धर्म

अब मैंने पवित्र क़ुरआन की तिलावत शुरु कर दी, क़ुरआन की तिलावत ने मेरे मन की गुत्थियों को सुलझा दिया और फिर इस्लाम मज़हब अपना लिया, ईसाई महिला केली क्लासन

इस्लाम धर्म के अनुसार इंसान जब पैदा होता है तो वह हर प्रकार के पाप और गुनाहों से पवित्र होता है।

उसकी प्रवृत्ति, सत्यप्रेम, ईश्वर की तलाश में रहने वाली और धर्म की ओर झुकाव रखने वाली होती है, वह भलाई की ओर झुकाव रखता है और गुनाह तथा बुराई से दूर रहता है। सूरए रोम की आयत संख्या 30 में ईश्वर कहता है कि तो तुम पूरे अस्तित्व के साथ सीधे व ठोस धर्म की ओर उन्मुख हो जाओ, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसके लिए ईश्वर की ओर से कोई वापसी नहीं है। उस दिन लोग अलग-अलग और गुट-गुट हो जाएँगे।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की प्रवृत्ति होती है और जल्दी बदलती नहीं। अलबत्ता समय गुज़रने के साथ ही बाहरी या अन्य कारकों की वजह से इंसानी प्रवृत्ति में बदलाव भी हो जाता है और इंसान दूसरों के प्रशिक्षण, शिक्षा और अन्य कारणों की वजह से अपनी आदत बदलाव कर लेता है या समय रहते ही उससे दूरी बना लेता है लेकिन यह ईश्वरीय प्रवृत्ति हमेशा उसके साथ रहती है। जब भी इंसान चाहता है वह अपनी पुरानी प्रवृत्ति पर लौट आता है और इस तरह से वह कल्याण हासिल कर लेता है।

यहां पर यह बात बताना ज़रूरी है कि ईसाई धर्म सहित कुछ धर्मों और मतों के अनुसार इंसान जब पैदा होता है कि वह बुरा और गुनहगार होता है। ईसाई धर्मगुरुओं का कहना है कि इंसान के पितामह अर्थात आदम और हव्वा ने उस फल को खाया जिसे खाने से अल्लाह ने मना किया था, उन्होंने खाया और गुनाह किया और इसके परिणाम में हर इंसान उनकी ही पीढ़ी से है इसीलिए वह भी पापी और गुनाहगार है।

यह आस्था कि इंसान पैदा होने के समय से ही पापी और गुनाहगार रहा है, आरंभिक पाप की आस्था कहलाती है। यह आस्था हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद ईसाई धर्म में प्रविष्ट हुई जो किसी भी बुद्धि और तर्क से मेल नहीं खाती। जैसा कि पवित्र क़ुरआन बारम्बार इस बात पर बल देता रहा है कि हर इंसान अपने अच्छे और बुरे कर्म का ज़िम्मेदार है और दुनिया में कोई भी इंसान दूसरे के पाप की वजह से सज़ा नहीं पाएगा, विशेषकर यह कि हज़रत आदम ने जब वह फल खाया जिसके लिए उन्हें मना किया गया था, तो उन्होंने फल खाने के बाद प्रायश्चित किया और ईश्वर ने उनके पापों को क्षमा कर दिया।

आरंभिक पाप पर आस्था रखने वाले ट्रिनिटी जैसी आस्था पर ईमान रखते हैं। इसीलिए सुश्री केली क्लासन सहित बहुत से ईसाई लोगों को बहुत अधिक समस्याओं का सामना होता है। ट्रिनिटी या त्रित्व ईसाई धर्म का केंद्रीय तथा गूढ़तम धर्मसिद्धांत ईश्वर के आभ्यंतर स्वरूप से संबंधित है जिसे ट्रिनिटी अर्थात् त्रित्व कहते हैं। त्रित्व का अर्थ है कि एक ही ईश्वर में तीन व्यक्ति हैं, पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा,अर्थात फ़ादर, सन एंड होली गोस्ट)। ये तीनों समान रूप से अनादि, अनंत और सर्वशक्तिमान् हैं क्योंकि तर्क के बल पर मानव बुद्धि केवल एक सर्वशक्तिमान् सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्व तक पहुँच सकती है। वस्तुत: त्रित्व के धर्मसिद्धांत पर इसीलिये विश्वास किया जाता है कि उसकी शिक्षा हज़रत ईसा ने दी है।

केली क्लासन इस बारे में कहती हैं कि जब मैं बच्ची थी तो मुझे आरंभिक पाप की बात बहुत परेशान करती थी, मैं सोचती थी कि अगर कोई बच्चा बिना बपतिस्मा के अगर दुनिया से चला जाता है तो वह नरक में जाएगा, यह बात मेरी समझ से परे थी। क्लासन अमरीका में पैदा हुईं और वह कनाडा में जीवन व्यतीत कर रही थीं। उन्होंने बचपन में इस प्रकार की अतार्किक आस्था पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और कैथोलिक स्कूल में अपनी पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा।

क्लासन कहती हैं कि जवानी में उनको अंदर से कुछ चीज़ें खाए जा रही थीं और उनके दिमाग़ में अलग अलग तरह से सवाल पैदा हो रहे थे, ईसाई धर्म पर उनकी आस्था की पकड़ धीरे धीरे कमज़ोर होती गयी जबकि दूसरी ओर इस अध्यात्मिक शून्य को भरने और मन की शांति के लिए वह दूसरे रास्ते की तलाश में निकल पड़ीं। वह चाहती थी कि कोई दूसरा रास्ता हो जो उनकी बातों का जवाब दे और उनके मन में पैदा होने वाले सवालों का सही सही और विश्वसनीय जवाब दे।

कैली क्लासन को इस्लाम धर्म के बारे में कुछ भी पता नहीं था और इसके बारे में उन्होंने इससे पहले कभी नहीं सुना था। वह इस बारे में कहती हैं कि मुझे इस्लाम धर्म का कोई आइडिया नहीं था, न तो मैं किसी मुसलमान को जानती थी और न ही इस्लाम धर्म के बारे में मैंने कुछ सुना था। अगर कोई उस समय मुझसे इस्लाम धर्म के बारे में सवाल करता था तो मैं कहती थी कि मुझे कुछ पता नहीं है, मैं समझती थी कि मुसलमान सुअर का मांस नहीं खाते और सिर पर स्कार्फ़ बांधे रहते हैं, मैं इस्लाम के बारे में इतना ही जानती थी, मैं इस्लाम के बारे में और अधिक जानना भी नहीं चाहती थी।

कैली क्लासन कहती हैं लेकिन दयालु और कृपालु ईश्वर हमेशा अपने बंदों को अवसर देता है ताकि वह ईश्वर की खोज की अपनी प्रवृत्ति की ओर लौट सकें और वास्तविक कल्याण हासिल कर ले। इसीलिए मुक्ति पाने वाली यह ईसाई महिला कहती हैं कि जब मैं अतीत पर नज़र डालती हूं तो मैं देखती हूं कि ईश्वर ने मेरा बहुत साथ दिया, मैंने ही ईश्वर की ओर से नज़रें मोड़ ली थीं और उसकी ओर पीठ कर ली थी। इसके बावजूद उसने हमेशा मेरा साथ दिया, मैं समझती हूं कि मेरे जीवन में ईश्वर की बहुत ज़्यादा कमी है।

अंततः कैली क्लासन इन्टरनेट के माध्यम से कुछ मुसलमानों से परिचित हुईं लेकिन उनसे बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं हुआ, इन्हीं में से एक ने उन्हें किसी के भाषण की एक क्लिप भेजी जिसमें एक मुस्लिम वक्ता, उनके मन में पैदा होने वाले आरंभिक पाप की शंकाओं का जवाब दे रहे थे। वह उस भाषण के बारे में अपने दृष्टिकोण बयान करते हुए कहती हैं कि भाषण में आरंभिक गुनाह के विषय पर चर्चा की गयी थी। अलबत्ता चूंकि बचपन से ही मेरे मन में यह सवाल पैदा होता रहा है इसलिए वक्ता ने जो बयान दिया वह बहुत ही अच्छा था। मैं समझती हूं कि पूरा बयान लगभग आधे घंटे का था, उसमें जो बातें बयान की गयीं वह सब तर्क संगत थी, उदाहरण के तौर पर आरंभिक गुनाह का मुद्दा, हज़रत आदम व हव्वा के बारे में उन्होंने बहुत ही हटकर बयान किया जो मेरे लिए बहुत ही रोचक थी।

वह कहती हैं कि इस भाषण को सुनने के बाद मुझे यह एहसास हुआ कि मैंने सही मार्ग पर क़दम रखा है और यही रास्ता मेरे लिए सबसे अच्छा है, मैंने इस्लाम के बारे में अध्ययन शुरु कर दिया और चूंकि मेरा कोई मुस्लिम दोस्त नहीं था इसीलिए इस्लामी पुस्तक तक मेरी कोई पहुंच नहीं थी। मैंने इन्टरनेट द्वारा किताबों का अध्ययन किया और भाषणों को सुना। अब इस्लाम धर्म की ओर मेरा रुझान बढ़ रहा था।

सुश्री क्लासन कहती हैं कि इस्लाम के मूल सिद्धांत, अर्थात एकेश्वरवाद, ईश्वरीय मार्गदर्शन और प्रलय है। इंसान एक ईश्वर पर आस्था रखे और यह आस्था रखे कि ईश्वर ने उसके मार्गदर्शन के लिए अपने दूत भेजे हैं और यह आस्था रखे कि मरने के बाद प्रलय में उसका हिसाब किताब होगा। इस्लाम धर्म चिंतन मनन और तर्क का धर्म है। यही कारण है कि वह अपने चाहने वालों से यह चाहता है कि वह अपने धर्म के सिद्धांतों को तार्किक दलीलों और बौद्धिक तर्कों द्वारा हासिल करें ताकि मज़बूत ईमान और सच्ची आस्था के साथ धर्म पर अमल करें।

कैली क्लासन इस्लाम धर्म में रुचि रखने लगीं और उन्होंने अब पवित्र क़ुरआन की तिलावत भी शुरु कर दी, पवित्र क़ुरआन की तिलावत ने उनके मन की कई गुत्थियों को सुलझा दिया। क्लासन कहती हैं कि इस ईश्वरीय पुस्तक ने मुझको बहुत प्रभावित किया और मैं क़ुरआने मजीद में बहुत ज़्यादा रुचि लेने लगी, मैं दिन रात क़ुरआने मजीद की तिलावत करती थी या यूं कहें कि जब भी मुझे मौक़ा मिलता मैं क़ुरआन उठा लिया करती और पढ़ने लगती जिसकी वजह से मेरे मन में मौजूद कई सवालों के जवाब मुझे मिल गये।

अमरीका की यह नई मुस्लिम महिला कहती है कि पवित्र क़ुरआन की तिलावत बहुत ही सुन्दर है, मैं जब भी ख़ाली रहती या मुझे ग़ुस्सा आता था, मैं क़ुरआन निकाल कर पढ़ने लगती थी, मैं क़ुरआन को उसी जगह से शुरु करती थी जहां मैंने कल छोड़ा होता था। मैं एक पूरा सूरा पढ़ना चाहती या जब मैं परेशान रहती तो क़ुरआन की तिलावत मुझे अजीब तरह की शांति प्रदान करती थी। वह मुसलमानों से अपील करती हैं कि पवित्र कुरआन के साथ रहें और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से सही इस्लाम समझने की कोशिश करें क्योंकि यही वह सक्षम और योग्य लोग हैं जो पवित्र क़ुरआन की सही व्याख्या करते हैं।

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