विशेष

महाजन जिस पथ पर चले, उस पर मुझे नहीं चलना

Kavita Krishnapallavi
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मुझे किसी के जूते, ओवरकोट, छड़ी, छाता और टोपी नहीं चाहिए I आप महापुरुष हैं तो अपनी इन चीज़ों को किसी संग्रहालय को दे दें I मुझे विदूषक बनकर सड़क पर स्वाँग नहीं करना !

मुझे अपनी भूमिका अपने ही वेश में निभानी है और मंच पर अपने ही संवाद बोलने हैं, हकलाते हुए और अशुद्ध उच्चारण के साथ I
अनुकरण मुझे स्वीकार नहीं I महाजन जिस पथ पर चले, उस पर मुझे नहीं चलना I

मुझे अपनी पढ़ी किताबों और ज़िंदगी के तज़ुर्बात के बारे में बताइये I उनसे सीखकर मैं अपनी राह निकाल लूँगी और अपने हमखयाल, हमसफ़र ढूँढ़ लूँगी !
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भाषाशास्त्रियों के पास गद्य की बहुत परिष्कृत भाषा थी, अलौकिक आभा से भरी हुई ! उसमें अब प्रेम और विद्रोह की बातें संभव नहीं रह गयी थीं ! ज्यादा से ज्यादा कुछ आवेदन और निवेदन किये जा सकते थे और कुछ अर्ज़ियाँ लिखी जा सकती थीं I कथाएँ भी कुछ इकहरी और सपाट सी ही कही जा सकती थीं, जैसी ज़माने से कही जाती रही हैं I

फिर मैंने संगीत और रंगों के माध्यम से संवाद की कोशिश की, पर वहाँ भी कुछ रूढ़ियों की दीवारें थीं और कुछ अपनी अक्षमता !
तब मैंने कविता से अपना साथ देने का आग्रह किया I कविता मेरे बागीचे में पतझड़ के दिनों में आयी, धूल-गर्द में सनी हुई, झोले में छेनी और हथौड़ा, कुछ और औज़ार और कुछ रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें लिए हुए, न जाने कहाँ-कहाँ से होते हुए I किसी भाषा में संवाद किये बिना उसने मेरे दुखों और स्वप्नों को समझा, मेरी आत्मा के दाग़-धब्बों की पड़ताल की और भाषा की अलौकिक शुद्धता को छेनी-हथौड़े से तोड़-तोड़करआँसुओं से लेकर पिघले हुए धातु तक, हर तरह की तरलता के प्रवाह के लिए राह बनाने लगी !
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(डायरी के कुछ पुराने बिखरे-बिखरे से नोट्स, एक बार फिर)

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