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भारतीयों की इज़राइली तकनीक से जासूसी : गुजरात के ‘दो जासूसों’ ने अब देश में लागू किया जासूसी का ‘गुजरात मॉडल’ : रिपोर्ट

डिजिटल फॉरेन्सिक्स दिखाते हैं कि एसएआर गिलानी का फोन हैक हुआ था

BY सुकन्या शांता

मुंबई: साल 2017 के मध्य में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी के फोन पर एक के बाद एक कई मैसेजेस आए. इसमें कश्मीर के संबंध में कई सारी मनगढ़ंत खबरें थी, जिसके जरिये गिलानी के ध्यान को खींचने की कोशिश की गई थी.

अब पिछले महीने उनके फोन पर किए गए एक स्वतंत्र डिजिटल फॉरेंसिक्स के परिणामों के आधार पर पता चला है कि एक अज्ञात भारत-आधारित एजेंसी, जो इजराइल के एनएसओ ग्रुप की क्लाइंट थी, द्वारा साल 2017 और 2019 के बीच गिलानी के फोन को हैक किया गया था.

द वायर ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की सिक्योरिटी लैब के सहयोग से गिलानी के आईफोन, जिसे उनके परिजनों ने संरक्षित किया हुआ है, का फॉरेंसिक विश्लेषण कराया है और इस बात की पुष्टि कर सकता है कि फोन के साथ दो साल से अधिक समय तक छेड़छाड़ की गई थी.

गिलानी के फोन में पेगासस स्पायवेयर डाला गया था, जो इजराइल के तेल अवीव स्थित फर्म का नामी प्रोडक्ट है. पेगासस इसके ऑपरेटर को यूजर की इजाजत के बिना उसके मोबाइल पर अनाधिकृत पहुंच देता है.

यह स्पष्ट नहीं है कि एसएमएस-आधारित हमलों का कोई लाभ हुआ था या नहीं, लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल की सुरक्षा लैब द्वारा किए गए विशिष्ट फॉरेंसिक विश्लेषण से पता चलता है कि पेगासस द्वारा फरवरी 2018 और जनवरी 2019 के बीच और फिर सितंबर 2019 से अक्टूबर 2019 और अक्टूबर 2019 के बीच फोन के साथ छेड़छोड़ की गई थी.

फ्रांस स्थित मीडिया गैर-लाभकारी फॉरबिडेन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल की सुरक्षा लैब ने इन रिकॉर्ड तक पहुंच प्राप्त की, जिसे उन्होंने द वायर और दुनिया भर के 15 अन्य समाचार संगठनों के साथ एक सहयोगी जांच और रिपोर्टिंग परियोजना के हिस्से के तहत साझा किया है.

गिलानी, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में अरबी पढ़ाते थे, को संसद हमले के मामले में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में अक्टूबर 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ‘सबूतों के अभाव’ में उन्हें बरी कर दिया गया था, जिस फैसले को बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2005 में बरकरार रखा था.

जेल में रहने के दौरान भारी समर्थन हासिल करने वाले गिलानी ने जेल में बंद लोगों के लिए काम करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्होंने अपने दोस्त रोना विल्सन, जो साल 2018 के एल्गर परिषद मामले में मुख्य आरोपी के रूप में नामजद हैं, के साथ मिलकर राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए एक समिति- कमेटी फॉर द रिलीज़ ऑफ पॉलिटिकल प्रिज़नर्स (सीआरपीपी) की स्थापना की.

देश भर में मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित कई मामलों से जुड़े रहे गिलानी बाद में जीएन साईबाबा की रक्षा और रिहाई के लिए 17 सदस्यीय समिति का मुख्य हिस्सा भी बने थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को प्रतिबंधित माओवादी संगठन के साथ कथित संबंधों के लिए गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की कई धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. 90 फीसदी से अधिक शारीरिक अक्षमता के चलते साईबाबा को जेल में गंभीर कठिनाई का सामना करना पड़ा है, लेकिन निचली और उच्च न्यायपालिका दोनों ने कई बार जमानत से इनकार कर दिया.

गिलानी के बेटे सैयद आतिफ गिलानी, जो दिल्ली में वकील हैं, ने अक्टूबर 2019 में अपने पिता के गुजरने के बाद भी उनके फोन को सुरक्षित रखा था. आतिफ गिलानी ने द वायर को बताया कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने केवल उन आशंकाओं की पुष्टि की है जो वे दशकों से महसूस कर रहे थे.

आतिफ ने कहा, ‘हमें हमेशा डर रहा है कि परिवार को ट्रैक किया जा रहा है. उनकी (गिलानी की) मौत के महीनों बाद तक उनका फोन, उनके ईमेल हैक करने की कोशिश की जाती रही थी. इस फॉरेंसिक परिणाम ने केवल हमारे संदेह की पुष्टि की है.’

गिलानी के अलावा लीक हुए डेटा ने साईबाबा डिफेंस कमेटी के नौ और सदस्यों एवं करीबी समर्थकों के नंबर भी शामिल हैं.

रोना विल्सन और एल्गार परिषद मामले में उनके सह-आरोपी और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक सहयोगी प्रोफेसर हेनी बाबू भी इस सूची में शामिल थे.

हेनी बाबू सीआरपीपी और साईबाबा रक्षा समिति दोनों के कोर टीम के सदस्य भी थे. वे मुख्य रूप से प्रेस विज्ञप्तियों को संभालते थे और उनकी ईमेल आईडी और फोन नंबर आमतौर पर प्रेस स्टेटमेंट पर छपे होते थे.

संभावित निशाने के रूप में चुने जाने वाले साईबाबा रक्षा समिति और सीआरपीपी के अन्य सदस्य या करीबी समर्थक में सेवानिवृत्त प्रोफेसर जी. हरगोपाल, रक्षा समिति के अध्यक्ष सरोज गिरि और राकेश रंजन, दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं और नियमित रूप दिल्ली की बैठकों में भाग लेते हैं, साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी और दो अन्य शिक्षाविद भी शामिल थे.

दूसरे शब्दों में कहें, तो डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण के बिना ये पता लगाना संभव नहीं थी कि हेनी बाबू, विल्सन और समिति के अन्य सदस्यों ने फोन को हैक किया गया था या नहीं.

द वायर ने हरगोपाल के एंड्रॉयड फोन का फॉरेंसिक विश्लेषण कराया, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकल पाया क्योंकि आईफोन के विपरीत एंड्रॉयड में वो जानकारी नहीं होती है, जो एमनेस्टी की तकनीकी जांच के लिए आवश्यक होती है.

वैसे तो साईबाबा रक्षा समिति एक अलग इकाई है, लेकिन इससे जुड़े कई लोगों से एल्गार परिषद मामले में भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ की गई है.

आतिफ ने द वायर को बताया कि परिवार को एल्गार परिषद मामले में गिलानी की गिरफ्तारी की आशंका थी. आतिफ ने दावा किया, ‘अगर मेरे पिता की मृत्यु अक्टूबर में नहीं हुई होती, तो हमें पूरा यकीन था कि वे उन्हें भी मामले में फंसाने का रास्ता खोज लेते.’

वसंता ने कहा कि साईबाबा की रिहाई की मांग को लेकर पूरे भारत में आयोजित कई महत्वपूर्ण बैठकों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान ही ये निगरानी कराई गई है. उन्होंने कहा, ‘साईबाबा की सजा के तुरंत बाद रक्षा समिति ने विभिन्न शहरों में कई बैठकें आयोजित की थीं. विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नियमित रूप से प्रकाशित प्रेस बयानों के साथ हमारे कार्यक्रम सार्वजनिक नजर में थे.’

वसंता को आश्चर्य नहीं हुआ कि वह भी पेगासस के संभावित निशानों में से एक थीं. उन्होंने कहा, ‘साल 2014 में साईबाबा पर झूठे आरोप लगाए जाने के बाद से मुझे धमकियों का सामना करना पड़ रहा है. मैंने सार्वजनिक सभाओं में भाग लेना, उनकी झूठी गिरफ्तारी और बाद में उनकी सजा के खिलाफ बोलना शुरू किया. यह टार्गेटेड उत्पीड़न का विस्तार है जिसे मैं पिछले एक दशक में सहन कर रही हूं.’

हेनी बाबू की पत्नी जेनी रोवेना, जो डीयू के मिरांडा कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं, को लगता है कि उनके पति को उनकी पहचान के कारण निशाना बनाया गया.

उन्होंने कहा, ‘वह एक मुस्लिम व्यक्ति, एक ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) हैं और हाशिए पर पड़े लोगों को अपराधी बनाने के लिए सरकारी मशीनरी के खिलाफ बोलते रहे हैं.’

रंजन और गिरि ने द वायर को बताया कि हालांकि वे समिति के पदाधिकारी नहीं हैं, लेकिन वे नियमित रूप से बैठकों में भाग लेते रहे हैं. रंजन ने पुष्टि करते हुए कहा, ‘साईबाबा की गिरफ्तारी और दोषसिद्धि का व्यापक रूप से विरोध किया गया था. अन्य लोगों की तरह मैं भी उन बैठकों में नियमित रूप से भाग लेता था.’

गिरि ने कहा कि साईबाबा और विल्सन दोनों के साथ उनके लंबे जुड़ाव ने उन्हें निशाने पर ला दिया. उन्होंने द वायर से कहा, ‘मैं उस समिति का अभिन्न अंग रहा हूं जो उनकी रिहाई की मांग कर रही है. पिछले कुछ वर्षों में मैंने डीयू के प्रोफेसर जीएन साईबाबा के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की है.’

साल 2014 में साईबाबा की गिरफ्तारी से पहले जब उनके घर पर दो बार छापा मारा गया था, तब गिरि उनके साथ थे, गिरफ्तारी के खिलाफ लोगों को लामबंद कर रहे थे. बाद में जब साईबाबा जमानत पर बाहर थे, तो गिरि कहते हैं, वह उन्हें कई बार अस्पताल ले जाते थे.

उन्होंने कहा, ‘उनकी हालत तब गंभीर थी. मैं उनके साथ नियमित रूप से अस्पताल जाता था.’

हिंदी के प्रमुख अख़बारों ने पत्रकारों, नेताओं और अन्य की जासूसी की ख़बर को नहीं दी प्रमुखता

BY- द वायर

पेगासस प्रोजेक्ट: 40 से ज़्यादा पत्रकारों, तीन प्रमुख विपक्षी नेताओं, नरेंद्र मोदी सरकार में दो पदासीन मंत्री, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं सहित 300 से अधिक भारतीयों की इज़राइल के एक सर्विलांस तकनीक से जासूसी कराने की ख़बरों को देश की हिंदी पट्टी के प्रमुख अख़बारों ने या तो छापा नहीं है या इस ख़बर को महत्व नहीं दिया है.

नई दिल्ली: पत्रकारों, मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं आदि सहित 300 से अधिक भारतीयों की इजराइल के एक सर्विलांस तकनीक से जासूसी कराने की खबरें द वायर और 16 मीडिया सहयोगियों ने रविवार देर रात एक साथ दुनियाभर में प्रकाशित की थीं.

 

हालांकि, देश की हिंदी पट्टी के प्रमुख अखबारों ने या तो इस खबर को छापा ही नहीं है या इस खबर को महत्व नहीं दिया है.

अधिकतर हिंदी के अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है और आखिरी के पेजों में कहीं कोने में समेट दिया है. अगर पहले पन्ने पर जगह दी भी है तो या तो खानापूर्ति की है या फिर सरकार के खंडन के साथ खबर को छापा है.

देश में सबसे अधिक पाठकों वाले हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने इस खबर को छापा ही नहीं है. उसने संसद में सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार रहने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को अपना लीड बनाया है और मीडिया पोर्टल न्यूजक्लिक के खिलाफ ईडी की जांच की एक खबर को प्रमुखता से जगह दी है.

वहीं, हिंदी पट्टी के एक अन्य प्रमुख अखबार अमर उजाला ने इस खबर को दिल्ली संस्करण में पेज 11 पर सिंगल कॉलम में छापा है.

उसने इस खबर को तीन अन्य खबरों के साथ एक लाइन में रखते हुए हेडिंग दी है, ‘पेगासस से 40 भारतीय पत्रकारों समेत 300 से अधिक नंबरों की जासूसी का दावा.’

मुश्किल से 150 शब्दों की इस खबर में एक बॉक्स लगाकर लिखा गया है, ‘सरकार ने रिपोर्ट के दावों का किया खंडन.’

अमर उजाला के पेज 11 पर प्रकाशित पेगासस की खबर.

टाइम्स ग्रुप के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स (एनबीटी) ने इस खबर को पहले पन्ने पर जगह तो दी है लेकिन वह महज खानापूर्ति के लिए है. उसने इस खबर को अंदर के पेजों पर भी जगह नहीं दी है.

पहले पेज पर एनबीटी की हेडिंग है, ‘भारत समेत कई देशों के फोन की जासूसी के आरोप.’ उसने बॉक्स में सरकार का पक्ष रखते हुए लिखा है, ‘सरकार ने कहा, प्राइवेसी का सम्मान.’


नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण का पहला पेज.

वहीं, हिंदुस्तान ने इस खबर को अपने पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में संक्षिप्त में छापा है और हेडिंग में ही सरकार द्वारा खंडन किए जाने की बात लिखी है. वहां उसने खबर का बाकी ब्योरा पेज 9 पर देने की जानकारी भी दी है.

पहले पेज के हेडिंग में लिखा है, ‘सरकार ने फोन हैकिंग के आरोपों को नकारा.’ यहां वह फोन हैकिंग को कथित ठहराते हुए सरकार के पूरे बयान को ही छापता है.


हिंदुस्तान अखबार का पहला पेज.

इसके बाद पेज 9 पर उसने इसे एंकर (पेज पर सबसे नीचे) बनाया है और सनसनीखेज बताया है. यहां उसने हेडिंग दी है, ‘दावा: पत्रकारों, नेताओं सहित कई भारतीयों के 300 से ज्यादा फोन हैक.’

यहां उसने पूरी खबर लेते हुए जांच का आधार और पेगासस के जांच पर सवाल उठाने को भी अलग सबहेड के साथ लिया है.


हिंदुस्तान अखबार का पेज 9.

वहीं, एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार जनसत्ता और राजस्थान पत्रिका जैसे अखबारों ने भी इस खबर को नहीं छापा है.

कोविड-19 की दूसरी लहर के बाद से ही सरकारी और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं व नाकामियों की रिपोर्टिंग करने को लेकर चर्चा में रहने वाले दैनिक भास्कर ने इस पूरे मामले को पहले पेज पर प्रमुखता से जगह दी है.


दैनिक भास्कर का पहला पेज.

भास्कर ने इस खबर को अपनी लीड बनाते हुए लिखा, ‘भारत में जासूसी… पहली लिस्ट में 40 पत्रकार, 3 विपक्षी नेता, 2 मंत्री, एक जज’

यहां पर उसने इस पूरे मामले को कवर करने के साथ एक इंफोग्राफिक्स के साथ यह समझाने की भी कोशिश की है कि पेगासस सॉफ्टवेयर कैसे काम करता है.

बता दें कि, द वायर और 16 मीडिया सहयोगियों की एक पड़ताल के मुताबिक, इजराइल की एक सर्विलांस तकनीक कंपनी के कई सरकारों के क्लाइंट्स की दिलचस्पी वाले ऐसे लोगों के हजारों टेलीफोन नंबरों की लीक हुई एक सूची में 300 सत्यापित भारतीय नंबर हैं, जिन्हें मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, अधिकार कार्यकर्ताओं आदि द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है.

निशाना बनाने के लिए चुने गए नामों में 40 से ज्यादा पत्रकार, तीन प्रमुख विपक्षी नेताओं, एक संवैधानिक प्राधिकारी, नरेंद्र मोदी सरकार में दो पदासीन मंत्री, सुरक्षा संगठनों के वर्तमान और पूर्व प्रमुख एवं अधिकारी और बड़ी संख्या में कारोबारियों के नाम शामिल हैं.

द वायर उन नामों को अगले कुछ दिनों में अपने सहयोगियों के साथ एक-एक करके उजागर करने जा रहा है, जिसकी पुष्टि यह विभिन्न श्रेणियों के तहत कर पाने में कामयाब रहा है.

दुनियाभर में पेगासस की बिक्री करने वाली इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप का कहना है कि इसके ग्राहक ‘प्रमाणित सरकारों’ तक सीमित हैं.

फॉरेंसिक टेस्ट में हुई पेगासस द्वारा जासूसी की पुष्टि, निशाने पर थे कई भारतीय पत्रकार

BY अनुज श्रीवास | कबीर अग्रवाल

द वायर समेत 16 मीडिया संगठनों द्वारा की गई पड़ताल दिखाती है कि इज़रायल के एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पायवेयर द्वारा स्वतंत्र पत्रकारों, स्तंभकारों, क्षेत्रीय मीडिया के साथ हिंदुस्तान टाइम्स, द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस, द वायर, न्यूज़ 18, इंडिया टुडे, द पायनियर जैसे राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को भी निशाना बनाया गया था.

नई दिल्ली: द वायर और सहयोगी मीडिया संस्थानों द्वारा दुनिया भर में हजारों फोन नंबरों- जिन्हें इजरायली कंपनी के विभिन्न सरकारी ग्राहकों द्वारा जासूसी के लिए चुना गया था, के रिकॉर्ड्स की समीक्षा के अनुसार, 2017 और 2019 के बीच एक अज्ञात भारतीय एजेंसी ने निगरानी रखने के लिए 40 से अधिक भारतीय पत्रकारों को चुना था.

लीक किया हुआ डेटा दिखाता है कि भारत में इस संभावित हैकिंग के निशाने पर बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकार, जैसे हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक शिशिर गुप्ता समेत इंडिया टुडे, नेटवर्क 18, द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस के कई नाम शामिल हैं.

इनमें द वायर के दो संस्थापक संपादकों समेत तीन पत्रकारों, दो नियमित लेखकों के नाम हैं. इनमें से एक रोहिणी सिंह हैं, जिन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह के कारोबार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी कारोबारी निखिल मर्चेंट को लेकर रिपोर्ट्स लिखने के बाद और प्रभावशाली केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के बिजनेसमैन अजय पिरामल के साथ हुए सौदों की पड़ताल के दौरान निशाने पर लिया गया था.

एक अन्य पत्रकार सुशांत सिंह, जो इंडियन एक्सप्रेस में डिप्टी एडिटर हैं, को जुलाई 2018 में तब निशाना बनाया गया, जब वे अन्य रिपोर्ट्स के साथ फ्रांस के साथ हुई विवादित रफ़ाल सौदे को लेकर पड़ताल कर रहे थे.

डेटा लीक, एनएसओ का दावे से इनकार
फ्रांस के एक मीडिया नॉन प्रॉफिट संस्थान फॉरबिडेन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास एनएसओ के फोन नंबरों का रिकॉर्ड था, जिसे उन्होंने पेगासस प्रोजेक्ट नामक की एक लंबी जांच के हिस्से के रूप में द वायर और दुनिया भर के 15 अन्य समाचार संगठनों के साथ साझा किया है.

एक साथ काम करते हुए ये मीडिया संगठन- जिनमें द गार्जियन, द वाशिंगटन पोस्ट, ल मोंद और सुडडोईच ज़ाईटुंग शामिल हैं- ने कम से कम 10 देशों में 1,571 से अधिक नंबरों के मालिकों की स्वतंत्र रूप से पहचान की है और पेगासस की मौजूदगी को जांचने के लिए इन नंबरों से जुड़े फोन्स के एक छोटे हिस्से की फॉरेंसिक जांच की है.

एनएसओ इस दावे का खंडन करता है कि लीक की गई सूची किसी भी तरह से इसके स्पायवेयर के कामकाज से जुड़ी हुई है. द वायर और पेगासस प्रोजेक्ट के साझेदारों को भेजे गए पत्र में कंपनी ने शुरुआत में कहा कि उसके पास इस बात पर ‘यकीन करने की पर्याप्त वजह है’ कि लीक हुआ डेटा ‘पेगासस का उपयोग करने वाली सरकारों द्वारा निशाना बनाए गए नंबरों की सूची नहीं’ है, बल्कि ‘एक बड़ी लिस्ट का हिस्सा हो सकता है, जिसे एनएसओ के ग्राहकों द्वारा किसी अन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया.’

हालांकि, निशाना बनाए गए फोन की फॉरेंसिक जांच में सूची में शामिल कुछ भारतीय नंबरों पर पेगासस स्पायवेयर के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है. साथ ही इस बात को भी स्पष्ट किया गया है कि सर्विलांस का यह बेहद अनधिकृत तरीका- जो हैकिंग के चलते भारतीय कानूनों के तहत अवैध है- अब भी पत्रकारों और अन्य की जासूसी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

पेगासस और भारत
2010 में स्थापित एनएसओ ग्रुप को पेगासस के जनक के तौर पर जाना जाता है. पेगासस एक ऐसा स्पायवेयर है, जो इसे संचालित करने वालों को दूर से ही किसी स्मार्टफोन को हैक करने के साथ ही उसके माइक्रोफोन और कैमरा सहित, इसके कंटेंट और इस्तेमाल तक पहुंच देता है.

कंपनी ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि पेगासस को निजी संस्थाओं या किसी भी सरकार को नहीं बेचा जाता है. असल में द वायर और उसके मीडिया सहयोगियों को लिखे पत्र में भी एनएसओ ने दोहराया कि वह अपने स्पायवेयर को केवल ‘जांची-परखी सरकारों’ को बेचता है.

एनएसओ इस बात की पुष्टि नहीं करेगा कि भारत सरकार इसकी ग्राहक है या नहीं, लेकिन भारत में पत्रकारों और अन्य लोगों के फोन में पेगासस की मौजूदगी और संभावित हैकिंग के लिए चुने गए लोगों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि यहां एक या इससे अधिक आधिकारिक एजेंसियां सक्रिय रूप से इस स्पायवेयर का उपयोग कर रही हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अब तक स्पष्ट रूप से पेगासस के आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल से इनकार नहीं किया है, पर यह उन आरोपों को खारिज करती रही है कि भारत में कुछ लोगों की अवैध निगरानी के लिए पेगासस का इस्तेमाल किया जा सकता है. शनिवार को पेगासस प्रोजेक्ट के सदस्यों द्वारा इस बारे में भेजे गए सवालों के जवाब में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इसी बात को दोहराया है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की सिक्योरिटी लैब द्वारा लीक हुई सूची में शामिल कई देशों के लोगों के एक छोटे समूह के स्मार्टफोन के स्वतंत्र फॉरेंसिक विश्लेषण में आधे से अधिक मामलों में पेगासस स्पायवेयर के निशान मिले हैं.

भारत में जांचे गए 13 आईफोन में से नौ में उन्हें निशाना बनाए जाने के सबूत मिले हैं, जिनमें से सात में स्पष्ट रूप से पेगासस मिला है. नौ एंड्राइड फोन भी जांचे गए, जिनमें से एक में पेगासस के होने का प्रमाण मिला, जबकि आठ को लेकर निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि एंड्रॉइड लॉग उस तरह का विवरण प्रदान नहीं करते हैं, जिसकी मदद से एमनेस्टी की टीम पेगासस की उपस्थिति की पुष्टि कर सकती है.

हालांकि, इस साझा इन्वेस्टिगेशन से यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि वे सभी पत्रकार, जिनके नंबर लीक हुई सूची में मिले हैं, की सफल रूप से जासूसी की गई या नहीं. इसके बजाय यह पड़ताल सिर्फ यह दिखाती है कि उन्हें 2017-2019 के बीच आधिकारिक एजेंसी या एजेंसियों द्वारा लक्ष्य के बतौर चुना गया था.

एआई की सिक्योरिटी लैब द्वारा किए गए विशिष्ट डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण में लीक हुई सूची में शामिल छह भारतीय पत्रकारों के मोबाइल फोन पर पेगासस स्पायवेयर के निशान मिले, जो इस लिस्ट में अपना नंबर मिलने के बाद अपने फोन की जांच करवाने के लिए सहमत हुए थे.

पेगासस प्रोजेक्ट की रिपोर्टिंग से सामने आई पत्रकारों की सूची को बेहद विस्तृत या निगरानी का निशाना बने रिपोर्टर्स का सैंपल भर भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह केवल लीक हुए एक डेटा सेट में एक छोटी अवधि में सर्विलांस के एक तरीके- यानी केवल पेगासस से हुई जासूसी के बारे में बात करता है.

दिल्ली के पत्रकारों पर थी नज़र
लिस्ट में शामिल अधिकतर पत्रकार राष्ट्रीय राजधानी के हैं और बड़े संस्थानों से जुड़े हुए हैं. मसलन, लीक डेटा दिखाता है कि भारत में पेगासस के क्लाइंट की नजर हिंदुस्तान टाइम्स समूह के चार वर्तमान और एक पूर्व कर्मचारी पर थी.

इनमें कार्यकारी संपादक शिशिर गुप्ता, संपादकीय पेज के संपादक और पूर्व ब्यूरो चीफ प्रशांत झा, रक्षा संवाददाता राहुल सिंह, कांग्रेस कवर करने वाले पूर्व राजनीतिक संवाददाता औरंगजेब नक्शबंदी और इसी समूह के अख़बार मिंट के एक रिपोर्टर शामिल हैं.

अन्य प्रमुख मीडिया घरानों में भी कम से कम एक पत्रकार तो ऐसा था, जिसका फोन नंबर लीक हुए रिकॉर्ड में दिखाई देता है. इनमें इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा (जो शिक्षा और चुनाव आयोग कवर करती हैं), इंडिया टुडे के संदीप उन्नीथन (जो रक्षा और सेना संबंधी रिपोर्टिंग करते हैं), टीवी 18 के मनोज गुप्ता (जो इन्वेस्टिगेशन और सुरक्षा मामलों के संपादक हैं), द हिंदू की विजेता सिंह (गृह मंत्रालय कवर करती हैं) शामिल हैं, और इनके फोन में पेगासस डालने की कोशिशों के प्रमाण मिले हैं.

द वायर में जिन्हें निशाना बनाया गया, उनमें संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और एमके वेणु शामिल हैं, जिनके फोन की फॉरेंसिक जांच में इसमें पेगासस होने के सबूत मिले हैं. द वायर की डिप्लोमैटिक एडिटर देवीरूपा मित्रा को भी निशाना बनाया गया है.

रोहिणी सिंह के अलावा द वायर के लिए नियमित तौर पर राजनीतिक और सुरक्षा मामलों पर लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा का नंबर भी रिकॉर्ड्स में मिला है. इसी तरह स्वतंत्र पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी को भी तब निशाना बनाया गया था, जब वे वायर के लिए लिख रही थीं.

सर्विलांस के लिए निशाना बनाए जाने की बात बताए जाने पर झा ने कहा, ‘जिस तरह यह सरकार भारतीय संविधान का अपमान इसकी रक्षा करने वालों को ही फंसाने के लिए कर रही है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यह खतरा है या तारीफ.’

द हिंदू की विजेता सिंह ने द वायर से कहा, ‘मेरा काम स्टोरी करना है. खबर रुकती नहीं है, स्टोरी वैसी ही कही जानी चाहिए, जैसी वो है, बिना किसी फैक्ट को दबाए बिना सजाए-धजाये.’

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह ‘अनुमान लगाना उचित नहीं होगा’ कि कोई उन्हें निगरानी के संभावित लक्ष्य के रूप में क्यों देखेगा, ‘हम जो भी जानकारी इकट्ठा करते हैं, वो अगले दिन के अख़बार में आ जाती है.’

सूची में द पायनियर के इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर जे. गोपीकृष्णन का भी नाम है, जिन्होंने 2जी टेलीकॉम घोटाला का खुलासा किया था. उन्होंने द वायर से कहा, ‘एक पत्रकार के तौर पर मैं ढेरों लोगों से संपर्क करता हूं और ऐसे भी कई लोग हैं जो यह जानना चाहते हैं कि मैंने किससे संपर्क किया.’

कई ऐसे वरिष्ठ पत्रकार, जिन्होंने मुख्यधारा के संगठनों को छोड़ दिया है, वे भी लीक हुए डेटा में संभावित लक्ष्य के रूप में दिखाई देते हैं.

ऐसे लोगों में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्टर सैकत दत्ता, ईपीडब्ल्यू के पूर्व संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता, जो अब नियमित तौर पर न्यूज़क्लिक वेबसाइट के लिए लिखते हैं, टीवी 18 की पूर्व एंकर और द ट्रिब्यून की डिप्लोमैटिक रिपोर्टर स्मिता शर्मा, आउटलुक के पूर्व पत्रकार एसएनएम अब्दी और पूर्व डीएनए रिपोर्टर इफ्तिखार गिलानी का नाम शामिल है.

द वायर द्वारा किए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि ऊपर उल्लिखित अधिकांश नामों को 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 2018-2019 के बीच निशाना बनाया गया था.

वहीं कुछ पत्रकारों को कमोबेश एक ही समय में संभावित लक्ष्यों की सूची में जोड़ा गया, अन्य को अकेले ही निशाने के तौर पर चुना गया है, शायद उन रिपोर्ट्स के लिए जिन पर वे उस समय काम कर रहे थे. और ये रिपोर्ट्स हमेशा बहुत साधारण नहीं होती हैं.

एक युवा टीवी पत्रकार, जिन्होंने उनका नाम न देने को कहा है, क्योंकि वे किसी और क्षेत्र में करिअर बनाने के लिए पत्रकारिता छोड़ चुकी हैं, ने वायर को बताया कि जहां तक उन्हें याद पड़ता है डेटा में दिखाई गई समयावधि में जिस स्टोरी के लिए उन्हें संभवतया निगरानी के लिए निशाना बनाया जा सकता है, वह सीबीएसई पेपर लीक से जुड़ी थी.

इससे पहले के पेगासस के निशाने
2019 में वॉट्सऐप ने कनाडा के सिटिज़न लैब के साथ मिलकर इस ऐप की सुरक्षा में सेंध लगाने को लेकर हुए पेगासस हमले को लेकर इससे प्रभावित हुए दर्जनों भारतीयों को चेताया था. ऐसे कम से कम दो पत्रकार हैं, जिनका नाम पेगासस प्रोजेक्ट को मिले लीक डेटा में है, जिन्हें 2019 में वॉट्सऐप द्वारा उनके फोन हैक होने के बारे में बताया गया था.

इनमें विदेश मंत्रालय कवर करने वाले रिपोर्टर सिद्धांत सिब्बल (जो विऑन टीवी चैनल में काम करते हैं) और पूर्व लोकसभा सांसद और वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय का नाम है.

द वायर द्वारा जिस डेटा की समीक्षा की गई, उसके मुताबिक सिब्बल को 2019 की शुरुआत में चुना गया था, उन्होंने इसी साल के आखिर में बताया था कि उन्हें वॉट्सऐप ने उनके फोन से हुई छेड़छाड़ के बारे में चेताया था. रिकॉर्ड्स के अनुसार, भारतीय को भी संभावित लक्ष्य के तौर पर 2019 की शुरुआत में ही चुना गया था, उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह बताया था कि उन्हें भी वॉट्सऐप द्वारा संदेश भेजा गया था.

दिल्ली से दूर
लीक हुए डेटा से उन पत्रकारों के नंबर शामिल हैं, जो लुटियंस दिल्ली और राष्ट्रीय चकाचौंध से बहुत दूर काम करते हैं. इसमें उत्तर-पूर्व की मनोरंजना गुप्ता, जो फ्रंटियर टीवी की प्रधान संपादक हैं, बिहार के संजय श्याम और जसपाल सिंह हेरन के नाम शामिल हैं.

हेरन लुधियाना स्थित पंजाबी दैनिक रोज़ाना पहरेदार के प्रधान संपादक हैं. पंजाब के हर जिले में अखबार के पत्रकार हैं, इसे व्यापक रूप से पढ़ा जाता है और राज्य में इसका खासा प्रभाव है.

हेरन ने पेगासस प्रोजेक्ट को बताया कि उनके अख़बार की आलोचनात्मक रिपोर्ट के कारण वर्षों से सभी सरकारों के साथ उनका टकराव हुआ है और उन्हें कई कानूनी नोटिस मिले हैं.

हेरन और उनका अख़बार. (फोटो: पावनजोत कौर)

उन्होंने कहा कि पत्रकारों पर किसी भी तरह से निगरानी रखा जाना ‘शर्मनाक’ है. उन्होंने कहा, ‘उन्हें यह पसंद नहीं है कि उनके नेतृत्व में देश जिस दिशा में जा रहा है, हम उसकी आलोचना करें. वे हमें चुप कराने की कोशिश करते हैं.’

लुधियाना से दक्षिण पूर्व में 1,500 किलोमीटर दूर एक और पत्रकार मिले, जो फौरी तौर पर तो बेहद प्रभावशाली नहीं लगते हैं, लेकिन एनएसओ ग्रुप के भारतीय क्लाइंट की उनमें काफी दिलचस्पी नजर आती है. झारखंड के रामगढ़ के रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनसे जुड़े तीन फोन नंबर लीक हुए डेटा में मिले हैं.

रूपेश यह जानकर हैरान नहीं थे कि उन्हें जासूसी के लिए निशाना बनाया गया. उन्होंने बताया, ‘मुझे हमेशा से लगता था कि मुझ पर नजर रखी जा रही है, खासकर 2017 में झारखंड पुलिस द्वारा एक निर्दोष आदिवासी की हत्या को लेकर की गई रिपोर्ट के बाद से.’

जिस रिपोर्ट का रूपेश जिक्र कर रहे हैं, वह 15 जून 2017 को द वायर हिंदी में प्रकाशित हुई थी और जिसमें एक ऐसे शख्स की मौत को लेकर सवाल उठाए गए थे, जिसे लेकर राज्य पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी समूह से संबद्ध होने का दावा किया था.

पेगासस प्रोजेक्ट के डेटा के मुताबिक रूपेश के फोन की निगरानी की शुरुआत इस रिपोर्ट के कुछ महीनों बाद हुई थी.

जून 2019 में रूपेश को बिहार पुलिस ने गिरफ्तार किया था और कड़े गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत विस्फोटक रखने का मामला दर्ज किया था. छह महीने बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया क्योंकि पुलिस निर्धारित समय के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रही.

सिंह ने कहा, ‘पुलिस ने विस्फोटक लगाए थे. यह मेरी रिपोर्टिंग के कारण मुझे डराने-धमकाने का प्रयास था.’

फॉरेंसिक विश्लेषण क्या कहता है?
एमनेस्टी इंटरनेशनल की सिक्योरिटी लैब ने सात पत्रकारों के फोन पर डिजिटल फॉरेंसिक जांच की. इसके नतीजों का सिटिज़न लैब के विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किया गया था, जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के एक संस्थान द्वारा व्यापक मेथडोलॉजी की समीक्षा की गई.

इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व पत्रकार सुशांत सिंह, टीवी 18 की पूर्व एंकर स्मिता शर्मा, ईपीडब्ल्यू के पूर्व संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता, आउटलुक के पूर्व पत्रकार एसएनएम अब्दी, द हिंदू की विजेता सिंह और द वायर के दो संस्थापक संपादकों सिद्धार्थ वरदराजन और एमके वेणु के फोन का विश्लेषण किया गया था.

एआई ने पाया कि इनमें से सुशांत, परंजॉय, अब्दी, सिद्धार्थ और वेणु के फोन में पेगासस से छेड़छाड़ की गई थी. स्मिता शर्मा के मामले में विश्लेषण दिखाता है कि एप्पल के आईमैसेज सिस्टम को हैक करने का प्रयास किया गया, लेकिन इस बात का प्रमाण नहीं मिला कि वे फोन में पेगासस डालने में सफल हो सके. इसी तरह विजेता के फोन में छेड़छाड़ के प्रयास के सबूत तो मिलते हैं, लेकिन हैकिंग असफल रही है.

हालांकि परिणाम यह नहीं दर्शाते हैं कि हमलावर ने पेगासस का उपयोग करके क्या किया, लेकिन निम्नलिखित लोगों के लिए कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए गए है:

1. एसएनएम अब्दी: अप्रैल 2019, मई 2019, जुलाई 2019, अक्टूबर 2019 और दिसंबर 2019 के महीनों के दौरान पेगासस द्वारा फोन से छेड़छाड़ की गई. एमनेस्टी इसके तरीके (किस तरह स्पायवेयर फोन में पहुंचा) को सत्यापित नहीं कर सका.

2 . सुशांत सिंह: मार्च 2021 से जुलाई 2021 तक पेगासस द्वारा फोन से छेड़छाड़ की गई, जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल आईमैसेज सेवा में हुआ जीरो क्लिक एक्सप्लॉइट कहता है. ऐसे हमले को ‘जीरो-क्लिक ’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें पीड़ितों को कुछ नहीं करना होता (जैसे एसएमएस या ई-मेल में आए किसी गलत इरादे वाले लिंक पर क्लिक करना अदि)

3. परंजॉय गुहा ठाकुरता: अप्रैल 2018, मई 2018, जून 2018 और जुलाई 2018 के दौरान पेगासस द्वारा फोन से छेड़छाड़ की गई. एमनेस्टी उस तरीके की पहचान करने में सक्षम नहीं रहा, जिसका इस्तेमाल स्पायवेयर की फोन में घुसपैठ के लिए किया गया.

4. एमके वेणु: एमनेस्टी के विश्लेषकों ने पाया कि फोन को हाल ही में जून 2021 तक जीरो क्लिक एक्सप्लॉइट के जरिये पेगासस से निशाना बनाया गया था.

5. सिद्धार्थ वरदराजन: अप्रैल 2018 के कुछ हिस्सों के दौरान पेगासस द्वारा फोन से छेड़छाड़ की गई. डिजिटल फॉरेंसिक यह नहीं बता सका कि स्पायवेयर ने फोन को कैसे संक्रमित किया.

मुख्यधारा के एक भारतीय अख़बार के वरिष्ठ संपादक के आईफोन का भी डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण किया गया था, लेकिन चूंकि यह वह डिवाइस नहीं था जिसे पत्रकार संभावित निशाने के रूप में चुने जाने के समय इस्तेमाल कर रहे थे, एमनेस्टी पेगासस के प्रमाण खोजने में असमर्थ रहा.

फॉरबिडेन स्टोरीज़ और द वायर ने मुख्यधारा समेत अन्य कई पत्रकारों से फॉरेंसिक विशलेषण में शामिल होने के बाबत बात की, लेकिन उन्होंने उनके प्रबंधन द्वारा असहयोग और इस प्रक्रिया में अविश्वास जाहिर करने जैसे विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया.

(पावनजोत कौर, अजॉय आशीर्वाद महाप्रशस्त और देवीरूपा मित्रा के इनपुट्स के साथ)

सीजेआई गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद हैकिंग के निशाने पर थीं पीड़िता

BY – अजॉय आशीर्वाद महाप्रशस्त | कबीर अग्रवाल

नई दिल्ली: अप्रैल 2019 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की कर्मचारी से संबंधित तीन फोन नंबर इज़राइल स्थित एनएसओ समूह की ग्राहक- एक अज्ञात भारतीय एजेंसी द्वारा निगरानी के उद्देश्य से संभावित हैक के लिए लक्ष्य के रूप में चुने गए थे. द वायर इस तथ्य की पुष्टि कर सकता है.

एनएसओ समूह को पेगासस स्पायवेयर के लिए जाना जाता है, जिसका दावा है कि वह इसे केवल ‘प्रमाणित सरकारों’ को बेचता है. हालांकि उसने यह नहीं बताया है कि अपने इस विवादित उत्पाद को उसने किस सरकार को बेचा है.

अपनी पहचान जाहिर करने की अनिच्छुक सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि साल 2018 में सीजेआई गोगोई द्वारा उनका यौन उत्पीड़न किया गया था. इस घटना के कुछ हफ़्तों बाद ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अप्रैल 2019 में उन्होंने एक हलफनामे में अपना बयान दर्ज कर सर्वोच्च अदालत के 22 जजों को भेजा था.

फ्रांस की मीडिया नॉन-प्रॉफिट फॉरबिडेन स्टोरीज़ द्वारा लीक हुए फोन नंबरों की सूची का विश्लेषण बताता है कि इसके कुछ ही दिनों बाद उन्हें संभावित हैकिंग के निशाने के तौर पर चुना गया था.

इन लीक रिकॉर्ड्स के अनुसार, जिस हफ्ते उनके सीजेआई पर लगाए गए आरोपों की खबर आई थी, उसी सप्ताह उनके पति और दो देवरों से जुड़े आठ नंबरों को भी टारगेट के तौर पर चुना गया. लीक रिकॉर्ड्स की मानें तो सूची में शामिल 11 फोन नंबर महिला और उनके परिवार से संबंधित थे.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की तकनीकी लैब के साथ फॉरबिडेन स्टोरीज द्वारा समन्वित 16 अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की टीम द्वारा की गई विशेष पड़ताल में पाया गया कि भारत के जिन नंबरों को संभावित हैकिंग का निशाना बनाया गया, उनमें यह सबसे बड़ा समूह है.

महिला का इस सूची में होना और उन्हें चुने जाने का समय यह संकेत देते हैं कि वे उस अज्ञात भारतीय एजेंसी की दिलचस्पी के दायरे में इसलिए आईं, क्योंकि उन्होंने तत्कालीन सीजेआई पर सार्वजनिक तौर पर गंभीर आरोप लगाए थे.

उनका चुना जाना उस बिंदु को भी विस्तार देता है, जिसकी पैरवी निजता के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता लंबे समय से करते आए हैं- वह यह कि सर्विलांस के अनधिकृत और अवैध साधनों का उपयोग उन स्थितियों में लगातार हो रहा है, जहां दूर-दूर तक किसी तरह की ‘इमरजेंसी’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा कोई बहाना भी नहीं है.

पेगासस प्रोजेक्ट के सदस्यों द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भेजे गए विस्तृत सवालों के जवाब में भारत सरकार के पेगासस से संबंधों के आरोपों को ‘दुर्भावनापूर्ण दावा’ बताया गया है और कहा गया कि ‘कुछ विशिष्ट लोगों पर सरकारी निगरानी के आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है.’

हालांकि द वायर महिला से जुड़े किसी भी फोन का फॉरेंसिक परीक्षण नहीं करवा सका, लेकिन उनसे जुड़े 11 नंबरों का संभावित हैकिंग की सूची में होना प्राइवेसी, लैंगिक न्याय और न्यायिक प्रक्रिया की ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है.

शीर्ष अदालत के जजों को उनकी शिकायत भेजने के बाद वे तीन वरिष्ठ जजों की एक समिति के सामने पेश हुई थीं, जो एक गोपनीय प्रक्रिया थी. अगर उनके फोन सफल तौर पर हैक हो गए थे, तो इसका अर्थ यह है कि वह अज्ञात एजेंसी उनके वकीलों के साथ होने वाली उनकी बातें भी सुन सकती थी.

महिला के पति और देवर, जो उनके कथित यौन उत्पीड़न की घटना के समय दिल्ली पुलिस में काम करते थे और उन्हें महिला को नौकरी से निकाले जाने के बाद जनवरी 2019 में सस्पेंड कर दिया गया था, जिसे महिला ने उनके खिलाफ बदले की कार्रवाई बताया था. उनके अनुसार, इस प्रतिशोध में उन्हें एक मनगढ़ंत मामले में फंसाकर गिरफ्तार करना भी शामिल था, जिसमें उन्हें आखिकार ‘सबूतों के अभाव’ में छोड़ दिया गया.

सीजेआई ने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों का खंडन किया था. शीर्ष अदालत द्वारा की गई इन-हाउस जांच- जिसके काम करने के तरीके की तीखी आलोचना हुई थी- में आखिरकार गोगोई को तीन न्यायाधीशों के पैनल द्वारा बरी कर दिया गया, जिसका कहना था कि महिला के आरोपों में कोई ‘तत्व’ नहीं था.

वह पूरी प्रक्रिया अब इस संभावना से निष्प्रभावी मालूम देती है कि शायद वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर उनके और उनके परिवार के टेलीफोन पर नजर रखी जा सकती है.

द वायर की पड़ताल के अनुसार, अदालत की पूर्व कर्मचारी जिन तीन फोन नंबरों का उपयोग कर रही थीं, उनमें से दो पहली बार उनकी शिकायत दर्ज होने के कुछ दिनों बाद चुने गए थे, जबकि तीसरा नंबर लगभग एक सप्ताह बाद चुना गया. उनके पति के पांच फोन नंबरों में से चार पहले हलफनामे के सार्वजनिक होने के कुछ दिनों बाद चुने गए थे, जबकि आखिरी नंबर कुछ दिनों बाद चुना गया था. इसी तरह, उसके पति के दो भाइयों के फोन नंबर भी इसी अवधि के आसपास चुने गए थे.

टेलीकॉम सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सभी 11 फोन नंबरों पर नजर रखने का प्रयास, जो पेगासस जैसे स्पायवेयर के साथ एक संभावित हैक को अंजाम देने की दिशा में एक जरूरी और पहला कदम था- महिला के आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद पहली बार निशाना बनाए जाने के बाद कई महीनों तक जारी रहा.

फॉरेंसिक विश्लेषण किए बिना यह जानना संभव नहीं है कि महिला, उनके पति या देवरों के फोन के साथ वास्तव में पेगासस छेड़छाड़ सफल हुई या नहीं. द वायर ने महिला और उनके परिवार से संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया.

क्या था मामला
अपने हलफनामे में शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि जस्टिस गोगोई ने कथित तौर पर कुछ एहसानों के बदले उनके साथ शारीरिक तौर पर अंतरंग होने का प्रयास किया था. महिला का यह भी दावा था कि इससे इनकार करने के कुछ ही हफ्तों में उन्हें तीन बार स्थानांतरित किया गया, कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा और आखिरकार उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

उनके एक देवर, जिन्हें सीजेआई के विवेकाधीन कोटे से कोर्ट में नियुक्त किया गया था, को भी बिना किसी स्पष्टीकरण के काम से हटा दिया गया.

हालांकि उनका ट्रॉमा यहीं ख़त्म नहीं हुआ. अपने हलफनामे में महिला ने दावा किया कि इस प्रकरण के तुरंत बाद दिल्ली पुलिस कार्यरत उनके पति और पति के एक भाई को कथित रूप से झूठे आरोपों में विभागीय जांच का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया.

उनके अनुसार, लगभग उसी समय महिला के खिलाफ रिश्वतखोरी का एक आपराधिक मामला एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर किया गया था, जिससे वह कभी नहीं मिली थीं और बाद में इसी मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया.

उनका आरोप था कि हिरासत के दौरान उन्हें पुलिसकर्मियों द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जो सीजेआई के कार्यालय से हटाए जाने के बाद से उनके परिवार पर भी नजर रख रहे थे.

उस समय सीजेआई के कार्यालय ने सभी आरोपों का खंडन किया और उन्हें ‘पूरी तरह से झूठा और निंदनीय’ बताते हुए खारिज कर दिया था.

20 अप्रैल 2019 को अदालत की जल्दबाजी में बुलाई गई विशेष बैठक, जिसकी अध्यक्षता स्वयं जस्टिस गोगोई ने की थी, में सीजेआई ने दावा किया कि उनके खिलाफ लगे आरोप ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ पर हमला और ‘सीजेआई के कार्यालय को निष्क्रिय करने’ की एक ‘बड़ी साजिश’ हैं.

महिला के आरोपों की जांच के लिए शीर्ष अदालत के तीन वरिष्ठ जजों की एक आंतरिक समिति बनाई गई थी. 6 मई 2019 को इस समिति ने सीजेआई को क्लीनचिट देते हुए कहा था कि पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं है.

समिति के इस निर्णय के बाद महिला ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि वे बेहद निराश और हताश हैं. देश की एक महिला के तौर पर उनके साथ घोर अन्याय हुआ है, साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत से न्याय की उनकी उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो गई हैं.

जून 2019 में महिला के पति और देवर को दिल्ली पुलिस ने बहाल कर दिया था. इसके बाद जनवरी 2020 में इन महिला कर्मचारी की भी नौकरी बहाल कर दी गई थी.

शिकायतकर्ता को जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट में वापस नौकरी की पेशकश भी की गई थी, लेकिन उन्होंने अपने मानसिक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया.

यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद नवंबर 2019 अपने पद से रिटायर होने के बाद जस्टिस गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया गया था, जिस कदम की काफी आलोचना हुई थी.

सोर्स : द वायर
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