिखा हुआ एक जाली ग्रंथ ठहराया है। रासो में चंगेज, तैमूर आदि कुछ पीछे के नाम आने से यह संदेह और भी पुष्ट होता है। प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ‘रासो’ में वर्णित घटनाओं तथा संवतों को बिल्कुल भाटों की कल्पना मानते हैं।

काव्य विशेषताएँ

‘पृथ्वीराज रासो’ वीर रस का हिंदी का सर्वश्रेष्ठ काव्य है। हिंदी साहित्य में वीर चरित्रों की जैसी विशद कल्पना इस काव्य में मिली वैसी बाद में कभी नहीं दिखाई पड़ी। पाठक रचना भर में उत्साह की एक उमड़ती हुई सरिता में बहता चलता है। कन्नौज युद्ध के पूर्व संयोगिता के अनुराग और विरह तथा उक्त युद्ध के अनंतर पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता के मिलन और केलि विलास के जो चित्र रचना में मिलते हैं, वे अत्यंत आकर्षक हैं। अन्य रसों का भी काव्य में अभाव नहीं है। रचना का वर्णनवैभव असाधारण है; नायक नायिका के संभोग समय का षड्ऋतु वर्णन कहीं कहीं पर संश्लिष्ट प्रकृति चित्रण के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। भाषा-शैली सर्वत्र प्रभावपूर्ण है और वर्ण्य विषय के अनुरूप काव्य भर में बदलती रहती है। रचना के इन समस्त गुणों पर दृष्टिपात किया जाए तो वह एक सुंदर महाकाव्य प्रमाणित होता है और नि:संदेह आधुनिक भारतीय आर्यभाषा साहित्य के आदि युग की विशिष्ट कृति ठहरती है।

परमार वंश

परमार वंश का आरम्भ नवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नर्मदा नदी के उत्तर मालवा (प्राचीन अवन्ती) क्षेत्र में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज द्वारा हुआ था। इस वंश के शासकों ने 800 से 1327 ई. तक शासन किया। मालवा के परमार वंशी शासक सम्भवतः राष्ट्रकूटों या फिर प्रतिहारों के समान थे।

इस वंश के प्रारम्भिक शासक उपेन्द्र, वैरसिंह प्रथम, सीयक प्रथम, वाक्पति प्रथम एवं वैरसिंह द्वितीय थे।
परमारों की प्रारम्भिक राजधानी उज्जैन में थी पर कालान्तर में राजधानी ‘धार’, मध्य प्रदेश में स्थानान्तरित कर ली गई।
इस वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं प्रतापी राजा ‘सीयक अथवा श्रीहर्ष’ था। उसने अपने वंश को राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त कराया।
परमार वंश में आठ राजा हुए, जिनमें सातवाँ वाक्पति मुंज (973 से 995 ई.) और आठवाँ मुंज का भतीजा भोज (1018 से 1060 ई.) सबसे प्रतापी थी।
मुंज अनेक वर्षों तक कल्याणी के चालुक्य राजाओं से युद्ध करता रहा और 995 ई. में युद्ध में ही मारा गया। उसका उत्तराधिकारी भोज (1018-1060 ई.) गुजरात तथा चेदि के राजाओं की संयुक्त सेनाओं के साथ युद्ध में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही परमार वंश का प्रताप नष्ट हो गया। यद्यपि स्थानीय राजाओं के रूप में परमार राजा तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ तक राज्य करते रहे, अंत में तोमरों ने उनका उच्छेद कर दिया।
परमार राजा विशेष रूप से वाक्पति मुंज और भोज, बड़े विद्वान् थे और विद्वानों एवं कवियों के आश्रयदाता थे।

चौहान वंश

चौहान वंश राजपूतों के प्रसिद्ध वशों में से एक है। ‘चव्हाण’ या ‘चौहान’ उत्तर भारत की आर्य जाति का एक वंश है। चौहान गोत्र राजपूतों में आता है। कई विद्वानों का कहना है कि चौहान सांभर झील, पुष्कर, आमेर और वर्तमान जयपुर (राजस्थान) में होते थे, जो अब सारे उत्तर भारत में फैले चुके हैं। इसके अतिरिक्त मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) एवं अलवर ज़िले में भी इनकी अच्छी-ख़ासी संख्या है।

प्रसिद्ध शासक

चौहान वंश की अनेक शाखाओं में ‘शाकंभरी चौहान’ (सांभर-अजमेर के आस-पास का क्षेत्र) की स्थापना लगभग 7वीं शताब्दी में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चन्द्रराज, गोपराज जैसे अनेक सामंतों ने शासन किया। शासक अजयदेव ने ‘अजमेर’ नगर की स्थापना की और साथ ही यहाँ पर सुन्दर महल एवं मन्दिर का निर्माण करवाया।

‘चौहान वंश’ के मुख्य शासक इस प्रकार थे-

अजयदेव चौहान
अर्णोराज (लगभग 1133 से 1153 ई.)
विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (लगभग 1153 से 1163 ई.)
पृथ्वीराज तृतीय (1178-1192 ई.)

राजस्थान के चौहान वंश

राजस्थान में चौहानों के कई वंश हुए, जिन्होंने समय-समय पर यहाँ शासन किया और यहाँ की मिट्टी को गौरवांवित किया। ‘चौहान’ व ‘गुहिल’ शासक विद्वानों के प्रश्रयदाता बने रहे, जिससे जनता में शिक्षा एवं साहित्यिक प्रगति बिना किसी अवरोध के होती रही। इसी तरह निरन्तर संघर्ष के वातावरण में वास्तुशिल्प पनपता रहा। इस समूचे काल की सौन्दर्य तथा आध्यात्मिक चेतना ने कलात्मक योजनाओं को जीवित रखा। चित्तौड़, बाड़ौली तथा आबू के मन्दिर इस कथन के प्रमाण हैं।

चौहान वंश की शाखाओं में निम्न शाखाएँ मुख्य थीं-

– सांभर के चौहान
– रणथम्भौर के चौहान
– जालौर के चौहान
– चौहान वंशीय हाड़ा राजपूत

सांभर के चौहान

चौहानों के मूल स्थान के संबंध में मान्यता है कि वे सपादलक्ष एवं जांगल प्रदेश के आस-पास रहते थे। उनकी राजधानी ‘अहिच्छत्रपुर’ (नागौर) थी। सपादलक्ष के चौहानों का आदिपुरुष ‘वासुदेव’ था, जिसका समय 551 ई. के लगभग अनुमानित है। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता माना गया है। इस प्रशस्ति में चौहानों को ‘वत्सगौत्रीय’ ब्राह्मण बताया गया है। प्रारंभ में चौहान प्रतिहारों के सामन्त थे, परन्तु गुवक प्रथम, जिसने ‘हर्षनाथ मन्दिर’ (सीकर के पास) का निर्माण कराया, स्वतन्त्र शासक के रूप में उभरा। इसी वंश के चन्दराज की पत्नी रुद्राणी यौगिक क्रिया में निपुण थी। ऐसा माना जाता है कि वह पुष्कर झील में प्रतिदिन एक हज़ार दीपक जलाकर महादेव की उपासना करती थी।

अजयराज चौहान ने 1113 ई. में अजमेर नगर की स्थापना की। उसके पुत्र अर्णोराज (आनाजी) ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाकर जनोपयोगी कार्यों में भूमिका अदा की। चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ का काल सपादलक्ष का स्वर्ण युग कहलाता है। उसे ‘वीसलदेव’ और ‘कवि बान्धव’ भी कहा जाता था। उसने ‘हरकेलि’ नाटक और उसके दरबारी विद्वान् सोमदेव ने ‘ललित विग्रहराज’ नामक नाटक की रचना करके साहित्य स्तर को ऊँचा उठाया। विग्रहराज ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया, जिस पर आगे चलकर क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ नामक मस्जिद का निर्माण करवाया। विग्रहराज चतुर्थ एक विजेता था। उसने तोमरों को पराजित कर ‘ढिल्लिका’ (दिल्ली) को जीता।

इसी वंशक्रम में पृथ्वीराज चौहान तृतीय राजस्थान और उत्तरी भारत का प्रतिभाशाली राजा था। बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में शाकम्भरी के इस चौहान शासक ने अपनी विजयों से उत्तरी भारत की राजनीति में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया था। उसने चन्देल शासक परमार्दीदेव के देशभक्त सेनानी ‘आल्हा’ और ‘ऊदल’ को मारकर 1182 को महोबा को जीत लिया। कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचन्द का दिल्ली को लेकर चौहानों से वैमनस्य था। हालांकि पृथ्वीराज चौहान तृतीय भी अपनी दिग्विजय में कन्नौज को शामिल करना चाहता था। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान तृतीय और जयचन्द की महत्त्वाकांक्षा दोनों के वैमनस्य का कारण बन गई। ‘पृथ्वीराजरासो’ दोनों के मध्य शत्रुता का कारण जयचन्द की पुत्री संयोगिता को बताता है। पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद ग़ोरी को परास्त कर वीरता का समुचित परिचय दिया तथा भारत में तुर्क आक्रमण को धक्का पहुंचाया।

चौहान वंश की शाखाएँ क्रम संख्या वंश का नाम शाखा की संख्या
1. चौहान राजपूत 14 शाखा
2. राठौर राजपूत 12 शाखा
3. परमार या पंवार राजपूत 16 शाखा
4. सोलंकी राजपूत 6 शाखा
5. परिहार राजपूत 6 शाखा
6. गहलोत राजपूत 12 शाखा
7. चन्द्रवंशी राजपूत 4 शाखा
8. सेनवंशी या पाल राजपूत 1 शाखा
9. मकवान या झाला राजपूत 3 शाखा
10. भाटी या यदुवंशी राजपूत 5 शाखा
11. कछवाहा या कुशवाहा राजपूत 1 शाखा
12. तंवर या तोमर राजपूत 1 शाखा
13. र्भूंयार या कौशिक राजपूत 1 शाखा

तुर्कों के विरुद्ध लड़े गए युद्धों में तराइन का प्रथम युद्ध चौहानों की विजय का एक गौरवपूर्ण अध्याय है। परन्तु पृथ्वीराज चौहान द्वारा पराजित तुर्की सेना का पीछा न किया जाना, इस युद्ध में की गई भूल के रूप में एक कलंकित पृष्ठ माना जाता है। इस भूल के परिणामस्वरूप 1192 में मुहम्मद ग़ोरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय को पराजित कर दिया। तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज की ग़ोरी से हार हो गई, तो उसने आत्मसम्मान को ध्यान में रखते हुए आश्रित शासक बनने की अपेक्षा मृत्यु को प्राथमिकता दी। इस हार का कारण राजपूतों का परम्परागत सैन्य संगठन माना जाता है। पृथ्वीराज चौहान अपने राज्यकाल के आरंभ से लेकर अन्त तक युद्ध लड़ता रहा, जो उसके एक अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। सिवाय तराइन के द्वितीय युद्ध के वह सभी युद्धों में विजेता रहा था।

साहित्य तथा विद्वान् संरक्षण

पृथ्वीराज स्वयं अच्छा गुणी होने के साथ-साथ गुणीजनों का सम्मान करने वाला था। जयानक, विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन तथा विश्वरूप उसके दरबारी लेखक और कवि थे, जिनकी कृतियाँ उसके समय को अमर बनाए हुए हैं। जयानक ने ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की थी। ‘पृथ्वीराजरासो’ का लेखक चन्दबरदाई भी पृथ्वीराज चौहान का आश्रित कवि था। ‘पृथ्वीराज विजय’ के लेखक जयानक के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने जीवनपर्यन्त युद्धों के वातावरण में रहते हुए भी चौहान राज्य की प्रतिभा को साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में पुष्ट किया। तराइन के द्वितीय युद्ध के पश्चात् भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आया। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं था कि इस युद्ध के बाद चौहानों की शक्ति समाप्त हो गई। लगभग आगामी एक शताब्दी तक चौहानों की शाखाएँ रणथम्भौर, जालौर, हाड़ौती, नाडौल तथा चन्द्रावती और आबू में शासन करती रहीं और राजपूत शक्ति की धुरी बनी रहीं। इन्होंने दिल्ली के सुल्तानों की सत्ता का समय-समय पर मुकाबला कर शौर्य और अदम्य साहस का परिचय दिया। पूर्व मध्य काल में पराभवों के बावजूद राजस्थान बौद्धिक उन्नति में नहीं पिछड़ा। चौहान व गुहिल शासक विद्वानों के प्रश्रयदाता बने रहे, जिससे जनता में शिक्षा एवं साहित्यिक प्रगति बिना अवरोध के होती रही। इसी तरह निरन्तर संघर्ष के वातावरण में वास्तुशिल्प पनपता रहा। इस समूचे काल की सौन्दर्य तथा आध्यात्मिक चेतना ने कलात्मक योजनाओं को जीवित रखा।

रणथम्भौर के चौहान

रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्द राज ने की थी। यहाँ के प्रतिभा सम्पन्न शासकों में हम्मीर का नाम सर्वोपरि है। दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन ख़िलजी ने हम्मीर के समय रणथम्भौर पर असफल आक्रमण किया था। अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1301 में रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया। इसका मुख्य कारण हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन ख़िलजी के विरुद्ध मंगोल शरणार्थियों को आश्रय देना था। क़िला न जीत पाने के कारण अलाउद्दीन ने हम्मीर के सेनानायक ‘रणमल’ और ‘रतिपाल’ को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। हम्मीर ने आगे बढ़कर शत्रु सेना का सामना किया, पर वह वीरगति को प्राप्त हुआ। हम्मीर की रानी रंगादेवी और पुत्री ने जौहर व्रत द्वारा अपने धर्म की रक्षा की। यह राजस्थान का प्रथम जौहर माना जाता है। हम्मीर के साथ ही रणथम्भौर के चौहानों का राज्य समाप्त हो गया। हम्मीर के बारे में प्रसिद्ध है- “तिरिया-तेल, हम्मीर हठ, चढे न दूजी बार”।

जालौर की चौहान शाखा

जालौर की चौहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम ‘जाबालिपुर’ और क़िले का ‘सुवर्णगिरि’ मिलता है, जिसको अपभ्रंश में ‘सोनगढ़’ कहते हैं। इसी पर्वत के नाम से चौहानों की यह शाखा ’सोनगरा’कहलाई। इस शाखा का प्रसिद्ध शासक कान्हड़दे चौहान था। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने जालौर को जीतने से पूर्व 1308 में सिवाना पर आक्रमण किया। उस समय चौहानों के एक सरदार, जिसका नाम सातलदेव था, दुर्ग का रक्षक था। उसने अनेक स्थानों पर तुर्कों को छकाया। इसलिए उसके शौर्य की धाक राजस्थान में जम चुकी थी। परन्तु एक राजद्रोही भावले नामक सैनिक द्वारा विश्वासघात करने के कारण सिवाना का पतन हो गया और अलाउद्दीन ने सिवाना जीतकर उसका नाम खैराबाद रख दिया। इस विजय के पश्चात् 1311 में जालौर का भी पतन हो गया और वहाँ का शासक कान्हड़देव वीरगति को प्राप्त हुआ। वह शूरवीर योद्धा, देशाभिमानी तथा चरित्रवान व्यक्ति था। उसने अपने अदम्य साहस तथा सूझबूझ से क़िले के निवासियों, सामन्तों तथा राजपूत जाति का नेतृत्व कर एक अपूर्व ख्याति अर्जित की थी।

हाड़ा राजपूत

वर्तमान हाड़ौती क्षेत्र पर चौहान वंशीय हाड़ा राजपूतों का अधिकार था। प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर मीणाओं का अधिकार था। ऐसा माना जाता है कि बून्दा मीणा के नाम पर ही बूँदी का नामकरण हुआ। कुंभाकालीन राणपुर के लेख में बूँदी का नाम ‘वृन्दावती’ मिलता है। राव देवा ने मीणाओं को पराजित कर 1241 में बूँदी राज्य की स्थापना की थी। बूँदी के प्रसिद्ध क़िले तारागढ़ का निर्माण बरसिंह हाड़ा ने करवाया था। तारागढ़ ऐतिहासिक काल में भित्ति चित्रों के लिए विख्यात रहा है। बूँदी के सुर्जनसिंह ने 1569 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। बूँदी की प्रसिद्ध चौरासी खंभों की छतरी शत्रुसाल हाड़ा का स्मारक है, जो 1658 में सामूगढ़ के युद्ध में औरंगज़ेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बुद्धसिंह के शासन काल में मराठों ने बूँदी रियासत पर आक्रमण किया था।

प्रारम्भ में कोटा बूँदी राज्य का ही भाग था, जिसे शाहजहाँ ने बूँदी से अलग कर माधोसिंह को सौंपकर 1631 ई. में नए राज्य के रूप में मान्यता दी थी। कोटा राज्य का दीवान झाला जालिमसिंह इतिहास चर्चित व्यक्ति रहा है। कोटा रियासत पर उसका पूर्ण नियन्त्रण था। कोटा में ऐतिहासिक काल से आज तक कृष्ण की भक्ति का प्रभाव रहा है। इसलिए कोटा का नाम नन्दग्राम भी मिलता हैं। बूँदी-कोटा में सांस्कृतिक उपागम के रूप में यहाँ की चित्र शैलियाँ विख्यात रही हैं। बूँदी में पशु-पक्षियों का श्रेष्ठ अंकन हुआ है, वहीं कोटा शैली शिकार के चित्रों के लिए विख्यात रही है।

चालुक्य वंश

वातापी के चालुक्य शासक शासक शासनकाल
जयसिंह चालुक्य –
रणराग –
पुलकेशी प्रथम (550-566 ई.)
कीर्तिवर्मा प्रथम (566-567 ई.)
मंगलेश (597-98 से 609 ई.)
पुलकेशी द्वितीय (609-10 से 642-43 ई.)
विक्रमादित्य प्रथम (654-55 से 680 ई.)
विनयादित्य (680 से 696 ई.)
विजयादित्य (696 से 733 ई.)
विक्रमादित्य द्वितीय (733 से 745 ई.)
कीर्तिवर्मा द्वितीय (745 से 753 ई.)

चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में इन्हें ‘शूलिक’ जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है। ‘विक्रमांकदेवचरित’ में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् ‘विन्सेण्ट ए. स्मिथ’ इन्हें विदेशी मानते हैं। ‘एफ. फ्लीट’ तथा ‘के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री’ ने इस वंश का नाम ‘चलक्य’ बताया है। ‘आर.जी. भण्डारकरे’ ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम ‘चालुक्य’ का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है। इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।

वंश शाखाएँ

दक्षिणपथ मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था। जब मौर्य सम्राटों की शक्ति शिथिल हुई, और भारत में अनेक प्रदेश उनकी अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र होने लगे, तो दक्षिणापथ में सातवाहन वंश ने अपने एक पृथक् राज्य की स्थापना की। कालान्तर में इस सातवाहन वंश का बहुत ही उत्कर्ष हुआ, और इसने मगध पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। शकों के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण जब इस राजवंश की शक्ति क्षीण हुई, तो दक्षिणापथ में अनेक नए राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें वाकाटक, कदम्ब और पल्लव वंश के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्हीं वंशों में से वातापि या बादामी का चालुक्य वंश और कल्याणी का चालुक्य वंश भी एक था।

वातापी व बादामी का चालुक्य वंश

छठी शताब्दी के मध्य से लेकर आठवीं शताब्दी के मध्य तक दक्षिणापथ पर जिस चालुक्य वंश की शाखा का अधिपत्य रहा उसका उत्कर्ष स्थल बादामी या वातापी होने के कारण उसे बादामी या वातापी चालुक्य कहा जाता है। इस शाखा को पूर्वकालीन पश्चिमी चालुक्य भी कहा जाता है। पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख से बादामी के चालुक्यों के बार में प्रमाणिक ज्ञान प्राप्त होता है। ऐहोल लेख की रचना रविकृत ने की थी।

वातापी का चालुक्य वंश

वाकाटक वंश के राजा बड़े प्रतापी थे और उन्होंने विदेशी कुषाणों की शक्ति का क्षय करने में बहुत अधिक कर्तृत्व प्रदर्शित किया था। इन राजाओं ने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अनेक अश्वमेध यज्ञों का भी अनुष्ठान किया। पाँचवीं सदी के प्रारम्भ में गुप्तों के उत्कर्ष के कारण इस वंश के राज्य की स्वतंत्र सत्ता का अन्त हुआ। कदम्ब वंश का राज्य उत्तरी कनारा बेलगाँव और धारवाड़ के प्रदेशों में था। प्रतापी गुप्त सम्राटों ने इसे भी गुप्त साम्राज्य की अधीनता में लाने में सफलता प्राप्त की थी। पल्लव वंश की राजधानी कांची थी, और सम्राट समुद्रगुप्त ने उसकी भी विजय की थी। गुप्त साम्राज्य के क्षीण होने पर उत्तरी भारत के समान दक्षिणापथ में भी अनेक राजवंशों ने स्वतंत्रतापूर्वक शासन करना प्रारम्भ किया। दक्षिणापथ के इन राज्यों में चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों के द्वारा स्थापित राज्य प्रधान थे। उनके अतिरिक्त देवगिरि के यादव, वारंगल के काकतीय, कोंकण के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब, तलकाड़ के गंग और द्वारसमुद्र के होयसल वंशों ने भी इस युग में दक्षिणापथ के विविध प्रदेशों पर शासन किया। जिस प्रकार उत्तरी भारत में विविध राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वाकांक्षी राजा विजय यात्राएँ करने और अन्य राजाओं को जीतकर अपना उत्कर्ष करने के लिए तत्पर रहते थे, वही दशा दक्षिणापथ में भी थी।

वातापी के चालुक्य वंश का अन्त

विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 744 ई. के लगभग कीर्तिवर्मा द्वितीय विशाल चालुक्य साम्राज्य का स्वामी बना। पर वह अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित साम्राज्य को क़ायम रखने में असमर्थ रहा। दन्तिदुर्ग नामक राष्ट्रकूट नेता ने उसे परास्त कर महाराष्ट्र में एक नए राजवंश की नींव डाली, और धीरे-धीरे राष्ट्रकूटों का यह वंश इतना शक्तिशाली हो गया, कि चालुक्यों का अन्त कर दक्षिणापथ पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। चालुक्यों के राज्य का अन्त 753 ई. के लगभग हुआ। वातापी के चालुक्य राजा न केवल वीर और विजेता थे, अपितु उन्होंने साहित्य, वास्तुकला आदि के संरक्षण व संवर्धन की ओर भी अपना ध्यान दिया।

कल्याणी का चालुक्य वंश

चालुक्यों की मुख्य शाखा का अन्तिम महत्त्वपूर्ण शासक सम्भवतः कीर्तिवर्मा द्वितीय था। चालुक्यों की कुछ छोटी शाखाओं ने भी कुछ दिन तक शासन किया। ऐसी ही एक शाखा कल्याणी के चालुक्यों की थी, जिसका महत्त्वपूर्ण शासक तैल अथवा तैलप द्वितीय था, आरम्भ में वह राष्ट्रकूटों का सामन्त था, परन्तु बाद में राष्ट्रकूटों की दुर्बलता का लाभ उठाकर वह एक स्वतंत्र शासक बन गया। उसने अन्तिम राष्ट्रकूट शासक कक्र को अपदस्त कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। इसकी पत्नी ‘जक्कल महादेवी’ थी, जो राष्ट्रकूट शासक भामह की पुत्री थी। सत्तारूढ़ होने के बाद तैलप ने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना आरम्भ किया। उसके इस साम्राज्य विस्तारवादी नीति का प्रबल विरोधी गंग नरेश पांचाल देव था। दोनों के मध्य कई बार युद्ध हुआ। अन्त में वेल्लारी के सामन्त शासक गंगभूतिदेव की सहायता से तैलप ने पांचाल देव को पराजित कर मार दिया। इस महत्त्वपूर्ण विजय के उपलक्ष्य में तैलप द्वितीय ने ‘पांचलमर्दनपंचानन’ का विरुद्व धारण किया तथा अपने सहायक गंगभूतिदेव को तोरगाले का शासक बनाकर उसे ‘आहवमल्ल’ की उपाधि से अलंकृत किया। तैलप द्वितीय ने चेदि, उड़ीसा और कुंतल ने शासक उत्तम चोल तथा मालवा के परमार राजा मुंज को पराजित किया। तैलप द्वितीय द्वारा मुंज के स्थान का उल्लेख आवन्तरकालीन ग्रन्थ आइना-ए-अकबरी तथा उज्जैन से प्राप्त अभिलेख में मिलता है। कन्नड़ कथाओं में तैलप द्वितीय को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कहा गया है। उसने ‘भुनैकमल्ल’, ‘महासामन्तधिपति’, ‘आहमल्ल’, ‘महाराजाधिराज’, ‘परमेश्वर’, ‘परमभट्टारक’, ‘चालुक्यभरण’, ‘सत्याश्रम’, ‘कुलतिलक’ तथा ‘समस्तभुवनाश्रय’ आदि उपाधियां धारण की थीं। पहले चालुक्य वंश की राजधानी वातापी थी, पर इस नये चालुक्य वंश ने कल्याणी को राजधानी बनाकर अपनी शक्ति का विस्तार किया। इसीलिए ये ‘कल्याणी के चालुक्य’ कहलाते हैं।

कल्याणी के चालुक्य शासक शासक शासनकाल
तैलप –
सत्याश्रय (977 से 1008 ई.)
विक्रमादित्य पंचम (1008 ई.)

अच्चण द्वितीय –

जयसिंह जगदेकमल्ल (1015 से 1045 ई.)

सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल (1043 से 1068 ई.)

सोमेश्वर द्वितीय भुवनैकमल्ल (1068 से 1070 ई.)

विक्रमादित्य षष्ठ (1070 से 1126 ई.)

सोमेश्वर तृतीय (1126 से 1138 ई.)

जगदेकमल्ल द्वितीय (1138-1151 ई.)

तैलप तृतीय (1151-1156 ई.)

सोमेश्वर चतुर्थ (1181-1189 ई.)

चालुक्य शक्ति में निर्बलता

सोमेश्वर तृतीय के बाद कल्याणी के चालुक्य वंश का क्षय शुरू हो गया। 1138 ई. में सोमेश्वर तृतीय की मृत्यु हो जाने पर उसका पुत्र जगदेकमल्ल द्वितीय राजा बना। इस राजा के शासन काल में चालुक्यों में निर्बलता आ गई। अन्हिलवाड़ा कुमारपाल (1143-1172 ई.) के जगदेकमल्ल के साथ अनेक युद्ध हुए, जिनमें कुमारपाल विजयी हुआ। 1151 ई. में जगदेकमल्ल की मृत्यु के बाद तैल ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया। उसका मंत्री व सेनापति विज्जल था, जो कलचुरी वंश का था। विज्जल इतना शक्तिशाली व्यक्ति था, कि उसने राजा तैल को अपने हाथों में कठपुतली के समान बना रखा था। बहुत से सामन्त उसके हाथों में थे। उनकी सहायता से 1156 ई. के लगभग विज्जल ने तैल को राज्यच्युत कर स्वयं कल्याणी की राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया, और वासव को अपना मंत्री नियुक्त किया।

कल्याणी के चालुक्य वंश का अन्त

भारत के धार्मिक इतिहास में ‘वासव’ का बहुत अधिक महत्त्व है। वह लिंगायत सम्प्रदाय का प्रवर्तक था। जिसका दक्षिणी भारत में बहुत प्रचार हुआ। विज्जल स्वयं जैन था, अतः राजा और मंत्री में विरोध उत्पन्न हो गया। इसके परिणामस्वरूप वासव ने विज्जल की हत्या कर दी। विज्जल के बाद उसके पुत्र ‘सोविदेव’ ने राज्य प्राप्त किया, और वासव की शक्ति को अपने क़ाबू में लाने में सफलता प्राप्त की। धार्मिक विरोध के कारण विज्जल और सोविदेव के समय में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, चालुक्य राजा तैल के पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ ने उससे लाभ उठाया, और 1183 ई. में सोविदेव को परास्त कर चालुक्य कुल के गौरव को फिर से स्थापित किया। पर चालुक्यों की यह शक्ति देर तक स्थिर नहीं रह सकी। विज्जल और सोविदेव के समय में वातापी के राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उसके कारण बहुत से सामन्त व अधीनस्थ राजा स्वतंत्र हो गए, और अन्य अनेक राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वकांक्षी राजाओं ने विजय यात्राएँ कर अपनी शक्ति का उत्कर्ष शुरू कर दिया। इन प्रतापी राजाओं में देवगिरि के यादव राजा भिल्लम का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 1187 ई. में भिल्लम ने चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, और इस प्रकार प्रतापी चालुक्य वंश का अन्त हुआ।

वेंगि का चालुक्य वंश

प्राचीन समय में चालुक्यों के अनेक राजवंशों ने दक्षिणापथ व गुजरात में शासन किया था। इनमें से अन्हिलवाड़ (गुजरात) वातापी और कल्याणी को राजधानी बनाकर शासन करने वाले चालुक्य वंश थे। पर इन तीनों के अतिरिक्त चालुक्य का एक अन्य वंश भी था, जिसकी राजधानी वेंगि थी। यह इतिहास में ‘पूर्वी चालुक्य’ के नाम से विख्यात है, क्योंकि इसका राज्य चालुक्यों के मुख्य राजवंश (जिसने कल्याणी को राजधानी बनाकर शासन किया) के राज्य से पूर्व में स्थित था। इनसे पृथक्त्व प्रदर्शित करने के लिए कल्याणी के राजवंश को ‘पश्चिमी चालुक्य राजवंश’ भी कहा जाता है। इतिहास में वेंगि के पूर्वी चालुक्य वंश का बहुत अधिक महत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके राजाओं ने न किसी बड़े साम्राज्य के निर्माण में सफलता प्राप्त की, और न दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं। पर क्योंकि कुछ समय तक उसके राजाओं ने भी स्वतंत्र रूप से राज्य किया, अतः उनके सम्बन्ध में भी संक्षिप्त विवरण प्राप्त होता है।

जिस समय वातापी के प्रसिद्ध चालुक्य सम्राट पुलकेशी द्वितीय ने (सातवीं सदी के पूर्वार्ध में) दक्षिणापथ में अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना की, उसने अपने छोटे भाई ‘कुब्ज विष्णुवर्धन’ को वेंगि का शासन करने के लिए नियुक्त किया था। ‘विष्णुवर्धन’ की स्थिति एक प्रान्तीय शासक के समान थी, और वह पुलकेशी द्वितीय की ओर से ही कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्यवर्ती प्रदेश का शासन करता था। पर उसका पुत्र ‘जयसिंह प्रथम’ पूर्णतया स्वतंत्र हो गया था, और इस प्रकार पूर्वी चालुक्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ। इस वंश के स्वतंत्र राज्य का प्रारम्भकाल सातवीं सदी के मध्य भाग में था।

जब तक वातापी में मध्य चालुक्य वंश की शक्ति क़ायम रही, वेंगि के पूर्वी चालुक्यों को अपने उत्कर्ष का अवसर नहीं मिल सका। पर जब 753 ई. के लगभग राष्टकूट दन्तिदुर्ग द्वारा वातापी के चालुक्य राज्य का अन्त कर दिया गया, तो वेंगि के राजवंश में अनेक ऐसे प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने राष्ट्रकूटों और अन्य पड़ोसी राजाओं पर आक्रमण करके उनके साथ युद्ध किया। इनमें ‘विक्रमादित्य द्वितीय’ (लगभग 799-843) और ‘विजयादित्य तृतीय’ (843-888) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन दोनों राजाओं ने राष्टकूटों के मुक़ाबले में अपने राज्य की स्वतंत्र सत्ता क़ायम रखने में सफलता प्राप्त की। इनके उत्तराधिकारी चालुक्य राजा भी अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में सफल रहे।

दसवीं सदी के अन्तिम भाग में वेंगि को एक नयी विपत्ति का सामना करना पड़ा। जो चोलराज राजराज प्रथम (985-1014) के रूप में थी। इस समय तक दक्षिणापथ में राष्टकूटों की शक्ति का अन्त हो चुका था, और कल्याणी को अपनी राजधानी बनाकर चालुक्य एक बार फिर दक्षिणापथपति बन गए थे। राजराज प्रथम ने न केवल कल्याणी के चालुक्य राजा सत्याश्रय को परास्त किया, अपितु वेंगि के चालुक्य राजा पर भी आक्रमण किया। इस समय वेंगि के राजसिंहासन पर ‘शक्तिवर्मा’ विराजमान था। उसने चोल आक्रान्ता का मुक़ाबला करने के लिए बहुत प्रयत्न किया, और अनेक युद्धों में उसे सफलता भी प्राप्त हुई, पर उसके उत्तराधिकारी ‘विमलादित्य’ (1011-1018) ने यही उचित समझा, कि शक्तिशाली चोल सम्राट की अधीनता स्वीकार कर ली जाए।

राजराज प्रथम ने विमलादित्य के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर उसे अपना सम्बन्धी व परम सहायक बना लिया। विमलादित्य के बाद उसका पुत्र ‘विष्णुवर्धन’ पूर्वी चालुक्य राज्य का स्वामी बना। उसका विवाह भी चोलवंश की ही एक कुमारी के साथ हुआ था। उसका पुत्र ‘राजेन्द्र’ था, जो ‘कुलोत्तुंग’ के नाम से वेंगि का राजा बना। उसका विवाह भी एक चोल राजकुमारी के साथ हुआ, और विवाहों के कारण वेंगि के चालुक्य कुल और चोलराज का सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ हो गया।

चोलराजा अधिराजेन्द्र के कोई सन्तान नहीं थी। वह 1070 ई. में चोल राज्य का स्वामी बना, और उसी साल उसकी मृत्यु भी हो गई। इस दशा में वेंगि के चालुक्य राजा राजेन्द्र कुलोत्तुंग ने चोल वंश का राज्य भी प्राप्त कर लिया, क्योंकि वह चोल राजकुमारी का पुत्र था। इस प्रकार चोल राज्य और वेंगि का पूर्वी चालुक्य राज्य परस्पर मिल कर एक हो गए, और ‘राजेन्द्र कुलोत्तुंग’ के वंशज इन दोनों राज्यों पर दो सदी के लगभग तक शासन करते रहे। 1070 के बाद वेंगि के राजवंश की अपनी कोई पृथक् सत्ता नहीं रह गयी थी।

कल्याणी के चालुक्य वंश का दक्षिणापथ के बड़े भाग पर उनका आधिपत्य था, और अनेक प्रतापी चालुक्य राजाओं ने दक्षिण में चोल, पांड्य और केरल तक व उत्तर में बंग, मगध और नेपाल तक विजय यात्राएँ की थीं। पर जब बारहवीं सदी के अन्तिम भाग में चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई, तो उनके अनेक सामन्त राजा स्वतंत्र हो गए, और अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे। जिस प्रकार उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के ह्रास काल में अनेक छोटे-बड़े राजपूत राज्य क़ायम हुए, वैसे ही दक्षिणी भारत में कल्याणी के चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर अनेक राजाओं ने स्वतंत्र होकर अपने पृथक् राज्यों की स्थापना की।

संयोगिता

संयोगिता कन्नौज के महाराज जयचन्द्र की पुत्री थी। जयचन्द्र ने संयोगिता के विवाह हेतु स्वयंवर का आयोजन किया था, किंतु पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता के कारण उसने उसे स्वयंवर का निमंत्रण नहीं भेजा। जब राजकुमारी संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया गया, तब पृथ्वीराज चौहान के अपमान के लिए महल में दरबान के स्थान पर पृथ्वीराज की प्रतिमा लगाई गई। स्वयंवर में पहुँचकर पृथ्वीराज चौहान राजकुमारी संयोगिता का हरण कर ले जाते हैं। इस घटना से दोनों राजाओं में इतनी अधिक शत्रुता पैदा हो गई कि जयचन्द्र ने मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद ग़ोरी से हाथ मिलाकर उसे पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने का निमंत्रण दिया। 1192 ई. में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज पराजित हुआ और उसने स्वयं का प्राणांत कर लिया। दो वर्ष बाद सन 1194 ई. में चन्दावर के युद्ध में तुर्क विजेता मुहम्मद ग़ोरी ने जयचन्द्र को भी हराया और मार डाला।

पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेमकथा

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेमकथा राजस्थान के इतिहास में स्वर्ण अंकित है। वीर राजपूत जवान पृथ्वीराज चौहान को उनके नाना ने गोद लिया था। वर्षों दिल्ली का शासन सुचारु रूप से चलाने वाले पृथ्वीराज को कन्नौज के महाराज जयचंद की पुत्री संयोगिता भा गई। पहली ही नजर में संयोगिता ने भी अपना सर्वस्व पृथ्वीराज को दे दिया, परन्तु दोनों का मिलन इतना सहज न था। महाराज जयचंद और पृथ्वीराज चौहान में कट्टर दुश्मनी थी। राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर आयोजित किया गया, जिसमें पृथ्वीराज चौहान को नहीं बुलाया गया तथा उनका अपमान करने हेतु दरबान के स्थान पर उनकी प्रतिमा लगाई गई। ठीक वक्त पर पहुँचकर संयोगिता की सहमति से महाराज पृथ्वीराज उसका अपहरण करते हैं और मीलों का सफर एक ही घोड़े पर तय कर दोनों अपनी राजधानी पहुँचकर विवाह करते हैं। जयचंद के सिपाही बाल भी बाँका नहीं कर पाते। इस अपमान का बदला लेने के लिए जयचंद ने मुहम्मद ग़ोरी से हाथ मिलाता है तथा उसे पृथ्वीराज पर आक्रमण का न्योता देता है। कहते हैं कि पृथ्वीराज ने 17 बार मुहम्मद ग़ोरी को परास्त किया तथा दरियादिल होकर छोड़ दिया। 18वीं बार धोखे से मुहम्मद ग़ोरी ने पृथ्वीराज को कैद कर लिया तथा अपने मुल्क ले गया। वहाँ पृथ्वीराज के साथ अत्यन्त ही बुरा सलूक किया गया। उनकी आँखें गरम सलाखों से जला दी गईं। अंत में पृथ्वीराज के अभिन्न सखा चंदबरदाई ने योजना बनाई। पृथ्वीराज चौहान शब्द भेदी बाण छोड़ने में माहिर थे। चंदबरदाई ने ग़ोरी तक इस कला के प्रदर्शन की बात पहुँचाई। ग़ोरी ने मंजूरी दे दी। प्रदर्शन के दौरान ग़ोरी के शाबाश लफ्ज के उद्घोष के साथ ही भरी महफिल में अंधे पृथ्वीराज चौहान ने ग़ोरी को शब्दभेदी बाण से मार गिराया तथा इसके पश्चात् दुश्मन के हाथ दुर्गति से बचने के लिए दोनों ने एक-दूसरे का वध कर दिया। अमर प्रेमिका संयोगिता को जब इसकी जानकारी मिली तो वह भी वीरांगना की भाँति सती हो गई। दोनों की दास्तान प्रेमग्रंथ में अमिट अक्षरों से लिखी गई।

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