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मारुति सुजुकी, मानेसर आंदोलन के 10 साल पूरे होने पर…..

Kavita Krishnapallavi
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‘‘नव-दार्शनिकों” के रुख़ के साथ एक तीसरी समस्या भी जुड़ी हुई है। उन्हें वे चीज़ें भी दिखाई नहीं दे रहीं जिन्हें कि कोई अन्धा आदमी भी देख सकता है। 2011 के पहले दौर में, मारुति सुजुकी मज़दूरों का संघर्ष ट्रेड यूनियनवादी राजनीति का बन्दी बना रह गया था, बावजूद इसके कि इसने केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के ट्रेड यूनियनवाद को ख़ारिज किया था। हालाँकि, केन्द्रीय ट्रेडयूनियन नौकरशाही का स्थान एक नयी ट्रेडयूनियन नौकरशाही ने ले लिया। यही कारण था कि एम.एस.ई.यू. अप्रासंगिक होकर ख़त्म हो गयी और नयी यूनियन एम.एस.डब्ल्यू.यू. अस्तित्व में आयी। एक दिन की भूख हड़ताल व दूसरे दिन धरने के साथ 7-8 नवम्बर को मारुति सुजुकी मज़दूरों के संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ है। अभी यह कहना जल्दबाज़ी कहलायेगी कि अब यह संघर्ष कारखाने की चौहद्दियों को तोड़ देगा और गुड़गाँव-मानेसर-धारूहेड़ा-बावल ऑटोमोबाइल औद्योगिक पट्टी के मज़दूरों के बीच राजनीतिक वर्ग एकता स्थापित करने की ओर आगे बढ़ेगा; कि यह अर्थवाद और ट्रेडयूनियनवाद से पूर्णतः निजात पा लेगा। लेकिन, इतना तो तय हैः एम.एस.डब्ल्यू.यू. के उदय ने कई “अति-वामपंथी” संगठनों और व्यक्तियों द्वारा हर उस चीज़ के जल्दबाज़ और अनालोचनात्मक तौर पर उत्सव मनाने और उसका महिमा-मण्डन करने की, जो कि एम.एस.ई.यू. कर रहा था, शुद्ध आधारहीनता को प्रदर्शित कर दिया है। इन ”चिन्तकों” को मारुति सुजुकी मज़दूर आन्दोलन के इस नये ट्रेडयूनियनवाद की असफलताएँ नज़र ही नहीं आती। मज़दूरों ने मानेसर के ऑटोमोबाइल बेल्ट में फैक्टरियों की चौहद्दियों का अतिक्रमण करते हुए मज़दूरों के बीच वर्ग एकता कायम करने का एक बहुमूल्य अवसर खो दिया, जो कि, अगर वास्तविकता में तब्दील किया गया होता, तो राज्य के लिए एक संकट की स्थिति उत्पन्न कर सकता था। लेकिन ट्रेड यूनियन नौकरशाही (शुरू में, केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की, और बाद में, एम.एस.ई.यू. की) और आर्थिक तर्क (पेक्युनियरी लॉजिक) के प्रभाव में मज़दूरों ने केवल अपने प्लाण्ट पर ही ध्यान देना बेहतर समझा। परिणामस्वरूप, मारुति सुजुकी के मज़दूरों और पूरे मानेसर बेल्ट की अन्य ऑटोमोबाइल फैक्टरियों के मज़दूरों की समस्याएँ एकसमान होने के बावजूद, सभी फैक्टरियों के मज़दूरों के बीच एकता कायम करने के लिए कोई गम्भीर प्रयास नहीं किये गये। इसलिए, कुछेक संयुक्त रैलियों में अन्य फैक्टरियों की यूनियनों की भागीदारी के अलावा, मज़दूर आन्दोलन मारुति सुजुकी प्लाण्ट तक ही सिमटा रह गया। एम.एस.ई.यू. का नेतृत्व उनके संघर्ष के लिए एक ठोस कार्ययोजना तय करने और गुड़गाँव-मानेसर बेल्ट की फैक्टरियों में इन्हीं दशाओं में काम करने वाले लाखों-लाख मज़दूरों का सक्रिय रूप से आह्वान करने के सुझाव की उपेक्षा करता रहा, जो कि वहाँ सक्रिय एक संगठन ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ दे रहा था। जिस समय यह ग़लती की जा रही थी, उस दौरान वहाँ अनेक तथाकथित “अतिवामपन्थी” प्रवृत्तियाँ (जो माकपा से अधिक वामपन्थी हैं!) मौजूद थीं और ”मज़दूरों के आत्मसंगठन के क्षण” का आनन्द ले रही थीं; जो लोग नेतृत्व का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचने का प्रयास कर रहे थे कि फैक्टरी की सीमाओं से बँधे रहकर आन्दोलन प्रबन्धन के साथ-साथ राज्य से निपट पाने में समर्थ नहीं हो पायेगा, उन्हें शिक्षाशास्त्रवादी कहा जा रहा था; कुछ अतिआशावादी संगठनों और बुद्धिजीवियों ने उनपर मज़दूरों को हतोत्साहित करने का भी आरोप लगाया; जबकि कुछ दूसरों ने दलील दी कि ये लोग (जो इलाकाई वर्ग एकजुटता की ज़रूरत की ओर ध्यान खींचने का प्रयास कर रहे थे) मारुति सुजुकी मज़दूरों के संघर्ष के साथ सिर्फ सहानुभूति रखते हैं, जबकि, वे स्वयं उस संघर्ष का हिस्सा हैं! जो लोग आन्दोलन को फैक्टरी की सीमा से बाहर और पूरे गुड़गाँव-मानेसर बेल्ट में फैलाने का आग्रह कर रहे थे उनपर तरह-तरह के आरोप लगाये गये। “आशावादियों” और ‘‘नव-दार्शनिकों” द्वारा पेश की जा रही अधिकतर दलीलें वास्तव में मज़दूर वर्ग के आन्दोलन में मौजूद उपरोक्त राजनीतिक प्रवृत्तियों का मिश्रण भर थीं।
कुछ गिने-चुने लोगों को ही मारुति सुजुकी मज़दूर आन्दोलन के विकास और जिस रास्ते पर वह आगे बढ़ रहा था उसके आलोचनात्मक विश्लेषण में दिलचस्पी थी। ख़ास तौर पर, ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ सक्रिय रूप से इस दृष्टि का प्रचार कर रहा था कि आन्दोलन को चरणबद्ध ढंग से संचालित करने के लिए एक ठोस कार्यक्रम होना चाहिए और आन्दोलन को गुड़गाँव-मानेसर के पूरे ऑटोमोबाइल बेल्ट में विस्तारित किया जाना चाहिए। दस्ता के कार्यकर्ता एम.एस.ई.यू. के नेतृत्व को बार-बार बताते रहे कि उनकी लड़ाई प्रबन्धन के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय श्रम विभाग से नहीं थी, जैसा कि कई मज़दूर सोचते थे। उनकी लड़ाई सुज़ुकी कम्पनी, हरियाणा सरकार और केन्द्रीय सरकार तथा नवउदारवादी नीतियों से है। जापानी कम्पनियाँ दुनियाभर में अपनी फासीवादी प्रबन्धन तकनीकों के लिए कुख्यात हैं और मज़दूरों को कुचलने के लिए वे किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती हैं। हरियाणा को विदेशी निवेश की पसन्दीदा जगह बनाने के लिए, राज्य सरकार ने हमेशा ही अपना नंगा मज़दूर-विरोधी चेहरा दिखाया है, चाहे वह 2006 में होण्डा मज़दूरों की हड़ताल रही हो या अन्य हालिया मज़दूर संघर्ष। भारत सरकार जिन आर्थिक नीतियों को थोप रही है वह मज़दूरों के अतिशोषण के बिना लागू ही नहीं की जा सकती हैं। मज़दूरों को इस तथ्य से भी अवगत कराया जाना चाहिए कि पूरी दुनिया के पैमाने पर मज़दूरों के अधिकारों, जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है, पर हमले किये जा रहे हैं। इसलिए मारुति सुजुकी के मज़दूरों पर इस हमले का मुकाबला केवल मज़दूरों की व्यापक वर्ग एकता और संघर्ष को सुनियोजित और संगठित ढंग से चलाकर ही किया जा सकता है।4
लेकिन उस समय, अधिकतर “अति”-वामपन्थी समूह संघर्ष छिड़ने से उत्पन्न हर्षोन्माद में डूब-उतरा रहे थे। आन्दोलन की किसी भी चीज़ के बारे में आलोचनात्मक रवैया रखने वालों को जमकर निन्दा की जाती थी। सोनू गुज्जर और शिव कुमार जैसे एम.एस.ई.यू. के नेताओं का भारत में मज़दूर वर्ग के संघर्ष के नये पथप्रदर्शकों के रूप में यशगान किया जा रहा था। हड़ताल के असफल होने, और यूनियन के पूरे नेतृत्व के प्रबन्धन द्वारा ख़रीद लिये जाने और आन्दोलन की पीठ में छुरा घोंपने के बाद, मज़दूर बहुत हतोत्साहित और परेशान थे। हालाँकि, दिलचस्प बात है कि, ”वाम” समूहों और बुद्धिजीवियों का हर्षोन्माद फिर भी जारी रहा! वे अब भी मज़दूरों की स्वतःस्फूर्तता और इस तथ्य का जश्न मना रहे थे कि मज़दूरों ने केन्द्रीय ट्रेड यूनियनवाद को नकार दिया था, हालाँकि उन्हें यह नहीं दिख रहा था कि नये ट्रेड यूनियनवाद ने भी कोई नया विकल्प नहीं पेश किया था। एक बार फिर, जब 18 जुलाई की घटना हुई, तो उन्हीं संगठनों और उन्हीं बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर इसका परकीकरण किया और इसका गैरआलोचनात्मक गुणगान किया। इसे भारत में मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के पुनर्जागरण, भारत के मज़दूरों को राह दिखाने वाली एक नयी शुरुआत के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। यह त्रासद है, बल्कि कहना चाहिए कि विडम्बनापूर्ण है कि मारुति सुजुकी प्लाण्ट के मज़दूरों की एक असंगठित, अनियोजित और जवाबी कार्रवाई, जिसमें कि महीनों से पल रहा मज़दूरों का गुस्सा और असन्तोष फूट पड़ा था, को भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन की भावी राह दिखाने वाली घटना के तौर पर पेश किया जा रहा है। यूँ तो कोई भी क्रान्तिकारी व्यक्ति या समूह मारुति सुजुकी के फासीवादी प्रबन्धन और राज्य और केन्द्र सरकारों के खि़लाफ मज़दूरों के अधिकारों की हिफाज़त करेगा, लेकिन ऐसा अनावश्यक और निराधार यशगान और मज़दूर वर्ग की स्वतःस्फूर्त कार्रवाई का ऐसा गैरआलोचनात्मक उत्सव मज़दूर वर्ग के आन्दोलन को भी नुकसान ही पहुँचायेगा।
ऐसा लगता है कि इस प्रकार का हर्षातिरेक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन में व्याप्त पराजयबोध से उत्पन्न हुआ है। मज़दूर वर्ग के आन्दोलन में लम्बे समय से मौजूद शान्ति और ठहराव के दौर ने क्रान्तिकारी शक्तियों और बुद्धिजीवियों को निराशा और कुण्ठा से भर दिया है। हालाँकि, पिछले 7-8 सालों से इस ठहराव के टूटने के साथ, वाम समूहों और बुद्धिजीवियो में यह प्रवृत्ति आ गयी है कि कहीं भी मज़दूरों के संघर्ष की ख़बर सुनते ही वे खुशी से चीखने लग जाते हैं। विश्वविद्यालयों के लोग ‘संघर्ष पर्यटन’ पर निकल पड़ते हैं, तथाकथित “अति-वामपन्थी” समूह और ‘‘नवदार्शनिक” अलथूसर के शब्दों में ”सैद्धान्तिक वृत्ति” में चले जाते हैं और मज़दूर वर्ग की स्वतःस्फूर्तता और हिरावल के अप्रासंगिक हो जाने के बारे में सैद्धान्तिकीकरण और चिन्तन करने लगते हैं। यह इन बुद्धिजीवियों में गहरे पैठा पराजयबोध और निराशावाद ही है जो उन्हें ऐसे निष्कर्षों तक पहुँचाता है। इनमें से ज़्यादातर ने लम्बे समय से मज़दूर आन्दोलन के बारे में कुछ देखा-सुना ही नहीं है (भागीदारी करना तो दूर की बात है!); अब जबकि मज़दूर सड़कों पर उतर रहे हैं, अब जबकि उनका धैर्य जवाब दे चुका है और वे संघर्ष कर रहे हैं; तो ये ‘‘नवदार्शनिक” भाव-विभोर हो उठे हैं! मज़दूरों सड़कों पर उतर रहे हैं, जुझारूपन और हिंसा पर उतारू हो जा रहे हैं, यह तथ्य उन्हें चकित कर देता है! और अचानक ही वे आलोचनात्मकता, ऐतिहासिकीकरण (historicization) के उपयोग, और उन सभी दूसरी चीज़ों के बारे में भूल जाते हैं जिनके बारे में वे इस पूरे दौर में खुद सबसे ज़्यादा बातें करते रहे हैं और शिक्षाएँ देते रहे हैं; उनसे भी ज़्यादा जो मारुति सुजुकी आन्दोलन के आलोचनात्मक मूल्यांकन की बात करते रहे हैं। इनमें से कुछ बुद्धिजीवियों पर बेदियू, नेग्री, हार्ट आदि जैसे उत्तर-मार्क्सवादी चिन्तकों का काफी प्रभाव है, जो कि खुद यही काम कर रहे हैं: हिरावल की ज़रूरत को ख़ारिज कर रहे हैं और गैर-पार्टी क्रान्तिवाद का उपदेश दे रहे हैं। अचानक ही, इन उत्तर-मार्क्सवादी और स्वायत्ततावादी मार्क्सवादी सिद्धान्तकारों के भारतीय अनुगामियों के भी इलहाम का वक्त आ गया और उन्हें यह ”दिव्य-ज्ञान” प्राप्त हुआ हैः मज़दूर वर्ग हिरावल से आगे निकल गया है; हिरावल पीछे छूट गया है; मज़दूर वर्ग की स्वतःस्फूर्तता जिन्दाबाद; ”मज़दूर वर्ग के हाथों मज़दूर वर्ग की मुक्ति”! ऐसे सिद्धान्त पश्चिम बंगाल के कुछ अराजकतावादी-संघाधिपत्यवादी समूहों द्वारा भी प्रचारित किये जा रहे हैं, जो यह दावा करते हैं कि मज़दूर संघर्ष और प्रतिरोध के नये रूप और रणनीतियाँ स्वयं ही निकाल लेंगे; इसमें हिरावल की कोई भूमिका नहीं होगी! इनका कहना है कि पार्टी से इतर मज़दूर वर्ग का एक ”जन राजनीतिक केन्द्र” बनाना होगा (यानी, एक्सेलरोद की वही लाइन जिसकी लेनिन ने यह दलील देते हुए सख़्त आलोचना की थी कि मज़दूर वर्ग का केवल एक ही राजनीतिक केन्द्र हो सकता है, और वह है पार्टी, और इस पार्टी का चरित्र एक जन (मास) पार्टी का कतई नहीं हो सकता) इस तरह एक ख़ास प्रवृत्ति उभरकर आयी है जो अराजकतावादी-संघाधिपत्यवाद, स्वायत्ततावाद, ट्रॉण्टी-ब्राण्ड का इतालवी ऑपराइस्मो, अराजकतावाद, काउंसिल कम्युनिज़्म, आदि का निहायत ही बचकाना मिश्रण है। ये नाना प्रकार की असम्बद्ध राजनीतिक प्रवृत्तियाँ एकजुट होकर ग़ैरपार्टी क्रान्तिवाद की प्रवृत्ति में एकाकार हो गयी हैं।
वर्तमान समय में यह क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए चिन्ता का विषय है कि क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों और विद्यार्थियों के एक ख़ास हिस्से में यह प्रवृत्ति जिसे लेनिन ने ”वाम”-पन्थी बचकानापन कहा था, फैशनेबल हो रही है। इन सिद्धान्तकारों के मतों का खण्डन करना और उनके सिद्धान्तों का सतहीपन उजागर करना बेहद ज़रूरी काम बन गया है। हिरावल की भूमिका को ख़ारिज करना मज़दूर वर्ग को किसी भी अभिकरण (एजेंसी) से रिक्त कर देना है। पार्टी को वर्ग के खि़लाफ खड़ा करने की प्रवृत्ति खतरनाक है। जो लोग इस भ्रम का प्रचार करते हैं वे हिरावल पार्टी की प्रकृति को भूल जाते हैं। लेनिन के शब्दों में कहें तो कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग का उन्नत दस्ता होती है; यह वर्ग के सबसे उन्नत तत्वों को समाहित करती है; यह ”सर्वहारा की विश्वदृष्टि का साकार रूप होती है”। हम यहाँ वर्ग, पार्टी और राज्य और उनके आपसी सम्बन्धों से जुड़े प्रश्नों की चर्चा में नहीं जायेंगे। लेकिन इतना तय हैः मज़दूर वर्ग के आन्दोलन का ठहराव टूट रहा है; हम एक संक्रमण काल से गुज़र रहे हैं; पूँजीवादी व्यवस्था एक बन्द गली के अन्तिम छोर तक पहुँच चुकी है; पूरी दुनिया के पैमाने पर मज़दूर वर्ग आजीविका और बेहतर जीवन के अपने अधिकारों के लिए स्वतःस्फूर्त ढंग से सड़कों पर उतरने लगा है; लेकिन यही वह समय है जब हमें हिरावल, एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी, की ज़रूरत पर बार-बार ज़ोर देना चाहिए, बार-बार दोहराना चाहिए; वर्तमान समय में भारत में मज़दूर वर्ग की कोई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी नहीं है, इस तथ्य से हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अब हिरावल की ज़रूरत ही नहीं रह गयी है और वर्ग अपनी मुक्ति खुद ही हासिल कर लेगा। अतीत में ऐसे अराजकतावाद और अराजकतावादी-संघाधिपत्यवाद ने आन्दोलन को सिर्फ नुकसान ही पहुँचाया है। मज़दूर वर्ग के बढ़ते जुझारूपन और वर्ग अन्तरविरोधों के तीखे होते जाने से यह और भी ज़रूरी हो गया है कि रैडिकल क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी और विद्यार्थी जितनी जल्दी सम्भव हो एक क्रान्तिकारी मज़दूर वर्गीय पार्टी के निर्माण की ओर आगे बढ़ें। आज के वक्त में क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों की पूरी ऊर्जा ऐसी एक क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण की दिशा में लगायी जानी चाहिए। वरना, समाजवाद की वेला बीत जायेगी, ‘‘नव-दार्शनिक” अपनी प्रलोभनकारी सैद्धान्तिक जुगाली ही करते रह जायेंगे और इतिहास हमारी सज़ा मुकर्रर करेगा वह होगी फासीवाद!
— Abhinav Sinha

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