साहित्य

बेगम ज़लज़ला आफ़तुद्दौला की एक ग़ज़ल!

Kavita Krishnapallavi
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दिल्ली की इल्मी, अदबी और सक़ाफ़ती दुनिया की मुजस्सम और मुशक्कल तस्वीर पेश करती बेगम साहिबा की एक नयी ग़ज़ल!
ग़ज़ल


— बेगम ज़लज़ला आफ़तुद्दौला
जित्तन कबिताई करते हैं, मुत्तन लिखते हैं इतिहास
गोरखपुर का जलवा अब अफ़रोज़ हुआ है दिल्ली में
हाजीपुर का हलवा बिकता दरियागंज की गलियों में
सोनपूर के सभी जिनावर आ पहुँचे हैं दिल्ली में
रंग-बिरंगी चिड़ियों की नीलामी मण्डी हाउस में
ले ज़रीब पटना के पटवारी पहुँचे हैं दिल्ली में
ओहदे और ईनाम के ख़्वाहिशमंदों का भेड़ियाधसान
सत्ता के इमामदस्ते में इल्म कुट रहा दिल्ली में
आलिम-फ़ाज़िल लोगों का लेकर के टोपी-छाता-कोट
अहमक़-उजबक धौंस जमाते घूम रहे हैं दिल्ली में
शोहरत-दौलत की रक़्क़ासा के आगे-पीछे देखो
कल्चर के दल्लों-भँड़वों की सजी बरातें दिल्ली में
लकदक-चकमक नगरी में सरमाया नाच दिखावे है
इल्मो-अदब नाले में लेटे दारू पीकर दिल्ली में
लम्पट-आवारे अदबी दूकान सजाये बैठे हैं
सोशल डेमोक्रेटों की महफ़िलें सजी हैं दिल्ली में
बतकुच्चन करने वालों ने धुआँ-धुआँ कर डाला है
लिबरल लिल्ली घोड़ों का है खेल-तमाशा दिल्ली में
फ़ासिस्टों को प्यार-मुहब्बत से इंसान बनायेंगे
अर्ज़ी लिखने वाले सब अक्सर जुटते हैं दिल्ली में
ख़ून जलाते मेहनतक़श के लिए अँधेरों की सौगात
गीदड़ बोलें कुत्ते रोवें चीलें उड़ती दिल्ली में
उम्मीदों और सपनों का शमशान फैलता जाता है
रोज़ हो रही ख़ून की बारिश ऐसा मंज़र दिल्ली में
एक ज़लज़ला आना ही है मुल्क के इस कूड़ाघर में
उड़ जायेगी सभी गंद ज़िन्दगी खिलेगी दिल्ली में

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