दुनिया

आज इस्राईल सीरिया और हिज़्बुल्लाह के मिसाइलों के डर से थर-थर कांप रहा है : रिपोर्ट

इस्राईली प्रधानमंत्री नफ़ताली बेनेत को घमंड और द्वेष ने इस तरह अंधा कर दिया है कि वह मध्यपूर्व में तेज़ी से बदल रहे हालात को देख ही नहीं पा रहे हैं। ख़ास तौर पर सीरिया में मौजूद ज़मीनी हालात से वह पूरी तरह बेख़बर हैं।

हमारी इस बात का सुबूत बेनेत का वह बयान है जो उन्होंने मैकोर रीशोन नामक अख़बार की ओर से आयोजित किए गए कार्यक्रम में गोलान हाइट्स के बारे में दिया।

बेनेत ने इस कार्यक्रम में बड़े जोश में कहा कि सीरिया के बारे में विश्व समुदाय का दृष्टिकोण बदल जाता है तब भी गोलान हाइट्स इस्राईल के ही पास रहेंगी। उन्होंने अपने भाषण के आख़िर में कहा कि गोलान हाइट्स इस्राईल की हैं बस!

बेनेत और उनके सारे दक्षिणपंथी नस्लवादी घटकों की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि 55 साल पहले जिन हालात की वजह से इस्राईल को गोलान हाइट्स पर क़ब्ज़ा करने का मौक़ा मिल गया था वह अब राजनैतिक, सामरिक, अरब और अंतर्राष्ट्रीय हर पहलू से पूरी तरह बदल चुके हैं। 1967 के युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाने वाली इस्राईली वायु सेना अब कोई भी युद्ध नहीं जीत पा रही है। सीरिया की यह हालत है कि वह दस साल से ज़्यादा समय से अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय साज़िशों और चढ़ाई का सामना करते हुए अपने आप को बचाने में कामयाब रहा है।

 

आज इस्राईल सीरिया और हिज़्बुल्लाह के मिसाइलों के डर से थर थर कांप रहा है। ग़ज़्ज़ा पट्टी में मौजूद फ़िलिस्तीनी संगठनों ने पूरे इस्राईल को हालिया युद्ध में बेबस करके रख दिया था। हालत यह हो गई थी कि अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन बीच में कूदे और उन्होंने मिस्र पर दबाव डालकर संघर्ष विराम करवाया।

बेशक सीरिया के भीतर होने वाले इस्राईली हवाई हमलों पर भी हमारी नज़र है लेकिन हमें यक़ीन है कि गोलान हाइट्स से इस्राईल को शिकस्त खाकर निकलना पड़ेगा बल्कि सारे अरबी इलाक़े उसे ख़ाली करने पड़ेंगे।

जब अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका को शिकस्त हो गई और इराक़ से भी कुछ ही दिनों के भीतर उसे अपनी सेना बाहर निकालनी है तो फिर इस्राईली सेना की क्या औक़ात है कि वह सीरियाई इलाक़ों में क़ब्ज़ा करके वहीं जमी रहेगी।

लेबनान में हिज़्बुल्लाह, गज़्ज़ा पट्टी में फ़िलिस्तीनी संगठनों, इराक़ में हश्दुश्शाबी और यमन में अंसारुल्लाह के पास जो मिसाइल हैं उनकी ताक़त और सटीक निशाने का लोहा अब सारी दुनिया मान चुकी है। इन मिसाइलों ने सऊदी अरब के भीतर अमरीकी पैट्रियट और थाड सिस्टम को नाकाम बना दिया। इस्राईल का आयरन डोम फ़िलिस्तीनी मिसाइलों के सामने फ़ेल हो चुका है।

सीरिया के पास इन सारे हथियारों से अधिक ताक़तवर हथियार उसका स्ट्रैटेजिक संयम है। आज सीरिया बहुत बड़े संकट से उबर चुका है और बहुत ताक़तवर बनकर उभरा है। आज सीरिया उस प्रतिरोधक मोर्चे का हिस्सा है जो आज तक अपना कोई भी युद्ध हारा नहीं है। जब इस्राईल ने गोलाइन हाइट्स पर क़ब्ज़ा किया था उस समय सीरिया इस मोर्चे का हिस्सा नहीं था क्योंकि यह मोर्चा तब बना नहीं था।

बेनेत से हमें बस यह कहना है कि इस्राईल 1967 के बाद से आज तक एक भी युद्ध जीत नहीं सका है। गोलान हाइट्स सीरिया का इलाक़ा है और उसके पास वापस जाएगा जिस तरह सीरिया के दूसरे इलाक़े आतंकियों के क़ब्ज़े से आज़ाद होकर उसके पास लौटे हैं। इसी के साथ पूरा फ़िलिस्तीन फ़िलिस्तीनियों को वापस मिलेगा। बस इंतेज़ार कीजिए।

 


लेबनान के हिजबुल्ला (Hezbollah) के सरगना हसन नसरल्ला(Hassan Nasrallah) ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि एक साल में उन्होंने गाइडेड मिसाइलों का जखीरा दोगुना कर दिया है। यह मिसाइल इजरायल में कहीं भी हमला करने में सक्षम। बेरुत, एजेंसी। हिजबुल्ला हथियारों का जखीरा लगातार ब़़ढाता जा रहा है।

– 29-Dec-2020

Hezbollah’s rocket force
The mainstay of Hezbollah’s rocket force are small 122mm artillery rockets known by the generic term “Katyusha”. The name – which means “little Katy” in Russian – was coined more than 60 years ago by Soviet Red Army troops who fired them at the invading German army.

During World War II the Katyushas’ distinctive screech cast a powerful psychological spell over the enemy. In northern Israel today, later versions of the rocket remain crude, yet often effective, weapons.

Hezbollah’s Katyushas are thought to derive mainly from former Soviet and Chinese stockpiles. A typical example is the Soviet BM-21 Grad missile, which was first deployed in 1963 and has a maximum range of about 25km.

Because of their lack of a guidance system, Katyushas have the greatest effect when launched in concentrated numbers.

Since 2001, Hezbollah is believed to have acquired a number of truck-mounted Multi-Barrel Rocket Launchers [MRBL], enabling them to fire such multiple barrages.

Images broadcast recently by Hezbollah’s TV station appeared to show what the group described as a Ra-ad 1 missile being fired. Military analysts believe this missile was an Iranian-built Shahin I missile, which has a range of about 13km.

Recent missile strikes on Israel’s northern port city of Haifa indicate that Hezbollah may also have acquired longer-range missiles.

Most of these are believed to be Iranian-manufactured systems like the Fajr-3, with a 45-km range; the Fajr-5, with a range of some 75km.

Some analysts believe that Hezbollah also has the more potent Zelzal-2 which has a claimed range of 200-400km and can be fitted with a 600kg high-explosive warhead. Its solid fuel system means that it can be more easily transported and prepared for firing.

Most analysts believe a more realistic range to be about 100km, but this would still bring much of Tel Aviv – Israel’s largest population centre – within its range.

None of these are guided or accurate systems, but often accuracy is not important if the target is an urban area.

– 18 July 2006

 

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