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पाकिस्तान, ईरान और रूस से मिल रहे हथियारों से तालिबान बेहद मज़बूत हो गये हैं : रिपोर्ट

मई की शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी शुरू हुई है और तभी से पूरे अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का दबदबा बढ़ रहा है.

द लॉन्ग वॉर जर्नल के अनुसार, देश के 407 ज़िला केंद्रों में से 195 से अधिक जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरी तरह से तालिबान के नियंत्रण में थे, जबकि मई से पहले केवल 73 ज़िलों में तालिबान का नियंत्रण था.

देश के 34 प्रांतों में से कई की राजधानियों पर सरकारी नियंत्रण भी ख़तरे में हैं, जिससे यह डर पैदा हो रहा है कि तालिबान सैन्य रूप से सत्ता पर काबिज़ हो जाएगा.

हालाँकि सरकारी सुरक्षा बलों ने कुछ ज़िलों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया है और कुछ क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ रहा है, लेकिन यह तालिबान की सफलताओं की तुलना में नगण्य है.

अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय सेना के पीछे हटने की शुरुआत तालिबान को मिलते क्षेत्रीय लाभ का मुख्य कारण प्रतीत होती है, लेकिन इसके पीछे कई दूसरे कारण भी हैं.

विदेशी सैनिकों की ‘अचानक’ वापसी

कई महीनों तक पर्यवेक्षकों ने चेतावनी दी कि अगर अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच राजनीतिक समझौता होने से पहले विदेशी सेनाएँ वापस चली जाती हैं, तो संघर्ष तेज़ हो जाएगा.

सांसद ज़िया आर्य नेजहाद ने अप्रैल में कहा था, “मैं अब घोषणा करता हूँ कि अगर अमेरिकी इस तरह से अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देते हैं, तो तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा बलों के बीच एक बहुत ही ख़तरनाक और व्यापक युद्ध शुरू हो जाएगा.”

बाद में अफ़ग़ान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब ने तालिबान की सफ़लता का श्रेय अफ़गान बलों के लिए हवाई समर्थन की कमी को दिया.

मोहिब ने बीबीसी को बताया, “कुछ क्षेत्रों से अमेरिकियों की अचानक वापसी के कारण, उन दूरदराज़ के ज़िलों में जहाँ अफ़ग़ान सेना गठबंधन बलों के हवाई समर्थन पर निर्भर थी, उन्हें या तो ख़ाली कर दिया है या वो तालिबान के हाथों में चले गए है.”

इसी तरह, सैन्य मामलों के जानकार अब्दुल हादी ख़ालिद ने कहा कि अफ़ग़ान सरकार सैन्य सहायता देने और समय पर सैन्य टुकड़ियों को सही तरीक़े से तैनात में असमर्थ रही है.

उन्होंने कहा, “नेटो जा रहा है, अफ़ग़ान सुरक्षा बलों की तैनाती बिखरी हुई है.”

फरवरी 2020 में दोहा में दस्तख़त किए गए यूएस-तालिबान समझौते के अनुसार, सभी विदेशी सेनाओं को 1 मई 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना था, लेकिन अप्रैल के मध्य में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की कि ये प्रक्रिया 11 सितंबर से पहले पूरी नहीं हो पाएगी

 

अंदरूनी सूत्रों का कथित समर्थन

सैद्धाांतिक तौर पर, 1,50,000 के क़रीब तालिबान लड़ाकों और लगभग 290,000 अमेरिकी-प्रशिक्षित सरकारी समर्थन वाले सुरक्षाबलों के बीच कोई मुक़ाबला था ही नहीं

लेकिन यह समूह बड़े पैमाने पर क्षेत्र पर कब्ज़ा करने में सक्षम रहा है क्योंकि सरकारी सुरक्षाबल या तो ज़िला मुख्यालय से पीछे हट गए, अपने पदों को छोड़ दिया या बिना विरोध के आगे बढ़ते चरमपंथियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

यह आरोप लगाया गया है कि कई मामलों में वरिष्ठ क़बायली नेताओं और अन्य स्थानीय प्रभावशाली लोगों ने सरकारी सैनिकों को माफ़ी के बदले तालिबान को अपने क्षेत्र देने लिए राज़ी किया.

दक्षिणी कंधार प्रांत की राजधानी कंधार शहर में तालिबान चरमपंथियों के प्रवेश करने के बाद, गवर्नर रोहुल्लाह ख़ानज़ादा ने कहा कि राजनेताओं ने सैनिकों से लड़ाई न करने का आग्रह किया था.

ख़ानज़ादा ने कहा, “कंधार शहर सैन्य रूप से तालिबान के नियंत्रण में नहीं गया है, यह एक राजनीतिक समर्पण है. उन्होंने सिर्फ़ एक फ़ोन कॉल के बाद पूरे ज़िलों को छोड़ दिया.”

हश्त-ए शोभ अखबार के मुताबिक़, उन्होंने कहा कि कई अधिकारियों ने “राजनीतिक और क़बायली संबधों” के कारण अपना ठिकाना छोड़ दिया था.

कंधार को तालिबान आंदोलन के जन्मस्थान के रूप में देखा जाता है.

उत्तर-पश्चिमी बदगिस प्रांत में गवर्नर ने ज़िलों के तालिबान के हाथ में चले जाने के लिए “विश्वासघाती साज़िश” को ज़िम्मेदार ठहराया है. उन्होंने सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए राज़ी करने के आरोप में कुछ “समुदाय के वरिष्ठ नेताओं” की गिरफ़्तारी के आदेश दिए हैं.

पहले उप-राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने कथित तौर पर बदगिस के सांसद अमीर शाह नायबज़ादा पर प्रांतीय राजधानी काला-ए-नव में सैनिकों को तालिबान के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए कहने का आरोप लगाया. सांसद ने आरोप से इनकार किया है.

बाद में सरकारी सैन्यबलों में शहर पर फिर से कब्ज़ा कर लिया.

सरकार विरोधी साज़िश का प्रचार

तालिबान लड़ाकों ने युद्ध के मैदान में अपनी काबिलियत का परिचय तो दिया ही, मुमकिन है कि सरकार विरोधी साज़िश के प्रचार ने भी उनकी सफलता में योगदान दिया है.

मोहिब ने हाल ही में कहा था, “काफ़ी हद तक, तालिबान का प्रचार (ज़िलों के नियंत्रण में चले जाने के) कारणों में से एक रहा है.”

उन्होंने कहा कि इस तरह के संदेश के कारण कुछ सुरक्षाकर्मी और स्थानीय लोग यह मानने लगे थे कि “सौदे” के तहत क्षेत्र तालिबान को सौंपे गए थे. मुमकिन है कि इससे सैनिकों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.

अफ़ग़ान सांसद मामूर रहमतजई ने आरोप लगाया कि पर्दे के पीछे के समझौते के तहत ज़िलों पर कब्ज़ा होने दिया गया.

“जब अफ़ग़ान सेना कहती है कि वे युद्ध के मैदान से पीछे हट गई, तो उन्होंने हथियार और सैन्य वाहनों को वहाँ ज़मीन पर क्यों छोड़ दिया.”

निजी अखबार अरमान-ए मेली में यह दावा किया गया है कि दोहा में वार्ता के दौरान यह सहमति हुई थी कि कुछ क्षेत्रों को तालिबान को सौंप दिया जाएगा, और बदले में “अमेरिकी कंपनियों को अफ़ग़ानिस्तान के ख़निज संसाधन निकालने की अनुमति मिलेगी”

अख़बार के मुताबिक, “ग़नी की टीम विदेशियों के आदेश पर देश को तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कराने का इरादा रखती है, यही कारण है कि राष्ट्रपति तालिबान से लड़ने के लिए सार्वजनिक विद्रोह बल के गठन के ख़िलाफ़ रहे हैं.”

राष्ट्रपति ने 20 जुलाई को यह कहते हुए इस तरह के आरोपों को ख़ारिज कर दिया है कि “कोई सौदा नहीं हुआ है और किसी भी तरह के सौदे का कोई इरादा नहीं है.”

भ्रष्टाचार, ‘अक्षम नेतृत्व’

माना जा रहा है कि स्थानीय पुलिस या सेना के बैनर तले सरकार समर्थक मिलिशिया बलों की भर्ती में भ्रष्टाचार ने भी तालिबान की सफलता में योगदान दिया है.

एक फ़ेसबुक पोस्ट में, राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के पूर्व प्रमुख रहमतुल्ला नबील ने कहा कि सरकार के भीतर कुछ हलकों ने वेतन को जेब में रखने के लिए “घोस्ट” (जिसका अस्तित्व ही नहीं है) मिलिशिया समूह बनाए हैं.

उन्होंने कहा कि अगर इन सर्कलों को 1,000 स्थानीय मिलिशिया के लिए पैसे मिलता हैं, तो वे केवल 200 को ही काम पर रखते हैं और बाक़ी के ख़र्च और वेतन का दुरुपयोग करते हैं.

नबील ने कहा, “कई इलाक़े पर कब्ज़ा हो गया, क्योंकि पहले उन इलाक़ों में हमला किया गया था, जिनके लिए घोस्ट चौकियों और घोस्ट सैनिकों को पंजीकृत किया गया था और वहाँ संसाधन नहीं थे”

कुछ पर्यवेक्षकों ने तर्क दिया कि “अक्षम नेतृत्व” सरकारी बलों के नुक़सान के लिए ज़िम्मेदार था.

सैन्य विशेषज्ञ मोहम्मद नादर मेमार ने कहा, “हमारे सुरक्षा नेतृत्व को अक्षम व्यक्ति संचालित कर रहे हैं, जो प्रोफ़ेशनल नहीं हैं.”

तालिबान लड़ाकों की बढ़ती संख्या

यूएस-तालिबान समझौते के तहत अफ़ग़ान जेलों से 5,000 तालिबान लड़ाकों की रिहाई ने भी समूह की सैन्य क्षमता को बढ़ाया.

अफ़ग़ान राष्ट्रपति ने हाल ही में कहा था कि तालिबान क़ैदियों को रिहा करना “एक बड़ी ग़लती” थी.

ग़नी ने यह भी दावा किया है कि हाल के हफ़्तों में हज़ारों विदेशी लड़ाके इस समूह में शामिल हुए हैं.

एक शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने ताशकंद में कहा कि ख़ुफ़िया इनपुट “पिछले महीने पाकिस्तान और अन्य स्थानों से 10,000 से अधिक जिहादी लड़ाकों के आने का संकेत देता है.

इसके अलावा, समूह ने हाल के वर्षों में अपने समर्थन का विस्तार किया है. 1990 के दशक के अंत में तालिबान ने पहले दक्षिण में अपनी स्थिति मज़बूत की जहाँ पश्तून रहते हैं और फिर ताज़िक और उज़्बेक की आबादी वाले उत्तर की ओर आगे बढ़े.

लेकिन आज देश भर के समूहों के बीच उनका प्रभाव है और समर्थन हासिल है.

तालिबान के एक शीर्ष नेता आमिर खान मोटाकी ने कहा, “आज स्थिति 20 या 25 साल पहले की तुलना में अलग है. अब हर गाँव और इलाक़े में मौजूद हर जातीय समूह में सैकड़ों और हजारों सशस्त्र मुजाहिदीन हैं.”

मोहम्मद हारुन रहमानी
बीबीसी मॉनिटरिंग

तालिबान की विदेशी सैनिकों को चेतावनी

तालिबान ने बीबीसी को बताया है कि नेटो की सितंबर में वापसी की मियाद ख़त्म होने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान में एक भी विदेशी सैनिक की मौजूदगी को ‘क़ब्ज़ा’ माना जाएगा.

ये बयान राजनयिक मिशनों और काबुल के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए, क़रीब 1,000 अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान में ही बने रहने की ख़बरों के बाद आया है.

अफ़ग़ानिस्तान में नेटो का 20 साल का सैन्य मिशन अब ख़त्म हो गया है. लेकिन देश में तालिबान के बढ़ते क़दमों के बीच हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है.

तालिबान के साथ एक समझौते के तहत, अमेरिका और उसके सहयोगी, अफ़ग़ानिस्तान छोड़ रहे हैं.

क्या समझौता हुआ है?

समझौता ये हुआ है कि विदेशी फ़ौजों के जाने के बाद तालिबान, अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी समूह को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में ऑपरेट करने की अनुमति नहीं देगा.

राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए 11 सितंबर की तारीख़ चुनी है.

ये अमेरिका पर 9/11 के हमलों की 20वीं सालगिरह होगी. लेकिन ऐसी ख़बरें हैं कि ये ‘वापसी’ कुछ दिनों के अंदर पूरी हो सकती है.

जैसे-जैसे देश की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सेनाओं को सौंपने की तैयारी हो रही है, वैसे-वैसे अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं.
‘हर विदेशी सैनिक छोड़ें अफ़ग़ानिस्तान’

तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि काबुल पर सैन्य रूप से क़ब्ज़ा करना ‘तालिबान की नीति नहीं’ है.

लेकिन क़तर में तालिबान के कार्यालय से बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘वापसी पूरी होने के बाद कोई भी विदेशी सेना, विदेशी फ़ौज के ठेकेदारों सहित शहर में नहीं रहनी चाहिए.’

शाहीन ने बीबीसी को बताया, “अगर वे दोहा समझौते के ख़िलाफ़ अपनी सेना को पीछे छोड़ देते हैं तो उस स्थिति में यह हमारे नेतृत्व का निर्णय होगा कि हम कैसे आगे बढ़ते हैं.”

उन्होंने कहा, “हम ऐसी स्थिति में जवाब देंगे और इस पर अंतिम फ़ैसला हमारे नेताओं का होगा.”

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान राजनयिक, एनजीओ और दूसरे विदेश नागरिकों को निशाना नहीं बनाएगा और उनकी सुरक्षा में लगे सैनिकों की ज़रूरत नहीं होगी.

उन्होंने कहा, “हम विदेशी सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ हैं न कि राजनयिकों, एनजीओ और उनके कर्मचारियों के. एनजीओ, दूतावास चलते रहें- यह वो हैं, जिन्हें हमारे लोग चाहते हैं. हम उनके लिए कोई ख़तरा नहीं बनेंगे.”
ऐतिहासिक लम्हा बताया

शाहीन ने अफ़ग़ानिस्तान के बगराम एयरफ़ील्ड को अमेरिकी फ़ौज द्वारा ख़ाली करने को ‘ऐतिहासिक लम्हा’ बताया है. यह अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा था.

लेकिन एक महिला सांसद फ़रज़ाना कोचाई कहती हैं कि अमेरिकी सेना ने इसे बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तरीक़े से ख़ाली किया है.

अफ़ग़ान सरकार के प्रवक्ता रज़वान मुराद ने बीबीसी से कहा कि सरकार तालिबान से बातचीत और संघर्ष विराम करने के लिए तैयार है लेकिन उन्हें दिखाना चाहिए कि वो भी शांति के लिए प्रतिबद्ध हैं.

हालाँकि, शाहीन ने इस बात को ख़ारिज किया है कि लड़ाके समूह हिंसा में हुई हालिया बढ़ोतरी के लिए ज़िम्मेदार हैं.

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि अधिकतर ज़िले तालिबान के नियंत्रण में मध्यस्थता के ज़रिए आए हैं, जब अफ़ग़ान जवानों ने वहाँ लड़ने से मना कर दिया था.

रविवार को तालिबान ने दक्षिणी कंधार प्रांत के एक और इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया. चरमपंथियों का कहना है कि देश के 400 ज़िलों में से अब उनके नियंत्रण में एक चौथाई हैं.

तालिबान प्रवक्ता ने वर्तमान सरकार को ‘मरणासन्न’ बताते हुए देश को ‘इस्लामी अमीरात’ कहा है. इसको इस चरमपंथी संगठन का एक संकेत माना जा रहा है कि वो देश पर शासन करने के लिए धार्मिक आधार की परिकल्पना पर चलेगा और शायद ही अफ़ग़ान सरकार की चुनावों की मांग पर सहमत हो.

तालिबान के क़ब्ज़े का डर

शाहीन ने कहा है कि तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच बातचीत में अब तक चुनावों पर कोई चर्चा नहीं हुई है.

अक्तूबर 2001 में अमेरिकी नेतृत्व वाली फ़ौजों ने तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता से बेदख़ल कर दिया था क्योंकि संगठन ने अमेरिका में 9/11 हमलों के दोषी ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा के दूसरे नेताओं को शरण दे रखी थी.

राष्ट्रपति बाइडन कह चुके हैं कि अमेरिका अपनी फ़ौजों को अफ़ग़ानिस्तान से इसलिए निकाल रहा है क्योंकि अब वो जगह पश्चिम के ख़िलाफ़ दोबारा योजना बनाने का विदेशी जिहादियों का अड्डा नहीं बन सकती है.

हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ज़ोर देकर कह चुके हैं कि देश के सुरक्षाबल विद्रोहियों को एक कोने में समेटे रखने में सक्षम हैं लेकिन कइयों का मानना है कि अमेरिकी फ़ौजों के जाने से देश वापस तालिबान के नियंत्रण में चला जाएगा.

अब्दुल राशिद दोस्तम

इनमें से दोस्तम सरकार की सुरक्षा नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और अपने बेटे यार मोहम्मद दोस्तम के साथ उत्तर में फ़रयाब, जोज़जन और सर-ए-पुल जैसे प्रांतों में तालिबान को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए युद्ध के मैदान में लौट गए हैं.

दोस्तम शांति प्रकिया को लेकर अक्सर अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे हैं.

हाल ही में दोस्तम ने कहा था, “यह कोई मज़ाक नहीं बल्कि युद्ध है. अब अमेरिका पहले की तरह हमारा समर्थन नहीं कर रहा है और हमारे ऊपर उनके लड़ाकू जहाज़ भी मौजूद नहीं हैं.”

वे कहते हैं, “अगर उत्तरी इलाका तालिबान के हाथ लगा तो अफ़ग़ानिस्तान तबाह हो जाएगा.”

उपराष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में दोस्तम ने उत्तर में तालिबान के ख़िलाफ़ कुछ सफल सैन्य हमलों का नेतृत्व किया था. लेकिन ये अभियान युद्ध अपराधों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से घिर गया था.

ऐसा माना जाता है कि तब से, दोस्तम का उज़्बेकों के बीच असर कम हुआ है और कुछ उज़्बेकों ने तालिबान के साथ जाने का भी फ़ैसला किया है. इसके अलावा फ़रयाब प्रांत के गवर्नर को हटाने को लेकर राजनीतिक असहमति के कारण, केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्तों में भी खटास भी आई है.

अता मोहम्मद नूर

अता मोहम्मद नूर भी इसी तरह अपनी राजनीतिक पार्टी जमीयत-ए इस्लामी में आंतरिक झगड़े की वजह से कमज़ोर हो गए हैं.

नूर अपने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, “सत्ता, धन, संसाधन, हथियार और युद्ध की कमान सरकार के पास है, मेरे पास नहीं. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकार को नहीं मालूम कि करना क्या है?”

नूर आगे लिखते हैं, “बिना किसी व्यापक सहमति के ‘दुश्मन को रोकना’ मुश्किल है.”

मोहक़िक़

उधर मध्य और उत्तरी प्रांतों में हज़ारा समुदाय पर ख़ासा प्रभाव रखने वाले मोहक़िक ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ 10 हज़ार लोगों को लामबंद किया है.

हालांकि उन्होंने इस पर भी बल दिया कि बड़े पैमाने पर तालिबान विरोधी किसी भी युद्ध के मोर्चे के गठन में सरकार की भागीदारी अहम साबित होगी.

तालिबान का उदय

अफ़ग़ानिस्तान के नक़्शे पर सबसे पहले तालिबान 90 के दशक में उभरा था. उस वक़्त देश भयंकर गृह युद्ध की चपेट में था. तमाम ताक़तवर कमांडरों की अपनी-अपनी सेनाएं थीं. सब देश की सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे थे.

अफ़ग़ानिस्तान पर गहरी समझ रखने वाले पत्रकार अहमद रशीद कहते हैं कि जब उन्होंने तालिबान का नाम सुना, तो चौंक गए. उनके ज़हन में सवाल उठा कि अचानक कौन से लोग इतने ताक़तवर हो गए?

रशीद, कई दशक से अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर रिपोर्टिंग करते आए हैं. वो कहते हैं, ”जब मैंने पहली बार नब्बे के दशक में उनका नाम सुना तो चौंक गया. मैं अफ़ग़ानिस्तान के हर लड़ाके को जानता था. पर तालिबान का नाम पहले कभी नहीं सुना था.”

लेकिन, अचानक ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान बेहद ताक़तवर हो गया था. देश की सत्ता पर क़ब्ज़े के लिए उन्होंने भी दूसरे लड़ाकों से जंग छेड़ दी थी. उन्हें हर मोर्चे पर जीत मिल रही थी.

तालिबान ने जनता से वादा किया कि वो देश को ऐसे लड़ाकों से मुक्ति दिलाएंगे. उन्होंने कुछ ही महीनों में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े हिस्से के लड़ाकों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया.

तालिबान को पाकिस्तान से हथियार मिल रहे थे. तालिबान के बारे में नई बात ये थी कि उनकी जो इस्लामिक विचारधारा थी, वो इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान में नहीं सुनी गई थी. लेकिन, चूंकि वो युद्ध से परेशान अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को शांति और स्थायी हुकूमत दे रहे थे, इसलिए तालिबान को स्थानीय क़बीलों का भी साथ मिलने लगा.

एक बार अहमद रशीद तालिबान के एक गुट के साथ युद्ध के मोर्चे पर गए. वो ये देखकर हैरान रह गए कि तालिबानी लड़ाके बेहद कम उम्र के थे. कई तो महज़ 16-17 बरस के ही थे.

वो जहां भी जाते थे, जश्न का माहौल हो जाता था. अहमद रशीद बताते हैं कि गांव दर गांव जीतते हुए एक दिन वो राजधानी काबुल तक पहुंच गए. दो साल की घेरेबंदी के बाद 1996 में उन्होंने राजधानी पर क़ब्ज़ा कर लिया.

सत्ता में आने पर तालिबान ने पहला काम किया कि राष्ट्रपति नज़ीबुल्लाह को सरेआम फांसी दे दी.

अहमद रशीद बताते हैं कि जल्द ही तालिबानी पुलिस ने अपना निज़ाम क़ायम करना शुरू कर दिया था. औरतों के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. उनकी पढ़ाई छुड़वा दी गई. तालिबान ने जल्द ही देश में गीत संगीत, नाच-गाने, पतंगबाज़ी से लेकर दाढ़ी काटने तक पर रोक लगा दी.

नियम तोड़ने वाले को तालिबानी पुलिस सख़्त सज़ा देती थी. कई बार लोगों के हाथ-पैर तक काट दिए जाते थे.

जल्द ही उन्हें लेकर डर और नफ़रत का माहौल देश भर में बन गया. मगर सत्ता पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत थी.

11 सितंबर 2001 को अमरीका में अल क़ायदा ने आतंकवादी हमले किए. जांच में जब ये पता चला कि इन हमलों की साज़िश रचने वालों ने अफ़ग़ानिस्तान में पनाह ली थी तो अमरीका ने तालिबान को चेतावनी दी कि या तो इन आतंकियों को उसके हवाले कर दें या फिर हमले झेलें.

इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोलने का फ़रमान दे दिया. कुछ ही हफ़्तों के अंदर तालिबान की शिकस्त हो गई. अफ़ग़ानिस्तान के लोग इस बात से बेहद ख़ुश हुए. उन्होंने राहत की सांस ली थी.

तालिबान ने सत्ता के साथ-साथ लोगों का समर्थन भी गंवा दिया था. उन्हें अच्छे लोग नहीं माना जाता था.

लेकिन, इससे तालिबान का ख़ात्मा नहीं हुआ.


जब तालिबान ने की वापसी

पैट्रीशिया गॉसमैन ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्चर हैं. तालिबान की हार के बाद वो अफ़ग़ानिस्तान गई थीं. उस वक़्त ये लगा था कि तालिबान का पूरी तरह से ख़ात्मा हो गया है.

मगर ऐसा नहीं था. अफ़ग़ानिस्तान पर नाटो का क़ब्ज़ा होने के बाद बहुत से तालिबानी लड़ाके अपने-अपने गांव चले गए. नाटो कमांडरों को ये बात पता थी. वो इनका ख़ात्मा करना चाहते थे. इसके लिए नाटो ने तालिबान विरोधी लड़ाकों को हथियार मुहैया कराने शुरू कर दिए.

पैट्रीशिया बताती हैं कि वो दौर बेहद बुरा साबित हुआ. जिसे भी ज़मीन हड़पनी होती थी या किसी महिला से शादी ही करनी होती थी तो वो इसका विरोध करने वालों को तालिबानी कमांडर कहकर मार देता था. अमरीकी सेनाओं ने इसे नहीं रोका.

नतीजा ये हुआ कि तालिबान कमांडरों के ख़ात्मे के नाम पर ज़ुल्म की इंतेहां हो गई. पैट्रीशिया बताती हैं कि कई लोग बारातों के बारे में नाटो कमांडरों को ग़लत जानकारी देते थे कि ये तालिबानी लड़ाके हैं. नाटो के विमानों ने ऐसे कई काफ़िलों पर बम बरसाकर हज़ारों बेगुनाहों का ख़ून बहाया.

अफ़ग़ानिस्तान के ताक़तवर तालिबान विरोधी लड़ाकों ने पश्तूनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. वो अमरीकी या नाटो सैनिकों का इंतज़ार करने के बजाय ख़ुद ही हमले करके लोगों को मारने लगे.

पश्तूनों को लगा कि उनका तो इस देश में कोई नहीं. वो अमरीका, नाटो और तालिबान विरोधी लड़ाकों के निशाने पर थे.

काबुल में बैठी कठपुतली सरकार लाचार थी. अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े हिस्से में कोई निज़ाम ही नहीं था. सिर्फ़ अपनी-अपनी सत्ता क़ायम करने की जंग चल रही थी.

ऐसी लाचारी की हालत में पश्तूनों को लगा कि इनसे बेहतर तो तालिबानी राज ही था.

जब अफ़ग़ानिस्तान में नहीं बची कोई सत्ता

इक्कीसवीं सदी में भी काबुल में हालात ऐसे थे जैसे लोग मध्य युग में रह रहे थे. उस दौर में सरकारी नौकरी कर रहे काबुल के निमिद बेज़ान कहते हैं कि लोग सरकारी दफ़्तरों में काग़ज़-क़लम लेकर काम करते थे. कंप्यूटर नहीं थे.

सरकार के काम-काज से भ्रष्टाचार बढ़ने लगा. विदेशी मदद पर चल रही सरकार बेअसर थी. निमिद कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए ज़रूरी संसाधन नहीं थे. देश के एक बड़े हिस्से पर कोई हुकूमत ही नहीं थी. न पुलिस थी, न दूसरे सरकारी अमले.

सत्ता के इस शून्य में ही एक बार फिर से तालिबान की वापसी हुई.

तालिबानी लड़ाके गांव-गांव जाकर फिर समर्थन जुटाने लगे. बुनियादी चीज़ों के लिए जूझते लोगों पर दबाव बनाया. निमिद कहते हैं कि तालिबानी लड़ाके गांवों की बिजली काट देते थे. फिर जो पैसा देता था, उसी की बिजली सप्लाई बहाल होती थी. इस तरह से तालिबान ने करोड़ों की रक़म जुटा ली.

तालिबान ने अफ़ीम की खेती भी शुरू कर दी. हज़ारों टन अफ़ीम का उत्पादन करके तालिबान ने करोड़ों रुपए का कारोबार शुरू कर दिया. अवैध वसूली और अफ़ीम की खेती से हुई आमदनी से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान एक बार फिर से ताक़तवर हो गया था.

अब वो नए दौर के हिसाब से बदल भी रहे थे. कभी टीवी पर पाबंदी लगाने वाले तालिबानी लड़ाकों ने अपने प्रचार के लिए वीडियो बनाने शुरू कर दिए थे. वो दावा करते थे कि जनता उनके साथ है और वो एक बार फिर दुनिया को चौंकाने को तैयार हैं.

वो सोशल मीडिया, इंटरनेट और टीवी का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहे थे. धीरे-धीरे तालिबानी राज फिर से पांव पसारने लगा था. गांवों से क़स्बों और क़स्बों से शहरों तक उनकी हुकूमत फैल रही थी.

अगर आप ये सोचें कि ये सब सिर्फ़ अवैध वसूली और अफीम की खेती से हुई कमाई से हुआ था, तो ऐसा नहीं था. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के दोबारा उभरने के पीछे थी एक विदेशी ताक़त.

एंटोनियो जस्टोसी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए अफ़ग़ानिस्तान में काम किया है. एक दौर में वो आराम से काबुल से बाहर जाकर घूमकर लौट आते थे. ऐसे ही कई दौरों में वो तालिबानी लड़ाकों से भी मिले थे. मगर अब ऐसा करना ख़तरे से ख़ाली नहीं.

एंटोनियो कहते हैं कि तालिबान को कई देशों से समर्थन मिलता है. इनमें से पहले नंबर पर है पाकिस्तान. पाकिस्तान शुरू से ही तालिबान का समर्थन करता रहा है. वो उन्हें हथियार, पैसे और छुपने की जगह मुहैया कराता रहा है.

तालिबानी सेना में भर्ती के लिए पाकिस्तान में मौजूद अफ़ग़ानी शरणार्थी बहुत काम आते हैं. वो सताए हुए बेघर, बेमुल्क़ लोग अपने वतन के लिए लड़ने और जान गंवाने के लिए आसानी से तैयार हो जाते हैं.

एंटोनियो कहते हैं कि आज की तारीख़ में अफ़ग़ानिस्तान में दो लाख या इससे भी ज़्यादा तालिबानी लड़ाके हैं. इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के शरणार्थी कैंपों से आए हुए लोग हैं.

तालिबानी लड़ाकों की तादाद आज इस्लामिक स्टेट या अल-क़ायदा जैसे चरमपंथी संगठनों से भी ज़्यादा है.

इन लड़ाकों को नियमित रूप से तनख़्वाह देनी होती है. तालिबान ये ज़रूरत सिर्फ़ पाकिस्तान की मदद से पूरी नहीं कर सकता. इसलिए उसने नए दोस्त तलाश लिए हैं.

2005 में नाटो सेनाओं ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था. नाटो ने दक्षिण और पश्चिम में यानी ईरान से लगी सीमा पर हमले तेज़ कर दिए थे.

पाकिस्तान के अलावा ईरान ने भी तालिबान को एक दौर में पैसे, हथियार और छुपने की जगह मुहैया कराई थी. हालांकि अब ईरान, तालिबान को सपोर्ट नहीं करता.

मगर, तालिबान ने नया सहयोगी तलाश लिया है. अमरीका का आरोप है कि अब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को रूस से हथियार और दूसरी मदद मिल रही हैं. हालांकि रूस ने इससे इनकार किया है.

सवाल ये है कि रूस तालिबान की मदद क्यों कर रहा है? कुछ जानकारों का कहना है कि रूस इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए तालिबान की मदद कर रहा है.

वहीं, एंटोनियो जस्टोज़ी कहते हैं कि रूस असल में अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका से अपनी कुछ बातें मनवाना चाहता है. इसीलिए वो तालिबान की मदद करके अमरीका को ये संकेत दे रहा है कि हमारी भी शर्तें मानो.

तालिबान के ठिकानों से मिले रूसी हथियार इस बात की तस्दीक़ करते हैं. लेकिन, इसमें कोई दो राय नहीं कि तालिबान को कई देशों से हथियार और पैसे मिल रहे हैं. पाकिस्तान और ईरान में उन्हें छुपने के ठिकाने भी मिल रहे हैं. इसीलिए वो आज की तारीख़ में दोबारा बेहद ताक़तवर हो गए हैं.

पाकिस्तान, ईरान और रूस से मिल रहे हथियार और अफ़ीम की खेती से तालिबान बेहद मज़बूत हालात में पहुंच गए हैं. युद्ध से बेहाल लोग उनकी पनाह में जाकर अमन चाहते हैं.

भले ही तालिबान आज अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता के क़रीब न हों मगर उनके विरोधी हार ज़रूर रहे हैं.

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