साहित्य

दुख्तरे नारंज व तुरन्ज : कहानी : पार्ट 2

प्राचीन काल में एक राजा ने नज़्र किया कि अगर ईश्वर ने मुझे बेटा दिया तो मैं एक हौज़ तेल और एक हौज शहद निर्धनों में बाटूंगा।

राजा ने यह नज़्र वक्त पूरी की जब उसका बेटा 18 साल का हो चुका था। एक दिन उसके बेटे या युवराज ने अपने वाणों से बूढ़ी महिला के प्याले को तोड़ दिया। इस पर बूढ़ी महिला ने युवराज को श्राप दिया कि वह नारंज और तुरंज नाम की लड़की की जाल में फंस जाये।

जब युवराज ने नारंज और तुरंज का नाम सुना तो वह उस लड़की की खोज में लग गया। लोगों ने उसे बहुत समझाया कि उस लड़की तक पहुंचना बहुत कठिन है लेकिन उसने एक न सुनी। रास्ता बहुत कठिन था। रास्ते में एक बूढे व्यक्ति की युवराज से भेंट हो गयी और उसने युवराज को रास्ता और लड़की का चिन्ह बताया। युवराज ने सारी समस्याओं का सामना कर लिया और वह मादा दैत्य तक पहुंच गया। मादा दैत्य ने भी उसे कुछ रास्ता बताया और कहा कि अगर तुम मेरी बात अच्छी तरह सुनोगे और कोई चीज़ नहीं भूलोगे तो नारंज व तुरंज के बाग तक अवश्य पहुंच जाओगे। इस रास्ते से सीधे जाओगे और उस पहाड़ के ऊपर जाओगे। जब वहां तुम पहुंच जाओगे तो तुम्हें एक काला घोड़ा दिखाई देगा जिसकी लगाम एक वृक्ष से बंधी होगी। अपने घोड़े से तुम उतर जाना और काला घोड़ा खोलकर उस सवार हो जाना और अपने घोड़े को काले वाले घोड़े के स्थान पर बांध देना। यह घोड़ा एक वर्ष की दूरी को एक ही दिन में बिजली और हवा की भांति तय करेगा और तुम्हें नारंज व तुरंज के बाग़ तक पहुंचा देगा।

बाग में पहुंचने से पहले तुम्हें मरूस्थल में एक बड़ा शिकार करना होगा और तुम उसकी लाश को अपने साथ ले जाओगे। जैसे ही उसकी दृष्टि तुम पर पड़े शिकार को उसके सामने फेंक देना और अजगर उसे खाने में व्यस्त हो जायेंगे तब तुम बाग के अंदर जाना।

बाग में वृक्ष बहुत घने हैं और सब नारंज और तुरंज से भरे पड़े हैं और हर वृक्ष के नीचे एक दैत्य सोया हुआ है और तुम घोड़े पर सवार की हालत में ही जितना नारंज व तुरंज चाहना तोड़ लेना और तेज़ी से वहां से लौट आना। जिस तरह से तुम जंगल से नहीं डरे उसी तरह यहां भी तुम्हें जो भी आवाज़ सुनाई दे उस पर ध्यान नहीं देना और अपने पीछे न देखना। जब तुम बाग से निकल आओगे तो काला घोड़ा तुम्हें दोबारा पहले वाली जगह पर पहुंचा देगा। वहां पर तुम काले घोड़े को बांध देना और अपने घोड़े पर बैठ जाना और जब तुम काले घोड़े को वृक्ष में बांध दोगे तब कोई भी दैत्य तुम तक नहीं पहुंच सकता।

राजा के बेटे ने दैत्य से विदा ली और उसी रास्ते से चला जिस रास्ते को मादा दैत्य ने बताया था। वह रास्ता चलता चला गया यहां तक कि वह पहाड़ के ऊपर वृक्ष तक पहुंच गया। जल्दी से उसने काले घोड़े को खोला और अपने घोड़े को वहां पर बांधा और काले घोड़े पर सवार हो गया। जैसे ही वह काले घोड़े पर सवार हुआ वह इतना तेज़ दौड़ने लगा मानो उस घोड़े के पंख निकल आये हों। एक घंटे तक वह रास्ते में रहा यहां तक कि बाग़ का कालापन दिखाई देने लगा। राजा के बेटे ने घोड़े की लगाम खींचकर उसे आराम किया और उसके बाद उसने अपना धनुष और वाण उठाया और एक बड़ी पहाड़ी बकरी का शिकार किया और उसे घोड़े की पीठ पर लादकर बाग की ओर चल पड़ा। इससे पहले कि वह बाग़ की ओर चले, उसने अजगरों को देखा। उसने पहाड़ी बकरी की लाश को उनके सामने फेंक दिया और अजगर उसे खाने में लीन हो गये तब राजा का बेटा बाग के अंदर गया। जैसे ही उसकी नज़र पेड़ों पर पड़ी उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह घोड़े पर बैठा बैठा बाग के बीच तक गया।

वह उन दैत्यों को देख रहा था जो पेड़ के नीचे सोये हुए थे। उसने घोड़े का मुंह मोड़ा और उसे कुछ नारंज व तुरंज तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। जैसे ही उसने पहली नारंज व तुरंज को तोड़ा उससे आवाज़ निकली कि वह कह रही थी चीद- चीद अर्थात तोड़ लिया तोड़ लिया यह सुनना था कि दैत्य उठ गये और जब तक कि दैत्य अपनी जगह से उठते राजा के बेटे ने दो तीन नारंज और तुरंज को और को तोड़ लिया और बिजली की तरह तेज़ी से वह बाग से निकल आया। जब वह बाग से निकल आया तो उसे एक आवाज़ सुनाई दी जो यह कह रही थी कि बाग में लौट आओ वरना मारे जाओगे परंतु राजा के बेटे ने मादा दैत्य की बात सुनी और उसने पलट कर भी पीछे नहीं देखा। काला घोड़ा दोबारा इतनी तेज़ी से दौड़ रहा था मानो उसे फिर पंख निकल आये हों। वह चलता चला गया यहां तक कि पहाड़ के ऊपर वृक्ष तक पहुंच गया।

राजा का बेटा घोड़े से नीचे उतरा और उसे उसी वृक्ष में बांधा और अपने घोड़े को खोलकर उस पर सवार होकर लौट आया। सबसे पहले वह मादा दैत्य के घर पहुंचा और वहां से भी वह गुज़र गया यहां तक जब जंगल से गुजरा तो जंगल के खतरनाक जानकारों ने उसे डराया परंतु राजा के बेटे ने, जिसे अब साहस आ गया था, उन सब पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसने अपनी पीठ के पीछे मुड़कर नहीं देखा।

राजा का बेटा जंगल से बाहर आया और चलता चला गया यहां तक कि वह पानी की नाली के पास पहुंचा। वहां पर वह घोड़े से उतरा और हाथ मुंह धोया तथा पानी पिया। इसके बाद वह बैठ गया और नारंज व तुरंज को अपनी जेब से निकाला। जब पहली को फाड़ा तो उससे बहुत ही सुन्दर लड़की निकली और उसने तुरंत कहा रोटी। राजा के बेटे ने अपने थैले से रोटी निकाली और उसे दे दिया। लड़की ने जैसे ही रोटी खाई गिरी और मर गयी। राजा के बेटे ने पीड़ा भरी आह भरी। इसके बाद उसने दूसरी नारंज व तुरंज फाड़ी। इस बार उससे पहली लड़की से भी सुन्दर दूसरी लड़की निकली। यह लड़की जैसे ही बाहर निकली बोली पानी। राजा के बेटे ने जैसे ही उसे पानी दिया वह पहली वाली लड़की की भांति गिरी और मर गयी। राजा के लड़के ने एक एक करके नारंज और तुरंज को फाड़ा सबसे सुन्दर लड़कियां निकलती थीं और उसके बाद मर जाती थीं।

केवल एक नारंज व तुरंज बच गयी। राजा के लड़के ने उसे नहीं फाड़ा। उसे अपने जब में रख लिया और दुःखी मन के साथ घोड़े पर सवार होकर अपने नगर की ओर चल पड़ा। धीरे धीरे आया यहां तक कि वह अपने नगर के निकट पहुंच गया। संयोग से वहां पर उसने उसी बूढिया को देखा जिसने लड़के श्राप दिया था कि उसे नारंज व तुरंज का दंड मिले। बूढी महिला ने राजा के बेटे की ओर देखा और कहा राजा के प्रिय बेटे नारंज और तुरंज तक पहुंचे या नहीं? राजा के बेटे ने उत्तर दिया हे काश न पहुंचा होता। वहां तक पहुंचने में मेरी जान निकल गयी यहां तक कि मैंने नारंज व तुरंज तोड़ा और जब मैं हर एक नारंज व तुरंज को फाड़ता था तो उससे एक अत्यंत सुन्दर लड़की निकलती थी जिसे देखकर इंसान पागल हो जाये लेकिन सबकी सब गिरीं और मर गयीं। केवल एक बच गयी है जिसे मैंने नहीं फाड़ा है।

मुझे भय है कि इसे भी फाड़ू तो सुन्दर लड़की निकल कर मर जाये। इस पर बूढी महिला ने कहा अगर यह चाहते हो कि वह न मरे तो वह जो चीज़ मांगे तुम उसे दूसरी चीज़ उसे देना। उदाहरण स्वरूप अगर वह रोटी मांगे तो तुम उसे पानी दे देना। अगर वह कहे कि पानी तो तुम रोटी उसके मुंह में डाल देना। इस पर राजा का बेटा प्रसन्न हो गया और बूढी महिला भी अपने रास्ते पर चली गयी।

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