इतिहास

भारत का इतिहास : मध्यकालीन भारत- 500 ई–1761 ई : सूफ़ी आन्दोलन : शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी से शेख़ अहमद सरहिन्दी तक : पार्ट 42

सूफ़ी आन्दोलन

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मध्य काल के दौरान दो परस्पर विरोधी आस्थाओं एवं विश्वासों के ख़िलाफ़ सुधार अति आवश्यक हो गया था। इस समय समाज में ऐसे सुधार की सख्त आवश्यकता थी, जिसके द्वारा हिन्दू धर्म के कर्मकाण्ड एवं इस्लाम धर्म में कट्टर पंथियों के प्रभाव को कम किया जा सके। दसवीं शताब्दी के बाद इन परम्परागत रूढ़िवादी प्रवृतियों पर अंकुश लगाने के लिए इस्लाम एवं हिन्दू धर्म में दो महत्त्वपूर्ण रहस्यवादी आन्दोलनों-सूफ़ी आन्दोलन एवं भक्ति आन्दोलन का शुभारंभ हुआ। इन आन्दोलनों ने व्यापक आध्यात्मिकता एवं अद्वैतवाद पर बल दिया, साथ ही निरर्थक कर्मकाण्ड, आडम्बर एवं कट्टरपंथ के स्थान पर प्रेम, उदारतावाद एवं गहन भक्ति को अपना आदर्श बनाया।

सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति

अबू नस्र अल सिराज की पुस्तक ‘किताब-उल-लुमा’ में किये गये उल्लेख के आधार पर माना जाता है कि, सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द ‘सूफ़’ (ऊन) से हुई, जो एक प्रकार से ऊनी वस्त्र का सूचक है, जिसे प्रारम्भिक सूफ़ी लोग पहना करते थे। ‘सफ़ा’ से भी उत्पत्ति मानी जाती है। सफ़ा का अर्थ ‘पवित्रता’ या ‘विशुद्धता’ से है। इस प्रकार आचार-व्यवहार से पवित्र लोग सूफ़ी कहे जाते थे। एक अन्य मत के अनुसार- हजरत मुहम्मद साहब द्वारा मदीना में निर्मित मस्जिद के बाहर सफ़ा अर्थात् ‘मक्का की पहाड़ी’ पर कुछ लोगों ने शरण लेकर अपने को खुदा की अराधना में लीन कर लिया, इसलिए वे सूफ़ी कहलाये। सूफ़ी चिन्तक इस्लाम का अनुसरण करते थे, परन्तु वे कर्मकाण्ड का विरोध करते थे। इनके प्रादुर्भाव का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह भी था कि, उस समय (सल्तनत काल) उलेमा (धर्मवेत्ता) वर्ग में लोगों के कट्टरपंथी दृष्टिकोण की प्रधानता थी। सल्तनत कालीन सुल्तान सुन्नी मुसलमान होने के कारण सुन्नी धर्मवेत्ताओं के आदेशों का पालन करते थे और साथ ही शिया सम्प्रदाय के लोगों को महत्व नहीं देते थे। सूफ़ियों ने इनकी प्रधानता को चुनौती दी तथा उलेमाओं के महत्व को नकारा।

विभिन्न सम्प्रदाय तथा उनके संस्थापक सम्प्रदाय के संस्थापक

– चिश्ती सम्प्रदाय ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (12 वीं शताब्दी)
– सुहरावर्दी सम्प्रदाय शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (12वीं शताब्दी)
– कादिरी सम्प्रदाय शेख़ अब्दुल कादिर जिलानी (16वीं शताब्दी)
– शत्तारी सम्प्रदाय शाह अब्दुल शत्तारी (15वीं शताब्दी)
– फ़िरदौसी सम्प्रदाय बदरूद्दीन
– नक़्शबन्दी सम्प्रदाय ख़्वाजा बाकी विल्लाह (16वीं शताब्दी)

प्रारम्भिक सूफ़ियों में ‘रबिया’ (8वीं सदी) एवं ‘मंसूर हल्लाज’ (10 वीं सदी) का नाम महत्त्वपूर्ण है। मंसूर हल्लाज ऐसे पहले सूफ़ी साधक थे, जो स्वयं को ‘अनलहक’ घोषित कर सूफ़ी विचारधारा के प्रतीक बने। सूफ़ी संसार में सबसे पहले इब्नुल अरबी द्वारा दिये गये सिद्धान्त ‘वहदत-उल-वुजूद’ का उलेमाओं ने जमकर विरोध किया। वहदत-उल-वुजूद का अर्थ है – ईश्वर एक है और वह संसार की सभी वस्तुओं का निमित्त है। इस प्रकार वहदत-उल-वुजूद एकेश्वरवाद का समनार्थी है। उलेमा वर्ग के लोगों ने ब्रह्मा तथा जीव के मध्य मालिक एवं ग़ुलाम के रिश्ते ही कल्पना की, दूसरी ओर सूफ़ियों ने ईश्वर को अदृश्य, सम्पूर्ण वास्तविकता और शाश्वत सौंदर्य के रूप में माना। सूफ़ी सन्त ईश्वर को ‘प्रियतमा’ एवं स्वयं को ‘प्रियतम’ मानते थे। उनका विश्वास था कि, ईश्वर की प्राप्ति प्रेम-संगीत से की जा सकती है। अतः सूफ़ियों ने सौन्दर्य एवं संगीत को अधिक महत्व दिया। सूफ़ी गुरु को अधिक महत्व देते थे, क्योंकि वे गुरु को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग का पथ प्रदर्शक मानते थे। सूफ़ी सन्त भौतिक एवं भोग विलास से युक्त जीवन से दूर सरल, सादे, संयमपूर्ण जीवन में आस्था रखते थे। प्रारम्भ में सूफ़ी आन्दोलन खुरासान प्रांत के आस-पास विशेषकर बल्ख शहर एवं इराक तथा मिस्र में केन्द्रित रहा। भारत में इस आन्दोलनों का आरम्भ दिल्ली सल्तनत से पूर्व ही हो चुका था।

सूफ़ी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार

ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी में लाहौर एवं मुल्तान में कई सूफ़ी संतों का जमघट हुआ। मुस्लिम स्रोत के आधार पर क़रीब 125 सूफ़ी धर्म संघों के अस्तित्व की बात कही जाती है। अबुल फ़ज़ल ने आइना-ए-अकबरी में क़रीब 14 सूफ़ी सिलसिलों के बारे में उल्लेख किया है। इनमें से केवल दो सिलसिलों का ही गहरा प्रभाव भारतीय जन-जीवन पर पड़ा। वे लोग जो सूफ़ी संतों से शिष्यता ग्रहण करते थे, उन्हें ‘मुरीद’ कहा जाता था। सूफ़ी जिन आश्रमों में निवास करते थे, उन्हें ‘खनकाह’ व ‘मठ’ कहा जाता था। एक सूफ़ी को परमपद प्राप्त करने से पूर्व दस अवस्थाओं – ‘तौबा’ (पश्चाताप), ‘बजा’ (संयम), ‘तबाकुल’ (प्रतिज्ञा), ‘जुहद’ (भक्ति), ‘फग्र’ (निर्धनता), ‘सब्र’ (संतोष), ‘रिजा’ (आत्म समर्पण), ‘शुक्र’ (आभार), ‘ख़ौफ़’ (डर), ‘रजा’ (उम्मीद) आदि से गुज़रना पड़ता था। सूफ़ी सन्तों ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार जन साधारण की भाषा में किया। इनके प्रयत्नों से हिन्दी, उर्दू के साथ अन्य प्रान्तीय भाषाओं का भी विकास हुआ। सूफ़ियों के धर्मसंघ ‘बा-शरा’ (इस्लामी सिद्धान्त के समर्थक), और ‘बे-शरा’ (इस्लामी सिद्धान्त से बंधे नहीं) में विभाजित थे। भारत में दोनो मत के लोग थे। भारत में चिश्ती एवं सुहरावर्दी सिलसिले की जड़े काफ़ी गहरी थीं।

चिश्ती एवं सन्त : सूफ़ी सन्त एवं उनकी उपाधियाँ

– शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया महबूबे इलाही
– शेख़ नासिरुद्दीन महमूद चिराग-ए-दिल्ली
– सैय्यद मुहम्मद गेसूदराज बन्दा नवाज
– शेख़ अहमद सरहिन्दी मुजदिह आलिफसानी

12वीं शताब्दी में अनेक सूफ़ी सन्त भारत आये। ‘चिश्ती धर्म संघ’ की स्थापना ख़्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्त (874-965 ई.) ने हेरात में की थी। 1192 ई. में मुहम्मद ग़ोरी के साथ ‘ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती’ भारत आये। उन्होंने यहाँ ‘चिश्तिया परम्परा’ की स्थापना की। उनकी गतिविधियों का मुख्य केन्द्र अजमेर था। इन्हें ‘गरी-ए-नवाज’ कहा जाता है। साथ ही अन्य केन्द्र नारनौल, हांसी, सरबर, बदायूँ तथा नागौर थे। कुछ अन्य सूफ़ी सन्तों में ‘बाबा फ़रीद, ‘बख्तियार काकी’ एवं ‘शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब’ थे। इन्हें भी देखें: चिश्ती सम्प्रदाय

हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल

निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य अमीर ख़ुसरो थे। अमीर ख़ुसरो ने औलिया की मृत्यु का समाचार सुनने के दूसरे दिन ही प्राण त्याग दिये थे। शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया ने अमीर ख़ुसरो को “तर्कुल्लाह” कहकर संबोधित किया था। औलिया ने योग की प्राणायाम पद्धति को इस हद तक अपनाया कि, उन्हें “योगी सिद्ध” कहा जाने लगा। ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया को संगीत से विशेष लगाव था। बंगाल में चिश्तिया मत का प्रचार शेख़ सिराजुद्दीन उस्मानी ने किया। इन्हे ‘आख़िरी सिराज’ कहा गया। शेख़ बुराहानुद्दीन ग़रीब ने 1340 ई. में दक्षिणी भारत के क्षेत्रों में चिश्ती सम्प्रदाय की शुरुआत की और दौलताबाद को अपना मुख्य केन्द्र बनाया। चिश्तियों ने हिन्दू-मुस्लिम के मध्य किसी भी प्रकार के भेदभाव का कड़ा विरोध किया। उन्हो^ने संयमपूर्ण, साधारण जीवन व्यतीत करते हुए लोगों से उन्हीं की भाषा में विचार-विनिमय किया। इस सम्प्रदाय के सूफ़ी सन्त हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों समुदायों में समान भाव से पूजनीय थे। बुरहानपुर के एक प्रमुख सूफ़ीं संत ‘सैय्यद मुहम्मद गेसूदराज’ को ‘बन्दा नवाज’ कहा जाता है।

सुहारवर्दी सम्प्रदाय

इस संघ को ‘सिलसिला’ भी कहा जाता है। इसकी स्थापना शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने की, किन्तु 1262 ई. में इसके सुदृढ़ संचालन का श्रेय शेख़ बदरुद्दीन जकारिया को है, जिन्होंने मुल्तान में एक शानदार मठ की स्थापना की तथा सिंध एवं मुल्तान को मुख्य केन्द्र बनाया। शेख़ बहाउद्दीन जकारिया के बाबा फ़रीद गंज-ए-शकर से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। इस सम्प्रदाय के अन्य प्रमुख संत थे- जलालुद्दीन तबरीजी, सैय्यद सुर्ख जोश, बुरहान आदि। सिंध, गुजरात, बंगाल, हैदराबाद एवं बीजापुर के क्षेत्रों में इस सिलसिले का प्रचार-प्रसार हुआ।

कादिरी सम्प्रदाय

इस सम्प्रदाय की स्थापना सैय्यद अबुल कादि अल गिलानी ने की थी। इनको ‘पीरान-ए-पीर’ (संतो के प्रधान) तथा ‘पीर-ए-दस्तगीर’ (मददगार संत) आदि की उपाधियाँ प्राप्त थीं। भारत में इस संघ या सिलसिले के प्रवर्तक मुहम्मद गौस थे। कादिरी सिलसिले के अनुयायी गाने-बजाने के विरोधी थे। वे हरे रंग की पगड़ियाँ पहनते थे।

नक़्शबन्दी सम्प्रदाय

इसकी स्थापना ख्वाजा उबेदुल्ला ने की। भारत में इस सिलसिले का प्रचार ‘ख्वाजा बाकी विल्लाह’ के शिष्य एवं अकबर के समकालीन ‘शेख़ अहमद सरहिन्दी’ ने किया। शेख़ अहमद सरहिन्दी ‘मुजाहिद’ अर्थात् इस्लाम के नवजीवनदाता या सुधारक के रूप में प्रसिद्ध थे। ख्वाजा मीर दर्द नक्शबंदी सम्प्रदाय के अन्तिम विख्यात सन्त थे। उन्होंने एक अलग मत ‘इल्मे इलाही मुहम्मदी’ चलाया। इससे सम्बन्धित तरह-तरह के नक्शे बनाकर उसमें रंग भरते थे। औरंगज़ेब, शेख़ अहमद सरहिन्दी के पुत्र शेख़ मासूम का शिष्य था।

फ़िरदौसी सिलसिला

इस सिलसिले के संस्थापक मध्य एशिया के सैफुद्दीन बखरजी थे। यह सिलसला सुहरावर्दी सिलसिले की ही एक शाखा थी। इस सिलसिले का भारत में कार्य क्षेत्र बिहार में था। बदरुद्दीन समरंगजी, अहमद याहया मनैरी आदि इस सिलसिले के प्रमुख सन्त थे। सूफ़ी सिद्धान्तों एवं पद्धतियों ने हिन्दू दर्शन और भक्ति के विभिन्न तत्वों को आत्मसात किया। सूफ़ियों के मठवासीय संगठनों एवं उनकी कुछ पद्धतियों, जैसे- प्रायश्यित, उपवास एवं प्राणायाम में बौद्ध एवं हिन्दू योगियों का प्रभाव झलकता है।

शेख़ शेख़ अब्दुल क़ादिर, जीलानी

Full Name अल-सय्यद मोहियुद्दीन अबू मुहम्मद अब्दुल क़ादिर अल-जीलानी अल-हसनी वल-हुसैनी
Born 11 rabi ul sani 470 हिजरी] या मार्च 17 ,1078
न्याय-शास्त्र हम्बली
Died 8 रबी अल-अव्वल् 561 हिजरी
≈ जनवरी 12, 1166 ई
Birthplace गीलान्, तबरेस्तान, पर्शिया
समाधी स्थल अब्दुल क़ादिर का मज़ार, बग़दाद, इराक़
Father अबू सालेह मूसा अल-हसनी
माँ उम्मुल खैर फ़ातिमा
• मदीना
• सादिक़ा
• मू’मिना
• महबूबा

पुत्र • सैफ़ुद्दीन
• शरफ़ुद्दीन
• अबू बक्र
• सिराजुद्दीन
• यह्या
• मूसा
• मुहम्मद
• इब्राहीम
• अब्दुल्ला
• अब्दुल वहाब
• अबू नासिर मूसा

• मुहियुद्दीन
(“धर्म की पुनस्थापना करने वाले”)
• अल-ग़ौस अल-आज़म्
• (“मदद करने वाले”)
• सुलतान अल-औलिया
(“संतों के सुल्तान”)
• अल-हसनी अल-हुसैनी
(“इमाम हसन और इमाम हुसैन दोनों के वारिस)

अब्दुल क़ादिर जीलानी (अरबी: عبد القادر الجيلاني‎), (फ़ारसी: عبد القادر گیلانی, तुर्कीयाई : Abdülkâdir Geylânî, उर्दू: عبد القادر گیلانی Abdolqāder Gilāni,(तमिल: அப்துல் காதிர் ஜிலானி ரலியல்லாஹூ அன்ஹூ), बांग्ला: আব্দুল কাদের জিলানী (রহ.))[8] अल-सय्यद मोहियुद्दीन अबू मुहम्मद अब्दुल क़ादिर जीलानी अल-हसनी वल-हुसैनी (जन्म: 11 रबी उस-सानी, 470 हिज्री, नाइफ़ गांव, जीलान जिला, इलम प्रान्त, तबरेस्तान, पर्शिया।

देहांत – इराक़ 8 रबी अल अव्वल, 561 हिज्री शहर बग़दाद, (1077–1166 CE), ईरान से थे। हम्बली न्यायसूत्र परंपरा और सूफ़ी संत।
इनका निवास बगदाद शहर।
इनहोंने क़ादरिया सूफ़ी परंपरा की शुरूआत की।
मुसलमानों द्वारा शेख ‘अब्द अल-क़दीर अल-जिलानी के रूप में लघु या आदरणीय के लिए अल-जिलानी है, एक प्रचारक, वक्ता, तपस्वी, रहस्यवादी, न्यायवादी, और धर्मविज्ञानी थे जो कदिरिया के नामांकित संस्थापक होने के लिए जाने जाते हैं जो सुन्नी सूफीवाद का आध्यात्मिक क्रम था।

शेख जिलानी का उर्स भारतीय उपमहाद्वीप और विदेशों में ग्यारवी शरीफ के रूप में मनाया जाता है।

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सहाब से अपने वंश को इंगित करने के लिए गिलानी को सय्यद का खिताब दिया गया है।. मुहियुद्दीन नाम उन्हें “धर्म के पुनरुत्थान” के रूप में वर्णित करता है। गिलान (अरबी अल-जिलानी) उनके जन्म स्थान, गिलान को संदर्भित करता है। हालांकि, हज़रत गिलानी ने बगदादी का भी उल्लेख किया। बगदाद में उनके निवास और दफन का जिक्र करते हुए। उन्हें अल-हस्नी वल-हुसैन भी कहा जाता है, जो हज़रत अली के पुत्र हज़रत हसन इब्न अली और हज़रत हुसैन इब्न अली दोनों नामों से वंशवादी वंश का दावा करता है।

हज़रत शेख़ जीलानी के पिता सय्यद वंशावली से थे। लोगों द्वारा संत के रूप में सम्मानित किया गया था

शिक्षा

हज़रत शेख जीलानी ने अपने प्रारंभिक जीवन को अपने जन्मस्थान शहर जीलान में बिताया। 1095 में, अठारह साल की उम्र में, वह बगदाद गए। वहां, उन्होंने अबू सईद मुबारक मखज़ुमी और इब्न अकिल के तहत हनबाली कानून का अध्ययन किया। उन्हें अबू मोहम्मद जाफर अल-सरराज द्वारा हदीस पर सबक दिए गए थे।. उनका सूफी आध्यात्मिक प्रशिक्षक अबू-खैर हम्मा इब्न मुस्लिम अल-डब्बा थे। (उनके विभिन्न शिक्षकों और विषयों का एक विस्तृत विवरण नीचे शामिल किया गया है)। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद,हज़रत जीलानी ने बगदाद छोड़ दिया। उन्होंने इराक के रेगिस्तानी क्षेत्रों में एक समावेशी भटकने वाले के रूप में पच्चीस वर्ष बिताए।

बगदाद में शिक्षा

18 साल की उम्र में, हज़रत गिलानी फ़िक़्ह के हनबाली शाखा का अध्ययन करने के लिए बगदाद गए थे।

विषय शैख (शिक्षक)
फिकह (इस्लामी न्यायशास्र) इब्न अकील
फिकह (इस्लामी न्यायशास्र) अबु अल हसन मुहम्मद इब्न काजी अबु याली
फिकह (इस्लामी न्यायशास्र) अबु अल खताब महफूज़ हनबली
फिकह (इस्लामी न्यायशास्र) मुहामद इब्न अल हुसैन
फिकह (इस्लामी न्यायशास्र) अबु सईद मुबारक मखजूम
तसवुफ (सूफीवाद) अबु सईद मुबारक मखजूम, अबु अल-हम्मद इब्न मुस्लिम अल-डब्बास, अब ज़कारिया इब्न याह्या इब्न अल तबरेज़ी
हदीस अबु बकर इब्न मुज़फ्फर
हदीस मुहम्मद इब्न अल बक़लाई अबु सईद, मुहम्मद इब्न अब्दुल करीम
हदीस अबु अल घनेम मुहम्मद इब्न अली मयमूम अल फ़ारसी
हदीस अबु बकर अहमद इब्न अल मुज़फ्फर
हदीस अबु जफ़र इब्न अहम् अल हुसैन अल क़ादरी
हदीस अबु अल क़ासिम अली इब्न मुहम्मद इब्न बनान अल करखी
हदीस अबु तालिब अब्दुल क़ादरी इब्न मुहम्मद युसूफ
हदीस अब्दुल रहमान इब्न अहमद अब अल बरकत हिबताल्लाह इब्न मुबारक
हदीस अबु अल नज़र इब्न अल मुख़्तार
हदीस अबु नज़र मुहम्मद
हदीस अबु ग़ालिब अहमद
हदीस अबु अब्दुल्लाह औलाद अली अल बना
हदीस अबु अल हैं अल मुबारक इब्न अलक तेवरी
हदीस अबु मंसूर अब्दुरहमान अल तक़रार

क़ादिरिया परंपरा की आध्यात्मिक शृंखला

हज़रत मुहम्मद

अमीर अल मोमिनीन अली इब्न अबी तालिब

शेख़ ख़वाजा हसन बसरी

शेख़ हबीब अजमी

शेख़ दाउद ताई

शेख़ मारूफ़ कर्खी

शेख़ सिर्री सक़्ती

शेख़ जुनैद अल-बग़दादी

शेख़ अबू बक्र शिब्ली

शेख़ अज़ीज़ अल तमीमी

शेख़ वाहिद अल तमीमी

शेख़ फ़राह तर्तूसी

शेख़ हसन क़ुरेशी

शेख़ अबू सईद अल मुबार मुकर्रमी

शेख़ सय्यद अब्दुल-क़ादिर जीलानी bade peer saheb

इन के खलीफ़ा

(1) Khwaja शहाब अल-दीन सुहरवर्दी

(2) हज़रत अबू मदयान

(3) शाह अबू उमर क़ुरेशी मज़रूकी

(4) शेख़ क़रीब अल्बान मोसाली

(5) शेख़ अह्मद बिन मुबारक्

(6) शेख़ अबू सईद शिबली

(7) शेख़ अली हद्दाद

मुईनुद्दीन चिश्ती

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पूरा नाम ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह
जन्म 1141
जन्म भूमि सजिस्तान, ईरान
मृत्यु तिथि 1230
मृत्यु स्थान अजमेर, राजस्थान
धार्मिक मान्यता इस्लाम धर्म
प्रसिद्धि सूफ़ी संत
मक़बरा ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती दरगाह, अजमेर
योगदान 12वीं शताब्दी में अजमेर में ‘चिश्तिया सम्प्रदाय’ की स्थापना आपने की थी।

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई. में मदीना से भारत आए थे। इसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन अजमेर (राजस्थान) में ही लोगों के दु:ख-दर्द दूर करते हुए गुजार दिया।

मुईनुद्दीन चिश्ती (पूरा नाम ‘ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह’; जन्म- 1141, ईरान; मृत्यु- 1230, अजमेर, राजस्थान) एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत थे। उन्होंने 12वीं शताब्दी में अजमेर में ‘चिश्तिया’ परंपरा की स्थापना की थी। माना जाता है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई. में मदीना से भारत आए थे। इसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन अजमेर (राजस्थान) में ही लोगों के दु:ख-दर्द दूर करते हुए गुजार दिया। वे हमेशा ईश्वर से यही दुआ किया करते थे कि वह सभी भक्तों का दुख-दर्द उन्हें दे दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे।

जन्म तथा शिक्षा

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती 536 हिजरी (1141 ई.) में ख़ुरासान प्रांत के ‘सन्जर’ नामक गाँव में पैदा हुए थे। ‘सन्जर’ कन्धार से उत्तर की स्थित है। आज भी वह गाँव मौजूद है। कई लोग इसको ‘सजिस्तान’ भी कहते है। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने ही भारत में ‘चिश्ती सम्प्रदाय’ का प्रचार-प्रसार अपने सद्गुरु ख़्वाजा उस्मान हारुनी के दिशा-निर्देशों पर किया किया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने पिता के संरक्षण में हुई। जिस समय ख़्वाजा मुईनुद्दीन मात्र ग्यारह वर्ष के थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया। उत्तराधिकार में इन्हें मात्र एक बाग़ की प्राप्ति हुई थी। इसी की आय से जीवन निर्वाह होता था।

संयोग या दैवयोग से इनके बाग़ में एक बार हज़रत इब्राहिम कंदोजी का शुभ आगमन हुआ। इनकी आवभगत से वह अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने इनके सिर पर अपना पवित्र हाथ फेरा तथा शुभाशीष दी। इसके बाद इनके हृदय में नवचेतना का संचार हुआ। सर्वप्रथम ये एक वृक्ष के नीचे समाधिस्थ हुए, परन्तु राज कर्मचारियों द्वारा यह कहने पर कि यहाँ तो राजा की ऊँटनियाँ बैठती हैं, ये वहाँ से नम्रतापूर्वक उठ गए। राजा के ऊँट-ऊँटनियाँ वहाँ से उठ ही न पाए तो कर्मचारियों ने क्षमा-याचना की। इसके बाद इनका निवास एक तालाब के किनारे पर बना दिया गया, जहाँ पर ख़्वाजा मुईनुद्दीन दिन-रात निरंतर साधना में निमग्र रहते थे। वे अक्सर दुआ माँगते कि “ए अल्लाह त आला/परब्रह्म स्वामी जहाँ कहीं भी दु:ख दर्द और मेहनत हो, वह मुझ नाचीज को फरमा दे।” ख़्वाजा मुईनुद्दीन ने अनेकों हज पैदल ही किए।

भारत आगमन

यह माना जाता है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती सन 1195 ई में मदीना से भारत आए थे। वे ऐसे समय में भारत आए, जब मुहम्मद ग़ोरी की फौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस ग़ज़नी की ओर भाग रही थी। भागती हुई सेना के सिपाहियों ने ख़्वाजा मुईनुद्दीन से कहा कि आप आगे न जाएँ। आगे जाने पर आपके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, चूंकि मुहम्मद ग़ोरी की पराजय हुई है। किंतु ख़्वाजा मुईनुद्दीन नहीं माने। वह कहने लगे- “चूंकि तुम लोग तलवार के सहारे दिल्ली गए थे, इसलिए वापस आ रहे हो। मगर मैं अल्लाह की ओर से मोहब्बत का संदेश लेकर जा रहा हूँ।” थोड़ा समय दिल्ली में रुककर वह अजमेर चले गए और वहीं रहने लगे।

सन्देश

मुईनुद्दीन चिश्ती हमेशा ईश्वर से दुआ करते थे कि वह उनके सभी भक्तों का दुख-दर्द उन्हें दे दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। उन्होंने कभी भी अपने उपदेश किसी किताब में नहीं लिखे और न ही उनके किसी शिष्य ने उन शिक्षाओं को संकलित किया। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने हमेशा राजशाही, लोभ और मोह आदि का विरोध किया। उन्होंने कहा कि- “अपने आचरण को नदी की तरह पावन व पवित्र बनाओ तथा किसी भी तरह से इसे दूषित न होने देना चाहिए। सभी धर्मों को एक-दूसरे का आदर करना चाहिए और धार्मिक सहिष्णुता रखनी चाहिए। ग़रीब पर हमेशा अपनी करुणा दिखानी चाहिए तथा यथा संभव उसकी मदद करनी चाहिए। संसार में ऐसे लोग हमेशा पूजे जाते हैं और मानवता की मिसाल क़ायम करते हैं।”

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जब 89 वर्ष के हुए तो उन्होंने ख़ुद को घर के अंदर बंद कर लिया। जो भी मिलने आता, वह मिलने से इंकार कर देते। नमाज अता करते-करते वह एक दिन अल्लाह को प्यारे हुए, उस स्थान पर उनके चाहने वालों ने उन्हें दफ़ना दिया और क़ब्र बना दी। बाद में उस स्थान पर उनके प्रिय भक्तों ने एक भव्य मक़बरे का निर्माण कराया, जिसे आजकल “ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का मक़बरा” कहा जाता है।

‘ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का मक़बरा’, जिसे ‘अजमेर शरीफ’ के नाम से भी जाना जाता है, के प्रति हर धर्म के लोगों की अटूट श्रद्धा है। इस दरगाह पर हर रोज हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते हैं और मन्नत माँगते हैं। वे मन्नत पूरी होने पर चादर चढ़ाने आते हैं। कहा जाता है कि मुग़ल बादशाह अकबर आगरा से पैदल ही चलकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शनों के लिए आया था। प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मांडू के सुल्तान ग़यासुद्दीन ख़िलजी ने सन 1465 में यहाँ दरगाह और गुम्बद का निर्माण करवाया था। बाद के समय में बादशाह अकबर के शासन काल में भी दरगाह का बहुत विकास हुआ। उसने यहाँ पर मस्जिद, बुलंद दरवाज़ा तथा महफ़िलख़ाने का निर्माण करवाया था।

शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (12वीं शताब्दी)

सुहरावर्दिया सुहरावर्दिया रहस्यवादियों (सूफ़ियों) का एक मुस्लिम ‘सिलसिला’ है, जो अपने आध्यात्मिक अनुशासन की कठोरता के लिए जाना जाता है। इस सम्प्रदाय की स्थापना शेख़ शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने की थी, किन्तु 1262 ई. में इसके सुदृढ़ संचालन का श्रेय शेख़ बदरुद्दीन जकारिया को है, जिन्होंने मुल्तान, सिंध को मुख्य केन्द्र बनाया।

शेख़ बहाउद्दीन जकारिया के बाबा फ़रीद गंज-ए-शकर से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। प्रसार इस सिलसिले की रस्मी प्रार्थनाओं (ज़िक्र) से जुड़े ख़ुदा के सात नाम हज़ारों जपों पर आधारित हैं। ये सात सूक्ष्म आत्माओं (लताइफ़ सबा) और सात रोशनियों से संबद्ध है। मुख्य सिलसिला अफ़ग़ानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप में केन्द्रित हो गया था। इस सिलसिले की अन्य शाखाएँ बाद में पश्चिम की ओर बढ़ीं। ईरान में ‘उमर उल खल्वती’ द्वारा स्थापित परम्परावादी ख़ल्वतिया भी कठोरतापूर्वक अनुशासित था। यह बाद में तुर्की और मिस्र से भी कई शाखाओं में बँट गया और फैला। अरदाबिल, ईरान में सफ़उद्दीन द्वारा संगठित सफ़विया ने ईरानी सफ़वी वंश (1502-1736 ई.) और कई तुर्की शाखाओं को जन्म दिया, जो 16वीं सदी की शुरुआत में ऑटोमन शासकों के विरुद्ध सक्रिय थे। अल्जीरियाई रहमानिया 18वीं सदी के दूसरे भाग में ख़ल्वतिया से विकसित हुआ, जब इसके संस्थापक ‘अब्द अर-रहमान अल-गुश्तुली’ खल्वती श्रद्धा का केन्द्र बन गए। संत परम्परा सुहरावर्दी सम्प्रदाय के अन्य प्रमुख संत थे- जलालुद्दीन तबरीजी, सैय्यद सुर्ख जोश, बुरहान आदि। सिंध, गुजरात, बंगाल, हैदराबाद एवं बीजापुर के क्षेत्रों में इस सिलसिले का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।

शाह अब्दुल शत्तारी (15वीं शताब्दी)

ख़्वाजा फ़रीदुद्दीन अत्तार

सूफ़ी कवी
जन्म c. 1145[1]
निशापुर, पर्शिया (ईरान)
मृत्यु c. 1220 (आयु 74–75)
निशापुर, पर्शिया (ईरान)

प्रभावित -फ़िरदौसी, सनाई, ख्वाजा अब्दुल्ला अन्सारी, मनसूर अल-हज्जाज, Abu-Sa’id Abul-Khayr, बायज़ीद बस्तामी

अबू हामिद बिन अबू बक्र इब्राहीम (फ़ारसी : फ़ारसी : ابو حامد بن ابوبکر ابراهیم) आम तौर पर ख़्वाजा फ़रीदउद्दीन अत्तार (1145-1220) के नाम से जाने जाते हैं। फ़ारस के नेशांपुर नगर के एक विद्वान थे जिनको सूफीवाद के तीन प्रमुख स्तंभों में गिना जाता है। आपने फ़ारसी भाषा का ग्रंथ मसनवी अत्तार लिखा था। प्रसिद्ध फ़ारसी सूफ़ी कवि रूमी वने इनकी तारीफ़ की थी। बारहवीं शताब्दी का फारसी कवि, सूफीवाद का सिद्धांतकार, और निशापुर का हियोग्राफर था, जिसका फारसी कविता और सूफीवाद पर अत्यधिक और स्थायी प्रभाव था। मनकी-उ-इयार (पक्षियों का सम्मेलन) और इलाही-नमा उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक हैं।

जीवनी

अत्तार के जीवन के बारे में जानकारी दुर्लभ और दुर्लभ है। उनका उल्लेख उनके दो समकालीनों, `अफी और तुसी ‘द्वारा किया गया है। हालांकि, सभी स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि वह मध्ययुगीन खोरासन (अब ईरान के उत्तर पूर्व में स्थित) के एक प्रमुख शहर निशापुर से थे, और `अफीफी ‘के अनुसार, वह सेल्जूक काल के कवि थे।

रेइनर्ट के अनुसार: ऐसा लगता है कि वह अपने जीवनकाल में एक कवि के रूप में अपने गृह नगर को छोड़कर, एक रहस्यवादी, कवि के रूप में अपनी महानता और 15 वीं शताब्दी तक कथा के एक गुरु के रूप में प्रसिद्ध नहीं थे। [4] उसी समय, रहस्यवादी फ़ारसी कवि रूमी ने उल्लेख किया है: “अत्तार आत्मा था, सनाई उसकी आँखों में दो बार, और उसके बाद समय में, हम उनकी ट्रेन में आए” और एक अन्य कविता में उल्लेख करते हैं: “अत्तार ने प्यार के सात शहरों को पीछे छोड़ दिया, हम अभी भी एक सड़क के मोड़ पर हैं ”।

अत्तार शायद एक समृद्ध रसायनज्ञ का बेटा था, जो विभिन्न क्षेत्रों में एक उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त कर रहा था। हालांकि उनके काम उनके जीवन के बारे में कुछ और कहते हैं, वे हमें बताते हैं कि उन्होंने फार्मेसी के पेशे का अभ्यास किया और व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी संख्या में ग्राहकों को भाग लिया। उन्होंने फार्मेसी में जिन लोगों की मदद की, वे अपनी परेशानियों को `अत्तार ‘में बताते थे और इससे वे गहरे प्रभावित हुए। आखिरकार, उन्होंने अपने फार्मेसी स्टोर को छोड़ दिया और व्यापक रूप से यात्रा की – बगदाद, बसरा, कूफ़ा, मक्का, मदीना, दमिश्क, ख़्वारिज़्म, तुर्किस्तान, और भारत, सूफी शायख से मिलकर – और सूफी विचारों को बढ़ावा देते हुए वापस लौटे।

सूफी प्रथाओं में अत्तार की दीक्षा बहुत अटकलों के अधीन है। माना जाता है कि सभी प्रसिद्ध सूफी शायकों में उनके शिक्षक थे, केवल एक – मजद उद-दीन बगदादी, नजमुद्दीन कुबरा के शिष्य – संभावना की सीमा के भीतर आता है। इस संबंध में एकमात्र निश्चितता `अत्तर का अपना कथन है कि वह एक बार उनसे मिला था। किसी भी मामले में यह स्वीकार किया जा सकता है कि बचपन से ही उनके पिता द्वारा प्रोत्साहित किया गया `अत्तार, सूफियों और उनकी बातों और जीवन के तरीके में रुचि रखता था, और अपने संतों को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानता था। 10 वर्ष की आयु में, अत्तार नरसंहार में एक हिंसक मौत हो गई, जिसे मंगोलों ने अप्रैल १२२१ में निशापुर में भड़काया था। आज, उनका मकबरा निशापुर में स्थित है। यह 16 वीं शताब्दी में अली-शिर नवावी द्वारा बनाया गया था और बाद में 1940 में रेजा शाह महान के दौरान कुल नवीकरण हुआ।

शिक्षण
ग़ज़नी के सुल्तान महमूद के सामने अयाज़ ने घुटने टेक दिए। वर्ष 1472 में बनाई गई एक लघु चित्रकला का उपयोग निसारपुर के अत्तर द्वारा छः कविताओं को चित्रित करने के लिए किया जाता है।

अत्तार के कार्यों में दर्शाए गए विचार सूफी आंदोलन के संपूर्ण विकास को दर्शाते हैं। प्रारंभिक बिंदु यह विचार है कि शरीर-आत्मा की प्रतीक्षित रिहाई और दूसरी दुनिया में अपने स्रोत पर लौटने का अनुभव वर्तमान जीवन के दौरान रहस्यवादी संघ में आवक शुद्धि के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। अपने विचारों को समझाने में, ‘अत्तर न केवल विशेष रूप से सूफी स्रोतों से सामग्री का उपयोग करता है, बल्कि पुरानी तपस्वी विरासत से भी। यद्यपि उनके नायक सूफी और तपस्वियों के अधिकांश भाग के लिए हैं, वे ऐतिहासिक कालक्रमों, उपाख्यानों के संग्रह, और सभी प्रकार के उच्च-सम्मानित साहित्य की कहानियों का भी परिचय देते हैं। बाहरी दिखावे के पीछे गहरे अर्थों की धारणा के लिए उनकी प्रतिभा उन्हें अपने विचारों के चित्रण में रोजमर्रा की जिंदगी के विवरणों को बदलने में सक्षम बनाती है। `अत्तार की प्रस्तुतियों का आदर्श वाक्य, उन ऐतिहासिक व्यक्तियों के अध्ययन के स्रोतों के रूप में उनके कार्यों को अमान्य करता है, जिनका वे परिचय देते हैं। सूफीवाद की जीवविज्ञान और घटनाओं के स्रोतों के रूप में, हालांकि, उनके कार्यों का अत्यधिक मूल्य है।

अत्तार के लेखन से देखते हुए, उन्होंने उपलब्ध अरिस्टोटेलियन विरासत पर संदेह और नापसंद के साथ संपर्क किया। [वह प्रकृति के रहस्यों को उजागर नहीं करना चाहता था। यह दवा के मामले में विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो फार्मासिस्ट के रूप में अपनी पेशेवर विशेषज्ञता के दायरे में अच्छी तरह से गिर गया। जाहिर तौर पर अदालत के जानकारों के बीच प्रथागत तरीके से अपने विशेषज्ञ ज्ञान को साझा करने का उनका कोई मकसद नहीं था, जिसका प्रकार उन्होंने कभी नहीं छोड़ा था। इस तरह के ज्ञान को केवल संदर्भों में उनके कामों में लाया जाता है जहां एक कहानी का विषय प्राकृतिक विज्ञानों की एक शाखा को छूता है।

कविता

एडवर्ड जी ब्राउन के अनुसार, अत्तार के साथ-साथ रूमी और सनाई , सुन्नी इस तथ्य से स्पष्ट थे कि उनकी कविता पहले दो खलीफ़ाओं अबू बक्र और उमर इब्न अल-खट्टब के लिए प्रशंसा के साथ गाली देती है – जिन्हें शिया रहस्यवाद द्वारा हिरासत में लिया गया है। एनीमेरी शिममेल के अनुसार, शिया लेखकों में रूमी और अत्तार जैसे प्रमुख रहस्यमय कवियों को अपने स्वयं के रैंकों में शामिल करने की प्रवृत्ति, १५०१ में सफ़वीद साम्राज्य में राजकीय धर्म के रूप में ट्वेल्वर शिया की शुरुआत के बाद मजबूत हो गई।

मुख्तार-नमा (مختارنامه) और ख़ुसरो-नमा (خسرونامه) के परिचय में, अत्तार ने अपनी कलम के आगे के उत्पादों के शीर्षक सूचीबद्ध किए:

मंतिक़ अत तैर

दीवान (دیوان)
असर-नामा (اسرارنامه)
मंतिक़ अत तैर (منطق الریر), जिसे मक़ामात अल-तयूर (مقامات الطیور) के नाम से भी जाना जाता है
मुसीबत नामा (مصیبت‌نامه)
इलाही-नामा (الهی‌نامه)
जवाहिर-नामा (جواهرنامه)
शरह अल-क़ल्ब [16] (شرح القلب)

वह यह भी कहता है, मुख्तार-नमा के परिचय में, कि उसने जवाहिर-नमा को नष्ट कर दिया और ‘ अल-अल- क़ालब’ को अपने हाथों से नष्ट कर दिया।

हालांकि समकालीन स्रोत केवल `अत्तार के दीवान और मनकी-उ-एयार के लेखक होने की पुष्टि करते हैं, लेकिन मुख्तार-नमा और खुसर-नमा की प्रामाणिकता और उनके पूर्वजों पर संदेह करने के लिए कोई आधार नहीं हैं। इन सूचियों में से एक काम याद आ रहा है, जिसका नाम है तधकीरत-उल-अवली, जो शायद छोड़ दिया गया था क्योंकि यह एक गद्य कृति है; `अत्तार के लिए इसका श्रेय मुश्किल से सवाल करने के लिए खुला है। इसके परिचय में `अत्तर ने उनके तीन अन्य कार्यों का उल्लेख किया है, जिनमें से एक Šar-अल-क़ालब का हकदार है, संभवतः वही जिसका उन्होंने विनाश किया था। अन्य दो का नाम, जिसका नाम कैफ अल-असर (الشف الاسرار) और Ma Nrifat al- Nafs (معرفت النفس) है, अज्ञात रहता है।

मंतिक़ अत तैर

मंतिक़ अत तैर (पक्षियों का सम्मेलन) खुर के नेतृत्व में दुनिया के पक्षी अपने राजा, सिमरघ की खोज में निकल पड़े। उनकी खोज उन्हें सात घाटियों में ले जाती है, जिसमें सौ मुश्किलें उन्हें पकड़ लेती हैं। वे कई परीक्षणों से गुजरते हैं क्योंकि वे अपने आप को मुक्त करने की कोशिश करते हैं जो उनके लिए अनमोल है और उनकी स्थिति को बदलते हैं। एक बार सफल होने और लालसा से भरे होने के बाद, वे अपने जीवन पर हठधर्मिता, विश्वास और अविश्वास के प्रभाव को कम करने के लिए शराब मांगते हैं। दूसरी घाटी में, पक्षी प्यार का कारण छोड़ देते हैं और बलिदान करने के लिए एक हज़ार दिलों के साथ, सिमरघ की खोज के लिए अपनी खोज जारी रखते हैं। तीसरी घाटी पक्षियों को भ्रमित करती है, खासकर जब उन्हें पता चलता है कि उनका सांसारिक ज्ञान पूरी तरह से बेकार हो गया है और उनकी समझ महत्वाकांक्षी हो गई है। इस घाटी को पार करने के विभिन्न तरीके हैं, और सभी पक्षी एक जैसे नहीं उड़ते हैं। समझ को विभिन्न तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है – कुछ ने मिहराब, दूसरों को मूर्ति पाया है।

चौथी घाटी को टुकड़ी की घाटी के रूप में पेश किया जाता है, अर्थात इच्छा से लेकर अधिकार और खोज की इच्छा तक। पक्षियों को लगने लगता है कि वे एक ऐसे ब्रह्मांड का हिस्सा बन गए हैं जो उनकी भौतिक पहचान योग्य वास्तविकता से अलग हो गया है। उनकी नई दुनिया में, ग्रह उतने ही मिनट के हैं जितने धूल और हाथियों की चिंगारियां चींटियों से अलग नहीं हैं। यह तब तक नहीं है जब तक वे पांचवीं घाटी में प्रवेश नहीं करते हैं, जब तक वे महसूस करते हैं कि एकता और बहुलता समान हैं। और जैसा कि वे निर्वात में नहीं अनंत काल के साथ बन गए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे समझते हैं कि ईश्वर एकता, अनेकता और अनंत काल से परे है। छठी घाटी में कदम रखते ही, पक्षी बेलवेड की सुंदरता पर चकित हो जाते हैं। अत्यधिक दुःख और आपत्ति का अनुभव करते हुए, उन्हें लगता है कि वे कुछ नहीं जानते, कुछ नहीं समझते। उन्हें खुद का भी पता नहीं है। केवल तीस पक्षी ही सिमरघ के निवास तक पहुँचते हैं। लेकिन देखा जाए तो कहीं भी सिमरघ नहीं है। सिमुरघ का चैंबरैन उन्हें लंबे समय तक सिमुरग की प्रतीक्षा करता रहता है ताकि पक्षियों को यह पता चल सके कि वे खुद ही मुर्ग (परिंदे) (مرغ,”पक्षी”) हैं। सातवीं घाटी वंचना, विस्मृति, गूंगेपन, बहरेपन और मृत्यु की घाटी है। तीस सफल पक्षियों के वर्तमान और भविष्य के जीवन आकाशीय सूर्य द्वारा पीछा छाया बन जाते हैं। और खुद, अपने अस्तित्व के सागर में खो गए, सिमरघ हैं।

आध्यात्मिकता की सात घाटियाँ (पक्षियों का सम्मेलन)

अत्तार ने पक्षियों के सम्मेलन में आध्यात्मिकता के सात चरणों का वर्णन किया है:

खोज की घाटी (वादी ए तलब)
प्रेम और स्नेह की घाटी (वादी ए इश्क़)
बुद्धिमता की घाटी (वादी ए हैरत)
त्याग की घाटी (वादी ए स्तग़ना)
एकत्व की घाटी (वादी ए तौहीद)
विस्मय की घाटी (वादी ए फ़िक्र व फ़ना)
अंतर्ज्ञान की घाटी (वादी ए मारिफ़त)

ताधिरकत-उल-अवली

अत्तार का एकमात्र ज्ञात गद्य काम है जो उन्होंने अपने पूरे जीवन में काम किया था और जो उनकी मृत्यु से पहले सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था, मुस्लिम संतों और मनीषियों की जीवनी है। इस पुस्तक में जो सबसे सम्मोहक प्रविष्टि मानी जाती है, `अत्तार मंसूर अल-हलाज के वध की कहानी से संबंधित है, इस रहस्यवादी व्यक्ति ने” मैं सत्य हूं “शब्दों को परमानंद के चिंतन की स्थिति में कहा था।

इलाही-नामा

इलाही-नामा (फ़ारसी:الهی نامه) अत्तार का एक और प्रसिद्ध काव्य है, जिसमें 6500 छंद हैं। रूप और सामग्री के संदर्भ में, इसमें बर्ड पार्लियामेंट के साथ कुछ समानताएं हैं। कहानी एक राजा की है जो अपने छह बेटों की भौतिकवादी और सांसारिक मांगों के साथ सामना करता है। राजा अपने छह बेटों की अस्थाई और संवेदनहीन इच्छाओं को उन्हें बड़ी संख्या में आध्यात्मिक कहानियों से दूर करके दिखाने की कोशिश करता है। पहला बेटा परियों के राजा (परियन) की बेटी के लिए पूछता है।

मुख्तार-नमा

मुख्तार-नमा (फ़ारसी:مختار نامه), एक विस्तृत संग्रह का क्वाटरिन्स (संख्या में 2088)। मोख्तार-नामा में, रहस्यमय और धार्मिक विषयों का एक सुसंगत समूह उल्लिखित है (मिलन के लिए खोज, विशिष्टता की भावना, दुनिया से दूर होना, सत्यानाश, विस्मय, पीड़ा, मृत्यु के प्रति जागरूकता, आदि) और एक समान रूप से समृद्ध समूह। विषयवस्तु रहस्यमय साहित्य द्वारा अपनाई गई कामुक प्रेरणा की गेय कविता की विशिष्टताओं (प्रेम, असंभव मिलन, प्रियजन की सुंदरता, प्रेम कहानी की रूढ़ियों को कमजोरी, रोना, अलग करना) की पीड़ा।

दीवान
निशापुर के बुजुर्ग अत्तार के अंतिम संस्कार को चित्रित करने के बाद बिहजाद द्वारा की गई एक लघु चित्रकारी को बंदी बनाकर मंगोल आक्रमणकारी द्वारा मार दिया गया था।

अत्तार का दीवान (फ़ारसी :دیوان عطار) ग़ज़ल (“गीत”) रूप में लगभग पूरी तरह से कविताओं में समाहित है , क्योंकि उन्होंने मोख्तार-नाम नामक एक अलग काम में अपनी रूबी (“यात्रा”) एकत्र की। कुछ क़सीदा (“ओड्स”) भी हैं, लेकिन वे दीवान के एक-सातवें हिस्से से कम हैं। उनका क़ासिदास रहस्यमय और नैतिक विषयों और नैतिक उपदेशों पर प्रकाश डालता है। वे कभी-कभी सनाई के बाद मॉडलिंग करते हैं। ग़ज़लें अक्सर उनकी बाहरी शब्दावली से लगती हैं, जो प्रेम और शराब के गीतों के साथ लिबर्टिन इमेजरी के लिए एक भविष्यवाणी के साथ होती हैं, लेकिन आम तौर पर शास्त्रीय इस्लामी सूफीवाद की परिचित प्रतीकात्मक भाषा में आध्यात्मिक अनुभवों को दर्शाती हैं। अत्तार के गीत उन्हीं विचारों को व्यक्त करते हैं जो उनके महाकाव्यों में विस्तृत हैं। उनकी गीत कविता उनकी कथात्मक कविता से काफी भिन्न नहीं है, और यही बयानबाजी और कल्पना के बारे में कहा जा सकता है।

रूमी पर प्रभाव

अत्तर ईरान के सबसे प्रसिद्ध रहस्यवादी कवियों में से एक है। उनकी रचनाएँ रूमी और कई अन्य रहस्यवादी कवियों की प्रेरणा थीं। `अत्तर, सनाई के साथ अपने सूफी विचारों में रूमी पर दो सबसे बड़े प्रभाव थे। रूमी ने अपनी कविता में कई बार दोनों को सर्वोच्च सम्मान के साथ उल्लेख किया है। रूमी ने अत्तार की प्रशंसा इस प्रकार की है:

अत्तार इश्क़ के सात शहरों से गुज़रा है, जबकि हमने पहली गली को मुश्किल से पर किया है।

फार्मासिस्ट के रूप में

अत्तार एक कलम-नाम था जिसे उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया था। `अत्तार का अर्थ है हर्बलिस्ट, ड्रगिस्ट, परफ्यूमिस्ट या कीमिस्ट, और फारस में अपने जीवनकाल के दौरान, बहुत सारी दवा और दवाएं जड़ी-बूटियों पर आधारित थीं। इसलिए, पेशे से वह एक आधुनिक शहर के डॉक्टर और फार्मासिस्ट के समान था। गुलाब के तेल का मतलब होता है अत्तर।

लोकप्रिय संस्कृति में

कई संगीत कलाकारों के पास एल्बम या गाने हैं जो उनके सबसे प्रसिद्ध काम, बर्ड्स ऑफ़ कांफ्रेंस के नाम के साथ-साथ प्रबुद्धता के विषयों को भी साझा करते हैं। विशेष रूप से, जैज़ बेसिस्ट डेविड हॉलैंड का एल्बम, जो अपने ज्ञानवर्धन के लिए एक रूपक के रूप में लिखा गया था, और ओम का सम्मेलन ऑफ़ द बर्ड्स, जो अत्यंत गूढ़ विषयों से संबंधित है, जो अक्सर उड़ान के रूपकों से जुड़ा होता है, आंतरिक दृष्टि, स्वयं का विनाश और एकता। ब्रह्मांड के साथ।

अर्जेंटीना के लेखक जॉर्ज लुइस बोर्जेस ने अपनी छोटी कहानियों में से एक, द अप्रोच टू अल-मुत्तसिम, द कॉन्फ्रेंस ऑफ द बर्ड्स ऑफ द बर्ड्स को एक संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया।

1963 में फारसी संगीतकार होसैन देहलवी ने अत्तार के ‘फ़रोग़ ए इश्क़’ पर आवाज और ऑर्केस्ट्रा के लिए एक टुकड़ा लिखा। इस टुकड़े को अपना पहला प्रदर्शन सबा ऑर्केस्ट्रा और गायक तेतरी ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर तेहरान में दिया । 1990 में ओपेरा गायक होसैन सरशार ने इस टुकड़े का प्रदर्शन किया, जिसकी रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।

ख़्वाजा बाकी विल्लाह (16वीं शताब्दी)

ख्वाजा बाकी बिल्लाह

जन्म – 971, काबुल
मृत्यु – 1012 , भारत

ख्वाजा बाकी बिल्लाह (14 जुलाई 1564 – 29 नवंबर 1603) काबुल के सुफी संत थे।

जन्म
ख्वाजा बाकी बिल्लाह उप-महाद्वीप में नगक्षबन्दी आदेश के प्रवर्तक और अग्रणी थे।उसका नाम राजी-उद-दीन मुहम्मद बाकी था लेकिन वह सामान्यतः ख्वाजा बाकी बिल्लाह के नाम से जाना जाता था उनके पिता काजी अब्द अल-सलाम समरकंदी एक प्रसिद्ध विद्वान और काबुल के संत थे।ख्वाजा बाकी बिल्लाह काबुल में 1563 ई.पू. में पैदा हुए थे। उनकी वंशावली अपने नाना के माध्यम से ख्वाजा उबेद उल्लाह अहरार तक पहुंचती है।उनका नाम उनके माता-पिता “मुहम्मद अल-बाकी” और बाद में “बाकी बिल्लाह” नाम से लोकप्रिय हो गया।उनका तखल्लुस (कलम का नाम) “बेरंग” था (जिसका शाब्दिक अर्थ है रंगहीन या पारदर्शी)

सूफ़ी सन्त

शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया

हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन

धर्म – इस्लाम, सुन्नी इस्लाम, सूफ़ी, चिश्तिया तरीक़ा
अन्य नाम : निज़ामुद्दीन औलिया

क्षेत्र – दिल्ली
उपाधियाँ – महबुब-ए-इलाही
काल – 1236-1325
पूर्वाधिकारी – फरीद्दुद्दीन गंजशकर (बाबा फरीद)
उत्तराधिकारी – नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी
जन्म तिथि – 1238
जन्म स्थान – बदायुं, उत्तर प्रदेश
Date of death – ३ अप्रैल, १३२५
मृत्यु स्थान – दिल्ली

हजरत निज़ामुद्दीन (حضرت خواجة نظام الدّین اولیا) (1325-1236) चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है।

जीवनी

हज़रत ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म १२३८ में उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ था। ये पाँच वर्ष की उम्र में अपने पिता, अहमद बदायनी, की मॄत्यु के बाद अपनी माता, बीबी ज़ुलेखा के साथ दिल्ली में आए। इनकी जीवनी का उल्लेख आइन-ए-अकबरी, एक १६वीं शताब्दी के लिखित प्रमाण में अंकित है, जो कि मुगल सम्राट अकबर के एक नवरत्न मंत्री ने लिखा था

१२६९ में जब निज़ामुद्दीन २० वर्ष के थे, वह अजोधर (जिसे आजकल पाकपट्टन शरीफ, जो कि पाकिस्तान में स्थित है) पहुँचे और सूफी संत फरीद्दुद्दीन गंज-इ-शक्कर के शिष्य बन गये, जिन्हें सामान्यतः बाबा फरीद के नाम से जाना जाता था। निज़ामुद्दीन ने अजोधन को अपना निवास स्थान तो नहीं बनाया पर वहाँ पर अपनी आध्यात्मिक पढाई जारी रखी, साथ ही साथ उन्होंने दिल्ली में सूफी अभ्यास जारी रखा। वह हर वर्ष रमज़ान के महीने में बाबा फरीद के साथ अजोधन में अपना समय बिताते थे। इनके अजोधन के तीसरे दौरे में बाबा फरीद ने इन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, वहाँ से वापसी के साथ ही उन्हें बाबा फरीद के देहान्त की खबर मिली।

निज़ामुद्दीन, दिल्ली के पास, ग़यासपुर में बसने से पहले दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहे। ग़यासपुर, दिल्ली के पास, शहर के शोर शराबे और भीड़-भड़क्के से दूर स्थित था। उन्होंने यहाँ अपना एक “खंकाह” बनाया, जहाँ पर विभिन्न समुदाय के लोगों को खाना खिलाया जाता था, “खंकाह” एक ऐसी जगह बन गयी थी जहाँ सभी तरह के लोग चाहे अमीर हों या गरीब, की भीड़ जमा रहती थी।

इनके बहुत से शिष्यों को आध्यात्मिक ऊँचाई की प्राप्त हुई, जिनमें ’ शेख नसीरुद्दीन मोहम्मद चिराग़-ए-दिल्ली” , “अमीर खुसरो”, जो कि विख्यात विद्या ख्याल/संगीतकार और दिल्ली सलतनत के शाही कवि के नाम से प्रसिद्ध थे।

इनकी मृत्यु ३ अप्रेल १३२५ को हुई। इनकी दरगाह, हजरत निज़ामुद्दीन दरगाह दिल्ली में स्थित है।

वंशावली

हजरत अब्राहिम

हज़रत मुहम्मद
हज़रत अली इब्न अबी तालिब
हज़रत सईदना इमाम हुसैन इब्न अली
हज़रत सईदना इमाम अली इब्न हुसैन ज़ैन-उल-आबेदीन
हज़रत सईदना इमाम मोहम्म्द अल-बाक़र
हज़रत सईदना इमाम ज़ाफ़र अल-सादिक़
हज़रत सईदना इमाम मूसा अल-काज़िम
हज़रत सईदना इमाम अली अर-रिदा (असल में, अली मूसा रज़ा)
हज़रत सईदना इमाम मोहम्म्द अल-तक़ी
हज़रत सईदना इमाम अली अल-नक़ी
हज़रत सईदना जाफ़र बुख़ारी
हज़रत सईदना अली अज़गर बुख़ारी
हज़रत सईदना अबी अब्दुल्लाह बुख़ारी
हज़रत सईदना अहमद बुख़ारी
हज़रत सईदना अली बुख़ारी
हज़रत सईदना हुसैन बुख़ारी
हज़रत सईदना अब्दुल्लाह बुख़ारी
हज़रत सईदना अली उर्फ़ दानियल
हज़रत सईदना अहमद बदायनी
हज़रत सईदना सय्यद शाह ख़्वजा निज़ामुद्दीन औलिया

आध्यात्मिक वंशावली

पैगंबर हज़रत मुहम्मद
अली इब्न अबी तालिब
हसन अल-बसरी
अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद अबुल फ़ाध्ल
फुधैल बिन इयाधबिन मसूद बिन बिशर तमीमी
इब्राहीम बिन अद-हम
हुज़ैफ़ा अल-माराशी
अबु हुबैरा बर्सी
इल्व मुम्शाद दिन्वारी

चिश्ती अनुक्रम का आरंभ

अबू इस-हाक़ शमी
अबू अहमद अब्दल
अबू मुहम्म्द बिन अबी अहमद
अबू यूसुफ़ बिन सामान
मौदूद चिश्ती
शरीफ़ ज़नदनी
उस्मान हरूनी
मौइनुद्दीन चिश्ती
कुत्बुद्दीन बख्तियार काकी
फ़रीदुद्दीन मसूद
निज़ामुद्दीन औलिया

शाखाएं

नसीरिया
हुसैनिया
नियाज़िया
अश्रफ़िया
फ़रीदिया

औलिया को मिली उपाधियां

महबूब-ए-इलाही
सुल्तान-उल-मसहायक
दस्तगीर-ए-दोजहां
जग उजियारे
कुतुब-ए-देहली

मुगल शाहज़ादी जहां आरा बेगम का मक़्बर (दायें), निज़ामुद्दीन औलिया क मक़्बरा (बायें), जमात खाना मस्जिद (पीछे), निज़ामुद्दीन दर्गाह समूह दिल्ली.

इनका उर्स (परिवाण दिवस) दरगाह पर मनाया जाता है। यह रबी-उल-आखिर की सत्रहवीं तारीख को (हिजरी अनुसार) वार्षिक मनाया जाता है। साथ ही हज़रत अमीर खुसरो का उर्स शव्वाल की अट्ठारहवीं तिथि को होता है।

दरगाह में संगमरमर पत्थर से बना एक छोटा वर्गाकार कक्ष है, इसके संगमरमरी गुंबद पर काले रंग की लकीरें हैं। मकबरा चारों ओर से मदर ऑफ पर्ल केनॉपी और मेहराबों से घिरा है, जो झिलमिलाती चादरों से ढकी रहती हैं। यह इस्लामिक वास्तुकला का एक विशुद्ध उदाहरण है। दरगाह में प्रवेश करते समय सिर और कंधे ढके रखना अनिवार्य है। धार्मिक गात और संगीत इबादत की सूफी परंपरा का अटूट हिस्सा हैं। दरगाह में जाने के लिए सायंकाल 5 से 7 बजे के बीच का समय सर्वश्रेष्ठ है, विशेषकर वीरवार को, मुस्लिम अवकाशों और त्यौहार के दिनों में यहां भीड़ रहती है। इन अवसरों पर कव्वाल अपने गायन से श्रद्धालुओं को धार्मिक उन्माद से भर देते हैं। यह दरगाह निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक मथुरा रोड से थोड़ी दूरी पर स्थित है। यहां दुकानों पर फूल, लोबान, टोपियां आदि मिल जाती हैं।

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो, हज़रत निजामुद्दीन के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे, जिनका प्रथम उर्दू शायर तथा उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत की एक विधा ख्याल के जनक के रूप में सम्मान किया जाता है। खुसरो का लाल पत्थर से बना मकबरा उनके गुरु के मकबरे के सामने ही स्थित है। इसलिए हजरत निज़ामुद्दीन और अमीर खुसरो की बरसी पर दरगाह में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्स (मेले) आयोजित किए जाते हैं।


नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी

धर्म – इस्लाम, विशेष रूप से सूफीवाद के चिस्ती निजामी आदेश
अन्य नाम – चिराग़ देहलवी
जन्म – 1274
अयोध्या, भारत
निधन – 1356 (आयु 82)
दिल्ली, भारत
कर्मभूमि – दिल्ली
उपदि چراغِ دہلی चिराग़-ए-दिल्ली
कार्यकाल – 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में
पूर्वाधिकारी – निज़ामुद्दीन औलिया
उत्तराधिकारी – ख्वाजा कमालुद्दीन अल्लामा चिश्ती, बंदा नवाज़ गेसू दराज़

नसीरुद्दीन महमूद चिराग़ – देहलवी (सीए 1274-1356) 14 वीं शताब्दी के रहस्यवादी-कवि और चिश्ती आदेश के सूफी संत थे। वह सूफी संत, निजामुद्दीन औलिया, और बाद में उनके उत्तराधिकारी के एक मूर्ति (शिष्य) थे। वह दिल्ली से चिश्ती आदेश का आखिरी महत्वपूर्ण सूफी थे ।

देहलवी को “रोशन चिराग-ए-दिल्ली” खिताब दिया गया था, जिसका अर्थ उर्दू में है, ” दिल्ली का प्रबुद्ध चिराग़ “।

जीवनी

नसीरुद्दीन महमूद चिराग़ देहलवी (या चिराघ-ए-दिल्ली) उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 1274 के आसपास सय्यद नासीरुद्दीन महमूद अलहस्सानी के रूप में पैदा हुए थे। देहलवी के पिता सैयद महमूद याह्या अलहस्नी थे, जिन्होंने पश्मीना का व्यापार किया करते थे। और उनके दादा सय्यद याह्या अब्दुल लतीफ अलहस्सनी, पहले खोरासन, पूर्वोत्तर ईरान से लाहौर चले गए, और उसके बाद अवध में अयोध्या में बस गए। उनके पिता की मृत्यु हो गई जब वह केवल नौ वर्ष की उम्र में थे और उन्हें मौलाना अब्दुल करीम शेरवानी से अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिली, और बाद में इसे मौलाना इफ्तिखार उद-दीन गिलानी के साथ जारी रखा।

चालीस वर्ष की आयु में, उन्होंने अयोध्या को दिल्ली के लिए छोड़ दिया, जहां वह ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य बने। यहां देहलवी अपने जीवन का बाकी हिस्सा उनके मुरीद (शिष्य) के रूप में रहे, और उनकी मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारी बने। समय के साथ, वह फारसी भाषा में एक ज्ञात कवि भी बन गए।

उनकी मृत्यु 82 वर्ष की उम्र में, 17 रमजान 757 हिजरी या 1356 ईस्वी में हुई, और उन्हें दक्षिण दिल्ली, भारत के एक हिस्से में दफनाया गया, जिसे उसके बाद “चिराग दिल्ली” के नाम से जाना जाता है।

उनके उल्लेखनीय शिष्यों में से एक बंदे नवाज़ गेसू दराज़ थे, जो बाद में दिल्ली के तिमुर के हमले के कारण 1400 के आस-पास दौलाबाद में चले गए, और जहां से बहामनी राजा, फिरोज शाह बहामनी के निमंत्रण पर, कर्नाटक के गुलबर्गा चले गए, जहां उन्होंने अपने जीवन के निम्नलिखित 22 वर्षों तक, दक्षिण में नवंबर 1422 में उनकी मृत्यु तक चिश्ती तरीके को फैलाया था। ख़्वाजा बंदे नवाज़ की दरगाह (मकबरा) आज गुलबर्गा शहर में मौजूद है, जो बहु-धार्मिक एकता प्रतीक है।

दिल्ली में उनके प्रवास के दौरान, देहलवी अक्सर अयोध्या जाते थे, जहां उन्होंने कई शिष्यों को बनाया, विशेष रूप से शेख जैनुद्दीन अली अवधी, शेख फतेहुल्ला अवधी और अलामा कमलुद्दीन अवधी। कमलुद्दीन अलामा उनके भतीजे थे और उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया और उसके बाद उनके उत्तराधिकारी अहमदाबाद में हैं गुजरात खानकाह ए औलीया चिश्ती के उत्तराधिकारी खवाजा रुक्नुद्दीन मोहम्मद फर्रुख चिश्ती हैं। वह नसीरबाग, शाहिबाग, गुजरात, अहमदाबाद, भारत में रहते हैं।

उनकी मृत्यु के बाद, उनकी मकबरा 1358 में दिल्ली के सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक (1351 – 1388) द्वारा बनाई गई थी, और बाद में दो दरवाज़े मकबरे के दोनों तरफ जोड़े गए थे। उल्लेखनीय जोड़ों में से एक 18 वीं शताब्दी की शुरुआत में बाद में मुगल सम्राट फररुखसियार द्वारा निर्मित एक मस्जिद थी, और मुसलमानों और गैर-मुस्लिम दोनों के बीच लोकप्रिय है। लोढ़ी राजवंश के संस्थापक, बहलूल खान लोढ़ी (1451-89) के संस्थापक का मकबरा दरगाह के करीब है, वर्तमान में ‘चिराग दिल्ली’ की इलाके में 1800 से मकबरे के आसपास का इलाक़ा अभी भी उनके नाम से जाना जाता है, यह दक्षिण दिल्ली में ग्रेटर कैलाश के इलाके के बहुत करीब है।

अपने आध्यात्मिक गुरु निजामुद्दीन औलिया के विपरीत नासीरुद्दीन चिराघ देहलवी ने समा को नहीं सुनते थे, जो कि मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा गैर-इस्लामी माना जाता था। हालांकि उन्होंने इसके खिलाफ कोई विशेष निर्णय नहीं दिया था। यही कारण है कि आज भी, क़व्वाली दिल्ली में अपने दरगाह के पास नहीं किया जाता है। नसीरुद्दीन के वंशज बहुत दूर पाए जाते हैं क्योंकि उनमें से बहुत से दक्षिण में हैदराबाद चले गए। बडी बुआ या बडी बीबी की दरगाह, जो नासीरुद्दीन महमूद चिराग़ देहलवी की बड़ी बहन थी, उनकी दरगाह आज भी अयोध्या शहर में मौजूद है।

खानजदाह शब्द राजपूत का राजपूताना शब्द का फारसी रूप है। प्राचीन जदुबांसी शाही राजपूत परिवार, कृष्णा के वंशज और इसलिए चंद्र वंश के प्रतिनिधियों का खिताब है।

जदोन (जदायूं भी पढ़ा जाता है) ख़ानज़ादा के परिवार के प्रजनक राजपूत राजा लखन पाला राजा आधान पाला के पोते थे (जो राजा ताहन पाल से वंश में चौथे स्थान पर थे)। तहानपाला जिसने तहानगढ़ की स्थापना की, राजा बीजई पाला (बीजई गढ़ के संस्थापक) के सबसे बड़े पुत्र थे, जो स्वयं भगवान कृष्ण से वंश में 88 वें स्थान पर थे। इसलिए, जदोन राजा लखन पाला, मेवात्पट्टी (शीर्षक का अर्थ, मेवाट का भगवान) भगवान कृष्ण से वंश में 94 वां था।
इस्लाम की स्वीकृति

खानजादह के परिवार के रिकॉर्ड में कहा गया है कि शिकार अभियान के दौरान जवान राजा लखन पाल के पुत्र कुंवर समर पाल और कुंवर सोपर पाल सूफी संत नासीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग़ देहलवी से मुलाकात की। खानजादाह को ‘दिल की प्रबुद्धता’ सूफी संतों के साथ उनके सहयोग द्वारा और इस्लाम की स्वीकृति द्वारा आ गई है।


ख़्वाजा बंदे नवाज़

जन्म – 7 अगस्त 1321
दिल्ली, दिल्ली सल्तनत, अब भारत
मृत्यु 10 नवंबर 1422 (आयु वर्ग 101)
जातीयता – भारतीय
युग – इस्लामी स्वर्णयुग
धर्म – इस्लाम

सय्यद वल शरीफ़ कमालुद्दीन बिन मुहम्मद बिन यूसुफ़ अल हुसैनी : जिन्हें आम तौर पर ख्वाजा बन्दा नवाज़ गेसू दराज़ कहते हैं। ( 7 अगस्त 1321, दिल्ली -10 नवंबर 1422, गुलबर्गा ) बंदा नवाज़ या गेसू दराज़ के नाम से जाना जाता है, चिश्ती तरीक़े के भारत से एक प्रसिद्ध सूफी संत थे, जिन्होंने समझ, सहिष्णुता की वकालत की, विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच सद्भावना पैदा की।

गेसू दराज़ दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी के एक मुरीद या शिष्य थे। चिराग देहलावी की मृत्यु के बाद, गेसू दराज़ ने उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) के तौर पर गद्दा नशीन हुवे। जब वह दिल्ली पर तैमूर लंग के हमले के कारण 1400 के आस-पास दौलाबाद में चले गए, तो उन्होंने चिश्ती तरीके को दक्षिण भारत में परिचय किया और स्थापित भी। अंत में वह बहामनी सुल्तान, ताज उद-दीन फिरोज शाह के निमंत्रण पर गुलबर्गा में बस गए।

बंदा नवाज़ का जन्म 1321 में दिल्ली में सय्यद वल शरीफ़ मुहम्मद बिन यूसुफ अल हुसैनी के घर हुआ था। चार साल की उम्र में उनका परिवार दक्कन (अब महाराष्ट्र में) में दौलताबाद में स्थानांतरित हो गया था। 1397 में, वह सुल्तान ताज उद-दीन फिरोज शाह के निमंत्रण पर दक्कन (वर्तमान में कर्नाटक में) गुलबर्गा आये।

पंद्रह वर्ष की आयु में, वह नासिरुद्दीन चिराग़ देहलावी द्वारा अपनी शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए दिल्ली लौट आए। वह हजरत केथली, हजरत ताजुद्दीन बहादुर और काजी अब्दुल मुक्तादिर के बहुत उत्साही छात्र भी थे। 1397 में दिल्ली, मेवाथ, ग्वालियर, चंदर, एयरचा, चतुरा, चंदेरी, मियांधर, बड़ौदा, खंबायत और गुलबर्गा जैसे विभिन्न स्थानों पर पढ़ाने के बाद और नवंबर 1422 में गुलबर्गा में उनकी मृत्यु हो गई।

उनके नाम के साथ अबुल-फतह और गेसू दराज़ उनका खिताब था। विद्वानों और धर्मविदों में से वह शेख अबुल-फतह सदर उदीन मुहम्मद देहलावी थे, लेकिन लोगों ने उन्हें ख्वाजा बंदा नवाज़ गेसू दराज़ कहा।

वह हजरत अली के वंशज थे। उनके पूर्वज हेरात में रहते थे। उनमें से एक दिल्ली आये और यहां बस गए। उनके पिता हजरत सय्यद वल शरीफ़ मुहम्मद बिन यूसुफ़ का जन्म 4, रजब, 721 हिजरी में हुआ था। उनके पिता हजरत सैयद वल शरीफ़ यूसुफ बिन मुहम्मद अल हुसैनी एक पवित्र व्यक्ति थे और हजरत निज़ामुद्दीन औलिया को समर्पित थे।

सुल्तान मुहम्मद-बिन तुगलक ने अपनी राजधानी को दौलाबाद (देवगिरी) में स्थानांतरित कर दिया और उसके साथ कई विद्वानों, धर्मविदों और रहस्यवादी भी गए। उनके माता-पिता भी इस स्थान पर चले गए। उस समय वह चार साल के थे जब मलिक-उल-उमर हजरत सैयद इब्राहिम मुस्तफा अल हाश्मी, उनके मामा, दौलतबाद के गवर्नर थे।

बचपन और प्रारंभिक शिक्षा

उनके पिता ने हमेशा शिक्षा के महत्व पर बल दिया। अपने बचपन से वह धर्म की ओर झुके हुए थे और ध्यान और प्रार्थना में समय बिताया था। जब वह दस वर्ष के थे उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनके दादाजी ने उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारी संभाली और उन्हें प्रारंभिक किताबें सिखाईं लेकिन उन्होंने मिस्बा और कदूरि पर दुसरे शिक्षक से सबक लिया।

दिल्ली में

अपने पिता की मौत पर। वह उस समय पंद्रह वर्ष के थे। उन्होंने हजरत निजाम उदीन औलिया और हजरत नासीर उदीन चिराग देहलावी के बारे में बहुत कुछ अपने पिता और नाना से सुना था और उन्हें अपना गुरू मान लिया था। एक दिन वह सुल्तान कुतुब उद्दीन के जामा-मजीद में अपनी प्रार्थना करने गए, वहां उन्होंने हजरत शेख नासीर उदीन महमूद चिराघ देहलावी को देखा और 16, रजब पर उनके प्रति आज्ञाकारिता का वचन दिया। हजरत नसीर उदिन चिराग देहलावी के मार्गदर्शन में उन्होंने स्वयं को प्रार्थनाओं और ध्यान में लगाया और उन्हें इतना मज़ा आया कि उन्होंने अध्ययनों को मना कर दिया और अपने शिक्षक से ऐसा करने की अनुमति देने के लिए अनुरोध किया। हजरत नसीर उदीन ने उन्हें अनुमति से इंकार कर दिया और उन्हें यूसुओल-ए-बिज़ौरी, रिसाल शमिया, कश्यफ, मिस्बाह के साथ अध्ययन करने का निर्देश दिया ताकि उन्होंने प्रसिद्ध शिक्षकों के मार्गदर्शन में अध्ययनों को फिर से शुरू किया।

अल हुसैनई ने 17 दिसंबर, 1398 को दिल्ली छोड़ दी, क्योंकि शहर तिमुर से घिरा हुआ था और इसकी गिरावट निकट थी।

एक दिन वह अन्य शिष्यों के साथ हजरत नसीरउद्दीन के पालकी को उठा कर जा रहे थे। उनके लंबे बाल पल्की के पैर में फंस गए और उन्हें गंभीर रूप से पीड़ा और तकलीफ हुई। लेकिन उन्होंने अपने पीर (गुरू या शिक्षक) के प्रति प्यार और सम्मान था इस लिए उन्हों ने इस पीड़ा को बर्दाश्त किया और ज़ाहिर नहीं किया। जब हज़रत नसीरुद्दीन महमूद चराग़ देहलवी को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत प्रसन्न हुए और यह फ़ारसी शेर पढ़ा:

ہر کہ مرید سید گیسو دراز شد

واللہ خلا ف نیت کہ او عشق باز شد

हर के मुरीद सय्यद गेसू दराज़ शुद;

वल्लाह ख़िलाफ़ ए निय्यत के ओ इश्क़ बाज़ शुद।” (“सय्यद गेसू दराज़ ने अपनी आज्ञाकारिता का वचन दिया है, इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है क्योंकि वह इश्क़ में गहराई से डूबे हुए हैं।”)

इस तरह उन्हें “गेसू दाराज़” का ख़िताब अपने उस्ताद से मिला।

गुलबर्गा में

दिल्ली में चालीस वर्षों से अधिक समय तक रहने के बाद, वह लगभग 76 वर्ष की उम्र में गुलबर्गा चले गए। इस अवधि के दौरान फिरोज शाह बहमानी ने दक्कन पर शासन किया। उसने उन्हें बहुत सम्मान दिया। लंबे समय तक वह धार्मिक प्रवचन, उपदेश, और लोगों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण में लगे थे।
वफ़ात

हज़रत बंदा नवाज ने 101 साल की उम्र प्राप्त की, गुलबर्गा में 16 ज़िलकादा 825 हिजरी पर उनकी वफ़ात हो गई और वहां दफनाया गया। उनका मकबरा ज़ियारत की जगह है,

उद्धरण

यदि एक सालिक सिर्फ प्रसिद्धि होने के लिए प्रार्थना करता है या ध्यान करता है, तो वह नास्तिक है।
यदि कोई डर से प्रार्थना करता है या ध्यान करता है, तो वह धोखाधड़ी और पाखंड है।
जब तक एक आदमी अपने सांसारिक चीजों से खुद को अलग करता है, वह दुर्व्यवहार की राह में नहीं चलेगा।
रात को तीन अवधियों में विभाजित करें: पहली अवधि में दारुद का पठन कहते हैं; दूसरी नींद में और तीसरे कॉल में उसका (अल्लाह का) ज़िक्र और ध्यान करे।
सालिक को भोजन में सावधान रहना चाहिए, यह वैध होना चाहिए।
सालिक को सांसारिक लोगों की सोहबत से दूर रहना चाहिए। बंदा नवाज़ की दरगाह पूरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है।


कार्य

बंदा नवाज़ ने अरबी, फारसी और उर्दू में लगभग 195 किताबें लिखीं। उनके महान कृति, ताफसीर मल्तिकात, को हाल ही में एक पुस्तक में संकलित किया गया था। उन्होंने उर्दू और दक्कनी भाषा में मेराज उल-आशिक़ीन नामक पुस्तक इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद पर लिखी। वह इस स्थानीय भाषा (दक्कनी) का उपयोग करने वाले पहले सूफी थे जिन्हें बाद के सदियों में दक्षिण भारत के कई अन्य सूफी संतों ने विस्तारित किया था। उन्होंने इब्न अरबी और सुहरवर्दी के कार्यों पर कई ग्रंथ लिखे, जिन्होंने इन विद्वानों के कामों को भारतीय विद्वानों के लिए सुलभ बनाया और बाद में मआरिफ़त (रहस्यमय) के विचारों को प्रभावित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। अन्य पुस्तकें क़सीदा अमाली और आदाब अल-मुरीदैन हैं।

किताबें

तफ़ासीर-ए-क़ुरान-ए-मजीद
मुल्तक़ीत
हवशी कश्फ़
शरह-ए-मशारेक़
शरह फिकह-ए-अकबर
शरह अदब-उल-मुरदीन
शरह तअर्रुफ़
रिसाला सीरत-उन-नबी
तरजुमा मशरेक़
मआरिफ़
तरजुमा अवारिफ़
शरह फ़सूसुल हिकम
तरजुमा रिसाला क़शेर्या
हवा असाही कुव्वत-उल-क़ल्ब

उर्स
जाति और पंथ के बावजूद, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोग, प्रसिद्ध बांड नवाज में मुस्लिम कैलेंडर के जुल-क़ादाह के 15, 16 और 17 दिनों के दौरान होने वाले उर्स (मौत की सालगिरह) का जश्न मनाने के लिए आज भी इकट्ठे होते हैं। हर साल गुलबर्गा में दरगाह । धर्म और विश्वासों के बावजूद, करीब और दूर से कई सौ हजार भक्त आशीर्वाद मांगने के लिए इकट्ठे होते हैं।

शेख़ अहमद सरहिन्दी

अहमद सरहिन्दी (जन्म २५ मई १५६४, देहांत १० दिसम्बर १६२४), जिन्हे पूरे औपचारिक रूप से इमाम रब्बानी शेख़ अहमद अल-फ़ारूक़ी अल-सरहिन्दी (شیخ احمد الفاروقی السرہندی) के नाम से जाना जाता है, १६वीं और १७वीं शताब्दी के एक विख्यात भारतीय सूफ़ी विद्वान थे। उनका सम्बन्ध हनफ़ी विचारधारा और नक़्शबन्दी सूफ़ी सम्प्रदाय से था। उन्होने मुग़ल सम्राट अकबर के काल में जो भारतीय इस्लाम में कई भिन्न मत पनपने आरम्भ हो गये थे उनका विरोध किया और ऐकिकरण पर ज़ोर दिया। इस कारण से कुछ इतिहासकार उन्हें भारतीय इस्लाम को विवधता-विरोध की ओर ले जाने का दोष देते हैं जबकि अन्य उन्हें कुरीतियों को रोकने का श्रेय देते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में फैली नक़्शबन्दी विचारधाराओं की मुजद्दिदी, क़ासिमिया, ताहिरी, सैफ़ी, ख़ालिदी व हक़्क़ानी शाखाएँ इन्ही की दी सोच से उभरी हैं। इनकी दरगाह भारत के पंजाब राज्य में स्थित है और रोज़ा शरीफ़ के नाम से जानी जाती है।

आरंभिक जीवन
शेख अहमद सरहिंदी का जन्म २६ जून १५६४ ई. को सरहिंद के एक गाँव में असरफ परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा अधिकांशतः अपने पिता शेख ‘अब्द अल-अहद’, अपने भाई शेख मुहम्मद सादिक और शेख मुहम्मद ताहिर अल-लाहुरी से पराप्त की। आप नक़्शबन्द सिलसिले के मशहूर बुज़ुर्ग हज़रत बाकी बिल्लाह से मुरीद हुवे।

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