साहित्य

एक बार तुम्हारे बिन “मुझे” सोच कर देखना

Madhu
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माँ तुम खुद को मेरी खातिर रखना सम्हाल कर
एक बार तुम्हारे बिन “मुझे” सोच कर देखना
मैं सिर्फ जीवित में गिनी जाउंगी
साँसों की रवानगी की वजह से
तुम सोचना एक पेड़ कितने दिन
जीवित रह सकता है बिन पानी
कोई तस्वीर कड़ी धूप में
कब तक सुर्खी बचाए रख सकती है
सोचना अंतरिक्ष के उस अंधेरे ग्रह को
जहाँ से कोई रौशनी नही देती दिखाई
वहाँ से चकोर कब तक चांद को टेर सकता है
कोई खुशबू किसी पहाड़ पर बिन हवा
कितना लम्बा सफर तय कर पाएगी
तितली बिना पंख कितनी
दूर भला उड़ पाएगी
क्षितिज तक फैले समंदर में फँसा
बिन पतवार कब तक चला सकेगा हाथ पैर
डोर से टूटी गयी जो पतंग फिर
कितना ऊँचा जा नभ छू पाएगी
गर्म रेत में गिरा बर्फ का नन्हा टुकड़ा
कब तक रूप बचा पाएगा
धुरी से बिछड़ा एक पहिया
मंजिल तक भला कैसे पहुँच पाएगा
मेरी माँ तुम मेरी खातिर खुद को
सम्हाल कर रखना
Madhu – writer at film writer’s association Mumbai

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