इतिहास

भारत का इतिहास : मध्यकालीन भारत- 500 ई–1761 ई : : विश्व के महानतम योद्धा महमूद ग़ज़नवी का भारत आगमन और सोमनाथ मंदिर तोड़ने की कहानी : पार्ट 41

महमूद ग़ज़नवी

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शासनावधि – 998-1030
राज्याभिषेक – 1002
पूर्ववर्ती – सबुक तिगिन
उत्तरवर्ती – मोहम्मद ग़ज़नवी
जन्म – 2 नवम्बर 971 (लगभग)
ग़ज़नी, अफ़ग़ानिस्तान
निधन – 30 अप्रैल 1030 (उम्र 59 वर्ष में)
ग़ज़नी, अफगानिस्तान
समाधि – ग़ज़नी
पिता – सबुक तिगिन
धर्म – इस्लाम

महमूद ग़ज़नवी (फ़ारसी: محمود غزنوی) मध्य अफ़ग़ानिस्तान में केन्द्रित गज़नवी राजवंश का अत्यंत शक्तिशाली शासक था जो पूर्वी ईरान भूमि में साम्राज्य विस्तार के लिए जाना जाता हैं। गजनवी तुर्क मूल का था और अपने समकालीन (और बाद के) सल्जूक़ तुर्कों की तरह पूर्व में एक इस्लामी साम्राज्य बनाने में सफल हुआ। इसके द्वारा जीते गए प्रदेशों में आज का पूर्वी ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और संलग्न मध्य-एशिया (सम्मिलित रूप से ख़ोरासान), पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत शामिल थे। इसके युद्धों में फ़ातिमी ख़िलाफ़त (शिया), काबुल शाही (हिन्दू) और कश्मीर का नाम प्रमुखता से आता है। भारत में मुस्लिम शासन लाने और अपने छापों के कारण भारतीय हिन्दू समाज में गजनवी को एक आक्रामक शासक के रूप में जाना जाता है।

महमूद ग़ज़नवी पिता के वंश से तुर्क था पर उसने फ़ारसी भाषा के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हाँलांकि गजनवी के दरबारी कवि फ़िरदौसी ने शाहनामा की रचना की पर वह हमेशा फ़िरदौसी का समर्थन नहीं करता था। ग़ज़नी, जो मध्य अफ़ग़ानिस्तान में स्थित एक छोटा-सा शहर था, इसकी बदौलत साहित्य और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण केंद्र में बदल गया। बग़दाद के अब्बासी ख़लीफ़ा ने महमूद को फ़ातिमी ख़िलाफ़त के विरुद्ध जंग करने के इनाम में ख़िल’अत और सुल्तान की पदवी दी। सुल्तान की उपाधि इस्तेमाल करने वाला गजनवी पहला शासक था।

सबुक तिगिन एक तुर्क ग़ुलाम थे जिन्होंने ख़ोरासान के सामानी शासकों से अलग होकर ग़ज़नी में स्थित अपना एक छोटा शासन क्षेत्र स्थापित किया था। पर उनकी ईरानी बेगम की संतान महमूद ने साम्राज्य बहुत विस्तृत किया। फ़ारसी काव्य में महमूद के अपने ग़ुलाम मलिक अयाज़ से प्रेम का ज़िक्र मिलता है।[ उर्दू में इक़बाल का लिखा एक शेर –

न हुस्न में रहीं वो शोखियाँ, न इश्क़ में रहीं वो गर्मियाँ

न वो गज़नवी में तड़प रहीं, न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में।

(ख़म – घुंघरालापन)

सामरिक विवरण

997: काराखानी साम्राज्य।

999: ख़ुरासान, बल्ख़, हेरात और मर्व पर सामानी कब्जे के विरुद्ध आक्रमण। इसी समय उत्तर से काराख़ानियों के आक्रमण की वजह से सामानी साम्राज्य तितर बितर।

1000: सिस्तान, पूर्वी ईरान।

1001: गांधार में पेशावर के पास जयपाल की पराजय। जयपाल ने बाद में आत्महत्या कर ली।

1002: सिस्तान: खुलुफ को बन्दी बनाया।

1004: भाटिया (Bhera) को कर न देने के बाद अपने साम्राज्य में मिलाया।

1008: जयपाल के बेटे आनंदपाल को हराया।

ग़ोर और अमीर सुरी को बंदी बनाया। ग़ज़ना में अमीर सुरी मरा। सेवकपाल को राज्यपाल बनाया। अनंदपाल कश्मीर के पश्चिमी पहाड़ियों में लोहारा को भागा। आनंदपाल अपने पिता की मृत्यु (आत्महत्या) का बदला नहीं ले सका।

1005: बल्ख़ और खोरासान को नासिर प्रथम के आक्रमण से बचाया। निशापुर को सामानियों से वापिस जीता।

1005: सेवकपाल का विद्रोह और दमन।

1008: हिमाचल के कांगरा की संपत्ति कई हिन्दू राजाओं (उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली, कालिंजर और अजमेर) को हराने के बाद हड़प ली।

ऐतिहासिक कहानियों के अनुसार गखर लोगों के आक्रमण और समर के बाद महमूद की सेना भागने को थी। तभी आनंदपाल के हाथी मतवाले हो गए और युद्ध का रुख पलट गया।

1010: ग़ोर, अफ़ग़ानिस्तान।

1005: मुल्तान विद्रोह, अब्दुल फतह दाउद को कैद।

1011: थानेसर।

1012: जूरजिस्तान

1012: बग़दाद के अब्बासी खलीफ़ा से खोरासान के बाक़ी क्षेत्रों की मांग और पाया। समरकंद की मांग ठुकराई गई।

1013: Bulnat: त्रिलोचनपाल को हराया।

1014 : काफ़िरिस्तान पर चढ़ाई।

1015: कश्मीर पर चढ़ाई – विफल।

1015: ख़्वारेज़्म – अपनी बहन की शादी करवाया और विद्रोह का दमन।

1017: कन्नौज, मेरठ और यमुना के पास मथुरा। कश्मीर से वापसी के समय कन्नौज और मेरठ का समर्पण।

1021: अपने ग़ुलाम मलिक अयाज़ को लाहोर का राजा बनाया।

1021: कालिंजर का कन्नौज पर आक्रमण : जब वो मदद को पहुंचा तो पाया कि आखिरी शाहिया राजा त्रिलोचनपाल भी था। बिना युद्ध के वापस लौटा, पर लाहौर पर कब्जा। त्रिलोचनपाल अजमेर को भागा। सिन्धु नदी के पूर्व में पहला मुस्लिम गवर्नर नियुक्त।

1023:लाहौर। कालिंजर और ग्वालियर पर कब्जा करने में असफल। त्रिलोचनपाल (जयपाल का पोता) को अपने ही सैनिकों ने मार डाला। पंजाब पर उसका कब्जा। कश्मीर (लोहरा) पर विजय पाने में दुबारा असफल।

1024: अजमेर, नेहरवाला और काठियावाड़ : आख़िरी बड़ा युद्ध।

1025-26: सोमनाथ : मंदिर पर हमला। गुजरात में नया राज्यपाल नियुक्त और अजमेर के राजपूतो से बचने के लिए थार मरुस्थल के रास्ते का सहारा लिया |

1027: रे, इस्फ़ाहान और हमादान (मध्य और पश्चिमी ईरान में)- बुवाही शासकों के खिलाफ।

1028, 1029: मर्व और निशापुर, सल्जूक़ तुर्कों के हाथों पराजय।

भारत (पंजाब) में इस्लामी शासन लाने की वजह से पाकिस्तान और उत्तरी भारत के इतिहास में उसका एक महत्वपूर्ण स्थान है। पाकिस्तान में जहाँ वो एक इस्लामी शासक की इज्जत पाता है वहीं भारत में एक लुटेरे और क़ातिल के रूप में गिना जाता है। पाकिस्तान ने उसके नाम पर अपने एक मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) का नाम रखा है।

उसको फिरदोसी के आश्रय और बाद के संबंध-विच्छेद के सिलसिले में याद किया जाता है। कहा जाता है कि महमूद ने फिरदौसी को ईरान के प्राचीन राजाओं के बारे में लिखने के लिए कहा था। इस्लाम के पूर्व के पारसी शासकों और मिथकों को मिलाकर 27 वर्षों की मेहनत के बाद जब फ़िरदौसी महमूद के दरबार में आया तो महमूद, कथित तौर पर अपने मंत्रियों की सलाह पर, उसको अच्छा काव्य मानने से मुकर गया। उसने अपने किए हुए वादे में प्रत्येक दोहे के लिए एक दीनार की बजाय सिर्फ एक दिरहम देने का प्रस्ताव किया। फ़िरदौसी ने इसे ठुकरा दिया तो वो क्रोधित हो गया। उसने फिरदौसी को बुलाया लेकिन भयभीत शायर नहीं आया। तब फिरदौसी ने महमूद के विरुद्ध कुछ पंक्तियाँ लिखीं जो लोकप्रिय होने लगीं :

अय शाह-ए-महमूद, केश्वर कुशा
ज़ि कसी न तरसी बतरसश ख़ुदा

(ऐ शाह महमूद, देशों को जीतने वाले; अगर किसी से नहीं डरता हो तो भगवान से डर)।

इन पंक्तियों में उसके जनकों (ख़ासकर माँ) के बारे में अपमान जनक बातें लिखी थी। लेकिन, कुछ दिनों के बाद, ग़ज़नी की गलियों में लोकप्रिय इन पंक्तियों की ख़बर जब महमूद को लगी तो उसने दीनारों का भुगतान करने का फैसला किया। कहा जाता है कि जब तूस में उसके द्वारा भेजी गई मुद्रा पहुँची तब शहर से फिरदौसी का जनाजा निकल रहा था। फिरदौसी की बेटी ने राशि लेने से मना कर दिया। अलबरूनी उत्बी फारुखी फिर्दोशी महमूद गजनबी के दरबारी थे।

गजनी के महमूद ने मिश्रित विरासत को पीछे छोड़ दिया। उनका साम्राज्य 1187 तक जीवित रहेगा, हालांकि यह उनकी मृत्यु से पहले ही पश्चिम से पूर्व की ओर उखड़ने लगा था। 1151 में, गजनवीद सुल्तान बहराम शाह ने गजनी को खो दिया, लाहौर (अब पाकिस्तान में) भाग गया।

सुल्तान महमूद ने अपना अधिकांश जीवन लड़ते हुए बिताया

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जब संत ने महमूद गजनवी से कहा, जरा अदब का लिहाज रख ये हराम है

By : नवभारत टाइम्स

संत अबुल हसन खिरकानी की परीक्षा लेने के लिए महमूद गजनवी अपने एक गुलाम को शाही लिबास पहनाकर और खुद दासी का रूप धारण कर उनके पास गया। संत ने केवल दासीरूप में आए महमूद की ओर देखा। इस पर बादशाह बना गुलाम बोला, ‘आपने बादशाह का सम्मान क्यों नहीं किया?’ हसन बोले, ‘सब रचा-रचाया जाल है।’

महमूद जान गया कि यह पहुंचा हुआ महात्मा है। उसने लिबास उतारकर माफी मांगी और कुछ नसीहतें देने को कहा। अबुल हसन ने दूसरों को बाहर करके कहा, ‘ऐ! महमूद, जरा अदब का लिहाज रख। जो चीजें हराम हैं, उनसे दूर रह। खुदा की बनाई दुनिया से प्यार कर और अपने जीवन में उदारता बरत।’ तब महमूद ने उन्हें अशर्फियों की थैली भेंट की। इस पर संत ने एक सूखी जौ की टिकिया उसे खाने को दी।

महमूद उसे चबाता रहा, किंतु वह गले से न उतरी। तब वह बोला, ‘यह निवाला मेरे गले में अटक रहा है।’ इस पर हसन बोले, ‘तब क्या तू भी यह चाहता है कि यह थैली मेरे हलक में अटके?’ महमूद शर्मिंदा हो गया और जाते-जाते बोला, ‘आपकी झोपड़ी बड़ी उम्दा है।’ हसन बोले, ‘महमूद, खुदा ने तुझे इतनी बड़ी सल्तनत दी, फिर भी तेरा लालच नहीं गया। क्या तू इस झोपड़े का भी तालिब है?’ महमूद और भी लज्जित हुआ और वह जाने के लिए बढ़ गया, तो हसन खड़े हो गए।

उन्हें खड़ा देखकर महमूद बोला, ‘जब मैं यहां आया, तब आपने सम्मान नहीं किया और अब कर रहे हैं।’ हसन बोले, ‘महमूद, जब तुम यहां आए थे, तब तुम्हारे दिल में शाही रौब भरा था। तुम मेरा इम्तिहान लेने आए थे, मगर अब यहां से अदब का ख्याल कर जा रहे हो, क्योंकि तुम्हारे चेहरे पर फकीरी का नूर चमक रहा है। इसी कारण मैंने उस समय सम्मान नहीं किया और अब कर रहा हूं।’

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पहचान ढूंढता गजनवी का शहर

अफगानिस्तान के शहर गजनी को साल 2013 के लिए एशिया की इस्लामिक सांस्कृतिक राजधानी चुना गया है. आयोजकों के बड़े बड़े दावे हैं लेकिन युद्ध में फंसे शहर में इतनी चौकसी है कि सैलानियों को यहां लाना मुश्किल काम है.

काबुल से 140 किलोमीटर दूर इस शहर की सांस्कृतिक प्रसिद्धि मध्यकाल के शासक महमूद गजनवी की देन है. गजनवी की ही बदौलत इस इस्लामिक राज्य में फारसी और तुर्की कलाओं ने सांस ली जिनका प्रसार भारत तक हुआ. 10वीं सदी में गजनवी ने यहां मध्य एशियाई लेखकों और दार्शनिकों को बढ़ावा दिया, जिससे शहर की अलग पहचान बनी.

गजनी में सांस्कृतिक धरोहरों को नया रूप देने में जर्मनी भी लगा है. जर्मनी की आखेन यूनिवर्सिटी के कार्सटेन ले महमूद गजनवी से जुड़ी चीजों को दोबारा जमा कर रहे हैं. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, “यूरोपीय अंदाज में अगर देखें तो अलग अलग संस्कृतियों के एकीकरण का यह एक जबरदस्त नमूना है.” ले 2010 से एक पूरी टीम के साथ शहर की सांस्कृतिक धरोहरों को बचाए रखने के लिए काम कर रहे हैं.

किले पर नजर

गजनी में सबसे मशहूर है यहां का किला. किले के आस पास दो मीनार हैं और शहर की सीमा तय करती एक लंबी दीवार. किले के संरक्षण के लिए जर्मनी ने 17 लाख यूरो (लगभग 12 करोड़ रुपये) की मदद दी है. ले बताते हैं, “पहले तो हम दीवार की हालत देख कर ही हैरान रह गए. यहां हमारे काम का मकसद लोगों को यह सिखाना नहीं है कि इमारतों का संरक्षण कैसे करते हैं, हमारा मकसद है इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में और यहां के लोगों की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में मदद करना.”

उन्होंने बताया कि उनकी टीम 1,500 मीटर तक दीवार की मरम्मत कर चुकी है. इस काम में 400 कर्मी लगे हुए हैं. ऐसे में तालिबान से खतरा भी बढ़ जाता है क्योंकि आत्मघाती हमलावर ऐसे ही ठिकाने ढूंढते हैं, जहां भीड़ भाड़ हो. लेकिन ले को इस बात की भी चिंता नहीं है. इसकी वजह यह है कि गजनी में रहने वालों ने तालिबान का सामना करने के लिए खुद ही नागरिकों की सेना तैनात कर रखी है.

गजनी की मुश्किलें

बाहर से आने वालों के लिए गजनी पहुंचना आसान नहीं. पत्रकार आरिफ का कहना है, “मैं फिलहाल गजनी नहीं जा सकता. कोई भी विदेशी मीडिया के साथ या विदेशियों के साथ मिल कर काम कर रहा है, तालिबान ने उन सब की जान लेने की धमकी दी हुई है.”

यही वजह है कि प्राइवेट रेडियो चलाने वाले वहीदुल्लाह उमरयार स्काइप के जरिए दुनिया से संपर्क कर रहे हैं. अपनी खुशी जाहिर करते हुए वह कहते हैं, “जब गजनी को सांस्कृतिक राजधानी चुना गया तो हम सब को बेहद खुशी हुई. अब इस शहर के इतिहास को फिर से जीवित किया जा रहा है और दुनिया हमें भूल नहीं सकेगी.” लेकिन वह साथ ही यह भी बताते हैं कि गजनी के लिए यहां तक पहुंचना एक बेहद ही मुश्किल काम रहा है और शहर के लिए चल रहे 30 प्रोजेक्ट्स में से कुछ ही पूरे हो पाए हैं.

अफगान मीडिया में तो ऐसी अटकलें भी लग रही हैं कि गजनी में जश्न शुरू होने से पहले ही उससे यह खिताब छिन जाएगा. उमरयार बताते हैं कि अमेरिका की ओर से करीब डेढ़ करोड़ डॉलर भेजे जा चुके हैं, “मैं नहीं जानता कि इस पैसे को कहां लगाया गया है. अब तक कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है. यहां तक कि गजनी में हवाई अड्डा तक नहीं है. फिर पर्यटक आएंगे कैसे?”

खराब ढांचा

गजनी की आबादी एक लाख चालीस हजार है. लोगों को बेहतर बिजली का वादा किया गया था. यह भी योजना थी कि 150 किलोमीटर तक बेहतरीन सड़कें बनाई जाएंगी. अब तक 50 किलोमीटर ही बन सकी हैं. ऐसे में शहर को उम्मीद नहीं है कि आर्थिक तौर पर इस खिताब से कोई फायदा मिल सकेगा. आरिफ कहते हैं, “खानापूर्ती के लिए कुछ प्रतिनिधिमंडल आ जाएंगे. उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस और सेना तैनात रहेगी और फिर एक दो दिन बाद चले जाएंगे.”

इसे देखते हुए जानकारों की मांग है कि गजनी को चित्रों, फिल्मों और प्रदर्शनियों के माध्यम से दुनिया के सामने पहुंचाया जाए. यानी जहां लोग नहीं पहुंच सकते, वहां शहर खुद ही लोगों तक पहुंच जाए. शायद ऐसा कर 2000 साल बाद महमूद गजनवी का शहर दुनिया के आगे अपनी पहचान बना पाएगा.

रिपोर्ट: मार्टिन गेर्नेर/एसएम, आईबी

संपादन: ए जमाल

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SULTAN MAHMUD OF GHAZNI

30 अप्रैल 1030 ईस्वी मानी आज से 990 साल पहले बुतशिकन महमूद ग़ज़नवी की वफ़ात हुई थी। बुतशिकन महमूद ग़ज़नवी की उम्र लगभग 59 साल थी। महमूद ग़ज़नवी ने लगभग 32 साल हुक़ूमत की।

महमूद ग़ज़नवी का जन्म अफ़ग़ानिस्तान के ग़ज़ना नगर में हुआ था। आप के वालिद का नाम सुबुक्तिगिन था। महमूद ग़ज़नवी ने मग़रिबी और शिमाल-मग़रिबी हिंद पर भी हुक़ूमत की है।

हम से पहले था अजब तेरे जहां का मंज़र
कहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं माबूद शजर

महमूद ग़ज़नवी एक ऐसा नाम है जिस से कोई हिंदी ही नावाक़िफ़ होगा। हिंदी मुअर्रिख़ों ने महमूद ग़ज़नवी के क़िरदार को दाग़दार किया और आज भी वही छवि तमाम के दिल-ओ-दिमाग़ में छपी हुई है।

क़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहां पर मरती
बुत-फ़रोशी के एवज़ बुत-शिकनी क्यूं करती

बहरहाल जो छवि हुनूद ने बनाई है उस से हटकर कुछ बातें बताना चाहूंगा। महमूद ग़ज़नवी पहला आज़ाद हुक़्मरां था जिसे ‘सुल्तान’ का लक़ब मिला। बुतशिकन सुल्तान महमूद ग़ज़नवी को यामीन उद्-दौला अबुल क़ासिम महमूद बिन सुबुक्तिगिन के नाम से भी जानते है।

एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अयाज़
न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़

लहद-ए-बुतशिकन : एक वाक़िया जो मैं ने मौलाना तारिक़ जमील की जबानी सुना था वो आप के सामने रखना चाहूंगा:

सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की वफ़ात 1030 ईस्वी में हुई थी जैसा कि मैं ने शुरुआत ही में लिखा भी है। 1974 ईस्वी में ग़ज़ना में ज़लज़ला आया तो बाइस-ए-ज़लज़ला महमूद ग़ज़नवी का मज़ार फट गया। हुक़ूमत ने जब मज़ार को दोबारा बनवाना चाहा और क़ब्र को खोदा तो अंदर महमूद ग़ज़नवी के ज़िस्म को सही-सलामत पाया। 900 सालों से ज़्यादा महमूद ग़ज़नवी के ज़िस्म को दफ़्न किए हो गए थे उसका हाथ सीने पर था ‘जब उठाया तो बिल्कुल मुलायम।

यह शान है बुत शिकन सुल्तान महमूद ग़ज़नवी रहमतुल्लाह अलैहि की।

क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात में
बैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात

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महमूद गजनवी से संबंधित परीक्षा उपयोगी प्रश्न उत्तर

प्रश्न : गजनवी वंश का संस्थापक कौन था?
उत्तर : अलप्तगीन

प्रश्न : महमूद गजनवी कौन था?
उत्तर : सुबुक्तगीन की मृत्यु 997 ई. में हुई। सुबुक्तगीन ने अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र इस्लाम को घोषित किया था, किन्तु उसके एक अन्य पुत्र महमूद ने इस्लाम को परास्त कर गजनी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न : महमूद गजनवी किस वंश का था?
उत्तर : गजनवी वंश

प्रश्न : महमूद गजनवी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर : महमूद गजनवी का जन्म 1 नवंबर, 971 ई. को हुआ था वह 998 ई. में गजनी के राजसिंहासन पर आसीन हुआ था।

प्रश्न : महमूद गजनवी भारत कब आया?
उत्तर : 1000 ई. में

प्रश्न : महमूद गजनवी का सेनापति कौन था?
उत्तर : मलिक अयाज़ सुल्तान

प्रश्न : महमूद गजनवी का दरबारी कवि कौन था?
उत्तर : फिरदौसी

प्रश्न : महमूद गजनवी ने भारत पर कितनी बार आक्रमण किया था?
उत्तर : महमूद गजनवी ने 1000 ई. से 1027 ई. के मध्य भारत पर 17 बार आक्रमण किया।

प्रश्न : महमूद गजनवी का प्रथम आक्रमण कब हुआ?
उत्तर : 1000 ई. में

प्रश्न : महमूद गजनवी ने भारत पर पहला आक्रमण कब किया?
उत्तर : 1000 ई. में, जिसमें उसने कुछ सीमांत किलों पर अपना अधिकार कर लिया था। जयपाल ने अपनी मुक्ति के लिए बहुत धन दिया, किन्तु अपने इस अपमान को वह सहन नहीं कर सका और आत्मदाह कर लिया।

प्रश्न : महमूद गजनवी का अंतिम आक्रमण कब हुआ?
उत्तर : 1027 ई. में महमूद गजनवी द्वारा जाटों व खोखरों को पराजित किया गया। वह महमूद का भारत पर अंतिम आक्रमण था।

प्रश्न : सुल्तान महमूद का भारत पर 16 बार आक्रमण करने का प्रमुख कारण क्या था?
उत्तर : भारत से अकूत धन संपत्ति लूटना

प्रश्न : महमूद गजनवी का सोमनाथ पर आक्रमण कब हुआ?
उत्तर : 1025 ई.

प्रश्न : महमूद गजनवी की उपाधि क्या थी?
उत्तर : महमूद गजनवी को ‘यमीन-उद-दौला’ तथा ‘यमीन-उल-उल्लाह’ की उपाधियां दी गई तथा उसके वंश को ‘यमीनी-वंश’ कहा गया।

प्रश्न : महमूद गजनवी के पिता का नाम क्या था?
उत्तर : सुबुक्तगीन

प्रश्न : महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण करने का क्या उद्देश्य था?
उत्तर : भारत से अकूत धन संपत्ति लूटना

प्रश्न : महमूद गजनवी के आक्रमण के समय गुजरात के राजा कौन थे?
उत्तर : भीमसेन प्रथम

प्रश्न : महमूद गजनवी को किसने मारा था?
उत्तर : असाध्य रोगों से पीड़ित होकर

प्रश्न : महमूद गजनवी की मृत्यु कब हुई थी?
उत्तर : 30 अप्रैल, 1030 ई. में

प्रश्न : महमूद गजनवी की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर : मलेरिया के कारण

भारत पर महमूद गजनवी के प्रमुख आक्रमण

1001 ई. : जयपाल (हिंदूशाही वंश) (पश्चिमोत्तर पाकिस्तान तथा पूर्वी अफगानिस्तान) – जयपाल पराजित होकर बंदी बना। शाही राजधानी वैहिंद/उद्भांडपुरम ध्वस्त कर दी गई। धन तथा हाथी देकर जयपाल मुक्त हुआ। अपमानित होकर जयपाल ने आत्महत्या कर ली।

1004 ई. : फतह दाऊद (मुल्तान) – मुल्तान पर अधिकार कर लिया गया। शासक करमाथी जाति का था और शिया ग्रंथ मानता था। दाऊद को हटाकर, जयपाल के पौत्र और आनंदपाल के पुत्र सुखपाल को गद्दी दी। सुखपाल मुसलमान बना (नौशाशाह), परन्तु पुनः हिंदू बना। अतः महमूद ने इसे हटाकर बंदी बनाया।

1008 ई. : आनंदपाल (हिंदूशाही वंश) – हिंदूशाहियों ने नंदना को अपनी नई राजधानी बनाया था, जो सॉल्टरेंज में स्थित थी। महमूद ने नंदना को नष्ट किया तथा आनंदपाल ने समर्पण किया।

1009 ई. : नगरकोट (काँगड़ा) – पहाड़ी राज्य काँगड़ा के नगरकोट पर आक्रमण। कोई लड़ने नहीं आया तथा अपार धन लूट के रूप में प्राप्त हुआ।

1015 ई. : कश्मीर – लोहार वंश की शासिका, रानी दिदा से महमूद पराजित हुआ (संभवतः प्रतिकूल मौसम के कारण)। यह भारत में महमूद की प्रथम पराजय थी।

1015 ई. : मथुरा और वृंदावन – क्षेत्रीय कल्चुरि शासक कोक्कल द्वितीय पराजित हुआ। महमूद ने हिंदू तीर्थ स्थलों में भारी लूटपाट व तोड़फोड़ की और मथुरा तथा वृंदावन को पूर्णत: विध्वंस कर दिया गया।

1015 ई. : कन्नौज – प्रतिहार शासक राज्यपाल बिना युद्ध किए ही भाग गया। राज्यपाल को दंडित करने हेतु कालिंजर के शक्तिशाली चंदेल शासक विद्याधर ने शासकों का एक संघ बनाया तथा कन्नौज की गद्दी पर त्रिलोचनपाल को बैठाया।

1019 ई. : बुंदेलखंड – बुंदेलखंड (राजधानी कालिंजर) के चंदेल शासक विद्याधर ने एक विशाल सेना जुटाई। महमूद सेना देखकर विचलित हो गया और कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ।

1025 ई. : सोमनाथ – काठियावाड़ का शासक भीमदेव बिना युद्ध किए ही भाग गया। पवित्र शिव मंदिर नष्ट करके भयंकर कत्लेआम मचाया गया और अपार सामग्री लूट में प्राप्त की। कुछ विद्वानों का मानना है कि महमूद ने 1027 ई. में जाटों के विरुद्ध आक्रमण किया, जो उसका भारत पर अंतिम आक्रमण था।

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महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया था, जिन पर महमूद गजनवी ने आक्रमण किया था उनका नाम निम्नलिखित रुप से दिया गया है।

(1) सीमांत नगरों पर आक्रमण
(2) जयपाल पर आक्रमण
(3) भेरा पर आक्रमण
(4) मुल्तान पर आक्रमण
(5) सेवक पाल पर आक्रमण
(6) राजा आनंदपाल पर आक्रमण
(7) नगरकोट पर आक्रमण
(8) मुल्तान पर आक्रमण
(9) थानेश्वर पर आक्रमण
(10) लाहौर पर आक्रमण
(11) काश्मीर पर आक्रमण
(12) मध्य प्रदेश पर आक्रमण
(13) कालिंजर पर आक्रमण
(14) पंजाब पर आक्रमण
(15) ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण
(16) सोमनाथ पर आक्रमण
(17) सिंध के जाटों पर आक्रमण

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Mehmood Ghaznavi Masjid

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सोमनाथ मंदिर पर मुहम्मद गजनवी के आक्रमण

भीमदेव प्रथम गुजरात के महाराजा थें, ज़ब मेहमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ गुजरात पर आक्रमण किया, ये समय था 1025. वास्तव में उस समय पाटन गुजरात के राजा थे चामुंडराय. भीमदेव इनके पोते थे और चामुंडराय अपना राजपाट छोड़ गए थे उनके दूसरे बेटे दुर्लभराय ग़ज़नवी से सहायता लेकर राजा बनने कि कोशिश कर रहे थे. इस प्रकार कुछ अव्यवस्था थी उस समय गुजरात में. लेकिन भीमदेव ग़ज़नवी के प्रतिद्विंदी जरूर थे.

महाराजा भीमदेव के बाद गुजरात के राजा बने उनके पुत्र कर्णदेव और उनके बाद सिद्धदेव जयसिंगराज जो कि प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट थें. फिर कुमारपाल जेन राजा बना पाटन का जो कि भीमदेव कि दूसरी पत्नी चोला देवी का प्रपोत्र था और जैसिंहदेव के समय में छिपकर रहा.जेसिंहदेव का कोई उत्तराधिकारी ण था. ग़ज़नवी से सामना करने वालों में गुजरात क्षेत्र के राजा महाराजा शामिल थें जिनमे भरुच के महाराज, भी सोमनाथ कि रक्षा हेतु आये थें. गुजरात के मजरज चामुंडराय अपनी राजधानी छोड़ कहि छिप गए थें. उनके दूसरे बेटे दुर्लभराय भी कहि जंगलों में भग गए थें. बस भीमदेव प्रथम ने ही अपनी सेना सहित मेहमूद का सामना किया इनको समर्थन करने वाले आस पास के बहुत से राजा सोमनाथ आकर लड़े और मारे गए.

अलबेरुनी ने इसके अभियानों कि जानकारी अपनी किताब में दी हैं. आचार्य चतुरसेन ने भी सोमनाथ नाम का एक उपन्यास लिखा हैं जिसमे इसकी लूट का विवरण दिया हैं. इसको मुर्ति भंजक की संज्ञा दी गया हैं

महमूद ग़ज़नवी के सोमनाथ मंदिर को तोड़ने, लूटने, गिराने की अनेक फ़र्ज़ी कहानियां भरी पड़ी हैं, तथ्यों से दूर ऐसे किस्से गढ़े गए हैं जिससे एक समुदाय के विरुद्ध नफ़रत पैदा की जा सके, इतिहासकारों और तथ्यों के अनुसार महमूद ग़ज़नवी जिस समय कश्मीर में था उस समय एक नौजवान महमूद के पास आया और उसने महमूद ग़ज़नवी से मदद मांगी कि वो उसके साथ गुजरात चले, जहाँ सोमनाथ के मंदिर में उसकी बहन को बंधक बना कर रख गया है, उस नौजवान ने महमूद ग़ज़नवी को बताया कि जैसे ही कोई लड़की जवान हो जाती है तो उसे मंदिर के प्रोहित अपनी सेवा के लिए मांग लेते हैं और अगर कोई इंकार करता है तो उस लड़की को जबरन प्रोहित उठवा लेते हैं या अगवा करवा लेते हैं

नौजवान की बातों पर महमूद ग़ज़नवी को यक़ीन नहीं हो रहा था, तब महमूद ग़ज़नवी ने उससे कहा कि अगर तुम्हारी बात झूठ साबित हुई तो तुम्हारा सर काट दिया जायेगा, नौजवान ने ये शर्त मान ली, नौजवान का आत्मविश्वास देख कर महमूद ग़ज़नवी ने गुजरात कूच का हुकुम दिया

महमूद ग़ज़नवी के गुजरात पहुँचने की ख़बर जैसे ही वहां के लोगों को हुई लाखों की संख्या में लोग रास्ते में रास्ता रोकने के लिए आ गए लेकिन महमूद ग़ज़नवी की सेना के हमलों के आगे वो टिक नहीं पाए, जब महमूद ग़ज़नवी की सेना मंदिर की तरह बढ़ रही थी तब वहां हज़ारों लोग पूजा पाठ कर रहे थे, उन्हें जब बताया जाता कि अब महमूद की सेना ‘उक्त’ स्थान तक आ पहुंची है तो जवाब में पुजारी लोग कहते आने दो सोमनाथ तक आने से पहले सब भस्म हो जायेंगे, यहाँ तक कोई नहीं आ सकता, लोगों को पुजारियों की बातों में सच मालूम पड़ता था और उन्हें भरोसा था कि ये भगवान् की धरती है, भगवान् का घर है यहाँ पर कोई हमला कैसे हो सकता है, इस तरह बिना किसी लड़ाई अथवा विरोध के महमूद ग़ज़नवी की सेना सोमनाथ मंदिर के मुख्य दुवार तक जा पहुंची, सेना के पहुँचते ही पुजारी और आम जनता वहां से भाग खड़ी हुई

महमूद ग़ज़नवी जब मंदिर के अंदर पहुंचा तो वो हैरान रह गया, मदिर के अंदर एक बहुत बड़े हाल के बीचों बीच नटराज की एक मूर्ति हवा में लटकी हुई थी, मूर्ति को इस तरह लटका देख कर महमूद ग़ज़नवी ने अपनी सेना के जानकारों से इसका राज़ जाना, जानकारों की समझ में शुरू में कुछ नहीं आया, बहुत सोच विचार के बाद कुछ लोगों ने महमूद ग़ज़नवी से मंदिर की एक दीवार तोड़ने का आज्ञा मांगी, आज्ञा मिलने के बाद एक दीवार को जैसे ही तोडा गया ‘हवा’ में लटकी मूर्ति दूसरी दीवार से जा चुपकी, दीवार तोड़ने पर मालूम हुआ कि बहुत ही कारीगरी से मंदिर की दीवारों, नीचे व् ऊपर ”चुम्बक” लगाए गए थे और जहाँ चुम्बकों का ”नार्मल” पॉइंट था उस जगह पर मूर्ति को हवा में लटका दिया गया था

इसके बाद मंदिर के नीचे बने तैखानों की तलाशी ली गयी जिनमे सैंकड़ों जवान, सुन्दर लड़कियों को बंधक बना कर रखा गया था, इनमे एक लड़की उस नौजवान की बहन भी थी

इन तैखानों में जो दौलत जमा कर रखी गयी थी वो इतनी अधिक थी कि उसे लादने के लिए महमूद ग़ज़नवी के पास घोड़े और ख़च्चर कम पड़ गए थे, इतिहासकार लिखते हैं कि तक़रीबन 160 खच्चरों पर सोना व अन्य कीमती चीज़ों को लादा गया था

सोमनाथ मंदिर को महमूद ग़ज़नवी ने हिन्दू विरोधी या मुस्लिम राजा होने के कारण नहीं गिराया था बल्कि उसके गिराने की वजह ये कहानी थी तो बतायी गयी है

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Historical buildings, Ex-Emperor Sultan Mahmood Ghaznavi & other prominent people’s tombs & Muj in anceint city of Ghazni Province.

Amrc-id
SA_R1_BF_E174

Cameraman
Ahamd Masoud.

Dari-title
مرقد سلطان محمود غزنوی.

Dari-title-romanized
Marqadi Sulṭān Maḥmūd-‘i Ghaznavī.

Identifier
amrc_198808_cna_00174_030

Location
Afghanistan, Ghazni Province, old city.

Medium
35mm color negative

Pashto-title
د سلطان محمود غزنوی مقبره.

Da Sulṭān Maḥmūd-‘i Ghaznawī maqbarah.

Hizb-‘i Islami, Hekmatyar

Internet Archive Python library 1.7.4

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