विशेष

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के हाथों हुई पिटाई के बाद अमेरिका सुपर पॉवर नहीं रहा ; अब चीन है नयी सुपर पॉवर : रिपोर्ट

वक़्त के साथ साथ चीज़ें बदलती रहती हैं, ये क़ुदरत का तरीक़ा है, हमेशा के लिए इस ज़मीन पर कुछ भी नहीं है सिवाए एक अल्लाह के, जो हमेशा से था, हमेशा रहेगा,,,,

एक वक़्त था जब अमेरिका की तूती बोल रही थी, वो जब जिस मुल्क पर चाहता था चढ़ाई कर देता था, इराक़, लीबिया, जॉर्डन, यमन, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान में उसने जो तबाही मचायी है उससे ये मुल्क दशकों तक पनप नहीं पाएंगे, ताक़ात के नशे में चूर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने लेटेस्ट हथियार, विमान, टैंक, तोपख़ाना, विमान इस्तेमाल किये, हज़ारों टन बारूद पहाड़ों पर बरसायी मगर अफ़ग़ानिस्तान की ज्योग्राफिकल लोकेशन और फ़ौलादी होंसले वाले तालिबान के मुक़ाबले में सब कुछ नाकाम साबित हुआ

अमेरिका ने हमला करते वक़्त सोचा भी नहीं होगा कि अफ़ग़ानिस्तान की जंग उसकी बर्बादी का कारण बनेगी, बीस की जंग के बाद बड़ी खुशामदों के बाद उसे निकलने का रास्ता मिला है, तालिबान ने शांति वार्ता के वक़्त से अब तक अमेरिका की कोई बात नहीं मानी उन्होंने अपनी शर्तों पर समझौता किया था

तालिबान से मिली हार ने इस वक़्त अमेरिका की सुपर पॉवर की शिनाख़्त ख़त्म कर दी है, इस वक़्त पाकिस्तान जोकि अमेरिका के इशारों पर नाचता था उसने भी अमेरिका को धुँधकार लगाना शुरू कर दिया है, फ़िलहाल अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का कोई टारगेट पूरा सका है उल्टे पाकिस्तान और तालिबान ने पूरे एशिया रीजन की राजनीती बदल दी है या कुछ समय बाद बदल जायेगी

आज तालिबान की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन तालिबान को खुल कर सपोर्ट कर रहा है, तालिबान के ज़रिये रूस अमेरिका से अपने बदले निकाल रहा है, रूस वैसे तो बहुत ज़यादा फ्रंट पर नज़र नहीं आता है मगर अफ़ग़ानिस्तान की इस जंग का सबसे बड़ा खिलाड़ी रूस ही है, मध्य एशिया से लगे देशों की सरहद से रूस तालिबान को लम्बे समय से मदद पहुंचता रहा है, तालिबान के बड़े कमांडर्स के लिए महफूज़ जगहों का बंदोबस्त रूस ने ही किया था

रूस और चीन अमेरिका के दुश्मन नंबर वन हैं, चीन के काम करने का तरीक़ा बहुत अलग है, वो शोर नहीं करता, बयानबाज़ी नहीं करता है, वो ख़ामोशी से अपने काम और मक़सद की प्राप्ति में लगा रहता है, चीन ने वर्तमान में अपनी आर्थिक इस्थिति जितना मज़बूत कर ली है उसकी मिसाल नहीं मिलती है, सैनिक शक्ति के मामले में चीन आज किसी भी देश से मीलों आगे निकल चुका है

अमेरिका के पास अब सिर्फ कोरी धमिकयां हैं या प्रॉक्सी के ज़रिये देशों के अंदरूनी हालात बिगाड़ने की कुछ ताकात शेष है जबकि चीन बिना जंग किये अनेक देशों में अपना दख़ल बढ़ता जा रहा है, वो पैसा लेकर पहुँचता है और कारोबार की बात करता है, चीन की ये तरकीब बहुत कारगर साबित हो रही है, चीन ग़रीब देशों की आर्थिक मदद कर रहा है, समय आने पर ये देश संयुक्त राष्ट में उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं, बिना वापसी के मोटी रक़म ख़र्च करना चीन का एक मज़बूत हथियार है

चीन ने अमेरिका को उलझा दिया है, हालात ऐसे बन गए हैं कि अमेरिका के अरब देशों से निकलना पड़ रहा है, सऊदी अरब से उसने अपनी सेना पहले ही निकाल ली है, अरब के देशों के पार दौलत बहुत है जिसका इस्तेमाल अभी तक अमेरिका कर रहा था लेकिन चीन ने इन अरब देशों के साथ भी बड़े इन्वेस्टमेंट की ऑफर दे दी है जिसकी वजह से सऊदी अरब, ईरान, सीरिया, क़तर आदि चीन और रूस के पाले में आ गए हैं

अमेरिका के पास अब सिर्फ यूरोप के कुछ देशों का सहारा बचा है, उनमे भी फ्रांस, जर्मनी आदि से उसके रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं, वहीँ चीन यूरोपीय देशों में मज़बूती के जड़ें जमा चुका है, चीन का यूरोप के साथ व्यापार बढ़ता ही जा रहा है, अब दुनियां को मानना ही पड़ेगा कि चीन नयी सुपर पॉवर बन चुका है,,,,परवेज़ ख़ान

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बत का दौरा व वहां शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर चौंकाया

पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों की सेना के जमावड़े के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बत का दौरा व वहां शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर चौंकाया है। भारत-चीन सैन्य तनाव के बीच जिनपिंग की यह पहली तिब्बत यात्रा थी। जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के अधिकारियों को ट्रेनिंग व युद्ध की मजबूती से तैयारी करने की बात कही।

जिनपिंग ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास रणनीतिक रूप से अहम तिब्बत के निंगची शहर का भी दौरा किया था। इस दौरान जिनपिंग ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा में शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने तिब्बत में दीर्घकालीन स्थिरता और समृद्धि पर जोर दिया।

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार जिनपिंग ने तिब्बत दौरे पर पीएलए की तिब्बत कमान के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। उन्होंने सैनिकों की ट्रेनिंग और युद्ध की तैयारी को पूरी तरह से मजबूत करने पर जोर दिया।

बता दें, जिनपिंग 22 जुलाई को निंगची रेलवे स्टेशन तक आए थे। यह भारतीय सीमा के बहुत पास है। ल्हासा-निंगची रेलखंड की शुरुआत 25 जून से हुई है। बीते कुछ सालों में यह पहला मौका था जब चीन के राष्ट्रपति ने तिब्बत के सीमावर्ती शहर का दौरा किया। निंगची के बाद जिनपिंग हाई-स्पीड ट्रेन से ल्हासा पहुंचे थे। शुक्रवार को वह तिब्बत में तैनात सैनिकों से मिलने के बाद बीजिंग लौटे थे।

समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट मुताबिक़ जिनपिंग ने पहली बार तिब्बत के शांतिपूर्ण लिबरेशन के 70वें वर्षगांठ पर तिब्बत स्वायत क्षेत्र का दौरा किया। उन्होंने तिब्बत के लोगों को बधाई दी। वह कई जनजाति के लोगों से मिले और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों से उनका ध्यान रखने को कहा।

जिनपिंग ने तिब्बत को लेकर क्या कहा?
जिनपिंग ने तिब्बत को लेकर कहा है कि मौजूदा वक्त में तिब्बत अपने विकास के एक नए ऐतिहासिक शुरुआती बिंदु पर है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद के रास्ते पर चलना जारी रखेगी। पिछले 70 सालों में तिब्बत ने ऐतिहासिक प्रगति की है और लोगों के जीवन में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।

चीन ने अमेरिका के पूर्व वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस समेत सात अमेरिकियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की

चीन ने हांगकांग में स्वतंत्रता के बिगड़ते हालात पर दी गई अमेरिकी सलाह के बाद अमेरिका के पूर्व वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस समेत सात अमेरिकियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। बाइडन प्रशासन के एक वरिष्ठ मंत्री के चीन दौरे से कुछ दिन पूर्व ही बीजिंग की इस कार्रवाई पर दोनों देशों के बीच मानवाधिकार, साइबर सुरक्षा, व्यापार और कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर तनाव बढ़ गया है।

बता दें कि अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शेरमन का चीन दौरा सुनिश्चित हो चुका है। इस बीच चीन ने यह फैसला अमेरिका के उस कदम के जवाब में उठाया है जिसके तहत अमेरिका पहले ही हांगकांग में चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। बाइडन प्रशासन ने चीनी फैसले को ‘निरर्थक’ और ‘निराशावादी’ करार दिया है।

पिछले सप्ताह ही अमेरिका ने हांगकांग में चीनी दबदबे के बाद व्यापारिक समुदाय को खतरे की चेतावनी दी थी। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा था कि चीनी सुरक्षा कानून से हांगकांग के नागरिकों और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। नए प्रतिबंधों का एलान करते हुए चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध हांगकांग में कारोबार का माहौल खराब करने के लिए लगाए गए हैं। इसी के जवाब में चीन अमेरिकी वाणिज्य मंत्री समेत सात अमेरिकी नागरिकों व संगठनों पर प्रतिबंध लगा रहा है।

रॉस ने खड़ी कीं चीनीं कंपनियों के लिए बाधाएं
चीन ने अमेरिका के जिस पूर्व वाणिज्य मंत्री पर हांगकांग में प्रतिबंध लगाया है उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन में चीन की नामी कंपनी हुवावे के कारोबार पर भी बाधाएं खड़ी की थीं। उन्होंने उन चीनी कंपनियों की संख्या बढ़ा दी थी जो पहले लाइसेंस लिए बिना अमेरिकी कंपनियों के साथ कारोबार नहीं सकतीं थीं। ऐसे में कई चीनी कंपनियों के सामने अमेरिका के साथ कारोबार का संकट पैदा हो गया।

रोक के बावजूद अमेरिका अपने फैसलों पर अडिग
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका चीन के इन प्रतिबंधों के बाद भी अपने फैसलों पर ‘अडिग’ है। उन्होंने कहा, ये पाबंदियां ताजा उदाहरण हैं कि चीन कैसे राजनीतिक संदेश भेजने के लिए लोगों, कंपनियों और सिविल सोसायटी संस्थानों को सजा देता है। बता दें कि दोनों देशों के बीच पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय से ही रिश्ते बिगड़ने लगे थे।


Is America no more a superpower?

By: Ali Shah

Either we say a diplomatic defeat or weak policies of the U.S. may give China a clear pitch to play a long game in the future. China is making no mistake and playing great strokes against its rival U.S. through its diplomatic attitude without any hesitation to talk with those countries which have a little rift with America.

It was a common thought for a long that, being a superpower, the U.S. always makes its policies for the next twenty to forty years not only for its nation but for the entire world. Whenever disputes arise in underdeveloped countries, they always seek help from the U.S. for a better solution, and the United States of America plays its role as the superpower of the globe. But the last regime of “Donald Trumped” of the U.S. and the current era of “Joe Biden” surprisingly lost its legacy while China made its best through modifying diplomatic policies against America.

A recent video conference between Russia and China made an alert to the U.S. and its allies that there is going a big deal in two powers and the U.S. must change its diplomatic policies as per future needs. The news aired on various global media forums that Russian President Vladimir Putin and his Chinese counterpart Xi Jinping extended a 20-year-old treaty aiming to play role in the dismantlement of arms control agreements; peace in the world and other conflicting situations.

China offered its services to Pakistan and Afghanistan for peace talks with the Taliban. While a couple of days back, during the media talk, Chinese Foreign Ministry spokesperson Zhao Lijian said that China was ready to work for peace in Afghanistan.

China is expanding its coordination and relations with those countries which have been ditched by the U.S. It is worth mentioning that a massive $400-billion deal between China and Iran may help China in getting easy access to the hot waters. Chabahar was a dream for India which has been drowned after the involvement of China. In a statement, Iranian Foreign Affairs Minister Zarif said, “We have made very clear to our Indian and Chinese friends that Chabahar is open for cooperation for everybody. Chabahar is not against China… is not against Gwadar. Chabahar is a place where we can all come together in order to help Afghanistan, help development and prosperity in the region”. Indian hopes connected to Iran’s Chabahar port aiming to devalued Gawadar have vanished after China’s entrance in the shape of a deal with Iran. Now the game is in the hands of China whether play or not.

Apart from all agreements and deals between China and other powers of the region; in the recent G7 summit, Joe Biden has tried to convince its allies to make a unified front against excelling economic power of China. The stronghold of China in the Eastern and Western parts may be a disaster for the U.S. and other countries. As per media reports during a session, Joe Biden dragged the attention of the participants towards the forced labor practices in China through which may they can build pressure against it. But only Canada, United Kingdom, and France endorsed Biden’s viewpoint against China while Germany, Italy, and European Union seemed a bit reluctant and showed no positive sign.

The new regime of America should realize that China’s forced labor practice is its internal issue and it will never allow any other power to interfere in it. Joe Biden’s government has lots of internal issues needed to be resolved on top priority but have been neglected so far.

China’s relations with Russia, Pakistan, Iran, and now with its deep concern in a stable Afghanistan is actually strong diplomacy which is not acceptable to the U.S. Economically growing China and its policies towards underdeveloped countries like Iran, Pakistan, and Afghanistan are not in favor of America and its close allies like India. America is losing its command over these countries, while China is supporting them by all means. America should modify its foreign policies if it really wants to remain a superpower.

The writer is a (Ph.D.) scholar and foreign policy analyst, available at alishah287@gmail.com

 

Father inculcated frugal habits

Xi Zhongxun, father of Xi Jinping, served as chairman of the Shaanxi-Gansu Border Region, a CPC revolutionary base of the 1930s, and was called by Chairman Mao Zedong a “leader of the people.” Xi Zhongxun later led Guangdong in its implementation of reform and opening-up policies and in the construction of special economic zones in the province.

“Dad leads a frugal life, almost to the point of being harsh. The strict family discipline is well-known. We have been taught to live a thrifty life since childhood. Such a family tradition should be passed down from generation to generation,” Xi said in a letter to his father in 2001, when he was the governor of Fujian province and was unable to attend his father’s 88th birthday celebration due to work commitments

The family had a tradition of adopting the frugal and austere lifestyle. Throughout their childhood, Xi Jinping and his younger brother used to wear clothes and shoes handed down from their elder sisters.

Xi Jinping and his wife Peng Liyuan named their daughter “Mingze” – in Chinese implies “living an honest life and being a useful person to society”, which is their expectation for her and also a symbol of their family’s simple style.


Molding ideals – Books Xi read as a child

While meeting with representatives to the first National Conference of Model Families in December 2016, Xi talked about books he read as a child.

“When I was a child, my mother gave me a picture-story book series-The Legend of Yue Fei. One of its more than 10 volumes shows Yue Fei’s mother tattooing four characters saying ‘serve the country with the utmost loyalty’ across his back,” Xi said, adding that the story deeply impressed him.

“It’s been my lifelong aspiration to ‘serve the country with the utmost loyalty’,” Xi said.


Eschewing luxury – Memories of skating shoes

In a trip to a 2022 Winter Olympics facility in Beijing in 2017, Xi shared his own story with the young ice hockey players practicing there. “I could only go skating on frozen Shichahai Lake,” Xi said recalling his skating memory as a teenager. He said he loved skating and always wanted to have a pair of skating shoes, while his younger brother liked playing ice hockey. “But at that time it was a luxury to have a pair of ice shoes worth 50 yuan. We were allowed to buy just one pair of new shoes,” Xi said. So he gave the chance to his younger brother

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *