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आईटी ऐक्ट के हटा दिए गए सेक्शन 66ए पर राज्यों और उच्च न्यायालयों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी ऐक्ट के सेक्शन 66ए को ख़त्म करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इस प्रावधान के तहत लोगों पर मुक़दमे दर्ज करने को लेकर सर्वोच्च अदालत ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी किया है.

साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी ऐक्ट की इस धारा को हटाने का आदेश दिया था.

जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस बीआर गवई की खंडपीठ ने कहा कि चूंकि पुलिस राज्य का विषय है, इसलिए इस मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पार्टी बनाना बेहतर रहेगा ताकि सर्वोच्च न्यायालय एक समग्र आदेश पारित कर सके और ये मामला हमेशा के लिए सुलझ जाए.

खंडपीठ ने कहा, “चूंकि ये मामला पुलिस और न्यायपालिका से जुड़ा है, इसलिए हम सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी करते हैं.”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सभी पार्टियों को चार हफ़्तों के भीतर नोटिस का जवाब देने के लिए कहा है.

सुनवाई के दौरान के याचिकाकर्ता एनजीओ ‘पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़’ (पीयूसीएल)के सीनियर एडवोकेट संजय पारिख ने कहा कि इस मामले के दो पहलू हैं, एक पुलिस है और दूसरी न्यायपालिका, जहां इन मामलों की आज भी सुनवाई चल रही है.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के मामले को वो देखेगा और सभी उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी किया जाएगा. चार हफ़्ते बाद इस मामले की फिर से सुनवाई होगी.

सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार के हलफनामे पर पीयूसीएल का रिज्वॉयंडर (जवाब) उन्हें रविवार को मिला है और वे इसे देखना चाहेंगे.

पांच जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईटी ऐक्ट के ख़त्म कर दिए गए सेक्शन 66ए के प्रावधान के तहत लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया जाना आश्चर्य कर देने वाली है.

इस प्रावधान के तहत इंटरनेट पर आपत्तिजनक संदेश पोस्ट करने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की जेल और जुर्माने की सज़ा दिए जाने का प्रावधान था.

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