इतिहास

कर्नल मुअम्मर ग़द्दाफ़ी की ज़िन्दगी के संघर्ष : इस्लामिक जगत के सुनहरे सपने का विनाश!

🕛 7 जून 1942 ई०

कर्नल मुअम्मर गद्दाफी
जन्म ( 7 जून 1942 )
मृत्यु ( 20 अक्टूबर 2011 )
जन्म और परिवार –
मोहम्मद गद्दाफी 7 जून 1942 को पश्चिमी लीबिया के रेगिस्तानी इलाके शिरदे के एक टाम्ब में पैदा हुए, उनके वालिदेन बेहद गरीब थे, मुअम्मर गद्दाफी के वालिद मोहम्मद अब्दुस्सलाम बिन हामिद ऊँट और बकरियां चराते थे, उसनके वालिद का इन्तेकाल 1985ई में हुआ, मुअम्मर गद्दाफी के वालिदा का नाम आयशा था जो एक गरीब खातून थी, मुअम्मर गद्दाफी के वालिदा का इन्तेकाल 1978ई में हुआ,

बचपन से ही मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया पर युरेपियन कालोनी के तसद्दुत के देखा था, अपने लड़कपन में उन्होंने अपने मुल्क को इटली के हाथों गुलाम होते देखा था, साल 1945 ई में लीबिया फिर एक मर्तबा बर्तानिया और फ़्रांसीसी फौजियों के कब्ज़े में अगया,

इब्तेदाई तालीम –
मोहम्मद गदाफी की इब्तेदाई तालीम मजहबी माहोल में हुई, जिन्हें इलाके के ही एक इस्लामिक स्कूल ने तालीम दी, बदहाली के बावजूद मुअम्मर गद्दाफी के वालिद ने उन्हें तालीम दिलवाई, इब्तेदाई तालीम हासिल करने के लिए मुअम्मर गद्दाफी अपनी वालिदेन से दूर रहा करते थे, वो हफ्ते भर मस्जिद में रहते थे और वहीँ रातों में सो जाते थे, और हफ्ते के आखिर में 30 किलो मीटर का सफ़र कर के अपने वालिदेन से मिलने जाते थे, मुअम्मर गद्दाफी के तालीम की दिल चस्पी उनके इलाके के बच्चों के लिए मिसाल थीं, बाद में उनके वालिद को सेन्ट्रल लीबिया में एक नौकरी मिली और वहीँ मुअम्मर गद्दाफी को सेकेंडरी में एडमिशन मिला और उस स्कूल में मुअम्मर गद्दाफी की तालीम की काफी प्रसंशा हुई, यहाँ उनके कई दोस्त बने, बल्कि उनके साथ मुअम्मर गद्दाफी ने अरब दुनिया में होने वाले सियासी और जंगी उथल पुथल का जायजा लिया, साल 1948ई में अरब इसराइल की होने वाली जंग, 1951 में मिस्र का इन्कलाब, 1956 का सीज क्क्रेईसेज भी उन्होंने देखा,

मिलिट्री ट्रेनिंग –
मुअम्मर गदाफी ने ” benghazi university of libya ” में तारीख का अध्यन किया, मुअम्मर गद्दाफी के रिकॉर्ड के मुताबिक़ 1963 ई में उन्होंने benghazi university of libya के ही रॉयल मिलेट्री ट्रेनिंग में अपनी ट्रेनिंग स्टार्ट कर दी, लीबिया में उस वक़्त मिस्र अफ्वाज को बरतानवी मिलिट्री की तरफ से ट्रेनिंग दी जाती थी, जिस पर मुअम्मर गद्दाफी काफी नाराज रहा करते थे और इसी नाराजगी और गुस्से की वजह से उन्होंने अंग्रेजी जुबान का इस्तेमाल ही तर्क कर दिया था, साल 1965 में मुअम्मर गद्दाफी ने मिलिट्री एकेडमी से ग्रेजुएशन किया और आर्मी सिग्नल कोर्ट्स में कोम्मुनिकाशन ऑफिसर की पोस्ट हासिल की , अप्रेल 1966 में मुअम्मर गद्दाफी को यूनाइटेड किंगडम में आगे की ट्रेनिंग के लिए चुना गया, इस दौरान मुअम्मर गद्दाफी की अग्रेजी बर्तानिया और बर्तानिया मिलिट्री के अहेल्कारों के साथ नाराजगी और गुस्सा बढ़ता ही गया, बहरहाल वो किसी ना किसी तरह लन्दन में दिन गुज़ारने के बाद वो काफी खुश फक्र के साथ अपने मुल्क वापस लौटे,

लन्दन से वापस अपने वतन लौटने के बाद –
लीबिया में सियासी उथल पुथल और मुअम्मर गद्दाफी के बढ़ते कदम –
1960 के बाद लीबिया के सदर इदरिस के हुकूमत की लोकप्रियता रोजाना कम होने लगी, करप्शन और कबाइलियों की बगावत बढ़ने लगी, कुछ वर्षों के बाद 1967 में होने वाली 6 दिन के जंग के दौरान मिस्र की इस्राइल के हाथ शिकस्त हुई, लीबिया में बहुत असर अंदाज हुई, लीबिया की अवाम ने इदरीश हुकूमत को इस्राइल का हिमायती पाया जिसके बाद लीबिया के बिल गाजी समेत कई इलाकों में मगरिब मुखालिफ एहतेजाज शुरू किये, लीबिया के वर्करों ने मिस्र आइल टर्मिनस बंद कर दिए, ऐसे में मुअम्मर गद्दाफी के फ्री ओफ्फिसर मूवमेंट भी काफी ताकतवर हो चुकी थी,

मुअम्मर गद्दाफी के ज़िन्दगी के संघर्ष –
लीबिया के साबिक सरबराह मुअम्मर गद्दाफी एक ऐसा लीडर जो ना सिर्फ अफ्रीका बल्कि अरब मुमालिक के इत्तिहाद का खवाब देखा था, तनाजात और ताजादाद से भरपूर ज़िन्दगी गुजारने वाले लीबिया के साबिक रहनुमा कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की ज़िन्दगी सराहनिय है, अफ़सोसनाक सवाल और दर्दनाक मौत अपने आप में एक इतिहास है, मुअम्मर गद्दाफी हक परस्ती के साथ काफी अरसे तक अरब रहनुमा रहे, 42 साल पहले एक नौजवान फौजी अफसर के हैसियत से हुकूमत पर कब्ज़ा कर के लीबिया के हुक्मरान बने, सबसे पहले नजर डालते हैं मुअम्मर गद्दाफी की शुरूआती ज़िन्दगी पे,

सियासी ज़िन्दगी –
तालीमी दौर के दौरान मुअम्मर गद्दाफी ने सियासत में दिलचस्पी दिखानी शुरु कर दी, इस सिलसिले में उनके सियासी हीरो मिस्र के सदर जमाल अब्दुल नासिर बने, मिस्र के साबिक सदर जमाल अब्दुल नासिर मगरीबी कलूनिज और यहूदियत के कट्टर विरोधी थे, मिस्र के सदर अब्दुल नासिर की किताब “philosophy of the revolution “ ने मुअम्मर गद्दाफी के ज़िन्दगी में इंक़लाब ला दिया, अक्तूबर 1961ई में मुल्क में हो रहे एहतेजाज में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, इस दौरान सीरिया से अरब जमुरिया का अलग होने के दौरान हुए एक एहतेजाज के मौके पर मुअम्मर गद्दाफी ने एल्कोहल फरोख्त करने वाली एक होटल के शीशे तोड़ दिए, जिसके बाद वो मुकामिया इंतेजामिया के तवज्जो का मरकज बने लेकिन उन्हें सभा से अपने परिवार समेत निकाल दिया गया, इसके बाद मुअम्मर गद्दाफी मिश्रातम दाखिल हुए और उन्होंने अपनी तालीम जारी रखी, और किसी भी सियासी पार्टी में शामिल होने से साफ़ इनकार कर दिए,

लीबिया के इक्तेदार पर कब्ज़ा –
साल 1969 में लीबिया के सदर इदरीश तुर्की और यूनान के दौरे पे रवाना हुए, उस वक़्त मुअम्मर गद्दाफी ने इस मौके को गलीमत जाना और 1 सितम्बर 1969 को मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया के एयरपोर्ट, पोलिस डिपोट, रेडिओ स्टेशन और सरकारी दफ्तरों पे कब्ज़ा कर लिया , इसी तरह उन्हों अपने साथियों के साथ पुरे लीबिया के हुकूमत पे कब्ज़ा जमा लिया, जूनियर ओफ्फिसर के पोस्ट में ही मुअम्मर गद्दाफी ने अपने दीगर साथी फौजी अफसरों के साथ मिलकर फ्री ऑफिसर मूवमेंट को मजीद ताकतवर बनाया और लीबिया के शाह इदरीश के खिलाफ बगावत करते हुए बगैर ख़ून बहाए इख्तेदार पर कब्ज़ा करने का कारनामा अंजाम दिया, कामयाब बगावत के बाद revolutionary command council libya के चेयरमैन और libyan army के chief of the armed forces मुन्ताकिब हुए और लीबिया को libyan arab republic का नाम दिया,

लीबिया के सरबराह होने के बाद मुअम्मर गद्दाफी की सरगर्मियां –
हुकूमत पे काबिज़ होने के बाद मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया में अपने तरीके से कानून नाफ़िज़ कराया, मुअम्मर गद्दाफी का सियासी फल्फासा इसलिए मुनफ़रिद था की वह उनका खुद का था और और दुनिया में चल रहे कम्युनिज्म से अलग था, इस मुहीम को दुनिया में तीसरी आर्मी थ्योरी के तौर पे देखा गया , अरब कौम परस्ती की इस सरपरस्त को अपने इक्तिदायी दौर में इस वजह से मकबूलियत भी हासिल हुई, मुल्क भर में हो रहे गैर इस्लामी सरगर्मियों को बंद कर दिया गया, शराब और जुये पर पाबंदी लगा दी गयी, 1977 में “Great Socialist People’s Libyan Arab Jamahiriya” के नाम से एक ऐसा निजाम बनाया जिस बजाहरे इख्तियाद्रात आवाम पर मुस्तामिल हजारों कमेटियों के हाथ में थे लेकिन मुअम्मर गद्दाफी ही तमाम इखितियारत का सर चश्मा थे, गद्दाफी के अपने लोगों में बड़ा असर था, और तेल पैदा करने वाली मुमालिक की OPEC में भी कर्नल ने अपने काफी हिमायती पैदा कर लिए थे, जिसकी वजह से 70 की दहाई में तेल के पैदावार की कमी कर के अमेरिका और यूरोप को भी इस तबानाई का शिकार कर दिया था, कर्नल गद्दाफी 70 की दहाई से ही अरब कौम परस्ती के आलमबरदार रहे, उन्होंने लीबिया को उस वक़्त के मिश्री और शामी रहनुमाई के साथ मुहाय्दों में भी मुन्सलिफ किया, 1988 में जब लोकर बी ने जहाज को तबाह करने का इल्जाम लीबिया के बासिंदों पे लगा तो मुअम्मर गद्दाफी ने उनको आर्मी अदालत के हवाले करने से इनकार कर दिया, उसके बाद सयुंक्त राष्ट्र से लीबिया बहुत सारी पाबंदियां लगा दी गयीं, ऐसे वक़्त पे अरब मुल्कों ने उस वक़्त लीबिया के हिमायती से दुरी कर ली, उसके बाद मुअम्मर गद्दाफी ने अरब कौम परस्ती को छोड़ कर अफ़्रीकी अवाम की तरफ अपनी हिमायती की कोश्सिशें शुरू कर दी. कर्नल मुअम्मर गद्दाफी दुनिया भर के मुक्तलिफ़ आज़ादी तहरीक के हिस्सा बने, जिनमे “ तंजीम आजादी ए फिलिस्तीन “ और अफ़्रीकी मुस्लिम तन्जिमी शामिल हैं, अपने अंदाज़ ए हुक्मरानी की वजह से दुशमन देश अम्रीका और यूरोपी देशों की नींद की हराम कर दिए, मगरीबी देश मुअम्मर गद्दाफी को अपने लिए खतरा समझने लगे और सयुंक्त राष्ट्र ने 1979 से 2006 तक लीबिया को दहशतगर्दी को बढ़ावा देने वाले मुमालिक के लिस्ट में रखा, 1986 में भी संयुक्त राष्ट्र ने बर्लिन धमाकों के रद्दे अमल में कर्नल गद्दाफी के रहने की जगह और लीबिया के एक बड़े इलाके पे बमबारी की थी जिसमे कर्नल गद्दाफी की बेटी हालाक हो गई ।

साल 2000 के बाद के हालात-
2003 में ईराक में सद्दाम हुसैन के हुकूमत के बाद कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने अपनी आर्मी तन्हाई ख़त्म करने का फैसला किया, और लोकर बी जहाज़ का मुकद्दमा इस्कोटलैंड के कानून के तहत हालैंड में हल करने की रजामंदी जाहिर की, जबकि लीबिया ने लोकर बी धमाके में मरने वाले परिवारों को हर्जान के तौर पे कई अरब डॉलर भी दिए थे, चंद माह बाद ही मुअम्मर गद्दाफी ने लीबिया के जौहरी हथियार के प्रोग्राम को ख़त्म करने का एलान किया, उसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने भी लीबिया पर से पाबंदिय हटा दी,
अरब क्यादत की जानिब से मुअम्मर गद्दाफी के अक्सर अरब रहनुमाओ से एक्तेलाफ रहे हैं, काय्राह मे अरब लीग के प्रोग्राम के दौरान गद्दाफी की सऊदी के बादशाह अब्दुल्लाह से सरे आम तू तू मैं मैं हुई थी, कर्नल गद्दाफी की उमर 68 साल की थी और उनके जाननशीनों के हवाले से कहा जाता है की वह अपने बेटे सैफ़ुल इस्लाम गद्दाफी को तैयार कर रहे थे, उन्होंने लीबिया में अपनी बड़ी से बड़ी सोशल जमात के साथ आवाम की रहनुमाई और इस्लाम के उसूल को पाबंद किये, अपने पुरे दौर इख्तेदार में अपने खिलाफ होने वाली किसी भी विरोधी देशों की साज़िश में ज़रा भी रहम नहीं दिखाई, 2011 के आगाज में बादशाही निजाम कायम की, इसी दौरान विरोधी देशों की साज़िश की तहरीक अरब देशों से होते हुए जब लीबिया में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी से टकराई तो इस तहरीक को सख्त रियासती निजामत का सामना करना पड़ा, और ये विरोधी तहरीक रियासती ताक़त के आगे बेबस दिखने लगी, लेकिन अमेरिका और दुसरे नेटो मुमालिक ने संयुक्त राष्ट्र के हिमायत से लीबिया पे चढ़ाई कर दी और विरोधी को हर तरह की इमदादी मदद की और खुद भी लीबिया पे फिजाई हमले शुरू कर दिए, 30 अप्रेल 2011 को बाबुल अजीजिया कंपाउंड पर नेटो के फिज़ाई हमले में कर्नल गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे और एक नवासी और दो पोते मारे गए, 29 अगस्त को कर्नल गद्दाफी की अहलिया साफिया और बेटी आयशा और दो बेटे सरहद छोड़ के पडोसी मुल्क अल-जजायेर चले गए, आयशा गद्दाफी की एक बेटी बाबुल अजेजिया पे अमेरिका के नेटो हमले में मारी गयी थी, 1970 में शाफिया नामी खातून से गद्दाफी ने शादी की थी, जिस से गद्दाफी 7 बच्चे हैं, जिसमे से एक आयशा गद्दाफी मुअम्मर गद्दाफी की एकलौती शाहिब्जादी हैं, पेशे से वकील थीं और साबिक इराकी सदर सद्दाम हुसैन के गिरिफ्तारी के बाद उनका दिफ़ा करने वाले वकीलों में से एक वाकील आयशा गद्दाफी थीं,
जब अमेरिका ने नेटो मुमालिक को साथ मिलाकर लीबिया पे हमला किया और मुअम्मर गद्दाफी की हुकूमत ख़त्म की उस वक़्त उस हमले की तरह तरह के अफवाह उड़ाई गयी, दुनिया की आँखों में धुल झोंकने और खुद के हमले को जायज शाबित करने के लिए अमेरिका ने कई झूट बोले, कुछ लोग कहते हैं की अमेरिका ने विरोधियों पे उठाए जाने वाले कदम की वजह से हमला किय, जबकि कुछ लीबिया के तेल झाखिरे को हमले की अहम् वजह बतायी, लेकिन कुछ दूर अंदेश ऐसे भी लोग थे जो समझते थे की ये हमला सिर्फ और सिर्फ गोल्ड से तेलों की फरोख्त के लिए हुई, हिलेरी किलिंटन की 3000 से ज्यादा ईमेल से पता चलता है की असल वजह की क्या थी, और अमेरिका की लीबिया पे होने वाले हमले की भी असल वजह सामने आगयी, हिलेरी क्लिंटन के ईमेल से पता चलता है की लीबिया कर्नल मुअम्मर गद्दाफी एक नई करेंसी लांच करवाना चाहते थे, जिसकी बुनियाद सोने पे रखी जानी थी, गद्दाफी ये जानते थे अगर हम बिखरे तो मेरा ये ख्याल मेरी तबाही होगी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, फौजी हमलों के चाँद महीने बाद ही उन्होंने तमाम मुस्लिम और अफ़्रीकी मुमालिक को दावत दी की आयें सोने और चांदी की हकीकी दौलत पे कारोबार करें, और अपना तेल डॉलर्स के बजाये सोने पे फरोख्त करें, ये वह ख्याल था जो दुनिया में जो अरब दुनिया को मग्रीबी ख्यालों से निकाल कर मुस्लिम दुनिया के हक में झुका देता, ऐसा पहले भी हो चूका था साल 2000 में ईराक साबिक सदर सद्दाम हुसैन ने एलान किया था की वह अपना तेल डॉलर्स के बजाये यूरो में बेचेंगे, और यही वह असल वजह थी जिसके वजह से बिना कोई ठोस वजह के बिना सबूत के ईराक पे चढ़ाई कर दी गयी और सद्दाम हुसैन को फांसी दी गयी, मुअम्मर गद्दाफी के भी साथ यही हुआ क्यूंकि उनका मकसद डॉलरों को नीचा दिखाना था, लेकिन अमेरिका समेत किसी भी मग्रीबी मुमालिक को कबूल नहीं हुई, इसीलिए अमेरिका ने नेटो मुमालिक के सात मिल कर लीबिया को तबाह करने का मंसूबा बनाया और मुअम्मर गद्दाफी को डॉलर और सोनो की दुनिया पे हुक्मरानी ख़त्म करने का खवाब चूकना चूर कर दिया, सोने पे खरीदो फरोख्त करना ऐसी चीज है जो दुनिया के ऊपर पर गहरे असरात की ताक़त रखता है, ना सिर्फ दुनिया के ऊपर बल्कि यही वह रास्ता है जो की गरीब मुस्लिम मुमालिक समेत गुलाम मुस्लिम मुमालिक को भी मगरिब से आगे ले जाने की सलाहियत रखता है, और यही वह वाहिद वजह भी है जो मग्रीबी खुदाओं को किसी भी सूरत में मंजूर नहीं हुआ ।

मुअम्मर गद्दाफी का ख़्वाब-
कहने को तो यूंही लीबिया और गद्दाफी के तबाही की वजह कहीं तेल का जखीरा बना तो कहीं सोने पे फरोख्त करना तो कहीं कागजी नोट वजह बनी, लेकिन इसी मसले को अगर इस्लामिक नज़रियात से राजनीतिकरण करके देखा जाए तो कोई शक नहीं की कुछ अलग पहलु देखने को मिले, जैसे अमेरिका द्वारा किये गए मुस्लिम देशों की तबाही, मुस्लिम हक्प्रस्त लीडर का तख्तापलट और क़त्ल, क्यूंकि ये पहली बार नहीं इस से पहले भी हो चुके हैं, आईये कुछ नजर डालते हैं-

जैसा की पहले बता चूका 1967 में हुए सिक्स डेज ऑफ़ वार में अरब मुल्क और इसराइल की जंग में इसराइल की जीत हुई जिसकी वजह से अरब और अफ्रीका के नक्से और सियासी हालात में बड़े पैमाने पे बदलाव आये, मिस्र में जमाल अब्दुल नासिर की हुकूमत गयी और अनवर सादात को हुकूमत मिली, और लीबिया में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को जंग में अरबों के सप्पोर्ट से इख्तेदार मिला, जहां मिस्र और सीरिया ने इसराइल से समझोते कर लिए वहीँ गद्दाफी ताउम्र इस समझौते के लिए तैयार न हुए, गद्दाफी पे कई बार जानलेवा हमला हुआ जिनमे उनके बच्चे भी शहीद हुए,

एक नजरिया इस्लामिक दुनिया –
70 के दशक में पाकिस्तान के सदर जुल्फेकार अली भुट्टो ने इतिहासिक इस्लामिक समिट बुलाई, जिसमे दुनिया भर के इस्लामिक मुल्क शामिल हुए, इस समिट में उन्होंने इस्लामिक जगत को एक अलग नजरिया दिया, जिसका मुख्य अजेंडा था, तमाम इस्लामिक मुल्कों की करेंसी एक होगी, पाकिस्तान उसका केंद्र बनेगा, तमाम मुल्कों की एक फ़ौज बनेगी, जिसका मुख्य उद्देश्य अमेरिका इस्राइल और नाटो जैसे देशों से इस्लामिक दुनिया का दिफ़ा करना होगा, और पूरी दुनिया के मुसलमानों को एक उम्मत होने के नाते हर हाल में माली मदद करना, ये एक ऐसा कदम था जिस से अमेरिका इसराइल और नाटो देशों में भूचाल आगया, क्यूंकि अगर ऐसा होता तो शायद ही दुनिया कोई मुसलमान कमजोर होता और गरीब होता, और इस समिट के अनुसार अगर व्यस्था प्रणाली बनायी जाती तो पस्छिमी देशों की हालत ख़राब हो जाती,, इस समिट को “2nd islamic Summit” or “ islamic Summit OF Pakistan “ के नाम से जाना जाता है,

इस्लामिक जगत के इस सुनहरे सपने का विनाश-
जब अमेरिका को इस समिट के बारे में पता चला तो सभी नाटो देश को देखा ना गया उसके बाद उनकी राजनीतिकरण कुछ यूं हुई, पकिस्तान में भुट्टो का तख्तापलट और उन्हें फांसी दी गयी, सउदिया में शाह फैसल का क़त्ल, सूडान में ईदी अमीन के खिलाफ आन्दोलन, इराक के खिलाफ हमले और इरान में शिया क्रांति, क्यूंकि इस समिट में इरान के “ रजा शाह पहलवी” शामिल हुए थे, खुमैनी के नेर्तत्व में उठी इस क्रान्ति ने मिडिल ईस्ट के सारे समीकरणों को बदल के रख दिया, सुन्नी शिया में बंटने से उस समिट क मकसद में जो ठेंस लगने के बाद भी अगर उसके आगे तक कोई उस समिट के आधार पे अड़ा रहा तो वो थे गद्दाफी, जिन्होंने 40 साल में ना केवल लीबिया की गरीबी दूर की बल्कि अफ़्रीकी देशों में सूडान, सोमालिया, इथोपिया, नाइजीरिया शामिल थे जहां गद्दाफी ने उनके अवाम को रोजगार दिया,

गद्दाफी की मांग और अमेरिका की साजिश-
तेल व्यापार के डील में गद्दाफी द्वारा अमेरिका के सामने रखा गया प्रस्ताव ही अमेरिका की नींद हराम कर दी थी, गद्दाफी ने कहा इस रद्दी नोट का कोई मोल नहीं हमें गोल्ड चाहिए, लेकिन परिणामस्वरूप अमेरिका ने लीबिया पे प्रतिबंध लगा दिया, परेशानी बढ़ते देख गद्दाफी ने फिर डालर लेने की बात मान ली, लेकिन डालर मिलते ही उस करेंसी का गोल्ड खरीदना शुरू कर दिया, अमेरिका अब कुछ नहीं कर सकता था सिवाय हाथ मलने के, क्यूंकि कानून मुअम्मर गद्दाफी का अब कुछ नहीं बिगाड़ सकता था, सद्दाम हुसैन के फांसी के बाद अरब और अफ्रीका में जो कुछ था गद्दाफी ही थे, जो अमेरिका से बचे हुए थे और अकलमंदी का सबूत देते हुए पूरी दुनिया से राब्ते में थे, जिस से उन्हें अलग थलग करना नामुमकिन साबित हो रहा था, बिलकुल ऐसे ही जैसे आज तुर्की के सदर रजब तैयब अर्दोगान हैं, अर्दोगान ने तो कुछ महीने पहले हुए तख्तापलट को नाकाम कर दिया, लेकिन गद्दाफी इसमें चूक गए, और शिया गद्दारों के झांसों की वजह से बच ना पाए,

अरब स्प्रिंग का आन्दोलन –
अरब स्प्रिंग का आन्दोलन जो ट्यूनीशिया से शुरू हुआ और सीरिया में अटका हुआ था, उसका असल मकसद ही गद्दाफी को ख़त्म करना था, जो उस समय अमेरिका के गले में हड्डी बनके अटके हुए थे, जैसे आज कोरिया के तानाशाह किम जोंग के बारे में मीडिया चिल्लाती रहती है, 2011 में वही हाल गद्दाफी के भी साथ हुआ था, ताकि जब एक आजाद मुल्क में अमेरिका अपनी बादशाही दिखाए तो दुनिया उसके साथ हो, और यही वजह है की कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के बारे में लोगो सही बात से ज्यादा मनगढ़ंत गलत बात पता है ।
गद्दाफी की मौत-
गद्दाफी का अंत 20 अक्टूबर को हुआ था। 2011 में 20 अक्टूबर को गद्दाफी को अपने ही होमटाउन सिर्त में एक संदिग्ध सैन्य हमले में मार गिराया गया था। गद्दाफी भले ही अपने शासन काल में बर्बर रहा हो, लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता, कि इस शासक ने अपनी देश की जनता के लिए जितना किया, उतना शायद ही कोई कर सके। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर इराक में सद्दाम हुसैन और लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी सत्ता में होते तो दुनिया बेहतर जगह होती । उत्तर कोरिया के किम जोंग उन ने कहा था कि अगर मुअम्मर गद्दाफी और सद्दाम हुसैन पर परमाणु हथियार होते तो उनका ये हाल ना होता ।
गद्दाफ़ी के द्वारा किये गए अच्छे कार्य-
हालांकि, गद्दाफी से जुड़ी ऐसी कई बातें हैं, जिनके बारे में कम लोग जानते होंगे। तो आइए जानते हैं गद्दाफी और लीबिया के बारे में कुछ ऐसी बातें जिनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं…

आज गद्दाफी को कर्नल गद्दाफी के नाम से भी जाना जाता था। आज भी लीबिया के नागरिकों का एक बड़ा तबका इस बात से असहमत नजर आता है कि गद्दाफी एक तानाशाह था या फिर वह आतंकियों को बढ़ावा देता था।
आइए आज हम आपको उन 10 खास बातों के बारे में बताते हैं जिनके बारे में लीबिया ने अमेरिका जैसे कई देशों के सामने भी एक आदर्श पेश किया था।

* घर हर व्‍यक्ति का मानवाधिकार
गद्दाफी का मानना था कि घर हर व्‍यक्ति और परिवार के लिए मानवाधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में घर पर किसी और का हक नहीं होना चाहिए। गद्दाफी की वर्ष 1975 में पब्लिश हुई ग्रीन बुक में यह बात लिखी थी।
लीबिया में ‘घर’ मानव अधिकार की श्रेणी में शामिल थे। लीबिया के हर नागरिक को उसका खुद का घर देना सरकारी जिम्मेदारी थी। बाते दें कि गद्दाफी ने कसम खाई थी कि जब तक लीबिया के हर नागरिक को उसका खुद का घर नहीं मिलता, तब तक वह अपने माता-पिता के लिए भी घर नहीं बनवाएगा। यही वजह थी कि गद्दाफी अपने परिवार के साथ टेंट में रहता था।

* शिक्षा और इलाज में बेस्‍ट था
गद्दाफी के शासन काल में लीबिया अरब और अफ्रीकी क्षेत्र में एक ऐसा देश था जहां के नागरिकों को सर्वश्रेष्‍ठ शिक्षा और इलाज की सुविधा थी। अगर किसी नागरिक को लीबिया में किसी एजुकेशनल कोर्स या फिर इलाज की सुविधा लेने की इच्‍छा नहीं होती थी तो फिर उसे विदेश जाने के लिए सरकार की ओर से पैसा मिलता था।
लीबिया में सभी लोगों के लिए हेल्थ फैसिलिटी पूरी तरह से फ्री थीं। यहां लोगों के स्वास्थ्य सेवाओं पर आने वाला सारा खर्चा गद्दाफी सरकार खुद वहां करती थी। साथ ही, देश के बाहर भी इलाज कराने पर मेडिकल फैसिलिटी पर आने वाला पूरा खर्च सरकार ही उठाती थी।

* दुनिया का आंठवां अजूबा सिंचाई प्रोजेक्‍ट
गद्दाफी जिस समय लीबिया के शासक थे तो उन्‍होंने देश में मानवनिर्मित एक नदी की डिजाइन तैयार की थी। इस नदी को यहां का सबसे बड़ा सिचाईं प्रोजेक्‍ट भी कहते हैं और इस नदी से सिंचाईं के अलावा पूरे लीबिया में लोगों को पानी आसानी से मिलता था। खुद गद्दाफी ने इसे ‘दुनिया का आंठवां’ अजूबा करार दिया था।

* फ्री में शुरू होता बिजनेस
अगर किसी लीबियन नागरिक को किसी फार्म हाउस के जरिए बिजनेस की शुरुआत करनी होती तो फिर उसे एक घर मिलता, फार्म के लिए जमीन दी जाती और मुफ्त में खेती के लिए बीज दिए जाते थे।

* नए जोड़ों को शादी पर मिलते थे 32 लाख रुपए
लीबिया में शादी करने वाले हर जोड़े को गद्दाफी की तरफ से 32 लाख रुपए (50 हज़ार डॉलर) की राशि दी जाती थी। इतना ही नहीं, लीबिया में बच्चों की पैदाइश के वक्त भी महिला और उसके बच्चे को करीब सवा 3 लाख रुपए की रकम दी जाती थी।

* बच्‍चे के जन्‍म पर 5000 अमेरिकी डॉलर
कोई भी लीबियन महिला अगर किसी बच्‍चे को जन्‍म देती तो उसको खुद के लिए और उसके बच्‍चे के लिए सरकार की ओर से 5,000 अमेरिकी डॉलर दिए जाते थे।

* बिजली मिलती थी फ्री
गद्दाफी के शासन में नागरिकों को मुफ्त बिजली सप्‍लाई होती थी। लीबिया में बिजली पूरी तरह से फ्री थी और किसी भी तरह के बिल की कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं थी। ये यहां के लोगों के बुनियादी अधिकारों में शामिल था। यहां लोगों को बाकी मुल्कों की तरह बिजली का बिल जमा नहीं करना पड़ता था। इसका पूरा खर्च देश की सरकार उठाती थी।

* पेट्रोल सबसे सस्‍ता
गद्दाफी के समय लीबिया में पेट्रोल की कीमत 0.14 अमेरिकी डॉलर प्रति लीटर तक होती थी।

* देश में बढ़ाया शिक्षा का स्‍तर
गद्दाफी से पहले लीबिया में सिर्फ 25 प्रतिशत लोग ही शिक्षित थे लेकिन गद्दाफी के शासनकाल में यह आंकड़ा 87 प्रतिशत तक पहुंच गया था। लीबिया में गद्दाफी सरकार की ओर से लोगों के लिए फ्री पढ़ाई की व्यवस्था थी। इतना ही नहीं, देश में जरूरी एजुकेशन न मिलने पर स्टूडेंट्स को बाहर जाने की भी सुविधा थी। वहीं, विदेश में पढ़ाई पर आने वाला पूरा खर्च तो सरकार उठाती ही थी। इसके साथ ही बाहर रहने के लिए महीने के खर्च के तौर पर डेढ़ लाख रुपए और कार अलाउंस अलग से दिया जाता था।

* जीरो प्रतिशत इंट्रेस्‍ट पर मिलता था लोन
लीबिया दुनिया की अकेला ऐसा देश था जिसके पास खुद का बैंक था और इसकी वजह से यहां के नागरिकों को जीरो प्रतिशत इंट्रेस्‍ट पर कर्ज मिलता था। लीबिया पर किसी भी देश का कोई कर्ज भी नहीं था। लीबिया में गद्दाफी शासन का अपना खुद का स्टेट बैंक था। इसके जरिए वो आपने नागरिकों को दिए गए बैंक लोन पर ब्याज नहीं वसूलता था। यानी यहां लोगों को लोन बिना किसी ब्याज के बड़ी आसानी से मिलता था और केवल लोन की रकम ही चुकानी पड़ती थी। साथ ही, लीबिया में ऑयल की बिक्री से आने वाली रकम का एक हिस्सा सीधे यहां के नागरिकों के बैंक खाते में जाता था।

* गोल्‍ड दीनार
गद्दाफी ने अपने शासनकाल के खत्‍म होने से पहले पूरे अफ्रीकी क्षेत्र में सिर्फ एक ही मुद्रा लाने की तैयारी कर ली थी।
सभी तथ्य को एकत्रित करने में गूगल, विकिपेडिया, अन्य वेबसाइट्स, न्यूज प्रोटोकॉल और मुन्शफ न्यूज और कुछ दोस्तों साथ लिया गया है-

कर्नल ग़द्दाफ़ी- झलक एक तानाशाह की ज़िंदगी की

इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक शुरू होते होते कर्नल मुअम्मर ग़द्दाफ़ी का वक़्त गुज़र चुका था.

वर्ष 2011 तक वो उस पुरानी फ़िल्म के किरदार सरीखे हो गए थे जिसे कोई दोबारा देखना नहीं चाहता था. वो उस समय सत्ता में आए थे जब वियतनाम का युद्ध चल रहा था, आदमी चाँद पर अपने क़दम रख चुका था और रिचर्ड निक्सन अमरीका के राष्ट्रपति हुआ करते थे.

तब से ले कर ग़द्दाफ़ी के इस दुनिया से जाने तक अमरीका ने सात राष्ट्रपति और ब्रिटेन ने आठ प्रधानमंत्री देख लिए हैं. लेकिन ग़द्दाफ़ी हमेशा अपनी तुलना ब्रिटेन की महारानी से करते थे.

जब लीबिया में विद्रोह शुरू हुआ तो ग़द्दाफ़ी ने अपने एक भाषण में कहा भी था कि ‘अगर ब्रिटेन की महारानी पचास से अधिक वर्षो तक और थाईलैंड के राजा 68 सालों तक राज कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं ?’

सिर्फ़ 27 वर्ष की उम्र में किया सैनिक विद्रोह

ग़द्दाफ़ी ने लीबिया पर पूरे 42 सालों तक राज किया. एक ज़माने में बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक रहे ग़द्दाफ़ी ने 1969 में लीबिया के बादशाह इदरीस का एक रक्तहीन सैनिक विद्रोह में तख़्ता पलटा था. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 27 साल.

उस समय त्रिपोली में रहने वाले अशर शम्सी बताते हैं, ”मैं गहरी नींद में सोया हुआ था. मेरी बहन ने मुझे जगा कर कहा, उठो, उठो., सैनिक विद्रोह हो गया है. मैंने रेडियो ऑन किया. उसमें देश भक्ति के गीत बज रहे थे और ज़ोर ज़ोर से नारे लगाए जा रहे थे. मैंने अपने कपड़े पहने और बाहर चला गया. ”

”जब मैं सिटी सेंटर पर पहुंचा तो वहाँ बहुत से लोग सड़कों पर जमा थे. वो लोग लीबिया और क्रांति के पक्ष में नारे लगा रहे थे. किसी को पता नहीं था कि सत्ता किस के हाथ में आई है. मैं भी जानना चाहता था कि हो क्या रहा है.”

विद्रोह के सात दिन बाद बताया अपना नाम

सत्ता पर काबिज़ होने के एक हफ़्ते बाद लोगों को पता चला कि ग़द्दाफ़ी इस सैनिक विद्रोह के नेता हैं. राष्ट्र के नाम अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा, ‘मैंने सत्ता बदल कर बदलाव और शुद्धिकरण की आपकी माँग का जवाब दिया है. बादशाह ने देश के बाहर रहने की बात मान ली है. बहुत से लोगों ने रुकी हुई और सामंती राजनीतिक व्यवस्था के बाद बहने वाली ताज़ी हवा का ज़ोरसोर से स्वागत किया है.’सिर्फ़ 27 वर्ष की उम्र में किया सैनिक विद्रोह

ग़द्दाफ़ी ने लीबिया पर पूरे 42 सालों तक राज किया. एक ज़माने में बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक रहे ग़द्दाफ़ी ने 1969 में लीबिया के बादशाह इदरीस का एक रक्तहीन सैनिक विद्रोह में तख़्ता पलटा था. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 27 साल.

उस समय त्रिपोली में रहने वाले अशर शम्सी बताते हैं, ”मैं गहरी नींद में सोया हुआ था. मेरी बहन ने मुझे जगा कर कहा, उठो, उठो., सैनिक विद्रोह हो गया है. मैंने रेडियो ऑन किया. उसमें देश भक्ति के गीत बज रहे थे और ज़ोर ज़ोर से नारे लगाए जा रहे थे. मैंने अपने कपड़े पहने और बाहर चला गया. ”

”जब मैं सिटी सेंटर पर पहुंचा तो वहाँ बहुत से लोग सड़कों पर जमा थे. वो लोग लीबिया और क्रांति के पक्ष में नारे लगा रहे थे. किसी को पता नहीं था कि सत्ता किस के हाथ में आई है. मैं भी जानना चाहता था कि हो क्या रहा है.”

विद्रोह के सात दिन बाद बताया अपना नाम

सत्ता पर काबिज़ होने के एक हफ़्ते बाद लोगों को पता चला कि ग़द्दाफ़ी इस सैनिक विद्रोह के नेता हैं. राष्ट्र के नाम अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा, ‘मैंने सत्ता बदल कर बदलाव और शुद्धिकरण की आपकी माँग का जवाब दिया है. बादशाह ने देश के बाहर रहने की बात मान ली है. बहुत से लोगों ने रुकी हुई और सामंती राजनीतिक व्यवस्था के बाद बहने वाली ताज़ी हवा का ज़ोरसोर से स्वागत किया है.’

अपनी सुरक्षा के प्रति सनक

ग़द्दाफ़ी ने शुरू से ज़ोर दिया कि वो व्यक्ति पूजा के घोर विरोधी हैं. लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, वो निरंकुश तानाशाह बनते गए. और अपनी सुरक्षा के प्रति उनकी सनक ख़तरनाक हद तक बढ़ती गई.

ग़द्दाफ़ी की जीवनी लिखने वाले डेविड ब्लंडी और एंड्रू लिसेट अपनी किताब ‘क़द्दाफ़ी एंड द लीबियन रिवोल्यूशन’ में लिखते हैं, ‘जब ग़द्दाफ़ी ने पहली बार सत्ता संभाली तो वो त्रिपोली में एक पुरानी खटारा ‘फ़ोक्स वैगन’ में घूमा करते थे. वो और उनकी पत्नी स्थानीय सुपर मार्केट में खुद ख़रीदारी करते थे. लेकिन धीरे धीरे सब बदलने लगा.

”जब वो ‘अज़ीज़िया बैरेक्स’ से निकलते थे तो हथियारबंद कारों का काफ़िला दो अलग-अलग दिशाओं में दौड़ता था. एक में वो ख़ुद होते थे और दूसरे को झाँसा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. जब वो हवाई जहाज़ से कहीं जाते थे तो एक साथ दो जहाज़ उड़ान भरा करते थे. जिस जहाज़ में उन्हें जाना होता था, उसे उड़ान भरने के दो घंटे बाद वापस उतार लिया जाता था.अपनी सुरक्षा के प्रति सनक

ग़द्दाफ़ी ने शुरू से ज़ोर दिया कि वो व्यक्ति पूजा के घोर विरोधी हैं. लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, वो निरंकुश तानाशाह बनते गए. और अपनी सुरक्षा के प्रति उनकी सनक ख़तरनाक हद तक बढ़ती गई.

ग़द्दाफ़ी की जीवनी लिखने वाले डेविड ब्लंडी और एंड्रू लिसेट अपनी किताब ‘क़द्दाफ़ी एंड द लीबियन रिवोल्यूशन’ में लिखते हैं, ‘जब ग़द्दाफ़ी ने पहली बार सत्ता संभाली तो वो त्रिपोली में एक पुरानी खटारा ‘फ़ोक्स वैगन’ में घूमा करते थे. वो और उनकी पत्नी स्थानीय सुपर मार्केट में खुद ख़रीदारी करते थे. लेकिन धीरे धीरे सब बदलने लगा.

”जब वो ‘अज़ीज़िया बैरेक्स’ से निकलते थे तो हथियारबंद कारों का काफ़िला दो अलग-अलग दिशाओं में दौड़ता था. एक में वो ख़ुद होते थे और दूसरे को झाँसा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. जब वो हवाई जहाज़ से कहीं जाते थे तो एक साथ दो जहाज़ उड़ान भरा करते थे. जिस जहाज़ में उन्हें जाना होता था, उसे उड़ान भरने के दो घंटे बाद वापस उतार लिया जाता था.

”तब जा कर वो उसमें बैठते थे, ताकि अगर उस विमान में कोई बम रखा हो तो वो उनके बैठने से पहले फट जाए. एक बार उन्होंने ट्यूनिशिया संदेश भिजवाया कि वो वहाँ कार से पहुंचेंगे. वहाँ का सारा मंत्रिमंडल उनके स्वागत में सीमा पर पहुंच गया. बाद में पता चला कि वो सुरक्षा कारणों से विमान से ट्यूनिस पहुंच गए.”

”जब उनके विमान उतरने से पहले हवाई अड्डे के कंट्रोल रूम ने पूछा कि विमान में कौन है तो पायलेट ने ग़द्दाफ़ी का नाम न लेते हुए कहा, ‘हमारे विमान में एक अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है.”

हाथ मिलाने से पहले पहनते थे दस्ताना

अपनी सुरक्षा के प्रति ग़द्दाफ़ी की सनक की और ख़बरे भी बाहर आने लगीं.

लिंडसी हिल्सम ने अपनी किताब, ”सैंड स्टॉर्म – लीबिया इन द टाइम ऑफ़ रिवॉल्यूशन’ में लिखती हैं, ‘वर्ष 2009 में अमरीकी राजदूत जीन क्रेंट्ज़ ने एक डिपलोमैटिक केबिल में ग़द्दाफ़ी की यूक्रेनियन नर्स गेलीना कोलोत्निस्का पर उनकी निर्भरता का ज़िक्र किया. गेलीना के बारे में कहा जाता था कि वो ग़द्दाफ़ी की प्रेमिका हैं.

वो ये सुनिश्चित करती थीं कि ग़द्दाफ़ी जिस चीज़ को छुएं, वो पहले से स्टेरेलाइज़्ड की गई हो. उनकी कुर्सी पर भी कीटाणुनाशक छिड़के जाते थे और उनके माइक्रोफ़ोन को भी स्टेरेलाइज़्ड किया जाता था.

ग़द्दाफ़ी जब भी विदेश जाते थे तो होटल में वो अपने साथ ले जाई गई चादरें बिछवाते थे. उनके बारे में यह भी कहानी मशहूर है कि एक बार उन्होंने एक बड़े अरब नेता का हाथ मिलाने से पहले सफ़ेद रंग का दस्ताना पहना था, ताकि उनके हाथों में कोई संक्रमण न हो जाए.’

लॉकरबी विस्पोट के पीछे ग़द्दाफ़ी का हाथ

ग़द्दाफ़ी दुनिया भर में उस समय बहुत बदनाम हो गए जब 21 दिसंबर, 1988 को फ़्रैंकफ़र्ट से डिट्रॉएट जाने वाले पैन -ऐम जहाज़ में स्कॉटलैंड में लॉकरबी के ऊपर हवा में विस्फोट हुआ जिसमें 243 लोग मारे गए.

बाद में जाँच में पाया गया कि इसमें कथित रूप से लीबिया का हाथ था. अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ग़द्दाफ़ी से इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उन्हें ‘पागल कुत्ता’ तक कह डाला.

विरोधियों को सरेआम फाँसी

बाहर ही नहीं अपने देश में भी ग़द्दाफ़ी की ज़्यादतियों की ख़बरें बाहर आने लगीं. सार्वजनिक जगहों पर विरोधियों को फाँसी पर लटकाना आम बात हो गई. उन दिनों त्रिपोली में रहने वाले बाशेश शेख़ावी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, ‘एक दिन जब हम विश्वविद्यालय पहुंचे तो उसके मुख्य द्वार पर चार लोग फांसी के फंदे पर लटके हुए थे.

मैं वो दृश्य आज तक नहीं भूल पाया हूँ. हुआ ये था कि गेट पर ग़द्दाफ़ी का एक बहुत बड़ा पोस्टर लगा हुआ था रात को कुछ छात्रों ने आ कर उस पोस्टर पर कालिख पोत दी थी. ग़द्दाफ़ी के प्रशासन ने तय किया कि इन लड़कों को सबक़ सिखाया जाए. उस सब को विश्वविद्यालय के गेट पर फांसी पर चढ़ा दिया गया.’

अबू सलीम जेल गोलीबारी जिसमें मारे गए थे 1270 लोग

1996 में ग़द्दाफ़ी के सैनिकों ने त्रिपोली की अबू सलीम जेल में कैदियों को एक अहाते में जमा कर उन पर गोली चलवा दी. ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ के अनुसार इस नरसंहार मे 1270 कैदी मारे गए. उनके रिश्तेदारों को कभी नहीं बताया गया कि उनके लोग इस दुनिया में नहीं हैं.

लिंडसी हिल्सम ने अपनी किताब में लिखा, ‘फ़ुआद असद बेन ओमरान ने मुझे बताया कि वो हर दो महीने बाद अपने साले के दो बच्चों के साथ त्रिपोली जाया करते थे, ताकि वो अबू सलीम जेल में उनसे मिल सकें. वो अपने साथ उनके लिए कपड़े और रोज़-मर्रा की चीज़ें अपने साथ ले कर जाते थे, जिन्हें सुरक्षाकर्मी अपने पास रख लेते थे. उन्हें अपने साले से कभी मिलने नहीं दिया गया. उन्होंने मुझे बताया कि वो 14 सालों तक लगातार वहाँ जाते रहे, लेकिन उन्हें कभी नहीं बताया गया कि वो अब इस दुनिया में नहीं हैं.

एक नरसंहार की विभीषिका को तो समझा जा सकता है. लेकिन 14 सालों की झूठी उम्मीद, जब परिवार ये आस लगाए बैठे हों कि उनके लोग एक दिन घर वापस आएंगे, जब कि वास्तव में उनका निर्जीव शरीर पास के एक गड्ढ़े में पड़ा हो, शायद इससे बड़ी क्रूरता की मिसाल कहीं नहीं मिल सकती. ‘

यासर अराफ़ात से थी ख़ास दुश्मनी ग़द्दाफ़ी की

वैसे तो ग़द्दाफ़ी मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर को अपना हीरो मानते थे, लेकिन उनके बाद मिस्र के राष्ट्पति बने अनवर सादात और फ़लस्तीनी नेता यासर अराफ़ात से उन्हें ख़ास चिढ़ थी.

लिंडसे हिल्सम अपनी किताब में लिखती हैं, ‘मिस्र के पत्रकार मोहम्मद हाइकाल ने लिखा था कि सऊदी अरब के शाह फ़ैसल और मिस्र के राष्ट्रपति नासेर उस समय अवाक रह गए जब ग़द्दाफ़ी ने सुझाव दिया कि जार्डन के शाह हुसैन को मार दिया जाए, क्योंकि उन्होंने अपने यहाँ से फलस्तीनी लड़ाकों को निकाल दिया था. ग़द्दाफ़ी कभी भी किसी अरब राष्ट्राध्यक्ष को नहीं मरवा पाए, लेकिन ऐसा नहीं था कि कभी उन्होंने इसके लिए कोशिश न की हो.

यासेर अराफ़ात के लिए उनके मन में कोई ख़ास इज़्ज़त नहीं थी. ग़द्दाफ़ी अराफ़ात से इसलिए नाराज़ रहते थे, क्योंकि उन्होंने विदेश में रह रहे उनके विरोधियों को मरवाने के लिए उन्हें अपने लोग मुहैया नहीं करवाए थे.

1982 में जब अराफ़ात और उनके अल- फ़तह के साथी बैरूत में घिर गए थे तो ग़द्दाफ़ी ने उन्हें खुला टेलिग्राम भेज कर कहा था, ‘आपके लिए सबसे अच्छा विकल्प ये है कि आप आत्महत्या कर लें.’ तब अराफ़ात ने उन्हीं की भाषा में उसका जवाब देते हुए लिखा था, ‘मैं इसके लिए तैयार हूँ, बशर्ते आप भी मेरे इस क़दम में मेरा साथ दें.’ ‘

ताक़तवर महिलाओं के मुरीद

बहुत कम लोगों को पता है कि ग़द्दाफ़ी दुनिया की शक्ति शाली महिलाओं के बहुत मुरीद थे. लिंडसी हिल्सन अपनी किताब में लिखती हैं, ‘ एक बार उन्होंने एक इंटरव्यू के अंत में एक महिला पत्रकार से कहा था, ‘क्या आप अमरीकी विदेश मंत्री मेडलीन अलब्राइट तक मेरा एक संदेश पहुंचा सकती हैं?’

संदेश में लिखा था, ‘मैं आपसे प्यार करता हूँ. अगर आपकी भी मेरे प्रति यही भावनाएं हों तो तो अगली बार जब आप टेलिविजन पर आएं, तो हरे रंग की पोशाक पहनें. राष्ट्पति बुश के ज़माने में विदेश मंत्री रहीं कोंडेलीसा राइस से भी वो उतने ही प्रभावित थे और उनके पीठ पीछे उन्हें ‘माई अफ़रीकन प्रिंसेज़’ कहा करते थे.

राइस अपनी आत्मकथा ‘नो हायर ऑनर’ में लिखती हैं, ‘ 2008 में जब मैंने उनसे उनके तंबू में मिलने से इंकार कर दिया, तब वो मुझे अपने घर ले गए. वहाँ उन्होंने दुनिया के चोटी के नेताओं के साथ मेरी तस्वीरों का अपना संग्रह मुझे दिखाया. जब मैं ये देख रही थी तो उन्होंने अपने म्यूज़िक सिस्टम पर एक अंग्रेज़ी गाना चला दिया, ‘ब्लैक फ़्लावर इन द वाइट हाउज़.”

अपने नंबर 2 जालौद को भेजा था दिल्ली गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में

भारत के साथ कर्नल ग़द्दाफ़ी के रिश्ते कभी बहुत अच्छे होते थे तो कभी बहुत बुरे. ग़द्दाफ़ी कभी भारत नहीं आए. यहाँ तक कि 1983 में दिल्ली में हुए गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में भाग लेने के लिए उन्होंने अपने नंबर 2 जालौद को दिल्ली भेजा.

वो यहाँ आकर एक विवाद में फंस गए. मशहूर पत्रकार केपी नायर ने ‘टेलिग्राफ़’ अख़बार में लिखा, ‘सम्मेलन में भाग लेने के बाद अहदेल सलाम जालौद हैदराबाद गए, जहाँ उन्होंने न सिर्फ़ ‘प्रोटोकॉल’ तोड़ा, बल्कि अपनी सुरक्षा भी ख़तरे में डाल ली. जब उनकी कार का काफिला चार मीनार के सामने पहुंचा, तो वो कार से उतर कर उसकी छत पर नाचने लगे.

”उनकी ये तस्वीर भारतीय अख़बारों में भी छपी. इंदिरा गांधी ने इसको लीबिया की भारतीय मुसलमानों से सीधा संवाद बैठाने की कोशिश के रूप में लिया. भारत और लीबिया के संबंध ख़राब होना शुरू हो गए. लेकिन ग़द्दाफ़ी को पता था कि इंदिरा गाँधी को कैसे मनाया जा सकता है ? उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी सफ़िया फ़रकाश अल ब्रज़ाई को इंदिरा को मनाने दिल्ली भेजा.”

इंदिरा गांधी की लीबिया यात्रा के बदले भारत ने छुड़वाए दो मज़दूर

जब ग़द्दाफ़ी की पत्नी दिल्ली आईं, उस समय लीबिया में अर्जुन असरानी भारत के राजदूत थे.

अर्जुन असरानी याद करते हैं, ‘मेरी पत्नी श्रीमती ग़द्दाफ़ी को छोड़ने त्रिपोली हवाई अड्डे गईं. उस समय उन्होंने कहा था कि जब मैं वापस लौटूंगी तो आपसे मिलूँगी. जब ग़द्दाफ़ी की पत्नी दिल्ली पहुंची तो उन्हें राष्ट्पति भवन में ठहराया गया. इंदिरा गांधी से जब वो मिलने गईं, तो उन्होंने कहा कि मेरे पति ने मुझसे कहा है कि मैं तब तक लीबिया वापस न लौटूँ, जब तक इंदिरा गाँधी लीबिया आने का वादा न कर दें. बहुत इसरार करने पर इंदिरा गांधी ने लीबिया जाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया.

”जब विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने मुझसे पूछा कि इसके बदले में क्या हम लीबिया से कुछ माँग सकते हैं ? मैने कहा ‘दो भारतीय श्रमिक पाँच मिलीग्राम अफ़ीम रखने के आरोप में उम्र कैंद की सज़ा काट रहे हैं, क्योंकि वहाँ के कानून बहुत कठोर थे. अगर श्रीमती ग़द्दाफ़ी चाहें तो उन्हें दया के आधार पर छोड़ा जा सकता है. जैसे ही सफ़िया ग़द्दाफ़ी ने लीबिया की धरती पर क़दम रखा, उन दो भारतीय मज़दूरों को छोड़ दिया गया.”

भारतीय राजदूत की पत्नी को ग़द्दाफ़ी की पत्नी का न्योता

अर्जुन असरानी आगे बताते हैं, ‘उन्होंने मेरी पत्नी को कॉफ़ी पीने के लिए बुलाया. उन्होंने उनसे पूछा कि आपका लीबिया प्रवास कैसा रहा. मेरी पत्नी ने जवाब दिया, बाकी सब तो बहुत अच्छा था, लेकिन मुझे एक ही अफ़सोस रहा कि मैं आपके ‘हैंडसम’ पति से नहीं मिल पाई. उस समय तो ग़द्दाफ़ी की पत्नी कुछ नहीं बोलीं. अगले दिन मेरे पास ग़द्दाफ़ी के दफ़्तर से फोन आया कि आज का आपका क्या कार्यक्रम है ?

मैंने बता दिया कि शाम को मैं फ़्रेंच राजदूत के यहाँ भोज पर जा रहा हूँ. जब हम लोग भोजन कर रहे थे तभी फ़्रेंच दूतावास में कर्नल ग़द्दाफ़ी के यहाँ से फ़ोन आया. मुझसे पूछा गया कि श्रीमती असरानी क्या अभी कर्नल ग़द्दाफ़ी से मिलने आ सकती हैं ? मैंने पूछा सिर्फ़ श्रीमती असरानी ? उधर से जवाब आया ‘सिर्फ़ मिसेज़ असरानी. आप चाहें तो एक दुभाषिया भेज सकते हैं.’ ख़ैर मेरी पत्नी वहाँ गईं. ग़द्दाफ़ी बहुत गर्मजोशी से उनसे मिले. उन्होंने उन्हें एक कालीन और गोल्ड-प्लेटेड घड़ी दी जिसके डायल पर ग़द्दाफ़ी की तस्वीर थी.

लेकिन एक अजीब सी बात उन्होंने कही, ”मैंने सुना है कि आप कल लीबिया छोड़ कर दूसरे देश तबादले पर जा रहे हैं. लेकिन आपके पति बग़ैर मेरी अनुमति के लीबिया कैसे छोड़ सकते हैं ? मेरी पत्नी ने कहा कि ये बात तो आप मेरे पति से ही पूछ सकते हैं. जैसे ही मेरी पत्नी गाड़ी में बैठने लगीं, उन्हें बताया गया कि अपने पति से कह दीजिएगा कि कल सुबह उन्हें यहाँ बुलाया जाएगा.”

भारत से परमाणु तकनीक चाहते थे ग़द्दाफ़ी

दूसरे दिन ग़द्दाफ़ी ने अर्जुन असरानी को बुलाने के लिए अपनी कार भेजी. ग़द्दाफ़ी ने उनके ज़रिए भारत से परमाणु तकनीक लेने की फ़रमाइश की जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया.

असरानी बताते हैं, ‘ग़द्दाफ़ी ने मुझसे कहा कि मोरारजी भाई ने हमसे वादा किया था कि वो हमें परमाणु तकनीक देंगे. लेकिन वो अभी तक नहीं हो पाया है. मैंने कहा, मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन मैं दिल्ली जा रहा हूँ तो आपकी इस बात का ज़िक्र ज़रूर करूँगा. ग़द्दाफ़ी ने मुझसे पूछा कि अब आपका तबादला किस देश में हुआ है ? जब मैंने कहा थाईलैंड तो ग़द्दाफ़ी ने कहा, थाईलैंड में हमारा कोई दूतावास नहीं हैं. आप वहाँ हमारे राजदूत की तरह भी काम करिएगा. मैं उनसे क्या कहता ? मैंने कहा ज़रूर, ज़रूर. ‘

रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता

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